शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2025

ऐसी अपनी काशी(1960--2025)

                   आज मैं अपने  जिस शहर पर स्वतः की अनुभूति अंकन का प्रयास कर रहा हूँ वह हमारे जनपद का मुख्यालय वाराणसी है जिसे कभी काशी ,कभी आनंदवन और सामान्यतः बनारस या वाराणसी नाम से जाना जाता है ।यह कथ्य नहीं अपितु अन्वेषित तथा स्थापित तथ्य है कि बनारस इस धरती  का प्राचीनतम जीवंत नगर है जो अनादि काल से  अपनी ज्ञानाभा से सम्पूर्ण जगत को आलोकित करता रहा है और इसी कारण आगे बढ़ती सभ्यता में सदैव यह नगर अनुकरणीय और आदरणीय रहा है । हमारे सनातन धर्म , संस्कृति तथा संस्कार का यह नगर अविरल श्रोत रहा है जिससे हम समस्त संसार में फैले सनातनी अनुप्राणित होते रहे हैं । हर काल खण्ड में, अनगिनत  मत ,मतांतर ,संप्रदाय  आग्रह या दुराग्रह यहाँ आते रहे और अंततः यहीं से मान्य होकर  इस धरा पर या तो फले- फूले या  अमान्य हो कर सिमट गए ।अतीत में अनेकानेक सभ्यताओं के साथ अनवरत संघात के बाद भी इस नगर ने अपना बनारसीपन और अक्खड़ स्वभाव सदैव बनाए रखा और यही इस काशी की अद्वितीय पूँजी रही है जो इसे सबसे अजब और गजब  बनाती है ।तभी तो लोकोक्ति  है कि चना ,चबैना ,गंग जल जो पुरवै करतार ;काशी कबहु न छाड़िए विश्वनाथ दरबार ।यहाँ के अक्खड़ियों ने और न जाने क्या क्या कह रखा है यथा काशी कबहु न छोड़िए ,काशी अद्भुत धाम ,मरने पर मुक्ति मिले ,जीते लंगड़ा आम या जहाँ की मिट्टी पारस है ,उस शहर का नाम बनारस है  या खाइ के पान बनारस वाला खुल जाय बंद अकल का ताला या कि गंगा जल अस जल नहीं ,नहिं काशी अस धाम आदि ,आदि ।    

*****हमारा भारत स्वाधीन हो चुका था जब इसी जनपद के एक गाँव के मध्य वर्गीय परिवार में मेरा जन्म हुआ ।लड़कपन में सांझ को रोशनी के लिए लालटेन और ढिबरी को जलते देखा । रास्ते के नाम पर कच्ची पगडंडी और धूलधूसरित सड़कें तथा यातायात के नाम पर बैलगाड़ी,ऊंट, खच्चर या इक्का-दुक्का साइकिलें देखा।घोड़ागाड़ी,बग्गी,तांगे व इक्के भी आवागमन के सुलभ साधन थे ।दस -ग्यारह वर्ष की वय मे एक कार्तिक पूर्णिमा के दिन अपनी चाची जी के सौजन्य से बनारस शहर देखा तो रोमांच की सीमा न रही ।  इस शहर में रात को सड़कों और घरों में बिजली की चकाचौंध रोशनी देख कर मै चौंक गया था और मेरे अन्तर्मन में स्वर्ग की एक आभाषी छबि बनी थी ।तदन्तर आने जाने और रुकने का सिलसिला यहाँ अंततः बस जाने तक जारी रहा। जिसने कभी कार्तिक पूर्णिमा की भोर में इंद्रधनुषी जगमग घाटों से लिपटती हुई कलकल बहती देवपगा की छबि से स्मृतियों पर अमिट छाप छोड़ा ,वह अमरावती को पीछे छोड़ने वाला जीवंत शहर आज कहीं खोता जा रहा है । उम्र बढ़ती गई ,न जाने कितनी  बार उन गलियों ,सड़कों, सीढ़ियों, घाटों तथा गली -मुहल्लों एवं बाजारों की परिपरिक्रमा किया और कभी दिन ,कभी चाँदनी रात के समय गंगधार मे नौका विहार किया । यहाँ तक कि देव दीपावली जैसे पर्वों पर अपार भीड़ की धक्कामुक्की भी झेला परंतु अपने उस पुराने शहर के शहरीपन तथा बाँकपन को क्रमशः क्षरित होते पाया । तब की मानसपटल पर बनी मनोहर  दृश्यावली को पुनः पुनः देखने की जिज्ञाशा होती रही  परंतु उस शहर और उस अनुभूति को कभी वापस नहीं पाया ।

*****जब भी कभी बनारस से पूछा कि तुम कहाँ खोते जा रहे हो तो प्रतिध्वनि हुई "कहाँ ठहर गए हो? अपनी आज की गंगा में तुम भारतेन्दु कालीन गंगा ढूँढ़ रहे हो कि "नव उज्ज्वल जल धार हार हीरक सी सोहति ,बीच बीच छहरति बूंद मध्य मुक्तमनि पोहति।सुभग स्वर्ग सोपान सरिस सबके मन भावत ,दर्शन मज्जन पान त्रिविध भय दूर मिटावत।" वे दिन भूल जाओ जब जान्हवी किनारे पहुँचते ही चुल्लू पर चुल्लू जल पीने ,नहाने और लोटे में जल भर कर महादेव को चढ़ाने के लिए लोग मचल जाया करते थे ।अब तो उसी गंगा का जल न पीने योग्य है न नहाने ।जाकर गंगा की सहायिका वरुणा की दुर्दशा और दुर्गंध युक्त मलजल प्रवाह तो देखो । यह वही वरुणा है जिसको प्रसाद जी यूं पुकारते थे --अरी ! वरुना की शांत कछार ,तपस्वी के विराग की प्यार । इन देव नदियों के असंख्य जलचरों का, मानव जनित दोहन व गंदगी से,अस्तित्व मिट गया ।अस्सी नदी का तो कहना क्या -इस नाम का एक नाला अपने अतीत पर रो रहा है । क्यों का उत्तर तो तुम सब जानते हो ।"उलहना भरी यह बनारस वाणी हमें जब तब ब्यथित और नि:शब्द कर जाया करती है । फिर भी परंपरा को तो आगे बढ़ते जाना है । अब वरुणा और अस्सी नदियों के बीच बसी इस वाराणसी में जो बची है ,वह इस कलियुग के विषय में बाबा तुलसी दास द्वारा वर्णित "जॅह वस सम्भु भवानि,सो कासी सेइअ न कस ।या " महा मंत्र जोइ जपत महेसू ।कासी मुकुति हेतु उपदेसू।" वाली हिन्दुओं की सनातनी आस्था है जिस कारण देश- विदेश से भारी संख्या में तीर्थयात्री अब भी मज्जन, दर्शन,पान के पुण्यलाभ हेतु आते रहते हैं, आते रहेंगे और  आज की आधुनिकता के दौर में भी यहाँ के अध्यात्मिक, धार्मिक,सांस्कृतिक वैभव की चकाचौंध से चमत्कृत होते रहेंगे ।

*****कभी मन में आया कि उषा बेला में बनारस के घाटों पर घूमें और सुबह ए बनारस से गलबहियां करें तब नि:संदेह इसे यथावत जीवन्त पाया । तब देखा,सुना कि मंदिरों में घंटा ,घड़ियालों की कानों में गूँजती ध्वनि -प्रतिध्वनि ,भजन गाते घाटों की सीढ़ियाँ पर उतरते-चढ़ते स्नानार्थी ,बड़ी बड़ी छतरियों तले बैठे पंडित-पंडों से श्रद्धा के साथ तिलक लगवाते ,मंत्रोच्चारण करते फिर गंगाजल लेकर देवालयों के लिए सीढ़ी चढ़ते ध्यानमग्न भक्त, प्राचीन परंपरा को यथावत आगे बढ़ाते हुए, ऐसी नैसर्गिक समा बांधते हैं कि मानो तीनों लोक से न्यारी काशी महादेव के नृत्य व डमरू निनाद से गुंजित हो रही है ।सूर्योदय की ओर बढ़ती उषाकाल में जब आकाश के तारे शांत जलधारा में डूबने लगते हैं और पूर्वी क्षितिज पर उभरती लालिमा सूर्योदय की सूचना देती है तब इंद्रधनुषी घाटों की सीढीपर पूर्वोन्मुखी खड़े हो गंगधार के साथ बाल रवि की सुनहरी किरणों के साथ चंचल अठखेलियाँ आज भी निहारते ही बनती हैं। फिर क्षितिज पर ऊपर उठते दिनकर के साथ शनैः-शनैः घाटों का शहर बनारस सुबहे बनारस से आगे यहाँ की गलियों ,मुहल्लों की ओर बढ़ जाता है ।यहाँ के शहरियों में प्रातरास व दिनचर्या की विविधता भी बड़ी प्यारी और न्यारी रही है जिसमें खाटी बनारसी भोज्य वस्तुओं के साथ हर राज्य की विशेष खान पान की सुलभता रहती है।आस्था के चलते सुबह ए बनारस में आज भी यह विशिष्ठ  निरंतरता बनी हुई है जब कि घोर प्रदूषण,आधुनिकता और आर्थिकी अपना असर डालने लगी हैं ।    

 *****मोक्षदायिनी काशी पुराधिपति बाबा विश्वेश्वर की शीर्षतम पीठ होने के कारण सनतानियों की यह सर्वोपरि तीर्थस्थली है और अनादि काल से हर अमीर-गरीब हिन्दू की कामना होती है कि जीवन में ज्यादा नहीं तो कम से कम एक बार काशी यात्रा कर लें और मोक्षदायिनी गंगा में स्नान और जग तारनहार बाबा विश्वेश्वर के दर्शन हो जाँय ।यही प्रेरणा शक्ति थी कि यहाँ इद्रधनुषी गंगा के पश्चिमी खड़े छोर पर आदि केशव से संत रविदास घाट तक इतिहास के क्रमिक काल खण्डों में भारत के बहुत से राजा-महाराजाओं ने पक्के घाट ,धर्मशाला ,किलेनुमा महल,मंदिर और बेधशाला बनवाए । सदियों पूर्व लगभग हर राज्य से काशीवास के इच्छुक संभ्रांत लोगों ने अलग अलग मुहल्ले बसा डाले और कालांतर में यह शहर एक सम्पूर्ण लघु भारत बन गया ।ऐसी न्यारी काशी में आर्यावर्त के कोने -कोने से बड़े बुजुर्ग , बृद्ध,,विधवा ,आश्रित ,निराश्रित ,संत ,सन्यासी आदि काल से मोक्ष की लालसा में काशीवास करते रहे हैं।कुछ लोग तो मोक्ष भवनों में वास ,या करवट काशी लेते हैं ताकि नश्वर शरीरत्याग के साथ वे कबीर के राम निहोरा व भोले नाथ की कृपा से जीवन -मरण के बंधन से मुक्त हो जाँय । बौद्ध धर्म प्रवर्तक भगवान बुद्ध की प्रथम उपदेशस्थली सारनाथ व उनके अनुयाई सम्राट अशोक द्वारा वहाँ स्थापित अशोक स्तंभ जो हमारे भारत का राजचिन्ह भी है ,बनारस के अनन्य वैभव हैं ।जैन धर्मावलंबियों के कई तीर्थंकर यथा पार्श्वनाथ, चन्द्रदेव इसी भूमि पर अवतरित  हुए ।रामनगर के काशी नरेश का स्वागत यहाँ हर हर महादेव के उद्घोष से होता है और यहाँ मंचित विश्वप्रसिद्ध रामलीला देखे बिना वर्णनातीत है। इस सर्वविद्या की राजधानी में संस्कृत से संस्कार तक,सगुण से निर्गुण तक ,रीति से नीति तक ,शिक्षा से साहित्य तक,राजशाही से लोकशाही तक स्वनाम धन्य विशाल बटबृक्ष सी विभूतियाँ अवतरित होती रही हैं और अपनी साधना तथा योगदान से दुनियाँ में इस शहर को मुकुटमणि की भाँति दमकाती रही हैं ।कुछ स्वनामधन्य विभूति यथा संत कबीर,संत रविदास ,गोस्वामी तुलसीदास, भारतेन्दु हरिश्चंद्र,आचार्य रामचंद्र शुक्ल ,मुंशी प्रेमचन्द,  जयशंकर प्रसाद, शिव प्रसाद गुप्त,पंडित मदन मोहन मालवीय, लाल बहादुर शास्त्री,डा. संपूर्णा नन्द तो बनारस के पर्याय सा पहचान रखते हैं ।पिछले ग्यारह वर्षों से हमारे सांसद व भारत के यशस्वी प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी बनारस के ग्रोथ इंजन बने हुए हैं । यह शहर नित्य विकास की नई नई ऊंचाइयां छू रहा है और बदलाव की द्वितियो नास्ति कहानी बन रही है । दूसरी ओर इस बदलाव में बरसों पूर्व के बनारस की निजता का धीमे-धीमे क्षरण भी होता जा रहा है ।

*****इस शहर को सिरमौर बनाने में बनारसी पान ,बनारसी साड़ी ,बनारसी लंगड़ा आम ,बनारसी हस्तशिल्प और हाथकरघा उत्पाद के साथ ,बनारस की गलियों और बनारसी अणियों का भी बड़ा योगदान रहा है ।और तो और यह शहर  संस्कृत ,वेद ,वेदान्त,ज्योतिष के अध्ययन, अध्यापन और देशी कुश्ती ,पहलवानी ही नहीं संगीत व नृत्य को भी आज तक जीवंत रखने में गुरुकुल एवं घराना परंपरा का ध्वजवाहक बना हुआ है ।                                                    ******अच्छाई के साथ बुराई न हो ,यह तो संभव ही नहीं है।ऐसे में काशी के इन बहुआयामी श्लाघनीय आयामों के साथ अनेक बुराइयाँ भी पनपती रहीं हैं जैसे यहाँ प्रवासी तीर्थयात्रियों और साधु -संतों को लोग काशीप्रवास में सँकरी गलिओं ,बहुतायत साँड़ों(नंदी )और सीढ़िओं से सावधान रहने की परामर्शी जारी करते रहते हैं ।एक बहुत प्रचलित कहावत भी है "राँड़ ,साँड़ ,सीढ़ी ,सन्यासी ;इनसे बचे तो वास करे काशी"।इनसे भी बड़ी आफत तो  बनारसी ठग और बनारसी जेब कतरे हैं जो अनेकों भोले भाले यात्रियों को अपना शिकार बनाते रहे हैं और इस धर्म नगरी को बदनाम करते रहे हैं । भारतेंदु जी का बनारस निरूपण कुछ यूँ रहा है ----"आधी कासी भाट ,भडेरिया,बाम्हन और सन्यासी ।आधी कासी रंडी,मुंडी,रांड,खानगी,खासी ।लोग निकम्मे,भंगी,गंजड़ ,लुच्चे,बेविस्वासी ।देखी तुम्हरी कासी ।"आज यह एक व्यवस्थाविहीन शहर बन चुका है ।काशी में आगन्तुक भ्रमणार्थियों को हर कदम पर;चाहे रिक्शा ,ऑटो या टैक्सी चालक हों ;चाहे होटलवाले या गाइड हों ;चाहे पंडे या पुजारी हों ;अथवा बनारसी साड़ी या अन्य विशिष्ठ उपहार व्यवसायी हों; ए अधिकांश लोग ,सारी नैतिकता ताख पर रख  ठगने और आर्थिक दोहन का प्रयास करते हैं।उचित या वाजिब दर के शायद यहाँ कोई मायने नहीं हैं।यहाँ ऐसे हुनरबाज भी हैं जो नकली चीजों को असली से बेहतर असली सिद्ध करते हुए क्रेता को उल्लू बना देने में माहिर होते हैं ।किसी को बुलाने या बातचीत में प्रायः यहां  गुरू नामक संबोधन बहुत प्रयोग होता है।दर्शनार्थी को इस गूढ रहस्य वाले गुरु शब्द से भी सावधान  रहना होता है । एक गुरु ने दूसरे गुरु से क्या कहा और तीसरे गुरु ने अपना काम कर लिया ,यह भी बनारस की एक अबूझ पहेली बनी रहती है ।  

 *****कालक्रम में जैसे जैसे सन् उन्नीस सौ साठ के बाद चलचित्र का प्रभाव बढ़ता गया, शिक्षा की ओर समाज का रूझान बढा ,संपर्क के संचार माध्यम बढे और गतिशीलता बहुत तीब्र होने लगी दुनियां एक छोर से दूसरे छोर तक सिमटने लगी।और संगणक फिर मोबाइल के हाथ में आते-आते आज शहरों तथा देशों की पहुंच ,जानकारी व संपर्क सबके हाथ मे सुशोभित मोबाइल के परदे पर आ गई है।परिणामरूप लोग ब्यवसाय नौकरी,शिक्षा,और सुविधापूर्ण जीवन की आशा मे गांव से शहर ,एक शहर से दूसरे शहर या एक देश से दूसरे देश मे प्रवास करने लगे हैं। हर आधुनिक शहर की भाँति अधिकाधिक प्रवासन  के कारण  बनारस की आबादी मिश्रित ही नहीं दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ रही है साथ ही इसकी निज भाषा भी गौड़ हो रही है। शहर चौतरफा फैलता जा रहा है ,सड़कें चौड़ी की जा रही हैं ,उपरिगामी सड़कों का जाल बन रहा है ,शहर के चारों तरफ रिंग रोड बनाया जा रहा है और गगनचुम्बी बड़े बड़े भवन तन रहे हैं । हजारों की संख्या में निजी क्षेत्र के चिकित्सालय, शैक्षिक संस्थान, होटल, माल,फूड चेन चल पड़े हैं ।फलत: बनारस की डेमोग्राफी व जीवन शैली तीब्रतर गति से बदलती जा रही है और जल्द ही बनारस में ही बनारसीपन ढूंढना कठिन हो सकता है।

*****सच सभी स्वीकार करते हैं परंतु कड़वे सच को बहस में उलझा दिया जाता है ।ऐसा ही एक कड़वा सच है बनारसियों की अनुशासन- हीनता जिसका शिकार आप यत्र तत्र सर्वत्र होते हैं ।सडकों पर बाइकर्स,कार चालकों द्वारा यातायात नियमों को धता बताना,यातायात वाली मुख्य सडकों पर गाडियों का रेलम-रेला व पूरे दिन सडकों का जाम रहना ,बाहरी यात्रियों व वरिष्ठ शहरियों के लिए अभिशाप बन गये है ।कहीं भी कतार तोड़कर अपना काम कराना या टिकट लेना यहाँ भोकाल माना जाता है और छोटी मोटी बातों पर गाली गलौज को रुतबा ।कहीं कानफोड़ू  बैण्ड के साथ सड़क को घेरे मस्ती में झूमते बाराती पूरी सड़क को बंधक बना लेते हैं और यातायात घंटों तक  पूर्णत: जाम ।सरकारी हो या गैर सरकारी ,भवन हों या खाली स्थान, पान के पीक तो अवश्य ही दिखेंगे,यह है मेरी आज की काशी ।आज यदि बनारस के पास ढेर सारी आधुनिक उपलब्धियाँ  हैं तो सदियों से प्रचलित  अपनी परंपरा के क्षरण का दर्द भी ।थोड़े विलुप्त हो चुके हैं और  थोड़े कगार पर ।लोगों !कुछ ऐसी ही है आज की अपनी काशी । अस्तु ।।************

************************मंगलवीणा

दिनाँक:14.फरवरी 2025

गुरुग्राम,हरियाणा------'----------------

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शुक्रवार, 5 मई 2023

बाइक टैक्सी की सवारी

 *बात  दिनांक 23 मार्च 23 की है ।। प्रातः जल्दी ही मैने अपनी एक्सयूवी ड्राइवर  के साथ पिरियाडिक सर्विस के लिए वाराणसी बाबतपुर मार्ग पर स्थित महिन्द्रा डीलर के यहाँ  भेज दिया था ताकि तीन चार बजे तक गाड़ी घर आ जाय ।यह तो पता ही था कि  सर्विस के बाद ज्योंही भुगतान की बात होगी,ड्राइवर परेशान होगा ।अतः दो बजे तक तैयार  होकर महीन्द्रा पहुँचने के लिए किसी वाहन के जुगाड़ मे लग गया ।एक बार तो सोचा अपनी बाइक से चलता हूँ;पूरी जिन्दगी तो इसी साधन से चलता रहा हूँ ।परंतु अन्दर से तुरंत प्रतिवाद हुआ,"बार बार भूलो मत  कि सत्तर पार कर चुके हो और इक्कीसवीं सदी है ,ऊपर से मोदी जी द्वारा विकसित आज का  बनारस  -चौडी सडकें,कही गाडियों का रेलम-पेल जाम तो कहीं आँधी सी भागती ट्रैफिक।कब कौन उड़नबाज गाड़ीचालक किनारा  पकड़े पैदल राही, साइकिल या बाइक सवार  का छक्का लगा दे या भीम दुर्योधन  के गदा की टकराहट वाली गर्जना के साथ गाड़ियों के परखचे उड़ जाँय;ईश्वर ही मालिक हैं ।सड़क पर अब पहले की न स्थितियाँ रहीं ,न डर ,न सब्र,  न अनुशासन और न ही दूसरे की फिक्र ।सब तरफ भागती दुनियाँ ।अब तो जल्दी पर जल्दी  ,सुरक्षा की ऐसी तैसी । अतः बाइक से जाने की तो सोचो ही मत ।"

*तब मन बनाया कि गूगल की शरण लेता हूँ और ओला एप से टैक्सी या औटोरिक्शा मँगा लेता हूँ । यह जानते हुए भी कि बनारस में यात्रियों के साथ टैक्सी और ऑटो चालकों का बकरी व कसाई सा निश्चित संबंध है सो  किराये में तो बेवकूफ बनना तय था,फिर भी जल्दी निकलने का दबाव था । अंगुलियाँ मोबाईल पर चल ही रहीं थीं कि मुझे अकस्मात एक बाइक सवारी का विकल्प दिखा और वह विकल्प दब गया । किराया जाँचा तो पहुँचबिंदु तक मात्र एक सौ अट्ठारह रुपये दिखा और मेरे घर तक पहुँच समय सात मिनट । ओके करते ही बाइक  चालक  का मोबाईल नंबर और बाइक का विवरण संदेश मोबाईल पर चमक उठा ।श्रीमती जी को आवाज लगाया ,'बाइक टैक्सी आ रही है । मैं निकलता हूँ । काफी सस्ती भी है । "

*पीछे -पीछे श्रीमती जी भी यथा आदत बाहरी दरवाजे तक आ गईं । हमारी नजरें बाइक आगमन वाली सड़क पर एकाग्र हुईं ।पूरी जिंदगी में कभी बाइक टैक्सी से यात्रा करने का संयोग नहीं मिला था । अतः मन में अजीब सा कौतूहल होने लगा । श्रीमती जी को भी बहुत अटपटा सा लगा ।इंतजार ने उस कौतूहल को और बढ़ाया ।तभी हमें बाहर खड़ा देख पड़ोस वाले मेडिकल कम्पाउंडर जी भी पास आ गए और प्रणाम करते हुए  पूछे कि अंकल ,ऑन्टी आप दोनों किसको देख रहे हैं ?बताना ही था - बेटा मैं बाइक टैक्सी की प्रतीक्षा कर रहा हूँ । बस क्या था ;सवालों की झड़ी लग गई ,कभी पहले बाइक टैक्सी की सवारी किए हैं ?आप का ड्राइवर कहाँ गया ?टैक्सी या ऑटो क्यों नहीं बुक कर लिया ?कहीं गिरा- पड़ा दे तो बिन बुलाए समस्या सर पर ।"

*अच्छी गेंद मिली । श्रीमती जी ने भी तगड़ा थ्रो फेंका ,"उम्र के आठवें दशक में प्रवेश कर गए हैं ,फिर भी आप हरकतें बचकानी करते हैं । कहीं चोट चपेट लगे तो यह मत कहिए गा कि चेताया नहीं ।"चुप होने के अलावा मेरे पास कोई बचाव युक्ति नहीं थी । 

 *पुनर्विचार का दौर चलने ही वाला था कि एक हेलमेट लगाया बाइक सवार हमारे सामने ही अपनी बाइक पर ब्रेकलेकर मोबाईल से किसी को फोन मिलाया।अरे ,यह तो मेरे मोबाईल की घंटी बज उठी और यह सुनिश्चित हो गया कि बुलाई गई बाइक टैक्सी यही थी । जो पहचान संदेश में भेजे गए थे ,मिलान में वे ठीक वही निकले ।विमर्श का केंद्र बदल चुका था।तब  हममे से किसी ने उससे सुरक्षा की बात पूछी तो किसी ने इस रोजगार से आमदनी की बात की ।प्रजापति उपनामधारी उस युवक ने हल्की सी मुस्कान लिए जवाब दिया था ,"महँगाई का जमाना है ।अपने से धंध-फंध होता नहीं ।खाली समय मे इसी बाइक से तीन -चार सौ रुपए कमा लेता हूँ जो मेरी मुख्य आमदनी में जुड़ जाता है और गृहस्थी की नाइया ठीक ठाक चल जाती है -अंकल जी । रही बात सुरक्षा की ;तो हम भी परिवार वाले हैं और हमारा भी घरवाले  इंतजार करते हैं ।"हम सभी निरुत्तर थे ।सुरक्षा की इससे बड़ी गारंटी क्या हो सकती थी ।

 *चलो; मैं होकर आता हूँ; बोलते हुए पीछे बाइक पर उछल कर बैठ गया । बाइक गली से मुख्य सड़क पर ,कभी भीड़ में कभी भीड़ से आगे ,कभी बीच सड़क तो कभी बायें किनारे दौड़ती जा रही थी । आदतन मैं "देखो बेटा !सँभाल के या ब्रेक पर ध्यान रखना "दोहराता जा रहा था । इत्मीनान से प्रजापति दायें- बायें ,चौराहे ,तिराहे का पूरा ध्यान रखते हुए सड़क को पीछे छोड़ रहा था और मैं गिरने- पड़ने वाले भय से सशंकित बाइक पर अपनी पकड़ मजबूत बनाने में लगा हुआ था । जाने कब गाड़ी के लयबद्ध चालन व तेज हवा के मनभावन स्पर्श मुझे अच्छा लगने लगे और मैं आनंद के लहरों पर तैराने लगा।फिर इस लघु यात्रा के आनंद में इतना विस्मृत हुआ  कि ब्रेक का झटका लगने पर ही तंद्रा टूटी। लगा  कि टैक्सी रुक गई है और सुन रहा हूँ" अंकल, वर्कशॉप आ गया ।तंद्रा टूटी ।मन में विचार उठा कि काश !वर्कशॉप थोड़ा और दूर होता । 

 नीचे उतर कर मैंने उसे धन्यवाद दिया और किराया पूछा 

अंकल ,वही एक सौ अट्ठारह रुपये ।

बटुए से एक सौ तथा एक बीस का नोट निकाल कर उसकी ओर बढ़ाया । 

*दो रुपये का सिक्का मुझे पकड़ाते हुए वह आगे बढ़ गया और मैं रोमांच की सवारी से उतर कर वर्कशॉप के गेट पर खड़ा था ।इस छोटी सी यात्रा ने मुझे स्फूर्ति और ताजगी से ऐसा भर दिया कि कई घंटों तक वय संबंधी थकान का कहीं अता पता नहीं । । प्रसन्नमन वर्कशॉप में दाखिल हुआ । ड्राइवर से सर्विस की जानकारी लिया और भुगतान के बाद  गाड़ी लेकर ड्राइवर से बातचीत करते घर आ गया । अभी भी याद आने पर वह उन्नीस बीस मिनट की यात्रा कमोवेश रोमांचित कर देती है ।

 सच है कि झुर्रियाँ चेहरे पर पड़ती हैं ,दिल पर नहीं । लड़कपन ,जवानी तथा बुढ़ापा मुख्य रूप से दिल /सोच से जुड़ी मनः स्थितियां हैं न कि उम्र से ; और जीवन में रोमांच,एडवेंचर तथा आनंद देने वाली ऐसी घटनाएँ , यात्राएँ व तदन्तर उनके वृतांत के अनुगमन मन को तरोताजा किंवा जवान कर देते हैं--------------मंगलवीणा  

वाराणसी ,बुद्ध पूर्णिमा ;दिनाँक 5 मई 2023

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मंगलवार, 8 सितंबर 2020

सेंगर राजपूतों का रोमाँचक इतिहास

 सेंगर राजपूतों की एक बसाहट-भदिवाँ  भी -------------------------

***************बालपन से 'आप कौन से राजपूत हैं 'का जवाब 'मैं सेंगर राजपूत हूँ 'कहते सात दशक बीत गए। मन में जिज्ञासा हुई कि ए सेंगर,ए राजपूत कौन हैं  जिनके हम वंशज हैं। फिर मैंने राजपूतों विशेषकर सेंगर राजपूतों के उद्भव ,विस्तार और वर्तमान को उपलब्ध साक्ष्यों ,परम्पराओं ,कुलधर्मिता ,श्रुतियों ,पौराणिक कथाओं और राजपूतों के उपलब्ध इतिहास को देखा ,सुना ,पढ़ा, गुना और धुना। फलतः मैंने इस राजवंश को त्रेतायुगीन श्रृंगी ऋषि से प्रारम्भ होकर आज सम्पूर्ण अविभाजित भारत व श्रीलंका तक विस्तारित पाया।चूँकि कोई क्रमबद्ध इतिहास सुलभ नहीं है अतः टूटी कड़ियों को जोड़ कर 'निश्चित रूप से ऐसा ही था 'वाला इतिहास नहीं बनाया जा सकता। लेकिन मुझे अपने प्रयास से बहुत ही आत्मसंतुष्टि मिली कि हमारी वंश परम्परा कुछ ऐसे ही यहाँ तक पहुँची है।आइए चलते हैं  इस वंश यात्रा पर विहंगम दृष्टि डालने।     

क्षत्रिय कौन,फिर सेंगर क्षत्रिय कौन -----------------------

********हमारे सनातन धर्म या जीवन पद्धति में स्वभावज गुणों से प्रेरित कर्मों के आधार पर  मानव समाज को  चार वर्णों; अर्थात ब्राह्मण ,क्षत्रिय ,वैश्य और शूद्र; में विभाजित  किया गया है। श्री मद्भगवद्गीता के अट्ठारहवें अध्याय  में अर्जुन के वर्ण विषयक शंका का समाधान करते हुए भगवान  श्री कृष्ण ने स्पष्ट किया कि क्षत्रिय कौन है।यथा -

***************शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनं। 

***************दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजं। (१८/४३ )

जिनका बहादुरी ,तेज ,धैर्य ,दक्षता ,युद्ध से अपलायन ,दान तथा ईश्वरभाव से सबका पालन करना स्वाभाविक कर्म है , वे क्षत्रिय हैं। ए ही क्षत्रिय आगे विस्तार पाते हुए छत्तीस उपजातियों में विभाजित हुए। यथा -

***************[+दस रवि से दस चंद्र से ,बारह ऋषिज प्रमान।**

*************** चार  हुतासन सों भयो ,कुल छत्तीस वंश प्रमाण। ]

इन्ही बारह ऋषि वंशजों में सेंगर राजपूत प्रथम वरीयता क्रम में आते हैं। सेंगर अपनी आध्यात्मिक रूझान , संघर्षशक्ति एवँ बहादुरी के अतिरिक्त अपने संस्कार और सभ्यता के लिए सम्पूर्ण राजपूतों में आदरणीय रहे हैं। क्षत्रिओं के श्रृंगार कुल होने के कारण भी इन्हें सेंगर कहते हैं।इन ऋषिवंशी राजपूतों का गोत्र गौतम ,वेद यजुर्वेद ,गुरु विश्वामित्र व कुलदेवी विंध्यवासिनी हैं।इनका पहचान ध्वज लाल होता है तथा पूज्य नदी सेंगर है। बलिया संभाग के राजपूतों के कुलदेवता श्रीनाथ जी रसरा बलिया हैं। ए राजपूत दशहरे के दिन कटार की पूजा करते हैं।  

**************************सेंगरों की वंश परम्परा ****************************************

रामायणकालीन साक्ष्य एवँ वर्तमान तीर्थस्थल :------------------------

***************श्री राम की बड़ी बहन  शान्ता थीं जिनकों ग्रहीय प्रतिकूलता के कारण श्री दसरथ जी एवँ माता कौशल्या ने अंगदेश के राजा रोमपद व रानी वर्षिणी को पालन हेतु गोंद दे दिया। रानी वर्षिणी और कौशल्या जी सगी बहनें थी। इस प्रकार शान्ता की परवरिश उनकी मौसी और मौसा ने किया। एक समय जब अंगदेश में बहुत  भीषण अकाल पड़ा तब  राजा ने महर्षि विभाण्डक के युवा तपश्वी पुत्र श्रृंगी ऋषि को बुला कर इन्द्र पूजन का अनुष्ठान करवाया जिससे अंगदेश में खूब वर्षा हुई और सर्वत्र खुशहाली की लहर दौड़ पड़ी। राजा और रानी अति प्रसन्न होकर  शान्ता का हाथ श्रृंगी ऋषि को सौंप दिए।इस दम्पति को दो संतानें हुई ;1. अर्गल से गौतम वंश और 2. पदम से सेंगर वंश चला।चूँकि पौराणिक काल से अंग देश बिहार के पूर्वी भाग व बंग के पड़ोस में स्थित रहा है अतः  सेंगरों की वंश परंपरा वर्तमान में बिहार के लखीसराय  (अंग देश )से ही प्रारम्भ होती प्रतीत होती है।  यहाँ आज भी श्रृंगी ऋषि धाम नामक एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है। मान्यता है कि यहीं पर श्रृंगी ऋषि और शान्ता की जीवन यात्रा से ऋषि वंश सेंगरों की उत्पत्ति हुई थी और यहीं आश्रम में श्री राम तथा उनके भाइयों का मुंडन संस्कार भी संपन्न हुआ था।परन्तु यह भी सत्य है कि रामायण काल में  आगरा क्षेत्र में रुनकता के पास यमुना किनारे सिंगला गांव में  श्रृंगी ऋषि की एक  तपोस्थली थी जहाँ पर पूर्व वर्णित  इनकी दोनों पुत्र संतानें पैदा हुई थीं। यह आज भी एक दर्शनीय स्थल है।वर्तमान में सेंगरों की सर्वाधिक बसाहट का आगरा से चल कर मैनपुरी ,इटावा ,जालौन ,कन्नौज ,कानपुर और रीवाँ के आसपास होना आगरे से आरम्भ इस वंश यात्रा की पुरजोर पुष्टि करता है।

ब्रह्मपुराण :------------------------- 

***************एक दूसरे मत डा ईश्वर सिंह मडाड रचित राजपूत वंशावली के अनुसार  ब्रह्मपुराण में वर्णन आया है कि  चंद्रवंशीय राजा महामना के पुत्र तितिक्षु ने भारत के पूर्वी भाग में एक राज्य स्थापित किया। इनके पुत्र बलि के पाँच पुत्र हुए जिन्हे बालेय कहा गया। इनके नाम थे अंग ,बंग ,सहय ,कलिंग और पुण्ड्रक। अंग की बींसवीं पीढ़ी में विकर्ण के सौ पुत्र हुए। सौ पुत्रों के पिता होने के कारण उन्हें शतकर्णि नाम से प्रसिद्धि मिली। इन्हीं के वंशज एक बड़े राज्य की स्थापना करते हुए पूर्वोत्तर एवँ  बंग होते हुए आंध्र पहुँचे।फिर  राज्य का विस्तार मालवा ,विदर्भ से नर्मदा तक किया।कालान्तर में इन्हीं के वंशज सिंहबाहु के पुत्र विजय ने सन 543 में  समुद्र मार्ग से जाकर लंका विजय किया और  पिता के नाम पर सिंघल राजवंश स्थापित किया। इसी कारण लंका को पूर्व में सिंघल द्धीप के नाम से जाना जाता था। शातकर्णी से ही सेंगर ,सिंगर ,सेंगरी इत्यादि नामों से जाने जाने लगे।

 कनार से जगमन पुर की यात्रा:-------------------------    

  *************** ग्यारहवीं शताब्दी तक  सेंगर चेदि,डाहर ,  मालवा ,कर्णावती (रीवाँ ) व आस पास कई प्रांतों तक फैलाव ले चुके थे।जब अन्य प्रांतों में ए पराभव की ओर बढे ,रीवाँ के मऊगंज को अपने राज्य का केंद्र बनाया।उनके द्वारा निर्मित गढ़ी जैसे नईगढ़ी ,मऊगंज ,मनगवां,इत्यादि आज भी उनकी उत्कर्ष गाथा हैं।कालांतर में मुगलों से हाथ मिला बघेलों ने इन्हें चुनौती दिया और ए रीवाँ रियासत के अधीन हो गए।  कर्णावती उदय से पहले ही सेंगरों ने जालौन ,कन्नौज ,इटावा ,मैनपुरी में अपना दबदबा स्थापित कर लिया था।जालौन के राजा विसुख देव ने कनार को अपनी राजधानी बनाया। इनकी शादी कन्नौज के गहरवार राजा जयचन्द की बेटी देवकाली से हुई। अपनी रानी के नाम पर उन्होंने देवकली नाम का नगर बसाया और बसीन्द(बसेढ़ ) नदी,,का नाम बदलकर सेंगर नदी कर दिया।सेंगर नदी आज भी मैनपुरी ,इटावा , कानपुर हो कर बहती है।विसुखदेव के वंशज जगमन शाह को जब बाबर ने पराजित कर कनार को तहसनहस कर दिया तब जगमन शाह के नेतृत्व में सेंगरों ने जालौन के दूसरे भूभाग पर जगमनपुर नाम की राजधानी की नींव डाली और पुनः एक शक्तिशाली राज्य स्थापित किया ।जगमनपुर के राजा आज भी सेंगरों के प्रमुख माने जाते हैं। और इस क्षेत्र के पचासों गांव में सेंगर बसते हैं जो अपने को कनारधनी कहते हैं। इन्हीं के वंशज रेलिचंददेव ने भरेह में अपनी राजधानी बनाई। इनके दसवें वंशज भगवंतदेव ने नीलकण्ठ भट्ट से भगवंत भाष्कर ग्रन्थ की रचना कराई थी। इसके बारह मयूख (अध्याय )हैं और यह आज भी हिन्दू लॉ का प्रमुख सन्दर्भ ग्रंथ है। वर्तमान में सेंगर राजपूतों की प्रमुख शाखाएँ चुरू ,कदम्ब ,बराही (बिहार,बंगाल,असम ),डहलिया आदि हैं। वर्तमान में सेंगर मध्य प्रदेश के रीवाँ और पड़ोस के उत्तर प्रदेश से जुड़े क्षेत्र ,उत्तर प्रदेश के जालौन ,अलीगढ ,फतेहपुर ,कानपुर,औरैया ,इटावा के भरेह, फफूंद  ,मैनपुरी ,वाराणसी ,बलिया तथा विहार के छपरा ,पूर्णिया आदि ज़िलों में पाए जाते हैं।

भरेह ,फफूँद (इटावा )से रसरा बलिया:----------------------- 

***************कनार काल के दौरान ही तेरहवीँ शताब्दी  मे भरेह , फफूंद (इटावा ) के कुछ सेंगर राजपूतों का साहसिक दल हरी(सूर) शाह और बीर शाह नाम के दो भाइयों के नेतृत्व में पूर्वांचल की ओर बढ़ा और गंगा घाघरा के बीच अपना राज्य स्थापित करने का उपक्रम किया। घने जंगल और एकान्त  की स्थिति के कारण इन्हें सामरिक लाभ मिला।परिणामस्वरूप सेंगरों ने न केवल इस बड़े भूभाग को राजभरों के अधिपत्य से मुक्त कर  सम्पूर्ण लखनेसर परगना पर अधिकार किया बल्कि इसके बैभव को पुनर्स्थापित किया। लखनेसर को शिव आराधना का महत्वपूर्ण केंद्र बनाया।इसके विशाल प्रांगण में लक्ष्मी नारायण और राधा कृष्ण मंदिर भी पूजित थे।हरी(सूर ) शाह के भाई बीर शाह के वंशज पास के सिकंदरपुर और जहानाबाद परगना तक फ़ैल गए जिन्हे आज बिरहिया राजपूत कहते हैं।रसड़ा बलिया इनके सत्ता का केंद्र रहा और यहीँ इनके पूज्य कुल देवता श्री नाथ जी की समाधि बनाई गई जो एक तीर्थ के रूप में पूजित है। यह राज्य अट्ठारहवीं शताब्दी तक एक सुगठित लोकतंत्रात्मक शासन के रूप में अनेकानेक आक्रमणों के बावजूद अविजित रहा ।सेंगरों में कोई राजा नहीं ,बल्कि संगठन व सामूहिक फैसले सत्ता सँभालती थी।ब्रिटिश काल में इन्होंने बनारस राज्य के राजा बलवंत सिंह व अंग्रेजों को जबरदस्त टक्कर दिया।

***************इन्हीं बसाहटों में रसड़ा से पंद्रह किलोमीटर दूर तमसा नदी के तट पर नगपुरा  और टीका देऊरी गाँव हैं।नगपुरा गाँव से बाहर  तमसा तट पर श्रीनाथ जी( पर्याय बाबा अमरदेव ,बाबा सत्य प्रकाश राव) की पाँच में से दूसरी समाधि स्थित है।श्रीनाथ जी दैवी शक्ति संपन्न सेंगर वंशीय बिभूति थे जो वहाँ सेंगरों के पथ प्रदर्शक एवं पूज्य होने के कारण उनके कुल देवता के रूप में पूजित हुए।श्रीनाथ जी शिव की आराधना करते थे और शैव मतावलम्बी थे। जिनको सेंगरों की परम्परा से परिचय पाना हो उन्हें रसरा के श्रीनाथ की समाधि पर होने वाले चक्रमणीय पञ्च वर्षीय मेले को देखना चाहिए जब बाबा को 151 क्विंटल गेहूँ का रोट चढ़ता है और देश विदेश से सेंगरों का जन शैलाब उमड़ पड़ता है।रसड़ा का श्री नाथ धाम एवं उसके चहुँ ओर फैले तालाब ,भींटे,भवन, मैदान व  ,जनश्रुतियाँ हर आगंतुक को सेंगरों की गणतांत्रिक समृद्ध शासन व्यवस्था से परिचित कराते हैं।   

अंततः टिका देउरी(नगपुरा ) से भदिवाँ :-------------------------------------  

***************अब हम बढ़ते हैं भदिवाँ की यात्रा पर जब अट्ठारहवीं उन्नीसवीं सदी के सन्धि काल में बनारस के बरथरा (चौबेपुर )निवासी एक रघुवंशी राजपूत ने अपनी पुत्री का विवाह टिकदेउरी के सेंगर परिवार में किया और अपने गाँव के निकट अमौली गाँव की अस्सी बीघा जमीन अपनी पुत्री और दामाद को उपहार में भेंट किया। बाद में यह दम्पति इसी जमीन पर आ बसी जहाँ भदिवाँ नाम की एक बसाहट आकर ले रही थी। धीरे धीरे इस बस्ती में ब्राह्मण , अन्य राजपूत ,अहीर ,सुनार,तेली , लुहार ,गड़ेरी ,पासी ,राजभर ,हेला (मुस्लिम )इत्यादि आ बसे और यह एक पूर्ण गाँव का आकर ले लिया।आज भी यह गाँव अमौली राजस्व गाँव का उपगाँव  है तथा वाराणसी के पहड़िया -बलुआ मार्ग पर दायीं ओर शहर से बारह किलोमीटर दूरी पर स्थित है।जाल्हूपुर ,विशुनपुरा ,उकथी ,सिरिस्ती ,भगतुआ,अमौली और अम्बा इसके पड़ोसी गाँव हैं। वर्तमान वर्ष 2021 की स्थिति यह है कि अन्य गाँवों की भाँति इस गाँव की चहल पहल भी कहीं खो गई है और रोजगार ,नौकरी के कारण परिवारों का पलायन जारी है। यहाँ से आगे भदिवाँ में सेंगरों की यात्रा व यथासंभव वंशावली विवरण अंकित करने का प्रयास होगा। क्रमशः---- 

अशोकविहार ,वाराणसी --------------------------------------------------- मंगला सिंह /मंगलवीणा  

दिनाँक 25 मार्च 2021----------------- -------    mangal -veena .blogspot @ gmail.com 

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बुधवार, 2 सितंबर 2020

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