**********एक तो झुलसाने वाली ग्रीष्म ऋतु , फिर उसमें सर्वाधिक तपने वाला जेठ का महीना ; दूजे अधिक(पुरुषोत्तम)मास पड़ने के कारण इस महीने की अवधि तीस नहीं साठ दिन का होना ;तीजे सूर्य की किरणों का सीधे धरती के इस भूभाग पर पड़ना और चौथे हमारे मौसम विज्ञानी व उनके अल नीनो की इस चौकड़ी ने, ताप -लहरों को हाथ ले, जो धमाचौकड़ी मचाया हैं कि सभी ओर त्राहि माम,त्राहि माम ही गूँज रहा है ।लोग पुरुषोत्तम भगवान विष्णु को स्मरण कर रहे हैं कि उन्हीं की सृष्टि है तो उनकी हम जीवों पर अवश्य कृपा होगी और इस अंगारे सी दहकती गर्मी से हमारी रक्षा होगी ।परंतु तत्काल हो नहीं रही है ;अपनी माया वे ही जानें ।यदि कोई खास कारण है तो कम से कम यह पुरुषोत्तम महीना तो जेठ की जगह अगहन या फाल्गुन के महीनें में डाल देते जिससे जेठ का गरूर टूटता ।
**********प्रातः वन्दनीय भगवान भुवन भास्कर की क्या कहें,प्राची में प्रगट होते ही आग बरसने लग रहे हैं और हमें पेड़ तले,दरिया किनारे या घरों के छाये में भगा रहे हैं ।जब मन में विचार उभरता है कि ए छाये ,ए किनारे अब हैं कहाँ ।फिर आकाश से मौन वाणी होती है " तुम लोगों को तो सारे श्रोत से भरी पूरी धरती मिली थी परन्तु तुम मनुष्य निरंतर उसे बर्वाद करते जा रहे हो तो तुम्हें ही भुगतना होगा। हे मानव !हम तो कभी भी प्रकृति व्यवस्था न तोड़ने के लिए वचनबद्ध हैं ।"अब समझ में आया कि भुवन भास्कर का साफ संकेत है कि हम मानव अब से सुधर जाँय और प्रकृति से छेड़ -छाड़ न करें वरन् ऐसे ही या इससे बदतर मजा चखेंगे । भाई चलिए!कर्मफल तो मिलना ही है सो इस असह्य गर्मी को हम लोगों को रो या धो कर सहना है ।
**********अब यदि गर्मी से राहत देने वाले तीसरे देव इन्द्रदेव की ओर कातर चक्षु से देखें तो लगता है कि इस धरा निवासी प्राणियों से उनका कोई संबंध ही नहीं ।उनका विभाग , तप्त तवे पर बूँदों की भाँति , यत्र -तत्र बरस रहा है और जीना बदतर कर रहा है ।ऐसा नहीं हो रहा कि वे उमड़ -घुमण कर बादल और बरसात उतार दें जिससे धरा तृप्त हो जाय तथा इस भीषण गर्मी से जीव जन्तु और वनस्पतियों को छुटकारा मिले ।इस बादल और बरसात वाले विभाग की हालत भी भारत के सरकारी विभागों सा हो गया है ।वैसे भी सर्वविदित है कि इन्द्र भगवान देवगणों के साथ अमरावती में सानन्द निवास करते हैं और यदि उन लोंगों का कोई काम बिगड़ता है तो लाख छल -छद्म कर के प्रभु से अपने अनुसार बनवा ही लेते हैं फिर औरों या इस धरती के जीवों की कुशल छेम क्यों सोंचे ।
**********वैसे तो धरातल पर हम लोग इस भयावह ताप लहरी को झेलने हेतु विवश हैं ही; ऊपर से ए आधुनिक मौसम विज्ञानी आए दिन तापलहर,आँधी,तूफान इत्यादि का बार- बार चलभाष पर पूर्वानुमान जारी कर दाद में खाज का काम कर रहे हैं ।इनके सचेतक संदेश हमारी गर्मी झेलने की शक्ति को मनोवैज्ञानिक रूप से क्षीण कर रहे हैं । फलत: इस विकट गर्मी में सभी जीवों की क्रियाशीलता /सक्रियता शिथिल हो रही है और अधिकांश उर्जा केवल तापलहरी से बचने में खर्च हो रही है ।भला सोचिए!हम इस अल नीनो का क्या करें ।
**********हार थक जब किसी उपक्रम, उपाय या साधन से इस प्रचंड ताप लहरी से राहत नहीं मिल रही है तब एक ही छाँव या ठाँव बचता है और वह है :श्रीकृष्णस्य शरणं गच्छ । याद करें !श्रीमद्भगवद्गीता में श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि महीनों में अगहन का महीना और ऋतुओं में बसन्त ऋतु मैं ही हूँ (मासानाम् मार्गशीर्षाणाम् ऋतुनाम् कुसुमाकर:) ।यदि कुछ सुन्दर और सुखदायी गुण इस ग्रीष्म व जेठ महीना मे होता तो वे अवश्य घोषणा करते कि 'मासानाम् ज्येष्ठ मासम् ऋतुनाम् ग्रीष्म भीषण:' ।इतना ही नहीं अतिवाद से बचने का सर्वोत्तम कवच श्रीकृष्ण की जीवन पद्धति है जिसका अनुसरण कर हम हर कठिन परिस्थिति यहाँ तक किअति गर्मी ,अनावृष्टि , अतिवृष्टि,अतिशीत,जलप्लावन,बाढ़,और सूखे का जयी सामना कर सकते हैं। सो हम भी वही राह पकड़ें।यह गरमी भी बीत जायगी।
**********पता करें तो लोग गर्मी से छुटकारा और वर्षा आगमन केलिए अपनी मान्यतानुसार अनेक उपाय कर रहे हैं । जैसे गाँवों मे लड़के कीचड़ में लोट-पोट रहे हैं और आकाश से आह्वान कर रहे हैं कि मेघा पानी दे- जिन्दगानी दे ।कहीं लोग मेंढक -मेढकी या गधे - गधी की शादी कराने का उतायोग करा रहे हैं । जप -जग्य भी हो रहे हैं।सभी उपाय अच्छे हैं क्यों कि सच मे गर्मी तो बीत ही रही है ।
**********यदि बीत रही इस गर्मी का सिंहावलोकन करें तो पाते हैं कि इस बार अप्रैल से ही दुसह गर्मी के कारण सर्वत्र हाहाकार मचा हुआ है। जब भूगर्भ ,नदी , बाँध ,तालाब ,कुँए एवं अन्य सभी जलश्रोत ही पानी के लिए तरस रहे हैं ,फिर आदमी ,जीव -जन्तु ,पेंड़-पौधे ,जलचरों ,पशुओं व पंछियों की प्यास कैसे बुझे ?समाचार पत्रों और इलेक्ट्रानिक मिडिया के माध्यम से मौसम विज्ञानी ग्रीष्म की निष्ठुरता व उसके कारणों की नित्य जानकारी दे रहे हैं। आइए कुछ हिंदी कवियों की दृष्टि से भी इस ताप को देखा जाय। यथा -
जाने क्या हुआ कि सूरज इतना लाल हुआ
प्यासी हवा हाँफती फिर -फिर पानी खोज रही
सूखे कण्ठ कोकिला ,मीठी बानी खोज रही
नीम द्वार का छाया खोजे, पीपल गाछ तलाशें
नदी खोजती धार, कूल कब से बैठे हैं प्यासे
पानी पानी रटे रात -दिन, ऐसा ताल हुआ।
जाने क्या हुआ कि सूरज इतना लाल हुआ------------------------------------------------------------------------------------डा.जगदीश ब्योम
ग्रीष्म की लय में बढ़ते हुए अब बदलाव की प्रतीक्षा करनी चाहिए। अश्विन गाँधी के शब्दों में -
यह सब कुछ याद रहे
मौसम का साथ रहे
ग्रीष्म ऋतु भी जाएगी
फिर रहे गी प्रतीक्षा /अगले मौसम की /बहार की।
***************तब तक हम सबका सर्वोच्च कर्तव्य है कि पानी बचाएँ और प्यासों को पानी उपलब्ध कराएँ।एक भी प्यासी पँछी को यदि हम पानी पिला पाए तो यह सृष्टि की बड़ी सेवा होगी।
**********अन्तत:----
**********आज वर्ष का सबसे बड़ादिन (13धंटा 43मिनट :सूर्योदय 5.08,सूर्यास्त6.51)और अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस है साथ ही वाराणसी में पछुआ हवा के साथ शुष्क ताप लहरें(42'C उच्चतम ) चल रही हैं ।फिर भी सबमें योग दिवस का उल्लास है।अत: सभी कर्मयोग साधकों और सुधी पाठकों को योगदिवस की सादर बधाई।---------------------------------------------------- ------------------------------------------------------------------मंगला सिंह -----------------कृते मंगलवीणा,/mangal-veena.blogspot .com@gmail.com
वाराणसी ;रविवार ,दिनाँक 21 जून 2026
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