सोमवार, 25 मई 2026

उफ् गर्मी

                                    एक तो ग्रीष्म ऋतु ,ऊपर से जेठ का महीना । दूजे अधिक मास पड़ने के कारण इस महीने की अवधि तीस नहीं साठ दिन का होना ।तीजे सूर्य की किरणों का सीधे धरती के इस भूभाग पर पड़ना । 

 उफ़ गर्मी। इस बार अप्रैल में ही दुसह गर्मी से सर्वत्र हाहाकार मच गया है। जब भूगर्भ ,नदी , बाँध ,तालाब ,कुँए एवं अन्य सभी जलस्रोत ही  पानी के लिए तरस रहे हैं ,फिर आदमी ,जीव -जन्तु ,पेंड़-पौधे ,जलचरों ,पशुओं व पंछियों की प्यास कैसे बूझे ?समाचार पत्रों और  इलेक्ट्रानिक मिडिया  के माध्यम से मौसम विज्ञानी ग्रीष्म की निष्ठुरता व उसके कारणों की नित्य जानकारी दे रहे हैं। आइए कुछ हिंदी कवियों की दृष्टि से इस ताप को देखा जाय। यथा -

जाने क्या हुआ कि सूरज इतना लाल हुआ

प्यासी हवा हाँफती फिर -फिर पानी खोज रही

सूखे कण्ठ कोकिला ,मीठी बानी खोज रही

नीम द्वार का छाया खोजे, पीपल गाछ तलाशें

नदी खोजती धार, कूल कब से बैठे हैं प्यासे

पानी पानी रटे रात -दिन, ऐसा ताल हुआ। जाने क्या हुआ ----डा.जगदीश ब्योम

ग्रीष्म की लय में बढ़ते हुए अब बदलाव की प्रतीक्षा करनी चाहिए। अश्विन गाँधी के शब्दों में -यह सब कुछ याद रहे

मौसम का साथ रहे

ग्रीष्म ऋतु भी जाएगी

फिर रहे गी प्रतीक्षा /अगले मौसम की /बहार की।

***************तब तक  हम सबका सर्वोच्च कर्तव्य है कि पानी बचाएँ और प्यासों को पानी उपलब्ध कराएँ।एक प्यासी पँछी को भी यदि हम पानी पिला पाए तो यह सृष्टि की बड़ी सेवा होगी।------------------------------------------- मंगलवीणा

वाराणसी ;दिनाँक 29 . अप्रैल 2016

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बुधवार, 14 जनवरी 2026

मकर संक्रांति पर बच्चों के नाम

 प्यारे बच्चों !

तुम सबको मकर संक्रांति अर्थात स्नान युध्द विजय पर्व पर ढेर सारा स्नेह ।जो जो स्नान के द्वारा  इस प्रबल ठंड व बर्फीले पानी को आज मात दे चुके हैं ,उन्हें हार्दिक बधाई ; जो जो इस विकट युद्ध में उतरने की तैयारी कर रहे हैं उन्हें शुभ कामना और जो ठंड के डर से उत्साह रुपी हथियार डाल दिए हैं उन्हें हनुमान जी की तरह याद दिलाया जाता है कि वे स्नान युद्ध में विजय पाने हेतु ही बनें हैं ।फिर भी ऐसे ऐसे बीर हमारे बीच हैं जो वर्ष में केवल एक बार आज के दिन नहा लेते हैं ,उन्हें आज सौ बार प्रणाम और उन भीष्म प्रतिज्ञा वालों को जो आज भी नहीं नहाते उन्हें हजार बार  क्योंकि गोस्वामी तुलसी दास जी भी रामचारित मानस (रामायण )की रचना के आरंभ में ही कुछ ऐसे ही कारण हेतु माननीय दुष्ट जनों की वंदना किए थे । 

ऐसे वैसे या कैसे भी जो विजयी हो गए हैं,उन्हें सूर्यदेव को नमन करने ,सूखी या पकी खिचड़ी दान करने के बाद  खिचड़ी-  पापड़-चोखा,तिलवा, ढुंडा ,मुग्दल ,दही-चिउड़ा इत्यादि का पूरा पूरा आनंद उठाने का आमंत्रण है । यदि बंधु- बांधव और इष्ट मित्रों के साथ इन ब्यंजनों का आनंद उठा पाएँ तो यही इस युध्द विजय का प्रथम पारितोषिक है ।

फिर क्या ; अब खुली धूप में पतंग उड़ाने  या दूसरों को उड़ाते हुए देखने का यतन करिए और मौज मस्ती भरिए । इतने बढ़िया त्योहार पर यह अवश्य याद रखिए कि पतंगबाजी एक अच्छा शौक है परंतु चीनी मंझा का प्रयोग एक घृणित अपराध है ।ए मंझे प्रति वर्ष अनगिनत पशु-पक्षियों व इंसानों की जान ले रहे हैं ।अत: आज यह भी प्रण करें कि हम पतंग उड़ाने में केवल देशी मंझा ही प्रयोग करेंगे ।

मजे की बात यह है कि सूर्यदेव हम सबको ठंढ से छुट्टी दिलाने के लिए ही प्रति वर्ष 14/15 जनवरी को मकर रेखा पार कर उत्तरायण होते हैं जिससे दिन के बाद दिन क्रमशः बड़ा होने लगता है और ठंड भागने लगती है ।अत:है न यह बढ़िया ,मीठा और प्यारा -प्यारा हमारा सनातनी  त्यौहार। हँसो, हँसाओ और खुश रहो ।शुभाशिष। जय श्रीराधाकृष्ण। -----मंगलवीणा

मकर संक्रांति ;15 जनवरी 2026,

वाराणसी ।