एक तो ग्रीष्म ऋतु ,ऊपर से जेठ का महीना ।
उफ़ गर्मी। इस बार अप्रैल में ही दुसह गर्मी से सर्वत्र हाहाकार मच गया है। जब भूगर्भ ,नदी , बाँध ,तालाब ,कुँए एवं अन्य सभी जलस्रोत ही पानी के लिए तरस रहे हैं ,फिर आदमी ,जीव -जन्तु ,पेंड़-पौधे ,जलचरों ,पशुओं व पंछियों की प्यास कैसे बूझे ?समाचार पत्रों और इलेक्ट्रानिक मिडिया के माध्यम से मौसम विज्ञानी ग्रीष्म की निष्ठुरता व उसके कारणों की नित्य जानकारी दे रहे हैं। आइए कुछ हिंदी कवियों की दृष्टि से इस ताप को देखा जाय। यथा -
जाने क्या हुआ कि सूरज इतना लाल हुआ
प्यासी हवा हाँफती फिर -फिर पानी खोज रही
सूखे कण्ठ कोकिला ,मीठी बानी खोज रही
नीम द्वार का छाया खोजे, पीपल गाछ तलाशें
नदी खोजती धार, कूल कब से बैठे हैं प्यासे
पानी पानी रटे रात -दिन, ऐसा ताल हुआ। जाने क्या हुआ ----डा.जगदीश ब्योम
ग्रीष्म की लय में बढ़ते हुए अब बदलाव की प्रतीक्षा करनी चाहिए। अश्विन गाँधी के शब्दों में -यह सब कुछ याद रहे
मौसम का साथ रहे
ग्रीष्म ऋतु भी जाएगी
फिर रहे गी प्रतीक्षा /अगले मौसम की /बहार की।
***************तब तक हम सबका सर्वोच्च कर्तव्य है कि पानी बचाएँ और प्यासों को पानी उपलब्ध कराएँ।एक प्यासी पँछी को भी यदि हम पानी पिला पाए तो यह सृष्टि की बड़ी सेवा होगी।------------------------------------------- मंगलवीणा
वाराणसी ;दिनाँक 29 . अप्रैल 2016
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