पूर्वजों ने सानंद जीवन के लिए हम भारतीयों को अनेकानेक सर्वप्रिय संस्कारों एवं त्योहारों का उपहार दिया है। ऊपर से कोई चाही हुई कामना पूरी होने पर या मनोवांछित वस्तु मिल जाने पर हमें तत्कालिक आनंदोत्सव सुलभ हो जाते हैं। परन्तु इस कल-युग में स्थिति यह है कि उम्र जैसे-जैसे बढती है, ये अवसर हमे कमतर गुदगुदाते हैं। यदि एक समय घर में बच्चे को सुन्दर खिलौना, युवक को उसका पसंदीदा परिधान एवं बृद्ध को उसके आँख पावर का चश्मा उपहार में दिया जाय और उनके आनंदित होने की पूर्णता व प्रतिक्रिया आँकी जाय तो उनमें आनंद का स्तर स्पष्टतः अलग-अलग मिलेगा। कारण है बालपन आनंद की स्थिति या घटना से निर्दोष व भोलेपन के साथ शतप्रतिशत जुड़ता है जबकि बढते वय का जुड़ाव क्रमशः घटता जाता है। यहाँ तक कि अपने को भद्र मानने वाले लोग तो चाहते हुए भी हँसने और आनंदित होने की स्वाभाविक क्रिया को भी छिपा ले जाने का स्वांग करते हैं। फिर जिन्दगी के टंट-घंट इस तरह उनको घेर लेते हैं कि मूल आदमी ही गायब हो जाता है। वैसे भी एक ही विषय या वस्तु जब किसी को आनंद से सराबोर करती है, उसी क्षण अन्य को दुःख की दरिया में हिचकोलें भी करा सकती है।
आनंदित जीवन की माँग है कि आदमी जब जिस काम में लगे, उसके साथ अधिकाधिक धनात्मकता से जुड़े,उसमे अपनी प्रबल उपस्थिति दे और हर लमहे को जीवंत जिए। कुछ ऐसी ही व्यवस्था वाराणसी, काशी या बनारस ने सदियों से कर रखा है कि इस ज्ञान के केंद्र में जीवन कभी बोझिल न हो। बनारसी संस्कृति इसीलिए तीन लोकों से न्यारी मानी गयी है। यहाँ यदि आपको गंगा तीरे दीपावली के बाद देव दीपावली, होली बाद बुढवा मंगल का हास्य सम्मेलन और मूर्ख-दिवस पर महामूर्ख सम्मेलन देखने व सुनने का अवसर मिले तो यकीन कर लेंगे कि आबालबृद्ध समाज को हर्ष एवं उमंग से भरने एवं उससे जुड़ने के लिए ये बनारसी क्या कुछ करते हैं। इस जतन में वे अनुपम छटा बिखेरने तथा मूर्ख बनने एवं बनाने से भी परहेज नही करते। इस आनंद के लिए यहाँ ज्ञानी एवं तपस्वी भी साधना के दौर में कुछ समय के लिए पागल बाबा बन जाया करते हैं। साधना की शीर्ष स्थिति भी तो परम आनंद ही है। बनारसी मंसा है कि मौज मनाते चलो।
अभी एक अप्रैल को पुण्य सलिला तट पर महामूर्ख सम्मेलन हुआ। निःसंदेह इसका आयोजन चतुर लोगों ने किया था और आशय था-कृतिम मूर्खता कर जन मानस को प्रफुल्लित करना। कार्यक्रम हल्का एवं अच्छा रहा रियल मूर्खों का तो इससे कोई लेना देना था नहीं। किरदारों एवं आयोजको ने सुर्खियाँ बटोर लीं। कुछ की कमाई तो कुछ की धमाई हो गयी। इक्के- दुक्के दूर खड़े रियल मूर्ख यह सब देख जोर-जोर से हँसते हुए बात कर रहे थे कि कौन किसको मूर्ख बना रहा है। वास्तविकता रही कि रियल और आर्टिफिसियल दोनों प्रकार के मूर्ख आनंदित हुए। एक अँगुली उठाने वाली(विद्या में उत्तम ) विद्योत्तमा को दो अँगुलियाँ उठाकर मात देने वाले(विद्या विहीन ) मूर्ख कालिदास को नकारा नहीं जा सकता है।
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अंततः
यदि आप हर्षित नहीं रहना चाहते हैं और हर्ष की पूँजी भी नही है तो भी दुनियाँ रुकने वाली नहीं है।
" सुख दुख में उठता गिरता,संसार तिरोहित होगा।
मुड़कर न कभी देखेगा, किसका हित अनहित होगा।" - जयशंकर प्रसाद
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दिनाँक 6.4.2012 mangal-veena.blogspot.com
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आनंदित जीवन की माँग है कि आदमी जब जिस काम में लगे, उसके साथ अधिकाधिक धनात्मकता से जुड़े,उसमे अपनी प्रबल उपस्थिति दे और हर लमहे को जीवंत जिए। कुछ ऐसी ही व्यवस्था वाराणसी, काशी या बनारस ने सदियों से कर रखा है कि इस ज्ञान के केंद्र में जीवन कभी बोझिल न हो। बनारसी संस्कृति इसीलिए तीन लोकों से न्यारी मानी गयी है। यहाँ यदि आपको गंगा तीरे दीपावली के बाद देव दीपावली, होली बाद बुढवा मंगल का हास्य सम्मेलन और मूर्ख-दिवस पर महामूर्ख सम्मेलन देखने व सुनने का अवसर मिले तो यकीन कर लेंगे कि आबालबृद्ध समाज को हर्ष एवं उमंग से भरने एवं उससे जुड़ने के लिए ये बनारसी क्या कुछ करते हैं। इस जतन में वे अनुपम छटा बिखेरने तथा मूर्ख बनने एवं बनाने से भी परहेज नही करते। इस आनंद के लिए यहाँ ज्ञानी एवं तपस्वी भी साधना के दौर में कुछ समय के लिए पागल बाबा बन जाया करते हैं। साधना की शीर्ष स्थिति भी तो परम आनंद ही है। बनारसी मंसा है कि मौज मनाते चलो।
अभी एक अप्रैल को पुण्य सलिला तट पर महामूर्ख सम्मेलन हुआ। निःसंदेह इसका आयोजन चतुर लोगों ने किया था और आशय था-कृतिम मूर्खता कर जन मानस को प्रफुल्लित करना। कार्यक्रम हल्का एवं अच्छा रहा रियल मूर्खों का तो इससे कोई लेना देना था नहीं। किरदारों एवं आयोजको ने सुर्खियाँ बटोर लीं। कुछ की कमाई तो कुछ की धमाई हो गयी। इक्के- दुक्के दूर खड़े रियल मूर्ख यह सब देख जोर-जोर से हँसते हुए बात कर रहे थे कि कौन किसको मूर्ख बना रहा है। वास्तविकता रही कि रियल और आर्टिफिसियल दोनों प्रकार के मूर्ख आनंदित हुए। एक अँगुली उठाने वाली(विद्या में उत्तम ) विद्योत्तमा को दो अँगुलियाँ उठाकर मात देने वाले(विद्या विहीन ) मूर्ख कालिदास को नकारा नहीं जा सकता है।
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अंततः
यदि आप हर्षित नहीं रहना चाहते हैं और हर्ष की पूँजी भी नही है तो भी दुनियाँ रुकने वाली नहीं है।
" सुख दुख में उठता गिरता,संसार तिरोहित होगा।
मुड़कर न कभी देखेगा, किसका हित अनहित होगा।" - जयशंकर प्रसाद
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accha lekha hai
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