शुक्रवार, 12 अगस्त 2016

कश्मीर पर ऊहापोह

***************कश्मीर की अशान्ति से पूरा देश बेचैन है। वहाँ की शान्ति के लिए हमारे सपूत सुरक्षा प्रहरी अपने जान की बाजी खेल रहे हैं तो दूसरी ओर आन्दोलनकारियों के साथ उनके बहकावे में आकर शान्ति भंग करने वाले भोले -भाले लोग भी हताहत हो रहे हैं। अवसर है, तो राजनेता ,विचारक ,विश्लेषक ,विशेषज्ञ और मीडिया के लोग भी मन माँगी मुराद पूरी कर रहे हैं। अधिकांश को समस्या समाधान की चिन्ता है तो कुछ को अपने प्रतिद्वंदियों को पटकने की। अभी राज्यसभा में कश्मीर पर पूरे दिन चर्चा हुई। माननीय सांसदों  में किसी ने कश्मीरियों से दिली संबंध जोड़ने ,तो किसी ने ऐतिहासिक गलतियों की बात की। किसी ने पडोसी देश को कोसा तो किसी ने पाकिस्तान पोषित आतंकी संगठनों को। किसी ने जम्मू और लद्दाख के परिपेक्ष्य में कश्मीर समस्या की यात्रा कराया तो किसी ने सरकार को विफल बताया। माननीय गृह मंत्री का निचोड़ वक्तव्य आया कि अब पाकिस्तान से बात होगी तो सिर्फ पाक अधिकृत कश्मीर पर होगी। यह तो भविष्य बताएगा कि भविष्य क्या होगा। परन्तु यह कौन बताए गा कि कश्मीर अन्य राज्यों के विपरीत ,सविधान प्रदत्त अलगाव से या एक राज्य दो कानून से कब मुक्त होगा ? बहु आयामी अलगाववाद कश्मीर की नीयति बन गई है।धार्मिक अलगाववाद ,सामाजिक अलगाववाद ,राजनितिक अलगाववाद ,संवैधानिक अलगाववाद यहाँ तक कि सांस्कृतिक अलगाववाद ,सब के सब  इस देश की मुकुटमणि से चिपक गए हैं।
***************यथास्थिति की बात की जाय तो भारत के हर राज्य व् जनपद में भारत के हर कोने के कम या ज्यादा परिवार मिल जाँयगे। कश्मीरी भी सर्वत्र मिल जाँयगे। जब कभी कर्फ्यू या प्राकृतिक  स्थिति देश के किसी हिस्से में आती है तो पूरा देश वहाँ रह रहे अपने परिवार वालों ,मित्रो व परिजनों के लिए ब्याकुल हो उठता है परन्तु जब कश्मीर में ऐसा कुछ होता है तो वह ब्याकुलता केवल उन्ही परिवारों में होती है जिनके लाडले वहाँ जनजीवन और देश की सीमा सुरक्षा में लगे हैं या केवल उन्ही परिवारों को होती है जिनके परिजन वहाँ धार्मिक या पर्यटन यात्रा में फँस गए हों क्योंकि अन्य स्तिथियाँ घाटी केलिए लागू ही नहीं हैं।दूसरी ओर जब सुरक्षा जांबाजों को, वहाँ शेष भारत की आम नागरिक अनुपस्थिति, कश्मीरियत से अलग हिंदुस्तानी होने की अनुभूति देती है तो उन्हें अजीब लगता है कि देश अपना और लोग पराये। हम सभी जानते हैं कि कश्मीर की यह स्थिति थी नहीं ,बनाई गई है। इसके लिए लाखों पण्डित ,हिन्दू तथा सिक्ख परिवारों को पलायन के लिए विवश किया गया और भारतीयता को उखाड़ फेंका गया।
*************** आज की बची परिस्तिथि में भी इस राज्य के अधिकांश नागरिक  शुद्ध भारतीयता से ओतप्रोत हैं और भारत के लिए कृतसमर्पित हैं ,परन्तु जब उनकी भावनाएँ बेलगाम बन्धक बनाई जा रही हों और सरकारें उन्हें संकट से उबारने में असहाय हों ,तब प्रतिबद्धता और निष्ठा दूसरे छोर की तरफ लुढके गी ही। एक राज्य यदि अपने नागरिकों को समानता एवं सुरक्षा की गारण्टी नहीं दे सकता तो उसके अलाप -प्रलाप की कोई विश्वसनीयता नहीं होती। क्या विडम्बना है कि कठोर कार्यवाही के अभाव में कश्मीर प्रताड़ित है और उसका लाभ उठाते हुए अलगाववादी दुस्साहस बढ़ाते जा रहे हैं। जम्मू ,लद्दाख या कश्मीर क्षेत्र के वे भारतीय जो अपने राज्य को पूर्णतया भारत के अन्य राज्यों जैसा  देखना चाहते हैं,सांस्कृतिक एवं धार्मिक विविधता अपनी धरती पर उतारना चाहते हैं और चाहते हैं कि मेलजोल वाली हिंदुस्तानी  झलक उनकी पहचान बने। परन्तु ऐसी अनुकूलता के अभाव में उनके साथ अन्याय हो रहा है।
***************सामान्यतया जब कश्मीर समस्या की चर्चा होती है ,तो सारी बातें परिकल्पना आधारित होती हैं  कि यदि इस राज्य का विलय तात्कालिक अन्य राज्यों की भाँति भारत के गण राज्य में हुई होती तो ऐसा न होता ,यदि यह काम सरदार पटेल पर छोड़ा गया होता तो भारत कि पाकिस्तान वाला विकल्प या विवाद ही मिटा दिया गया होता ,यदि विभिन्न युद्धों में विजय के बाद हम पाकिस्तान की जीती हुई भूमि नहीं लौटाते और पाक अधिकृत कश्मीर को अपने कश्मीर में मिला लेते तो कश्मीर इधर -कश्मीर उधर का प्रकरण समाप्त हो गया होता या कि अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर हम अपने पाकिस्तान द्वारा हड़प लिए गए कश्मीर की बात पाकिस्तान की अपेक्षा ज्यादा आक्रामकता से उठाते तो पडोसी के हौसले पस्त होते। सब ठीक है ,परन्तु खोये जा चुके अवसर वर्तमान को समाधान नहीं दे सकते।
***************इसमें संशय नहीं कि वर्तमान आंदोलन को संभाल लिया जाय गा। अलगाववादी ,आतंकी और पाकिस्तान  सभी परास्त होंगे। तात्कालिक तौर पर हमें सुरक्षाबलों के मनोबल और लाजिस्टक्स को हर तरह से बढ़ाये रखना चाहिए और प्रचार तंत्र सक्रिय कर नागरिकों को भरोसा देना चाहिए कि उनका अभियान आतंकवादियों व अलगाववादियों से है न कि देशवासियों से। घाटीवासियों से अपील कर उनकी सहायता ली जाय और यदि कोई गलती हो जाय तो उनसे क्षमा भी माँगी जाय क्योंकि वे अपने ही बंधु -बंधाव हैं। इस काम में सभी राजनीतिक दल बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। घाटी में जितने भी ग्रामीण ,कस्बाई या शहरी इकाइयाँ हैं ,उन्हें विभिन्न दलों से मिल कर पाँच -पॉँच प्रतिनिधियों का दल गोंद लें ,उनसे नियमित बैठक कर उनसे मेल -जोल करें और उनके विकास व हित को आगे बढ़ायें।साथ ही जम्मू व लद्दाख क्षेत्र का सर्वाङ्गीण विकास द्रुततम गति से किया जाय ताकि ये क्षेत्र उनके लिए अनुकरणीय बन सकें। जैसे ही कुंठा जाएगी ,समस्या भी तिरोहित हो जाय गी। 
***************दीर्घकालिक समाधान उपायों में संविधान की धारा तीन सौ सत्तर का समापन है। बहुत कठिन कदम है परन्तु राष्ट्र हित में इस राज्य को अन्य राज्यों सा समरस बनाना ही होगा। पाकिस्तान प्रायोजित आतंक को उसे नष्ट करने की क्षमता से अधिक आक्रामकता से तहस=नहस करना होगा। इन आतंकियों से ज्यादा खतरा देशी छिप कर वार कर रहे देशद्रोहियों और लगाववादियों से है जो विभीषण भूमिका में हैं।उन्हें चिन्हित कर कठोरतम प्रतिक्रिया से गुजारना होगा।लक्ष्य बना कर शिक्षा ,रोजगार व् विकास को घाटी की धरती पर उतारना होगा। तभी कश्मीर की वादियों में भारतीयता मुस्कराएगी। इतिहास को ऐसे दिन की प्रतीक्षा रहे गी जब कश्मीरी मुस्लिम समुदाय के लोग पलायन कराये गए हिदू और सिक्ख परिवारों से मिलें गे और गले लग उन्हें अपने घरों में पुनर्स्थापित करें गे।---------------------------------------  मंगलवीणा
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वाराणसी ;दिनाँक 12 अगस्त 2016 ---------------mangal-veena.blogspot.com
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अंततः
सभी सुधी पाठकों ,देशवासियों ,मित्रों  व टिप्पणीकारों को स्वतंत्रता दिवस की ढेर सारी शुभ कामनाएं। भारतीय सीमा एवं अशांत कश्मीर में तैनात बीर जवानों को मिठाइयाँ व राखी पहुँचे तथा हर कश्मीरी भाई बहन को सौहार्द और शान्ति का सन्देश।हर भारतीय की अभिलाषा है कि हमारा मुकुट मणि हमारी आभा को चार चाँद लगाए। ----- मंगलवीणा
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शुक्रवार, 29 अप्रैल 2016

न्यायाधीश जी ,बातें कुछ और भी

***************हाल ही में न्यायाधीशों के सम्मलेन में भारत के मुख्य न्यायाधीश श्री टीएस ठाकुर, प्रधान मन्त्री की उपस्थिति में, यह उल्लेख करते भाउक हो उठे कि वादों की तुलना में न्याय देने वालों की संख्या मानकों से बहुत कम है। स्पष्टतः उनकी वाणी से न्याय के प्रति हो रहे अन्याय की पीड़ा झलक उठी थी। केंद्र और राज्य सरकारों की, जनहित में,  यही संवेदनशीलता होगी कि तत्काल न्यायाधीशों की रिक्त पदों पर नियुक्तियाँ सुनिश्चित करते हुए न्याय आयोग की संस्तुतियाँ लागू करने की कार्यवाही करें। लाख बुराइयों के होते हुए भी इस देश की न्याय व्यवस्था आम आदमी के लिए लाठी का सहारा है। यह बात दीगर है कि यह लाठी अब बोझ बनती जा रही है और धन तथा संसाधन के अभाव में या तो उल्टे उसी के पीठ पर पड़ने लगी है या उसकी अगली पीढ़ी को उत्तरदायित्व रूप में दी जा रही है।दूसरे देशों की आबादी एवँ  जजों के अनुपात का तर्क न देकर बेहतर होगा कि अपनी देशी परस्थितियों यथा वादों को बढ़ाने में पुलिस व वकीलों की भूमिका ,न्यायालयों में  पैठ बना चुकी दलाली ,प्रति वकील वादों की  संख्या ,नियुक्तियों में वंशवादी अधिपत्य तथा  न्याय  पर पैसे का प्रभुत्व इत्यादि की समग्र समीक्षा होनी चाहिए।क्या न्यायाधीश महोदय यह भरोसा देने की स्थिति में हैं कि यदि न्यायाधीशों की अपेक्षित संख्याबल पूरी हो जाती है तो न्याय व्यवस्था में व्याप्त खामियाँ दूर हो जायगीं ,शायद बिल्कुल नहीं।
भारतीय लोकतंत्र तो राजनीति में सशक्त घुसपैठ बना चुके वंशवाद से बुरी तरह पीड़ित है ही ;न्याय तंत्र भी इससे अछूता नहीं है। जज के वंशज का जज होना हमारी न्यायपालिका में आम बात है। वैसे तो ये माननीय गैर राजनीतिक होते हैं परन्तु इनमें कुछ लोग ऐसे रहे हैं जिनका परिवार या वह स्वयं, किसी दल या नेता विशेष से उपकृत होकर, माननीय बना होता है।अतः जब भी प्रति उपकार का समय आता है ,ऐसे माननीय इंसाफ के तराजू को किनारे करने से नहीं चूकते।अपवादों को छोड़ दिया जाय तो मध्य व आधार स्तर के माननीयों से लेकर अधीनस्थों तक ,ब्रांडेड वकीलों से दलालीरत वकीलों तक सभी दिनोदिन मालामाल  होते जा रहे हैं। यहाँ तक कि लाखों वकील व पुलिस वाले भी खूब फल फूल रहे हैं। बदले में भिखारी सा दिखते लाखों वादी वकीलों से कुटिल वादा व न्यायालयों से तारीख पर तारीख पा रहे हैं।भारतीय न्यायलय ही वे स्थान हैं जहाँ  शोषक एवं शोषित के बीच का अंतर हर कदम पर साफ दिखता है।
***************चूँकि भारतीय न्यायिक व्यवस्था में लाखों लोगों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रोजगार मिला हुआ है और सभी किसी न किसी रूप में न्याय नामक उत्पाद बेच रहे हैं ,अतः वे हर संभव प्रयास से उपभोक्ताओं की संख्या व उन तक पकड़ बढ़ायें गे ही।अद्यतन स्थिति यही है कि जब कोई स्नातक किसी भी क्षेत्र में सफल नहीं हो पाता है तो कानून की पढाई कर वकील बन जाता है। वकालत में संख्या का कोई परिसीमन ही नहीं है।वकील नहीं हुए तो भी कोई बात नहीं ,न्याय की दलाली में लग जाइये।निःसन्देह देश में वादों की संख्या बहुत तीव्रता से बढ़ रही है परन्तु तथ्य यह है कि संख्या बढ़ाई जा रही है। जब भी किसी परिवार में या दो या दो से अधिक लोगों में विवाद पनपता  है ,न्याय रूपी उत्पाद बेचने वाले सक्रिय हो उठते हैं और जब वादी प्रतिवादी न्याय केलिए निकलते हैं ,कतिपय न्याय देने वाले चाहे ग्रामप्रधान हों या सरपंच ,स्थानीय पुलिस वाले हों या प्रशासन के लोग,आर्थिक दोहन के लिए विवाद को हवा पानी देकर चाँड़ने लगते हैं और आर्थिक सेवा करने वाले पक्ष के हित साधन में संलग्न हो जाते हैं। फिर मरता क्या न करता। पीड़ित न्यायलय पहुँचता है। वहाँ न्याय दिलाने के नाम पर किसी वकील के चंगुल में फँसता है और शुरू हो जाता है तारीख पर तारीख का अंत हीन क्रम। लम्बी लड़ाई तथा धन सम्मान सब कुछ गँवाने के बाद या तो कालातीत जय मिलता है या पैसा प्रेरित पराजय। पराजय की स्थिति में आगे तक लड़ाने वाले एक से बढ़ कर एक वकील सामने उपस्थित हो जाते हैं।यही है भारत में आम नागरिक के लिए अनन्त न्यायिक व्यवस्था।
***************हमारे देश में उपभोक्ता संरक्षण कानून है ,मंत्रालय है ,विवाद सुलझाने वाले पीठ हैं परन्तु न्याय नामक उत्पाद के उपभोक्ताओं ,जिन्हे उनकी शब्दावली में वादी या प्रतिवादी कहते हैं ,के हित संरक्षण की कोई नहीं सोचता। न सरकार न उच्चतम न्यायलय में यह सुनिश्चित करने करने का साहस है कि किसी भी वाद का निस्तारण अधिकतम कितने समय में किसी अदालत  में होना अनिवार्य होगा ,एक वाद में अधिकतम कितनी तारीखें पड़ सकें गी या बीमारी आदि कारणों से अनुपस्थिति का लाभ कितनी बार दिया जाय गा। वादियों व प्रतिवादियों का वर्षोंवर्ष तक कोई केस लड़ने में जो मानसिक ,शारीरिक एवँ आर्थिक शोषण होता है उसके लिए देश में कोई क्षतिपूर्ति व्यवस्था नहीं है। इस देश में ऐसे भी लम्बित वाद हैं जो एक पीढ़ी के बाद दूसरी या तीसरी पीढ़ी के लोग लड़ रहे हैं। इससे बड़ी न्याय की निष्ठुरता और क्या हो सकती है। कुछ राहत होगी यदि वाद पंजीकरण के समय ही वाद संपत्ति मूल्यांकन के आधार पर वादियों ,प्रतिवादियों का न्यायिक बीमा कर दिया जाय और एक निश्चित अवधि में फैसला न मिलने या वाद के बीच मृत्यु होने पर बीमित राशि का भुगतान उनके उत्तरधिकारिओं को कर दिया जाय ताकि उन्हें अंतहीन प्रताणना से कुछ राहत मिल सके और वे वाद को आगे लड़ सकें।
***************हमारे प्रधान मंत्री जी प्रायः उल्लेख करते हैं कि जब भी कोई आपदा या चुनौती सामने हो हमें उसे खुशहाली और बेहतरी के अवसर में बदलने का प्रयास करना चाहिए। अतः संख्या संकट के बीच यदि न्याय पालिका अपने उपभोक्ताओं के शोषण को कम करने वाले कुछ कदम उठा कदम पाए ,वाद निस्तारण की कोई समय सीमा तय कर सके या वादियों, प्रति वादियों को कोई न्यायिक बीमा योजना दे पाए तो न्याय के प्रति आस्था पुनर्स्थापित हो सके गी। यह भी सोचना होगा कि जब न्यायाधीशों की कमी दूर हो जाय गी तो यह संस्था कैसे सुनिश्चित करेगी कि शोषण की गति कम और निस्तारण की गति तेज होगी।भगीरथ प्रयास की आवश्यकता है क्योकि भारतीय लोकतंत्र  आशाभरी चक्षुओं से अहर्निश न्याय व्यवस्था की ओर देख रहा है। सबकी अपेक्षा  यही है कि न्याय के तराजू की गरिमा बढे। ------------------------------------- मंगलवीणा

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अंततः
उफ़ गर्मी। इस बार अप्रैल में ही दुसह गर्मी से सर्वत्र हाहाकार मच गया है। नदी ,बाँध ,तालाब ,कुँए सभी पानी के लिए तरस रहे हैं ,फिर आदमी ,जीव -जन्तु व पंछियों की प्यास कैसे बूझे ?समाचार पत्रों और  इलेक्ट्रानिक मिडिया के माध्यम से मौसम विज्ञानी ग्रीष्म की निष्ठुरता व उसके कारणों की नित्य जानकारी दे रहे हैं। आइए कुछ हिंदी कवियों की दृष्टि से इस ताप को देखा जाय। यथा -
जाने क्या हुआ कि सूरज इतना लाल हुआ
प्यासी हवा हाँफती फिर -फिर पानी खोज रही
सूखे कण्ठ कोकिला ,मीठी बानी खोज रही
नीम द्वार का छाया खोजे, पीपल गाछ तलाशें
नदी खोजती धार, कूल कब से बैठे हैं प्यासे
पानी पानी रटे रात -दिन, ऐसा ताल हुआ। जाने क्या हुआ ----डा.जगदीश ब्योम
ग्रीष्म की लय में बढ़ते हुए अब बदलाव की प्रतीक्षा करनी चाहिए। अश्विन गाँधी के शब्दों में -यह सब कुछ याद रहे
मौसम का साथ रहे
ग्रीष्म ऋतु भी जाएगी
फिर रहे गी प्रतीक्षा /अगले मौसम की /बहार की।
***************तब तक  हम सबका सर्वोच्च कर्तव्य है कि पानी बचाएँ और प्यासों को पानी उपलब्ध कराएँ।एक प्यासी पँछी को भी यदि हम पानी पिला पाए तो यह सृष्टि की बड़ी सेवा होगी।------------------------------------------- मंगलवीणा
वाराणसी ;दिनाँक 29 . अप्रैल 2016                 mangal-veena.blogspot.com
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रविवार, 10 अप्रैल 2016

पथभ्रष्ट शिक्षा -दुर्भाग्य देश का

****************देखते ही देखते हमारे कतिपय लब्धप्रतिष्ठित संस्थानों में शिक्षा प्राप्त कर रहे कुछ युवक  कुशिक्षित होने का प्रमाण देने लगे।कोई अफजल की शहादत मनाने लगा ,कोई महिषासुर दिवस मनाने लगा तो कोई श्रीनगर स्थित भारतीय प्रद्यौकिकी संस्थान में भारत  माता की जय बोलने वाले क्षात्रों की पिटाई करने लगा ।शिक्षा केन्दों में घट रही ये घटनाएँ सन्त कबीर की उलट बानी "बरसे कम्बल भींगे पानी " की याद दिला रही हैं।  नेताओं की तो माँगी मुरादें पूरी होने की बारी आई। कोई छात्र मरे तो क्या ,जनता के पैसों से शिक्षित हो रहे युवक राष्ट्र विरोधी बनें तो क्या ,मुट्ठी भर राष्ट्र विरोधी कश्मीरी देश को परेशान कर के रख दें तो क्या ,इन नेताओं को तो मुद्दे चाहिए जिसपर प्रलाप कर सत्ता पक्ष  के विरुद्ध भोली -भाली जनता को बहका कर अपने पक्ष में वोट बढ़ा सकें और फिर वोट से लूट और सत्ता सुख।परन्तु यह गहरी चिंता का विषय है कि ये बच्चे दुःसोच के हद तक कैसे पहुँचे।साथ ही भारतीय समाज एवँ सरकार को तत्काल सक्रिय होने का समय  है ताकि ऐसे संस्थानों, शिक्षकों , गैरशिक्षकों ,शिक्षण सामग्रियों ,विचारकों ,लेखकों ,प्रचारकों ,छद्म नायकों ,नेताओं , सफेदपोशों इत्यादि की पहचान हो सके जिसने ऐसी अपसंस्कृति एवँ राष्ट्द्रोही विद्यार्थी तैयार किये। फिर  दृढ इच्छाशक्ति से कारकों को समूल नष्ट करना होगा वरन ये लोग हमारे देश व संस्कृति को किसी गम्भीर अनहोनी में झोंक सकते हैं।विद्यार्थी तो पौध हैं,दोष तो जमीन और माली में है जिन्होंने ऐसे  कुपौधों को पनपाने की भूमिका निभाई।
***************चूँकि कारण की पूर्ण विवेचना बिना निवारण संभव नहीं है ,हमें भारत की स्वतंत्रता से अब तक नव निर्माण व प्रगति के लिए हुए सामाजिक और शैक्षिक परिवर्तनों को स्मरण करना होगा। महात्मा गाँधी की  कौशलोन्मुखी ,संस्कार स्निग्ध एवँ सर्वसुलभ शिक्षा ,जो भारत के नव निर्माण की आकांछा थी , स्वतंत्रता प्राप्ति तक आँधी की भाँति बहती रही परन्तु आजादी एवँ बँटवारे के बाद धीमी पड़ने लगी क्योंकि समकालीन अन्य शासकीय विचार धाराएँ जैसे राजशाही , प्रजातंत्र ,समाजवाद,मार्क्सवाद (कम्युनिज्म  ), व्यक्तिवाद ,धर्मसापेक्षवाद ,धर्मनिरपेक्षवाद ,उदारवाद ,कट्टरवाद ,अलगाववाद  इत्यादि  गाँधी के रामराज्य की परिकल्पना पर प्रतिघात करने लगीं।जिनके हाथ सत्ता आई वे गाँधीवादी कहलाना चाहते थे  परन्तु अपने लिए महारानी विक्टोरिया और लार्ड माउन्ट बेटन जैसी प्रभुता चाहते थे। फिर क्या था ?चतुर कांग्रेसी गाँधी के स्वयम्भू उत्तराधिकारी एवँ अपने हित केलिए देशी अंग्रेज बन गए। मैकाले की शिक्षा प्रणाली  परवान चढ़ने लगी। धीरे -धीरे व्यवस्थाविहीन व्यवस्थित भारत में  शिक्षा संस्कार विहीन होती गई।इस उदेश्य के लिए देश की अहित चाहने वाली विचारधाराओं को भी सरकारी प्रश्रय दिए गए ताकि राष्ट्रवादियों को उनके साथ उलझाया जा सके।देश के इतिहास को गौरवहीन बनाने का कुत्सित प्रयास हुआ ताकि तुलनात्मक दृष्टि से नेहरु परिवार को भारत के नव जागरण प्रतीक रूप में स्थापित किया जा सके और उनकी छाया में लाखों स्वार्थी काँग्रेसी वर्षोंवर्ष तक  इस विशाल देश का सत्ता सुःख भोगते रहें।इनकी सुविधा केलिए बनाए गए तंत्र के कारण ही इतिहास के साथ भूगोल भी बदला जिनको याद करते ही हर भारतीय का क्रोध आसमान पर चढ़ जाता है। अनुकूलता मिलती गई और विघटन केलिए लालायित  अति उग्रवादी संगठन  भी अपनी जड़ें ज़माते गए।कश्मीर एवँ पूर्वोत्तर राज्यों में विभीषिका फैलाने वाला आतँकवाद या पश्चिमी बँगाल से आँध्रप्रदेश तक फैला नक्सलवाद आँख मूंदने से ही आज ऐसे भष्मासुरी पैमाने पर पहुँचा है कि शिक्षण संस्थानों में भी इनके समर्थक अध्ययन -अद्ध्यापन कर रहे हैं और उनके हित को आगे बढ़ा रहे हैं।
***************शिक्षा को पथ भ्रष्ट होने का सबसे बड़ा कारण बना पैसा। पूरे विश्व में औद्योगीकरण के बाद संस्कृति, सदाचार ,संस्कार इत्यादि पर पैसा हावी होने लगा।सुख ,सुविधा ,शिक्षा ,सम्मान ,सत्ता ,यहाँ तक की धर्म भी पैसे के अनुचर बन गए। पैसा , सदाचार से अर्जित हो या कदाचार से , केवल पैसा माना जाने लगा और यह पैसा सर्वोपरि पैसा बन गया।जब भ्रष्ट कार्यों से पैसा बहुत कम समय में बहुत ज्यादा अर्जित होने लगा तो भ्रष्ट होने में लोगों की झिझक जाती  रही। गाँधी  काल की आम जन की वह पीढ़ी जो संस्कारों में जीती थी अगली पीढ़ी  को भी भरसक संस्कारित बनाए रखी  परन्तु तीसरी नई पीढ़ी  के सामने अनुत्तरित हो गई। युवक जब अभिभावकों के समक्ष आज के नायकों जैसे नेता ,माफिया ,अभिनेता ,सरकारी बाबू ,अभियन्ता ,वकील ,ठेकेदार ,शिक्षक इत्यादि का उदहारण रख देते हैं तो देश प्रेम  ,सदाचार एवँ संस्कार की बातें अप्रासंगिक लगने लगती हैं। धनोपार्जन की अनुगामी बन चुकी शिक्षण संस्थाएं भी इस नवाचार से अछूती नहीं रहीं ।  चाहे सत्ता पक्ष में रहें या विपक्ष में ,चाहे देश प्रेम की राजनीति करें या देश द्रोह की ;  नेता बनना तो धनोपार्जन का इतना सटीक ब्रह्मास्त्र बन गया है कि इससे अल्पकाल में सर्वाधिक संपत्ति और सम्मान की गारन्टी हो गई है।जवाहर लाल नेहरु  या जाधव पुर विश्वविद्यालय में कन्हैया जैसे छात्रनेताओं के प्रादुर्भाव की  यही तो प्रमुख पृष्ठभूमि है।
***************पिछले सात दशकों में हमारे देश में सामाजिक समरसता एवँ पुनर्निर्माण के लिए जो मील के पत्थर  सरीखे कार्य हुए वे भी पार्श्व प्रभाव के रूप में शिक्षा को संस्कार विहीन किये। रियासतों के विलय ,जमींदारी उन्मूलन ,अधिवासी कानून ,अथवा भूदान यज्ञ से जहाँ लोकतंत्र  की अच्छाइयाँ सामने आईं वहीं लाभान्वित वर्ग को लगा कि मनुवादी संस्कृति के बूते सदियों तक उन्हें उनके अधिकार से वंचित रखा गया। हद तो तब हुई जब  सामाजिक समरसता के नाम  पर जाति विशेषके लोगों को हर क्षेत्र में सरकारी आरक्षण दिया गया और आरक्षण पाने वाली जातियों की सूची उत्तरोत्तर बड़ी होती गई। भारतीय संस्कृति तथा इसके ताने बाने को आरक्षण ने इतनी छति पहुंचाई कि सामाजिक समरसता चूर -चूर होने लगी। मेधाओं के अवसर छीने और अयोग्य हाथों में जिम्मेदारियाँ आईं।सुअवसर कौन छोड़ता है ;अब जाट ,गूजर ,पटेल ,ब्राह्मण ,ठाकुर सभी  आरक्षण माँग रहे हैं और शिक्षण संस्थायें इन सारी विषमताओं के दर्पण बनते जा रहे हैं।उसी दर्पण में दुर्गा के आराधकों के सामने महिषासुर को महिमा मण्डित करने वाले भी दिखने लगे हैं।अतीत के गलत निर्णयों व् गन्दी नेतागिरी ने सामाजिक विषमता को चरम पर  पहुँचा दिया है जहाँ से इसे सही स्थान पर न लाने से देश को भयावह परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।
***************विश्वपटल पर आर्थिक शक्ति के रूप में उभरते भारत को ऐसे गतिरोधकों से तत्काल छुटकारा  पाने का समय आ गया है। समय की पुकार से प्रेरित जनता ने एक देश प्रेमी सरकार को बहुमत के साथ सत्ता सौंपी है। अपना दायित्व निभाते हुए जनता सरकार को याद दिला रही है कि ढुलमुल रवैया एवँ तुष्टिकरण से शासन को स्वतन्त्र किया जाय। संविधान देश के लिए है न कि देश संविधान के लिए। यदि अस्पष्टता के बहाने कोई गैरभारतीय सा व्यवहार करता है तो बोलने की स्वतंत्रता की तत्काल लिखित व्याख्या होनी चाहिए। देशप्रेम अभिव्यक्ति के जितने भी ढँग हों ,उनको संवैधानिक रूप से इस निर्देश के साथ सम्मान मिलना चाहिए कि जिस भी अभिव्यक्ति से भारत का जयकारा हो ,सभी वर्ग व धर्म के लोग समवेत स्वर से उसमें सहभागी बनें।भारत में रह कर पाकिस्तान जिंदाबाद कहने वालों को न पाकिस्तान मिले न विशेष दर्जा परन्तु उनके लिए सख्त  क़ानूनी परिणाम अवश्य सुनिश्चित हो ।यदि वर्तमान के साथ इतिहास  ठीक कर लिया जाय और संस्कार को समाज में पुनर्स्थापित कर दिया जाय तो कल हमारा है।देश को इन चुनौतियों पर विजय पाना ही होगा क्योंकि पूरी दुनियाँ की आशा भरी दृष्टि भारत पर है। ------मंगलवीणा
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वाराणसी ;दिनाँक 10 . 04 . 2016
------------चैत्र शुक्ल ३ सम्वत २०७३                           mangal-veena .bloger.com
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अंततः
चैत्र माह की नवरात्रि व् श्री रामनवमी के पावन पर्व पर यह स्मरण करना प्रासंगिक
होगा  कि गाँधीकल्पित रामराज्य के अतुल्य नायक मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम अपनी जन्मभूमि  को कैसी श्रद्धा अर्पित करते थे।''लंका विजयोपरांत वनवास की अवधि पूर्ण होते ही प्रभु श्रीराम अपनी अर्धांगिनी जानकी ,भ्राता लक्ष्मण ,लंकापति विभीषण ,वानर राज सुग्रीव तथा अंगद आदि के साथ पुष्पक विमान से अयोध्या वापस आ रहे थे। ज्यों ही विमान अयोध्या के आकाश पर पहुँचा ,मातृभूमि के दर्शन पाते ही प्रभु विह्वल हो उठे और सहयात्रिओं से बोल उठे कि -
*****जद्यपि सब बैकुंठ बखाना। बेद पुरान बिदित जगु जाना।।
*****अवधपुरी सम प्रिय नहिं सोऊ। यह प्रसंग जानइ कोउ कोऊ।।
*****जन्मभूमि मम पुरी सुहावनि। उत्तरदिसि बह सरजू पावनि।।
*****अति प्रिय मोहि इहाँ के बासी। मम धामदा पुरी सुख रासी।।श्रीरामचरितमानस।'
अस्तु ,बैकुण्ठ से भी अधिक प्रिय भारत के देशप्रेमियों को नवरात्रि एवँ श्री रामनवमी की
शुभ कामनाएँ।-------------------------------------------------------- मंगलवीणा   

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2016

दवा का दर्द

***************भारत जैसे देश में शिक्षा ,स्वास्थ्य व सामाजिक सुरक्षा को सकारात्मक और जनहितसाधी बनाए रखना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए परन्तु दुर्भाग्य से ये तीनों क्षेत्र भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं हो पा रहे हैं। ऐसे में सरकार को कम से कम ऐसे निर्णयों से बचना चाहिए जो इन क्षेत्रों में नकारात्मकता बढ़ाएँ।हाल ही में भारत सरकार ने गम्भीर रोगों में दी जाने वाली , विदेशों से आयातित, चौहत्तर दवाओं से आयत शुल्क छूट वापस लेकर एक ऐसा ही विपरीत कदम उठाया है जिसका औचित्य समझ से परे है। आयातित दवाएँ अपनी उत्तमता के कारण बाजार में हैं। अतः आर्थिक दबाव बढ़ा कर उन्हें बाजार से बाहर करना उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य के साथ अन्याय है।
***************प्रदूषित जलवायु ,आधुनिक जीवन शैली एवँ बढ़ते प्राकृतिक असंतुलन ने अनेकानेक गम्भीर बीमारियों का सौगात भी आज के समाज को सौंपा है। इन  फैलती  बीमारियों व बढ़ती चिकित्सकीय सुविधाओं के कारण  हर  घर -परिवार में आय का एक बड़ा हिस्सा दवा पर ब्यय हो रहा है। उन परिवारों की तो आर्थिक रीढ़ ही टूट जाती है जिनका  कोई सदस्य किसी गम्भीर एवँ लम्बी बीमारी की चपेट में आ जाता है ।ऐसे में किसी भी तर्क से  दवाओं की कीमते बढ़ा कर रोगियों के लिए दवा का दर्द बढ़ाना किसी भी दवा निर्माता या सरकार के लिए सराहनीय नहीं हो सकता है।हाल ही में कुछ गम्भीर बीमारिओं में प्रयोज्य आयातित दवाओं के दाम बढ़ने से वे रोगी तो कराह ही उठे हैं जो इन दवाओं से स्वास्थ्यलाभ पा रहे हैं। यह सभी जानते ,मानते और समझते हैं कि दक्षता के साथ-साथ चिकित्सक ,चित्कित्सालय व्,चिकित्सा  रोगी के विश्वास के विषय हैं। फिर विश्वास को आर्थिक दबाव से प्रभावित करना सरकार की संवेदनशीलता पर प्रश्नचिन्ह जड़ता है। अतः जिस सरकार के सर पर जनता के उम्मीदों की भारी गठरी है उसे देशी दवाओं के प्रोत्साहन के लिए, शुल्क छूट वापस लेकर आयतित दवाओं की कीमतें बढ़ा कर उनकी उम्मीदों पर पानी नहीं फेरना चाहिए।
*************** दवाओं के विषय में कोई निर्णय रोगियों के हित में होना चाहिए जिसे हमारे देश के अधिकार प्राप्त लोग समझने को तैयार नहीं हैं। वे अधिकांशतः अपने कर्तब्यों के प्रति असंवेदनशील हैं और ऐसा निर्णय ले रहे हैं कि लगता ही नहीं कि वे जनता  के लिए अधिकार संपन्न बनाये गए हैं। गाँधी के देश में नियन्ताओं को इतना भी यथेष्ठ क्यों नहीं लगता कि थोड़े समय केलिए स्वयं आम जन बन कर अनुभव करें कि उनका निर्णय उन्हें कैसा लग रहा है? स्वास्थ्य व्यवस्था को चुस्त -दुरुस्त, पारदर्शी एवँ आम आदमी केलिए सुलभ बनाने वाला प्रयास छोड़  उसे और दुसह बनाना सम्वेदना की किस कसौटी पर उचित माना जा रहा है?क्या किसी एच आई वी ,किडनी ,कैंसर ,दिल ,यकृत ,मधुमेह जैसी गम्भीर बीमारी से पीड़ित ब्यक्ति ,जो इन दवाओं के सहारे जिंदगी की जंग लड़ रहा है ,के प्रति सरकार का यही कर्तव्य बोध है? शायद ही ऐसे निर्णयों से भारत स्वस्थ भारत बने।
***************आयत शुल्क की छूट वापसी केलिए सरकार ने देशी दवा की कम्पनियों को बढ़ावा देने का तर्क दिया है जिससे प्रमाणित होता है कि देशी दवा उत्पादकों का सरकार पर दबाव है। परन्तु इससे यह प्रमाणित नहीं होता कि क्या सरकार का भी इन देशी  निर्माताओं पर कोई नियंत्रण है ?देश में निर्मित  दवाओं की गुणवत्ता से मूल्य तक ,जाँचशुल्क से डाक्टरों की फ़ीस तक सब कुछ अपारदर्शिता से आच्छादित हैं जिससे उपभोक्ता ,सरकारें व् अखिल भारतीय मेडिकल एसोसिएशन सभी विज्ञ हैं। फिर भी कुछ अदृश्य कारण हैं जिससे उबरने की इच्छाशक्ति न सरकार बना पा रही है न संगठन।
***************विसंगतियों को समाप्त करने के नाम  पर लोग अपनी लोक प्रियता बटोर लेते हैं और अपना हित भी साध लेते हैं पर उपभोक्ता ठगे से जहाँ के तहाँ रह जाते हैं। आज भी आमिर खान साहब की सत्यमेव जयते वाली धारावाहिक याद है जिसमें दवा क्षेत्र वाली कड़ी ने खूब वाहवाही बटोरी थी।सस्ती जेनरिक दवाओं की भी खूब ढोल पीटी गई। आस पास के किसी मेडिकल स्टोर पर जाइए,नहीं मिलती हैं। स्वच्छ भारत -स्वस्थ भारत वाले देश में यदि कहीं सबसे अस्वच्छ भारत दिखता है तो सरकारी अस्पतालों में जिनके कन्धों पर स्वस्थ भारत का दायित्व है।हो हल्ला सुनते रहिए परन्तु परिणाम- ढाक के तीन पात।सजग सरकार से अपेक्षा है कि उपभोक्ता हित में इस क्षेत्र के सभी खिलाडियों को समान सतह पर स्वस्थ एवँ पारदर्शी प्रतिद्वंदिता का अवसर प्रदान करे ताकि भारत स्वस्थ एवँ स्वच्छ रहे। तभी तो देवगण भी भारत भूमि में जन्म लेकर अपने को धन्यभागी मानें गे।---------------------------------------------------------------------------------मंगलवीणा
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वाराणसी ,दिनाँक 14.02 .2016                                 mangal-veena.blogspot.com
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अन्ततः
आज के त्योहार पर संत वेलेंटाइन यदि इस धरा पर होते तो ख़ुशी से झूम उठते कि उनको मानने वाले पूरी दुनियाँ में फ़ैल चुके हैं;यहाँ तक कि भारतीय सुसंस्कृति का भी चीर हरण करने लगे हैं।वेलेन्टाइन महोदय को शायद पता था कि लगभग इसी समय भारत में बसंत आगमन के साथ मदन महीप जी  का स्वागत होता है। अतः यहाँ भी हैप्पी  वेलेंटाइन डे लोगों के सर चढ़ कर बोले गा।भारतीय संस्कृति के हितैषी इस युवा भारत को क्या समझाएँ।अच्छा है कि लहरों को अपनी मस्ती में लहराने दिया जाय। संत वेलेंटाइन की जय हो। सभी सुधी पाठकों को  हैप्पी  वेलेंटाइन डे।------मंगलवीणा
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गुरुवार, 24 दिसंबर 2015

इति श्री असहिष्णुता कथा

***************वर्ष दो हजार पंद्रह अवसान की ओर अग्रसर है। साथ ही भारत में असहिष्णुता पर चर्चा- परिचर्चा भी समाप्त हो रही है। टीवी पटल से इस विषय का गायब होना और दूसरे विषयों का अवतरित होना इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। इसके कई उदाहरणों में प्रथम भारत द्वारा पाकिस्तान की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाना या दूसरा सोनिया जी व राहुल का दल -बल के साथ न्यायलय में उपस्थित होना है। किसी न किसी रूप में  यह असहिष्णुता सदियों से समाज के ताने -बाने में विद्यमान रही है। इतिहास साक्षी है कि पूर्व मध्य काल से आज तक,विदेशी आक्रान्ताओं और देशी दमनकारी शासकों  के लिए सहिष्णु भारत एवँ सहिष्णु भारतीय प्रशंसनीय रहे हैं क्योंकि हमारी सहिष्णुता पर ही उनकी असहिष्णुता फूलती - फलती रही है। बारहवीं सदी वाले उस काल -खण्ड को लोग आज भी याद करते हैं जिसमें सहिष्णु पृथ्वीराज चौहान बार - बार विजयी होने पर असहिष्णु एवँ आक्रान्ता मुहम्मद गोरी को छोड़ते गए और सन  ग्यारह सौ बानवे में आक्रमण कर जब उसने चौहान को पराजित किया तो उन्हें बन्दी बना कर अफगानिस्तान ले गया और यातनापूर्ण मृत्युदण्ड दिया।भारतीय इतिहास के हर नए पृष्ठ पर कुछ ऐसे ही घटनाक्रम झाँकते हैं। देशी राज्यों में आपसी असहयोग एवँ स्वभावगत सहिष्णुता के कारण लगातार बाहरी आक्रमण होते रहे और हमारे देश का इतिहास, भूगोल एवँ समाज  बदलता रहा। वर्तमान भारत में उसी समाज की नई         पीढ़ियाँ  बसती हैं जिसमें ढेर सारे अयोग्य एवँ असहिष्णु लोग भी छद्म धर्मनिरपेक्षता के सहारे समाज में स्थान बना लिए हैं। आज की भारतीय जलवायु में जब शुद्ध धर्मनिरपेक्षता,प्रखर राष्ट्रवाद एवँ सबके विकास की बात होने लगी है तो ऐसे लोगों में घबराहट हुई है और अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए वे सरकार और उनके समर्थन वाली जनता को असहिष्णु बनाने लगे हैं।यदि इस दबाव को निष्प्रभावी नहीं किया गया तो सरकार अपने मुद्दों से भटके गी और कुचक्र चलनेवाले अपने मंतव्य में सफल हो जाँयगे।
***************कोई घटनाक्रम नहीं अपितु दो घटनाएँ थीं जिनकी पृष्ठभूमि में वर्तमान असहिष्णुता का वितान रचा गया। ये थीं -कन्नड़ भाषा के साहित्यकार श्री कुल्बर्गी की हत्या एवँ दादरी में बीफ खाने की अफवाह पर अखलाक नामक एक व्यक्ति की पिटाई से मौत।दोनों ही घटनाएँ कानून व्यवस्था से जुड़ीं हैं और राज्य सरकारों का प्रथम दायित्व है कि हर नागरिक के जान -माल उसके संवैधानिक अधिकारों को चुस्त दुरुस्त सुरक्षा प्रदान करें।यदि ऐसा करने में राज्य सरकारें विफल होती  हैं तो उन्हें सत्ता में रहने का कोई औचित्य नहीं है। अतः अतीत के पुरस्कार विजेताओं में यदि कुछ लोगों को विरोध जताने की बात सूझी तो उन्हें कर्नाटक की काँग्रेस एवँ उत्तर प्रदेश की समाजवादी सरकारों के विरुद्ध खड़ा होना चाहिए था न कि केंद्र की गठबन्धन सरकार के बिरुद्ध। पूरे देश ने देखा कि दोषी कौन और कठघरे में खड़ा किसको किया गया।उद्देश्य एक ही था कि मारो कहीं लगे वहीँ।
***************यह सर्व विदित है कि किसी व्यक्ति को पुरस्कृत होने के लिए उत्कृष्टता के साथ एक अहं मापदण्ड पुरस्कार देने वाली सरकार या संस्था का ,विचारधारा आधारित, पसन्द भी होता है। पुरस्कृत होने पर  प्राप्त कर्ता को अल्पकालिक एवँ दीर्घकालिक दो प्रकार के लाभ होते हैं यथा एकाएक व्यक्ति को ख्याति मिलती है ,अपने क्षेत्र में उसकी पूछ बढ़ती है और भविष्य में सरकारी एवँ गैर सरकारी सुविधाओँ के लिए उसकी पात्रता बढ़ती है।यही कारण है कि गैर राष्ट्रवादी सरकारों के दौर में वामपंथी ,काँग्रेसी ,क्षद्म धर्मनिरपेक्षी और गैर हिंदूवादी विचारों वाले साहित्यकार ,समाजसेवी  वैज्ञानिक ,सिनेधर्मी ,संगीतज्ञ इत्यादि खूब पुरस्कृत होते रहे और दीर्घकालिक लाभ उठाते रहे।इन आदरणीयों में कुछ लोग  ऐसे भी हैं जो राष्ट्रवाद , वहुसंख्यकवाद एवँ मूल धर्मनिरपेक्षता को अपने एवँ देश के लिए अस्पृश्य मानते हैं। फलतः बेमेल विचार की व्यवस्था में ऐसे लोगों के सर्वकालिक लाभ भी बाधित  हुए । फिर क्या कुल्बर्गी या दादरी के बहाने , घटती आदरणीयता वाले  ये लोग सरकार के ऊपर असहिष्णु होने का आरोप लगा दिए। साहित्य अकादमी के सदस्य ,पैंतीस पुरस्कार वापस करने वाले साहित्यकार ,समाजसेवी,रंगकर्मी ,नेता. पुरस्कारों से जुडी संस्थायें इत्यादि मैदान में कूद पड़े। मीडिया के मैदान में भयंकर वाकयुद्ध हुआ कि सरकार असहिष्णु हो गई या नहीं।  अंततः मिथ्या बादल छँटने लगे और देशवासी समझ पाये कि असहिष्णु कौन हैं। वस्तुतः एक बहुमत से चुनी सरकार को सहन न कर पाना सबसे बड़ी असहिष्णुता है।
***************************** पूरी दुनियाँ में अपनी श्रेष्ठता एवँ स्वार्थपूर्ति के लिए विभिन्न समुदाय  के लोगों में दूसरों के प्रति  असहिष्णुता रही है और पीढ़ी दर पीढ़ी यह बढ़ती ही जा रही है। संभवतः यही असहिष्णुता भविष्य में  विनाश का कारण बने क्योंकि हम एक दूसरे के लिए ही नहीं बल्कि अपनी धरती पहाड़  ,पर्यावरण  ,जल ,वायु ,जीव -जन्तु सबके प्रति असहिष्णु होते जा रहे हैं।असहिष्णुता के एक से बढ़ कर एक गम्भीर विषय दुनियाँ के सामने हैं। अतः असहिष्णुता -असहिष्णुता का खेल खेलने वालों को सोचना होगा कि कौन सी असहिष्णुता की बात कर रहे हैं। दादरी एवँ बंगलुरू वाली लकीरों के सापेक्ष तो जम्मू कश्मीर में हिन्दुओं का नरसंहार व लाखों हिन्दुओं का घाटी से पलायन या सन चौरासी में  श्रीमती  इन्दिरा ग़ांधी की हत्या के बाद सिक्खों के नरसंहार की लकीरें बहुत बड़ी थीं। लगता है कि उस समय उन्हें असहिष्णुता की याद नहीं आई।बांग्ला देश की लेखिका तस्लीमा नसरीन  ने ऐसा कुछ कह कर,  कि भारत में जो मुसलमानों की बात करे वह धर्मनिरपेक्ष (सहिष्णु ) और जो हिन्दुओं की बात करे वह हिंदूवादी ( असहिष्णु ) ,ऐसा आईना दिखाया है कि तथाकथित आदरणीयों को अपनी कुरूपता के लिए पूरे राष्ट्र से क्षमा माँगनी चाहिए।
***************परन्तु केंद्र सरकार को भी विरोधिओं के मिथ्या आचरण व उनके उद्देश्य से सतर्क हो जाना चाहिए। असहिष्णुता ठण्डी पड़ेगी तो भ्रष्टाचार को गरमा जाय गा ,एक मंत्री का कोई वक्तव्य ठण्डा पड़ेगा तो किसी दूसरे मंत्री या भाजपाई का वक्तव्य उछाल दिया जाय गा। अर्थ व्यवस्था को गति देने के लिए जीएसटी जैसे कानून चाहिए तो राज्य सभा में बहुमत के बल पर वे ऐसा होने नहीं देंगे ,मुद्दों की कमी होगी तो प्रधान मंत्री को प्रवासी भारतीय बनायेंगे अथवा उनके पहनावे पर कटाक्ष करें गे और देश विदेश में ऐसा वातावरण बनायें गे कि मेक इन इंडिया की ऐसी तैसी हो जाय। संसद तो इस लिए चलने नहीं देंगे क्योंकि उनके शासनकाल में भाजपा वाले भी गतिरोध पैदा किये थे। ये लोग  सौहार्द ,आर्थिक विकास एवँ रोजगार के अवसरों को बाधित करने का पुरजोर प्रयास करेंगे।इनके षड्यन्त्रों  को निष्फल करने ,अपने चुनावी वादों को पूरा करने एवँ जनता से सक्रिय संवाद बनाये रखने में ही वर्तमान सरकार एवँ देश की प्रगति का मंगलकारी भविष्य छिपा है।
***************सारी दुनियाँ सहमत है कि गाँधी की अहिँसा सहिष्णुता की आदर्श अवस्था है और समाज में इसी की स्थापना के लिए असहिष्णुता के विरुद्ध हिंसात्मक संघर्ष होते हैं। यह प्रवृत्ति बहुदा दबती हुई तो पाई गई है परन्तु किसी भी संस्कृति में कभी भी समूल नष्ट होते नहीं पाई गई है। इसका कारण शायद  इसी तथ्य में छिपा है कि सामाजिक होने के साथ ही मनुष्य एक जानवर है। फिर भी सामाजिकता के नाते मनुष्य यदि मनुष्य से मनुष्यता का व्यवहार करे तो असहिष्णुता न्यूनतर होती जायगी और मानवता गाँधी के सपनो वाले राम राज्य को प्राप्त कर लेगी।मानव जाति में भी जिन्हें समाज आदरणीय कहता है उन्हें आदरणीयता के मापदण्ड पर सदैव खरा उतरना होगा वरन रँगा सियार की कहानी सत्यार्थ होगी।इति श्री असहिष्णुता कथा।----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- मंगलवीणा
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वाराणसी ,तिथि :२४ दिसम्बर 2015                    mangal-veena.blogspot.com
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शनिवार, 24 अक्टूबर 2015

क्या होगा बिहार का

***************बिहार में नई सरकार बनाने हेतु चुनाव प्रक्रिया जारी है।परिणाम बतायें गे कि वहाँ के मतदाता अपने पूर्वाग्रह पर  पूर्ववत  डटे हुए हैं या रूढ़ियों को तोड़कर विकास व प्रगति की धारा में अन्य राज्यों से प्रतिस्पर्धा का विचार बनाते हैं। यह चुनाव सरकार के बदलाव के साथ वहाँ के मतदाता की अपेक्षाओं को नए ढंग से परिभाषित करने एवँ पाने का सुअवसर भी है।हम सभी जानते हैं कि स्वतन्त्र भारत में समान अवसर की उपलब्धता व बिहार वासियों की बेहतर बौद्धिक सम्पन्नता के बाद भी बिहार से राजनीतिक गांभीर्य गायब हो गया ,शिक्षा अशिक्षित शिक्षा हो गई और सामाजिक पिछडापन वहाँ का ट्रेड मार्क बन गया। न बिहारियों का दूसरे राज्यों में तीब्रतम पलायन बन्द हुआ ,न दूसरे राज्य के लोगों का बिहारियों के प्रति दृष्टिकोण बदला। सामाजिक पिछड़ापन दूर करने केलिए जो आरक्षण की व्यवस्था हुई उससे कुछ वर्गों के पिछड़ेपन को दूर होने की क्या बात हो ,उल्टे पूरा बिहार ही पिछड़ गया। फिर क्या इसके साथ  हीनभावना पैदा करने वाला बीमारू राज्य जैसा नाम नत्थी कर दिया गया। अब बीमारू राज्य को स्वास्थ्यलाभ के लिए विशेष पैकेज की माँग हो रही है और यह इस चुनाव का केंद्रीय मुद्दा है।
***************वैसे तो बिहार में किसी भी जाति का प्रतिशत घनत्व इतना नहीं है कि अकेले अपने दम पर किसी प्रत्याशी को विधायक या सांसद का चुनाव जिता दे परन्तु जातिवादी नेताओं के गठजोड़ के कारण जब दो या दो से अधिक जातियों के ध्रुवीकरण का मायाजाल फैलता है तो अयोग्य एवँ जातिवादी लोग विधान सभा और संसद में पहुँचने में सफल हो जाते हैं और प्रदेश एवँ देश की बर्बादी के कर्ता और कारण बनते हैं। शिक्षा को पटरी से उतार देने से बिहार की आम जनता में जाति ,धर्म ,आम जनोपयोगी कानून  व विकास का घाल मेल हो गया। यदि इस प्रदेश में समृद्ध शिक्षा का समुचित विकास हुआ होता तो मतदाताओं में यह जागृति अवश्य होती कि जाति और धर्म का अलग क्षेत्र है जिसमें हमें जीना चाहिए , गर्व करना चाहिए ;साथ ही दूसरे की जाति व धर्म का समादर करते हुए अपने जाति व धर्म की उन्नति के लिए प्रयास करना चाहिए।ऐसा होने पर यह भी जागृति  होती कि विधायिका एवँ संसद का क्षेत्र विकासोन्मुखी एवँ व्यवस्थादायी क़ानून बनाना तथा विकास  एवँ कानून की व्यवस्था का सुनिश्चितीकरण है। फिर तो जनता यही क्षीर -नीर विवेक वाला सूत्र अपना लेती और विश्व में सबसे पहले जनतंत्र का प्रयोग करने वाला बिहार आज अपना खोया वैभव पुनः प्राप्त कर, अन्य राज्यों के लिए ,मार्गदर्शक की भूमिका में आ सकता है। देखना होगा कि जाति ,धर्म से अलग हट कर विकास एवँ विकासोन्मुखी विधायिका के लिए चुनाव लड़ रहे दलों व प्रत्याशियों का क्या हश्र होता है।
***************एक विधायक कैसा हो ,इसका सीधा -साधा मानक हर मतदाता को पता है। फिर भी स्वार्थी दल व प्रत्याशी मिथ्या प्रचार से ऐसी मृग मरीचिका तैयार कर रहे हैं कि मानक या कसौटी के मापदंड ही दृश्यपटल से ओझल हो जाँय और मरीचिका में हिरन का शिकार हो जाय। जातिवाद ,धर्मवाद ,आरक्षण ,गो रक्षा या गो हत्या ,दलित उत्पीड़न ,बलात्कार ,पड़ोसी पाकिस्तान से संबंध और कालिख का पोता -पोती ,राष्ट्रीय स्वयम सेवक संघ पर तंजकसी और पूँजीवाद जैसे मुद्दे इस चुनाव के लिए गढ़े और उछाले जा रहे हैं जिनका उद्देश्य चुनाव को मूल उद्देश्य से भटकाना है।इसी कड़ी में तथाकथित साहित्यकारों ने अपना साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटा कर चुनावी संग्राम को एक नया मुद्दा दिया है।सैक्युलरिज्म के भ्रामक प्रचार से वैसे ही स्वार्थी नेता  इस राष्ट्र के विकास को बाधित किए हुए हैं।इन भूलभुलैयों से बाहर निकलना बिहार के मतदाताओं के लिए एक कठिन परीक्षा है।
***************चुनाव परिणाम के बाद बिहार का राजनीतिक स्वरुप देश की भावी दिशा एवँ गति को अपरिहार्य रूप से प्रभावित करे गा।यदि भ्रामक मुद्दों की पराजय होती है तो विजय का मुकुट बिहार के नव युवतिओं और युवकों के सर पर होगा तथा प्रगति एवँ विकास वादी बिहार का उदय होगा। यदि ऐसा नहीं होता है तो मानना ही होगा कि चक्रव्यूह में अभिमन्यु अभी भी फँसा हुआ है। सत्ता ही नहीं विपक्ष में भी जो विधायक चुन कर आएं गे उनकी पृष्ठभूमि ,सोच व रुझान से लोकतान्त्रिक प्रणाली में त्रुटि ,संतुलन और सुधार की धनात्मक या ऋणात्मक लालसा का संकेत होगा। कोई भारत वासी नहीं चाहता कि कमाई ,दवाई और पढाई के लिए बिहार के लोग परप्रांतों पर निर्भर रहें। सराहनीय स्थिति वह होगी कि उलटी गंगा बहे। नई सोच के लोग यह भी देखने को उत्सुक हैं कि बिहार के नेताओं को मतदाता हमेशा केलिए उनके यथोचित स्थान पर पहुँचायें गे अथवा नौटंकी जारी रहे गी और थाप पर दर्शक जुटते रहें गे।---------------- मंगलवीणा
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वाराणसी ,दिनाँक 24 अक्टूबर 2015
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शुक्रवार, 18 सितंबर 2015

हिंदी के साथ पखवारे का छल

 ***************हमारे देश में चौदह सितंबर से हिंदी के लिए एक पखवारे की उत्सव बेला आती है। लोग एकाएक हिंदी को विश्व की सर्वाधिक समर्थ भाषा बताने लगते हैं और हिंदी का गुणगान कर तद्गत लाभ साधने लगते हैं।पूरे देश के कार्यालयों,विभागों व् अनेकानेक संस्थानों के अँग्रेजियत से ओतप्रोत प्रमुख, हिंदी महिमा महोत्सव के लिए, मंचों पर सजने लगते हैं। तीन सौ पैंसठ दिन हिंदी की अनवरत सेवा करनेवालों को तो इस भुलावे से कोई अंतर नहीं पड़ता परन्तु प्रति वर्ष  चौदह सितम्बर से एक पखवारा तक हिंदी के नाम उत्सव मनाने वालों के उत्साह का पारावार नहीं होता। यह उत्सव भारत में सरकार द्वारा आयोजित अनेक उत्सवों में एक है।  इस पर्व को पन्द्रह दिनों तक मनाने के लिए सरकार प्रचुर धनराशि खर्च करती है।अतः पैसे की स्वीकृति पूर्व में ही करा ली जाती है। फिर क्या हर कार्यालय के प्रमुख ,हिंदी अधिकारी व कर्मचारी नेमी कार्यों से विरत हो नित एक नया कार्यक्रम आयोजित करते हैं और स्मृतिचिन्ह ,पुरस्कार व जलपान में पैसे समायोजित करते हुए हिंदी को भरपूर उपकृत करते हैं।
***************इस पखवारे में ऐसे निठल्ले कहे जाने वाले कर्मचारियों की ,जिन्हें केवल हिंदी लिखना ,बोलना आता है, उनकी वैसे ही पूछ बढ़ जाती है जैसे शरद ऋतु में खञ्जन पक्ष की। गैर हिंदी भाषी  कर्मचारी जिन्हे थोड़ी बहुत हिंदी आती है, वे तो इस पखवारे में साइबेरिया से आये प्रवासी पक्षियों की भाँति गोष्ठियों में दर्शनीय व शोभनीय हो जाते हैं।जहाँ चाह है वहाँ राह है। दो चार लोग वाद -विवाद ,टिप्पण , टंकन,लेखन ,आलेखन इत्यादि में भाग लेने केलिए जुटा लिए जाते हैं। निर्णायक की भूमिका के लिए हिंदी के लाभार्थी तथा व्याख्यान के लिए धनार्थी हर कार्यालय को बड़ी सुगमता से मिल जाते हैं। चूँकि पखवारे का आयोजन पैसे से जुड़ा है अतः प्रिंट एवँ इलेक्ट्रानिक माध्यमों की भी सहभागिता हो जाती है। बड़े ही आनन्दमय वातावरण में"अगले बरस फिर अइयो साथ में ज्यादा बजट ले अइयो' की कामना के साथ विभागाध्यक्षों द्वारा पखवारे का समापन कर दिया जाता है। फिर वही यक्ष प्रश्न कि हिंदी भारत की राष्ट्र भाषा क्यों नहीं और पखवारे का छल क्यों। 
***************स्वाधीन भारत में हिंदी के प्रगामी प्रयोग को बढ़ाने एवँ,इसके प्रचार प्रसार हेतु दशकों से हर वर्ष यह सरकारी पर्व मनाया जा रहा है परन्तु हिंदी देश की राजनीतिक देहरी पर, अपने हक़ के लिए, सात दशकों से अनवरत खड़ी है।हमारे नेता इसे राष्ट्र संघ की भाषा बनाने की बात करते हैं परन्तु राष्ट्र भाषा बनाने की चर्चा से कन्नी काट जाते हैं। प्रारंभिक दिनों में बाबुओं द्वारा सरकार के ज्ञाप ,परिपत्र  या पत्र अंग्रेजी में जारी हो जाते थे और नीचे लिख दिया जाता था -हिंदी वर्जन फालोज। आश्चर्य है आज भी वैसा ही हो रहा है। इस प्रक्रिया को हिंदी की नियमित मासिक प्रगति रिपोर्ट बनानेवाले बाबू इतने वर्षों में उलट तक नहीं सके कि कोई अभिलेख हिंदी में पहले जारी हो और उस पर लिखा हो कि अंग्रेजी पाठान्तर अनुगमित।हमारे लोकतंत्र में विश्वसनीयता  के पैमाने पर सर्वोच्च न्यायालय शीर्ष पर है परन्तु आज तक उसे भी चिन्ता नहीं हुई कि वह जो फैसले अंग्रेजी में देती है उसका सीधा सम्वन्ध जनता से है जिसकी मातृ भाषा हिंदी है या हिंदी की सहोदरी भाषाएँ। ऐसे में फैसले भी वकील या उन जैसे दुभाषिये पढ़ कर याची या प्रति याची  को बताते हैं।ये न्याय देने वाले भारतीयता का कौन सा आदर्श उच्च या निचले न्यायालयों के समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं। जन की हित सोचने वाले जनहित का मरम जानने में विफल हैं।अब वे तर्क बेमानी लगते हैं कि हिंदी में तकनीकी शब्दावली क़ी कमी है या विज्ञानं,अभियांत्रिकी ,अंतरिक्ष ,कानून जैसे विषय हिंदी में ब्यक्त नहीं हो पाते। भाषाओँ की दूरियाँ मिट रही हैं। अंग्रेजी का ऑक्सफ़ोर्ड शब्दकोष प्रति संस्करण अनेकों हिंदी के शब्द आत्मसात कर रहा है। वैसे ही हिंदी में अन्य भाषाओँ के अनेकानेक शब्द घुल मिल रहे हैं।जिन शब्दों के अन्य भाषाओँ में समानार्थी नहीं होते वे शब्द हर भाषा के लिए सर्वमान्य रूप में लिए जाते हैं। जब महात्मा गाँधी  हिंदुस्तानी भाषा पर बल देते थे,उनके राष्ट्र भाषा पर यही विचार थे। अतः इस बहकाने वाले कुतर्क से हट कर उस मन्तब्य को सामने लाना चाहिए जो हिंदी से भेद भाव का मूल कारण है।
***************इस भेद भाव की नींव भारत की पराधीनता के दिनों में पड़ी जब अंग्रेज शासन करते थे। उनकी अपनी शासन शैली थी जिसमें वे अपनी अँग्रेजी भाषा ,अपनी सभ्यता ,अपनी जाति एवँ अपनी शिक्षा को पूरी दुनियाँ में सर्व श्रेष्ठ मानते थे।वे लोग लम्बे शासन काल में देशी साधन संपन्न लोगों को अपने साँचे में ढाल कर कर देशी अंग्रेज बनाते गए। स्वतंत्रता मिलने तक इस देश में अंग्रेजी शिक्षा पद्धति की जड़ें बहुत सुद्दृढ की जा चुकी थीं और देशी अंग्रेज़ या इंडियन, अंग्रेजियत के साथ, सत्ता सँभालने के लिए तैयार हो चुके थे। फिर क्या था ये देशी इंडियन सत्ता सँभाल लिए और देशी भाषाओँ को भारतीयों की भाषा तक सीमित कर आज तक भारत पर नियंत्रण किये हुए हैं।ये इंडियन ही भारती एवँ भारतीयता के अहित साधक है जो हिन्दी पखवारा का आयोजन कर करा कर हिन्दी भाषियों को तुष्ट करने का उपक्रम करते हैं।परन्तु साठ करोड़ से भी अधिक देशी हिंदी भाषी एवँ दुनियाँ में फैले भारतीय मूल के लोग अपनी भाषा के साथ हो रहे दुर्भाव को सहन करते हुए आज भी उसकी सेवा तथा प्रचार -प्रसार में अनवरत लगे हुए हैं।ये असंख्य हिंदीभाषी अपनी इस मातृ भाषा को विश्व की सम्पन्नतम व सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओँ में पहचान दिला चुके हैं और उसे वह हर प्रतिष्ठा भी दिलायें गे जो साहित्य ,कला ,लालित्य से ओतप्रोत एक जीवंत लोकप्रिय भाषा को मिलनी चाहिए।हिंदी का गंतब्य राजभाषा ,संपर्कभाषा से आगे राष्ट्र भाषा के रास्ते विश्व भाषा बन कर अन्तरिक्ष के अनंत रहस्यों तक है।
***************हिंदी पखवारा जैसे आयोजनों के औचित्य पर भी हिंदी साधकों के दो परस्पर विरोधी धड़े हैं।एक निःस्वार्थ साधकों का वर्ग है जो पूर्व ऐतिहासिक काल से अर्थात संस्कृत वांग्मय से उद्गमित होने से अब तक इस भारती की सेवा में तल्लीन है। दूसरे वर्ग में  हिन्दी के लाभार्थी साधक हैं जिनकी परम्परा बीर गाथा काल के चारण अथवा भाटों से आरम्भ हो भक्ति एवँ रीति काल के दरबारी साहित्यकारों से होते हुए आधुनिक काल के सरकारी सजावटी साहित्यकारों तक है।निःसंदेह दोनों वर्ग के साधक आज की आधुनिक हिन्दी के लिए सराहनीय कार्य कर रहे हैं परन्तु हिंदी को श्रेष्ठता की धार देने वाले निःस्वार्थ साधक रहे हैं जिन्होनें हिंदी की सेवा स्वान्तःसुखाय की है या कर रहे हैं। यह वही परम्परा है जिसका उद्घोष गोस्वामी तुलसी ने यह लिख कर किया कि भाषाबद्ध करब हम सोई ,मोरे मन भरोस जेहि होई।कारण बताया कि कीरति ,भनति ,भूति भल सोई,सुरसरि सम सबकर हित होई।अतः हिंदी के निःस्वार्थ सेवक,हिन्दी के कामिल बुल्के सरीखे विदेशी विद्वान व विदेशी शैक्षिक संस्थान सभी भूरि -भूरि प्रशस्ति के पात्र हैं।
***************इन वर्गद्वय के आलावा हिन्दी को बुलन्दियों पर पहुँचाने वालों में हिन्दी के चलचित्रों,हिंदी टीवी के समाचार व मनोरंजन के कार्यक्रमों ,हिन्दी के समाचार पत्रों तथा विदेशों में बसे प्रवासी भारतीयों का भी प्रथम पंक्ति में गणनीय योगदान रहा है। हिंदी में जीने वाले राजनेताओं ने भी कभी -कभी विश्व मंच से हिन्दी के लिए भारत देश को गौरवान्वित किया है। हिंदी फ़िल्मी गानों ,चलचित्रों ,भारतीय संगीत ,योग ,जय हो ,नमस्ते या सबका साथ सबका विकास का तो कहना क्या?ये पूरी दुनियाँ में हिन्दी की दुंदुभी बजा रहे हैं।देश के शिक्षा संस्थानों के लिए भी, संकोच  से  बाहर  होकर, नेतृत्व  करते  हुए  हिंदी  के प्रति  अपने दायित्व निर्वहन का यह स्वर्णिम समय है। मंच कोई भी हो, पखवारा हो या न हो , यदि हम भारतीय हिन्दी भाषी होने पर अहर्निश गर्व करने और आत्मविश्वास से हिन्दीमय ब्यवहार करने लगें तो सबसे आगे हिंदुस्तानी (हिंदी )दिखे गी।----------------------------------- -------------------------------- मंगलवीणा
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वाराणसी ;दिनाँक 18 . 09. 2015 -------------------mangal-veena.blogspot.com
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सोमवार, 7 सितंबर 2015

पावसनामा

***************रीतिकालीन "बरसा ऋतु सुखदानि जग ,तुम सम कोऊ नहीं" के विपरीत विदाई की ओर अग्रसर बरसात ने जनता की उलझने और उलझाई।ग्रीष्म के महीनों में मौसम विज्ञानियों ने यह कह कर कृषकों की उलझन बढ़ा दी कि इस वर्ष बरसात औसत से कम होगी। अर्थ व्यवस्था पर इसके कुप्रभाव एवं सरकार की तैयारियों पर चर्चा भी चल पड़ी। परन्तु जब वर्षा होने लगी तो ऎसी हुई कि तीन चौथाई देश जलमग्न हो  गया। बादल ऐसे फटे कि गाँव के गाँव अस्तित्व खो बैठे।समाचारों के अनुसार बाढ़ और बरसात से पूर्व की भाँति काफी जन धन की हानि हुई है जब कि कथनी के अनुसार सरकारें भी अति सक्रिय रहीं।पता नहीं ये मिथ्या पूर्वानुमान लगाने वाले सूखे का लाभ उठाने वालों को सही समय का संकेत दे रहे थे या देश के एक युवा नेता की तरह अपनी विशेषज्ञता की ढफली बजा रहे थे।इस पावस ने यह भी देखा कि गुण्डे ,लुटेरे ,हैवान खुलेआम आम आदमी एवँ उनकी बहन ,बेटियों की मर्यादा तार -तार करते रहे और चोर लुटेरे जनता की गाढ़ी कमाई पर हाथ साफ करने का रिकार्ड बनाते रहे। राज्य सरकारें जिनके हाथ कानून व्यवस्था है वे सुरक्षा सुनिश्चित करने से ज्यादा यह प्रचारित करने में लगे रहे कि अन्य राज्यों की तुलना में उनके यहाँ कम अपराध है।घटना घटने के बाद अपनी रीति के अनुसार हमेशा देर से पहुँचने वाली पुलिस और प्रशासन के लोग खानापूर्ति करते हुए जनता की जले पर नमक छिड़कते रहे। थोड़े और समय बाद जब विभिन्न दलों के नेता  पहुँच कर अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने के लिए घड़ियाली आँसू बहाना नहीं भूले तो शासन और सरकार से जनता को अत्याधिक घृणा हुई।  भुक्तभोगियों की हर प्रतिक्रिया नक्कारखाने में तूती सिद्ध होती रही है।लोकतंत्र से जनता अपने हक़ और सरकार के कर्तव्यों की अपेक्षा करती है पर सरकारें उन्हें अपनी कुटिल कृपावृष्टि से उपकृत कर रही हैं।ये परस्पर विरोधी स्थितियाँ हैं जो देश को बहुत हानि पहुँचा रही हैं।नई केंद्र सरकार द्वारा इस ऋतु में भी कुछ ऐसा होते नहीं दिखा कि इंडिया भारत बनने या भारत इंडिया बनने की ओर अग्रसर हों।ऐसे में पूर्व की भाँति जनता को न्याय पालिका एवँ मिडिया का वही सहारा रहा जो डूबते को तिनके से मिलता है परंतु कर्तव्य एवँ सुविधा के बीच स्वयं इनकी उलझन चिन्ता की लकीरें खींच रही हैं।
***************दूसरी ओर वर्षा ऋतु में हमारे देश की सड़कें ,रेल व बिजली व्यवस्था भी पानी -पानी हो गईं और लोगों की जान से जी भर के खेलीं ।जिन्हे लोगों के जान माल की चिंता होनी चाहिए वे सोचते हैं कि यह तो सामान्य बात है क्योंकि व्यवस्था  जनता के लिए है तो जनता ही भुगते गी भी।परन्तु आम आदमी क्या चाहता है ,यह कोई इतनी गूढ़ पहेली नहीं है। जहाँ जनता को चाहिए सुरक्षित ससमय रेलयात्रा वहाँ बार -बार हो रही रेल दुर्घटनाएँ उन्हें मौत का भय दे रही हैं और सरकार तीब्र द्रुतगामी रेल के सपने दिखा रही है। जहाँ उन्हें चाहिए टिकाऊ ,समतल, पक्की सड़कें वहाँ उन्हें दी जा रही है - अल्पावधि में गिट्टियाँ उधड़ी ऊबड़ -खाबड़ जानलेवा सड़कें जिन पर प्रतिवर्ष लाखों लोग दुर्घटनाग्रस्त हो रहे हैं।सरकार को तो दिखता ही नहीं कि बरसात में कुछ सडकों ने ताल -तलैया का रूप ले लिया और आस -पास बिखरी गिट्टियाँ उन पर चलने वालों के हाथ -पैर तोड़ रही हैं। आम लोग हैरान -परेशान हैं कि ये सड़कें क्यों बनाई जाती हैं। यदि सरकार के पास कोई दक्ष ,ईमानदार और सक्षम व्यवस्था नहीं है तो पहाड़ों को तोड़ कर पर्यावरण को हानि पहुँचाने ,पत्थर की गिट्टियों को समतल भूमि पर छींटने या यही क्रम बार -बार दुहराने और जनता के पैसे बर्बाद करने का सरकार को कोई हक़ नहीं है। लोग अपने को सत्ताधारी ,सरकारी एवँ गैरसरकारी लुटेरों के हाथ लुटते पा रहे हैं और अपनी नियति को कोस रहे हैं।कुछ साल पहले तक कच्ची सड़कें थीं या कम रेल सेवाएँ थीं तो क्या आज जैसी जानमारू तो नहीं थी।नई सड़कें बनती जा रही हैं। केंद्र और राज्य सरकारें लाखों किलोमीटर सड़क व पुलों के निर्माण होड़ में लगी हैं परन्तु पुरानी सडकों की दयनीयता को कोई देखने वाला नहीं। बिजली की आँख मिचौनी ने जीना दूभर कर रखा है ऊपर से पुराने जर्जर तार बरसात में सडकों एवँ गलिओं में टूट कर गिर रहे हैं और लोगों के जान ले रहे हैं। इसकी चिंता छोड़ नए तार बिछाए जा रहे हैं।जनता क्यों न सोचे कि विशेष अभिरुचि के कारण भी विशेष होते हैं।
**************इस पावस में बच्चों की शिक्षा एवँ सरकारी स्कूलों की दुर्दशा  ने आम लोगों को खूब झकझोरा ;यहाँ तक कि माननीय उच्च न्यायालय इलाहबाद को सख्त निर्णय सुनाना पड़ा कि नेता एवँ अधिकारियों के बच्चे अनिवार्यतः सरकारी स्कूलों में पढ़ाये जाँय तभी सरकारी विद्यालयों की दशा सुधरे गी। जरा उस मनोदशा को सोचें जब कृषक या श्रमिक खेतों में जूझ कर घर आते हैं और बैठक में सुस्ताते जब घर का कोई सदस्य कहता है कि रीता और रितेश को फिर सरकारी प्राइमरी स्कूल में ही भेजना होगा, क्योंकि बाजार में चल रहे अंग्रेजी माध्यम वाले प्राइवेट स्कूल बहुत ज्यादा दाखिला फ़ीस माँग रहे हैं। घर का बूढ़ा मुखिया धुँधली नज़रों से आसमान की ओर देखता है। न उसे तारे दिखते हैं न ही सुनहरी चाँदनी। मानो देसी सरकार रूपी बादलों ने उनके भविष्य को अंधकार से ढँक लिया हो।फिर थका हारा  चिंतित परिवार अपनी भावी पीढ़ी के भविष्य पर इस चर्चा में लग जाता है कि देश में दो प्रकार के स्कूल क्यों। ये नेता कौन सी आजादी की बात करते हैं ? यदि सरकारी स्कूल ही ठीक से चलाते तो हम प्राइवेट अंग्रेजी स्कूल में बच्चे पढ़ाने को क्यों तरसते। वाह रे, स्वराज के अरसठ साल बाद वाले सरकारी स्कूल --जर्जर भवन ,इक्के -दुक्के मास्टर ,न कापी न किताब।शिक्षा का कोई माहौल नहीं परन्तु मध्यान्ह भोजन की चिंता अवश्य हो रही है। ये सरकारी स्कूल क्या हैं - साक्षात शिशु शरणार्थी गृह। अंततः मुखिया निर्णय लेता है कि उसका बेटा अपने बच्चों व पत्नी के साथ शहर जाय। वहीँ अपनी रोजी तलाशे और किसी अच्छे स्कूल में बच्चों की शिक्षा सुनिश्चित करे।बूढ़ों के बुढ़ापे की चिंता छोड़ लोग बच्चों की पढाई हेतु शहर की ओर भाग रहे हैं।उस विकास को क्या कहा जाय जहाँ अच्छी शिक्षा अमीरों के लिए आरक्षित हो गई, नौकरियाँ सामाजिक पिछङों को आरक्षित हो गईं और गरीबों को परवश हो कराहने व वोट देने के लिए छोड़ दिया गया।उस बरसात को भी क्या कहा जाय जिसमें लोगों को घर छोड़ शहर की राह पकड़नी पड़े जबकि हमारी परंपरा चतुर्मासा में प्रवास पर जाना वर्जित करती है। शिक्षक दिवस को राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी ने मुखर्जी सर बन कर विद्यार्थियों को पढ़ाया ;वहीँ प्रधान मंत्री जी ने सीधे विद्यार्थियों से संवाद किया।यह शिक्षा सुधार की दिशा में एक नव युगारम्भकारी पहल हो सकता है परन्तु तभी जब अंतिम पंक्ति में बैठे साधनहीन विद्यर्थियों को पब्लिक स्कूलों की सुविधा देते हुए उनकी कक्षा में ऐसे दिवस मनाये जाँय गे।भारत और इंडिया अलग -अलग शब्द  होना छोड़ एक शब्दार्थ बनाने का प्रयास करते भी नहीं दीख रहे हैं।    
*************** बीते पावस से जनताको सुखद आस थी कि सरकार जीएसटी विधेयक पारित कर देगी  जिससे उपयोग की जिंस सस्ते दामों पर मिलने लगेंगी। कर के नाम पर ठगहारी व लूट बन्द हो जाय गी। परन्तु ऐसा हो न सका। जो सत्ता खो कर विपक्ष में बैठे हैं ,ऐसा भष्मासुरी नाच संसद और संसद के बाहर नाचे कि जनता ठगी कि ठगी रह गई।जनता के कई सौ करोड़ रुपये इनके इस नौटंकी आयोजन पर खर्च हो गए।ऊपर से इन शर्मविहीन सांसदों ने लोकलाज को किनारे रख अपने बेतन ,भत्ता व छूट वाले भोजन का पावस में खूब आनंद उठाया। आजकल अपने -अपने क्षेत्र में जनता के सामने अपनी पीठ थपथपा रहे हैं कि कैसे उन्होंने सरकार को घुटने टेका दिया। हो सकता है आगामी किसी सत्र में ये सभी पक्ष विपक्ष के नेता ,जीएसटी या कोई अन्य विधेयक पारित करते हुए, एक मत से अपना बेतन ,भत्ता दुगुना या तिगुना करा लें व अपनी विशेष दर्जा व सुविधा की और बड़ी सूची जनता को पकड़ा दें।सातवें बेतन आयोग की सिफारिशें आनेवाली हैं तो बाबू से पीछे सांसद ,विधायक क्यों।जागीर उनकी है ,जो कुछ  उनके उपभोग से बच जाय वह कमीशनखोरी के बाद देश एवँ देश के विकास के लिए ही तो है।                    
***************पावस बीतने वाला है पर उलझन सुलझे ना। स्वतंत्रता पाने के अति उत्साह में तत्कालीन नेताओं ने देश के लिए आरक्षण ,जम्मू -कश्मीर ,देश विभाजन ,राष्ट्रभाषा  जैसे राजरोग पैदा कर दिए जो देश की प्रगति को घुन की नाईं चाट रहे हैं।जहाँ जनता की अपनी असह्य उलझनें हैं वहाँ ये पैदा की हुई राष्ट्रीय अनुवाँशिक समस्याएँ, जैसे आरक्षण के लिए चल रहे आन्दोलन ,पश्चिमी सीमा पर आए दिन आम नागरिक एवँ सुरक्षा बल के जवानों का मारा जाना,  उन्हें और उलझन में डाल रही हैं।क्या प्याज की बात हो ,क्या दाल के दर्द पर रोया जाय ;जब सरकार सीमा पर पाकिस्तान को जवाब देने ,जम्मू -कश्मीर में आतंकियों को नष्ट करने और देश के विभिन्न भागों में आरक्षण के लिए चल रहे आंदोलनों को निबटने में ही अहर्निश उलझी हुई है।काश !ये समस्याएँ न होती,हम मन ,वाणी और कर्म से ईमानदार होते और देश तथा सरकार की ऊर्जा जन कल्याण कार्यों व विकास में लगी होतीं तो उलझन का नाम- ओ- निशान ही कहाँ होता। यदि लोकतंत्र में समान अवसर का सपना सचमुच में साकार हो पाता तो भारत द्वारा  मंगल पर मंगल यान भेजना या शक्तिशाली क्रायोजनिक इंजनों से उपग्रहों  का लगातार सफल प्रक्षेपण करना विश्व को कुछ अलग सन्देश दिया होता।फिर भी जनता आशान्वित है कि शरद ऋतु पावस से बेहतर होगी।जिन भारतीयों ने बीते मौसम में अपनीं  दाल विहीन थाली से एकाएक प्याज को महँगाई के साथ उड़न छू होते पाया है,उनके दिन जल्द बहुरें गे। सस्ती प्याज थाली में लौट कर फिर उनके आँसू निकाले गी और आँसू पोछे गी।____मंगलवीणा 
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वाराणसी ;दिनाँक :08 सितम्बर 2015                         mangal-veena.blogspot.com
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मंगलवार, 30 जून 2015

मैगी को वापस लाओ

************मैगी को वापस लाओ। मॉड्यूलर किचेन सूने पड़े हैं। आधुनिक माताएँ अपने बच्चों पर मैगी रूपी ममता नहीं उड़ेल पा रही हैं। नेस्ले वालों ने भारत से मैगी को बाहर कर लिया किन्तु आधुनिकाओं के साथ -साथ अकेले घर से दूर रहकर पढने -पढाने  और  नौकरी करने वाले  नवयुवकों एवँ युवतियों के भी बुरे हाल हो रहे हैं। बाजार में उपलब्ध  स्थानापन्न द्रुत भोज्य जैसे नोर ,टॉप रमेन,  मैक्रोनी,आईटीसी की यिप्पी या अन्य ब्राण्ड नूडल्स में वह दम -ख़म व लोकप्रियता कहाँ जो मैगी को भुलवा सकें।वैसे ये भी एक के बाद एक बाजार से निष्कासित हो रहे हैं।मैगी से प्राप्त बाकी सुविधाओं या फ्लेवर को छोड़ भी दें तो बतरस का आनन्द कहाँ से आये।मैगी नहीं; तो  चर्चा में प्रीती जिंटा ,माधुरी दीक्षित और अमिताभ बच्चन को कैसे लायें।मामला एक रस का नहीं  कई रसों का है अन्यथा शीघ्रता एवँ पौष्टिकता में तो पारम्परिक खिचड़ी भी किसी से कम नहीं। कुल मिला कर इस नूडल्स के बाजार से बाहर होने पर आधुनिक स्मार्टनेस को एक करारा झटका लगा है।
************सारे फसाद की जड़ में कोई चाणक्य प्रण वाला बाराबंकी का खाद्य निरीक्षक लगता है जिसने मैगी की जड़ में मंठा डाल दिया वरन कौन साधारण मनुज जनता था कि दूषित आबोहवा , मिलावटी दूध ,जहर घुले फल -सब्जी ,कंकड़ -पत्थर मिले खाद्यान्न या नकली दवाओं से भारतीयों को बचाने के लिए कुछ तंत्र ,नियमित विभाग या मंत्रालय भी हैं जो यदा -कदा समाचारों में आ जाते हैं।ऐसा ही एक विभाग है -भारतीय खाद्य संरक्षा एवँ मानक प्राधिकरण जो इस प्रकरण में नाम धन्य हो गया। यह भी पता चला कि इनकी अपनी प्रयोगशालाएँ हैं और राज्यों में इनके खाद्य आयुक्त एवँ अन्य खाद्य अधिकारी भी तैनात हैं जो हमें शुद्ध और स्वास्थ्यवर्धक खाद्य पदार्थों की गारण्टी देते हैं।परन्तु जनता की सेहत की क्या बात की जाय ,इस विभाग के पूर्व अधिकारी कह रहे हैं कि  विभाग की स्वयँ की ही सेहत बहुत ख़राब है। अपनी चिन्ता छोड़ अब सबलोग यह जानने को उत्सुक हैं कि विभाग के अधिकारिओं का माली स्वास्थ्य कैसा है। बिना किसी प्रयोजन के हानिकारक मिलावट एवँ ऐसे सरकारी विभाग, दूध और पानी की भाँति, वर्षों से मित्रवत सामंजस्य में नहीँ बने रहते।लोग हजम नहीं कर पा रहे हैं कि मैगी में मानक स्तर से ज्यादा पाये गए लेड व एमएसजी क्या हमारे हाजमे के लिए अन्य नित्य झेले जा रहे मिलावटों से ज्यादा घातक हैं।पहरेदारों से कौन पूछे कि ये हानिकारक नूडल्स भारतीय बाजार में कैसे घुसे।
************लोगों को यह बात और हैरान -परेशान कर रही है कि जिन खाद्य पदार्थों की शान में हमारे फ़िल्मी सितारे रात दिन विज्ञापनों द्वारा टीवी पर कसीदे काढ़ते हैं क्या वे भी स्वास्थ्य नाशक हो सकते हैं। ये वे लोग हैं जो हमारी आधुनिकता के मानक हैं और नई पीढ़ी की युवक एवँ युवतियों की चर्या में हर पल अनुकरणीय हैं।ये ब्रांड अम्बेसडर हैं जो  नैतिकता की परिभाषा भी स्वयँ गढ़ते हैं अन्यथा ब्राण्डिंग द्वारा करोड़ों कमाने से पहले वे अपने स्तर से यह सुनिश्चित अवश्य करते कि, जिसने उन्हें सितारा बनाया ,अपार संपत्ति स्वामी बनाया और अगाध स्नेह दिया ,उस जनता को विज्ञापन द्वारा परोसी जा रही वस्तु वास्तव में हानिकारक नहीं है।रही बात गलती मानने और क्षमा माँगने की तो ये चीजें बड़े लोगों के धर्माचरण में आती ही कहाँ हैं।काना -फूसी होती रहे ,करोड़ों की कमाई कर शांत बैठने में क्या बुराई है। अभी लू से देश में हजारों लोग मरे हैं  तो ताप की क्या जवाबदेही ?यही तो ताप का प्रताप है।
************हमारे जनतंत्र की धारिता है कि जवाबदेही तो बनती है। फिर इस प्रकरण में ज्वार आने पर खाद्य एवँ उपभोक्ता , रसायन एवँ उर्वरक तथा आयुष विभाग के मंत्री भी सामने आये हैं और उपभोक्ता हित एवँ अधिनियमों की बात कर रहे हैं परन्तु ब्राण्ड अम्बेसडरों की जबाबदेही विषय पर ये लोग भाटे की प्रतीक्षा करते दीख रहे हैं।नेताओं ,अभिनेताओं और बाबुओं को तो दृढ विश्वास है कि हर समस्या या विवाद की एक जिंदगी होती है और वह इस समय सीमा बाद स्वतः समाप्त हो जाती है।परन्तु विश्वास के विपरीत मैगी विवाद की जिन्दगी तो बढ़ती जा रही है। संयुक्त राष्ट्र खाद्य संगठन द्वारा गठित एक समिति ने रिपोर्ट दिया है कि मोनो सोडियम ग्लूटामेट मात्र एक चोखा फ्लेवर है और यह स्वास्थ्य केलिए बिलकुल हानिकारक नहीं है। अब किसकी मानें किसकी न मानें। कहीं नई पीढ़ी के प्रिय मैगी को उनसे छीनने एवँ उनपर खिचड़ी थोपने का कोई दुष्चक्र तो नहीं। दूध का दूध और पानी का पानी करने के लिए सीबीआई जाँच तो बनती है।------- सीबीआई से इस लिए कि अन्य किसी जाँच संस्था पर कोई भरोसा ही नहीं करता।
************दूसरी ओर हर संकट या समस्या अपने साथ नए अवसर भी लाती हैं ,यह खिचड़ी के लिए सर्वथा उपयुक्त समय है कि आधुनिक पीढ़ी में यह अपनी पैठ बढ़ाए और दुनियाँ का सबसे चोखा फटाफट भोज्य बने। इसके लिए यदि इसे मुँह बिदका देने वाला खिचड़ी नाम बदलना पड़े तो बदले ,जिन लोगों के नाम माँ -बाप ने खिचड़ू या खिचड़ी रख दिए है और वे, शर्मिंदगी के कारण, हमेशा अपना नाम अंग्रेजी के शार्ट रूप में लेते हैं,उनको नए जमाने के धाँसू नाम दिए जाँय।साथ ही दुनियाँ में फैले भारतीय दूतावासों में इस भोज्य को अनिवार्य कर दिया जाय।यह भी सुखद संयोग है कि भोजन में खिचड़ी हमारे प्रधान मंत्री जी की पहली पसंद है और  विश्व पटल पर भारत के लिए यह अनुकूल समय है।अतः योग दिवस की भाँति चौदह जनवरी को, संयुक्त राष्ट्र संघ से, अंतर्राष्ट्रीय खिचड़ी दिवस घोषित कराने का प्रयास हो। यदि सफलता मिली तो सरकार की यह दूसरी बड़ी उपलब्धि होगी और चौदह जनवरी को हमारा उत्साह बुलंदिओं पर।
******************************आश्चर्य !देखते ही देखते रोटी ,कपड़ा,मकान और स्वास्थ्य ,शिक्षा      ,सड़क, बिजली,भ्रष्टाचार वाली समस्याएँ नेपथ्य में जा रही हैं और सरकार जनता से झाड़ू लगवाती ,बैंक खाते खुलवाती ,योग कराती, बेटी के साथ सेल्फ़ी खिंचवाती,देशी मिलावटों पर कान बहरा करती और मैगीको भगाती रंगमंच पर पर अवतरित हो रही है ।इसे कहते हैं पैराडाइम शिफ्ट (Paradigm Shift) । जो हो रहा है होने दो ;फटाफट भूख मिटाने को मैगी वापस लाओ।नेस्ले वालोँ को तो भारतीय बाज़ारमें घुसने का पूर्व अनुभव है ही। पावस आ चुकी है ,स्कूल खुल गए हैं और सबको जल्दी पड़ी है। ज्यादा क्या लिखूँ।----------------------------------------------- मंगलवीणा
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वाराणसी :दिनाँक 30 जून 2015
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गुरुवार, 4 जून 2015

दस में कितने नम्बर

***************इन दिनों देश के विभिन्न शैक्षिक बोर्ड धड़ाधड़ दसवीं एवँ बारहवीं के परिणाम घोषित कर रहे हैं । बोर्ड चलाने वाले और परीक्षा देने वाले --दोनों ही नये -नए कीर्तिमान स्थापित कर रहे हैं। आँकड़ों की मानी जाय तो शिक्षा में युगान्तकारी सुधार हो रहा है और हम सौ प्रति सौ प्राप्ति के सन्निकट हैं। इसी दिन के लिए हमने अध्ययन -अध्यापन को बदला ,प्रश्नपत्रों को लम्बा कर उत्तर पुस्तिकाओं का आकर घटाया और हम उस आयाम को समाप्त कर रहे हैं कि किसी विषय पर कितना भी लिख़ दिया जाय ;उससे अधिक एवँ  बेहतर लेखन की संभावना सदैव बनी रहती है अतः पूर्णांक मिलना दुष्कर है। इन्हीं प्रयासों से शिक्षा के नए दिन आये हैं और शिक्षा की नई कालिदास-प्रणाली लागू हुई है। फलस्वरूप सफल छात्रों एवँ कीर्तिमान स्थापित करनेवालों की सर्वत्र प्रसंशा हो रही है। साथ ही परीक्षा उत्तीर्ण हुए लाखों  छात्र एवँ उनके अभिभावक जहाँ उत्साहित एवँ भविष्य के प्रति आशान्वित हैं वहीँ अनुत्तीर्ण छात्र और उनसे सहानुभूति रखने वाले लोग शिक्षकों ,परीक्षकों व शिक्षा की वर्तमान दशा को कोस रहे हैं।असफल परीक्षार्थियों को यहीं नहीं रुकना चाहिये बल्कि बीती परीक्षा से निराश न होते हुए आत्मचिंतन करना चाहिए और अगले अवसर को बड़ी सफलता में बदलने के लिए कटिबद्ध होना चाहिए।
***************ऐसे समय इसे सुयोग ही कहा जायगा कि बीते छब्बीस मई को केंद्र में सत्तासीन मोदी सरकार ने अपने कार्यकाल का एक वर्ष पूरा कर लिया और नई प्रथा के अनुरूप उसने भी टीवी ,मिडिया ,समाचारपत्र व जन संपर्क माध्यमों से अपनी एक वर्ष की उपलब्धि  का लेखा -जोखा जनता के समक्ष रखना प्रारंभ कर दिया।फिर क्या ;वाच्य हो ,दृश्य हो या श्रव्य -अहर्निश यही चर्चा कि मोदी सरकार को दस में कितने नम्बर ?सत्ताच्युत विरोधी नेता तो जैसे मूर्छा से जाग उठे हैं। उनके हाई कमान और कार्यकर्ता सरकार को दस में शून्य देने पर उतर आये हैं।उन्हें एक साथ कई लाभ जैसे टीवी चैनलों पर पुनः अवतरण ,भविष्य में सत्तासुख की आस ,हाई कमान की कृपा इत्यादि दिखने लगे हैं। यह तो भला हो आज  के ट्रेंड -सेटर (प्रथा -स्थापक )टीवी चैनलों का जो ऋणात्मक नंबरिंग नहीं करा रहे हैं वरन सरकार के प्राप्तांक को अपनी पूर्ववर्ती सरकार से पीछे धकेल देते। वैसे सभी भारतीय जानें या न जानें ,टीवी चैनल वाले मौलिक रूप से जानते हैं कि सरकार सबकी है। अतः वे सरकार के काम-काज का मूल्यांकन किसी से भी करा सकते हैं। वे चैनल का हित साधते हुए किसी को परीक्षक बनने का सुअवसर दे रहे हैं और उनसे पूछ रहे हैं कि आप मोदी सरकार को कितने नम्बर देंगे। इक्के -दुक्के धर्मगुरुओं ,अध्यापकों ,विश्लेषकों ,नौकरशाहों ,व्यवसायिओं , वकीलों ,डाक्टरों ,किसानों ,टॅक्सीचालकों, मजदूरों इत्यादि की तो बन आई है। टीवी के पैनलिस्टों की तो बात ही और है। मिडिया सौजन्य से इन सबके  अच्छे दिन चल रहे हैं।आम के आम ,गुठलियों के दाम - वे परीक्षक बनने के कल्पनातीत अवसर के साथ टीवी पर सुशोभित हो समाज में विशिष्ठ होने का रौब भी पा रहे हैं। जहाँ तक नम्बर की बात है वह तो चैनल वाले जो चाहते हैं दिला ही देते हैं। चूँकि चैनल दर्शकों से दर्शकों के लिए चलाये जा रहे हैं ,अतः पक्ष -प्रतिपक्ष की खिंचाई कराते समय वे दर्शकों का पूरा ख्याल भी रख रहे हैँ।इस नम्बर के खेल में मिडिया ने, सत्तारूढ़ केंद्र सरकार से राज्य सरकारों तक तथा विभिन्न राष्ट्रीय से स्थानीय प्रतिपक्षी दलों तक, सबको ऊपर -नीचे वाले ढेकुल झूले पर चढ़ा दिया है जिससे ये कभी आसमान में हुलस रहे हैं तो कभी धरती पर धूल फाँकते दिख रहे हैं।निःसंदेह चौथा स्तंभ अपने उत्कर्ष पर है।
***************सावन से भादों दूबर ?मोदी सरकार मिडिया पर छायेंऔर केजरीवाल राष्ट्रीय रंगमंच से ओझल हों ;यह आज के भारत में हो ही नहीं सकता।अतः वे भी अपनी सौ दिन में हल की गई उत्तरपुस्तिका ले कर मिडिया पर चढ़ गए और शंख नाद करने लगे कि उनके लिए दस में दस क्या ,हजार -लाख भी कम। लोग उन्हें ऐसे उछालते हैं मानो मोदी सरकार के बाद देश में कोई सत्ता है तो वह केजरीवाल ही हैं। केजरीवाल को लेकर मिडिया की आतुरता  एवँ उनके समाचार चयन के मापदण्ड पर आम जनता सशंकित हो रही है। यह तो नकारा नहीं जा सकता कि दिल्ली जैसे  कई महानगर इस देश में हैं जिनको वहाँ की महानगर पलिकाएँ एवँ स्थानीय प्रशासन चला रहे हैं; वह भी बिना केंद्र शासित राज्य दिल्ली जैसी प्राप्त सुविधाओं के।ऐसे में दिल्ली का प्रदेश होना समझ में आए या न आए  परन्तु केजरीवाल का मुख्य मंत्री होना और लेफ्टिनेंट गवर्नर साहब पर कीचड़ की फेंका -फेंकी खूब समझ में आ रही है।टीवी चैनल वालों के सामने टीआरपी की समस्या हैऔर ज्वलंत मुद्दों के पिछले पादान पर खिसकाने केँ उनके अपने तर्क भी हैं।  
***************परन्तु अपनी -अपनी ढफली अपना -अपना राग के बीच भी यह जो जनता है -सब जानती है। उसे पूरी बहस में ईमानदारी व निष्पक्षता बहुत ही रंच दिखाई दे रही है। जनता ने मोदी जी द्वारा सरकार बनाने के क्रम में उन्हें एक अनुमोदित प्रश्नपत्र या अपेक्षा  सूची सौंपी थी ,वह मूल्यांकन के समय लुप्त है। सत्ता ,विपक्ष और कुछ विश्लेषक  स्वयं को भाने वाले अपने -अपने गढंत प्रश्नपत्र व कल्पना सृजित उत्तरपुस्तिका या उपलब्धि लेकर धमा -चौकड़ी मचाए हुए हैं जैसे शूट -बूट वनाम शूट्केस की सरकार।    भाषा से ठेंठ न बना जाय ;समय आने पर जनता सत्ता ही नहीं विपक्ष का  भी यथेष्ट मूल्यांकन कर देगी। रही बात आज की तो दस में कितने नंबर वालों को सौ में कितने नंबर वालों से सीख लेनी चाहिए कि वहाँ लाखों परीक्षार्थी एक प्रश्न पत्र का उत्तर देते हैं।
***************सारांशतः दस में कितने नम्बर वाले परिवेश में सौ में कितने नम्बर वालों की प्रासंगिक वरीयता धूमिल होना भारत की सुनहरी यात्रा में एक गतिरोध सा होगा।ये लाखों की नई पीढ़ी कल देश को आगे बढ़ाने एवँ इसे सँवारने की जिम्मेदारी सँभालने वाली है। अतः उन्हें हर विशेषज्ञ परामर्श व मार्गदर्शन , व्यापक स्तर पर, मिलनी चाहिए।वर्तमान को भविष्य की अनदेखी नहीं करनी चाहिए। इस प्रसंग में प्रधान मंत्री ने अपनी पिछली मन की बात में  परीक्षार्थिओं को बधाई एवँ उत्साह वर्धन कर एक सराहनीय कार्य किया। इन बातों को टीवी ,मिडिया व अन्य सञ्चार माध्यमों को और आगे बढ़ाना होगा। यदि घुमक्कड़ी माने तो शिक्षा वही है जिससे व्यक्ति अपने जीवन के हर पहलू में शिक्षित लगे और सरकार की उपलब्धि वही जो बिना बताए ही जनता को दिखे।बिना तन्मय संघर्ष के परीक्षार्थी हों या  सरकारें मात्र नम्बर के सहारे अपने लक्ष्य को नहीं बेध पायें गे। --------------------------------------मंगलवीना
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अंततः
                                              विश्व - पर्यावरण -दिवस 
************आज पर्यावण दिवस पर हम पृथ्वीवासिओं को, पिछले तीन महीनों के, प्रकृति प्रदत्त संदेशों का
  स्मरण करना चाहिए। रबी कटाई के समय  तूफानी वरसात ,हिमालय की गोंद में एक से एक भूकम्प के झटके,पानी के लिए मचा हाहाकार एवँ आंध्र से पूरे उत्तर भारत में गर्मी का चल रहा  प्रलयंकरी ताण्डव जैसे प्राकृतिक उपहार पर्यावरण से छेड़ -छाड़ के रिटर्न -गिफ्ट हैं। यदि ऐसे रिटर्न -गिफ्ट नहीं चाहिए तो मानव जाति पचास वर्ष पहले का पर्यावरण धरती को लौटा दे वरन हम याचना करें गे -"हे प्रभु !अच्छे दिन तो बाद में देना ,ठण्डे दिन पहले दे दो। भूख तो मिटती रहेगी,प्यास तो पहले मिटा दो। "  -------------------मंगलवीना  
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पर्यावरण दिवस :दिनाँक 5 जून 2015 --वाराणसी।
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शुक्रवार, 15 मई 2015

A homage to late Dr Kesar Singh

Today is the 3rd Punya-tithi of Late Dr. Kesar Singh, who was my younger brother and served as a Professor at Rutgers University, New Jersey. All my family members remember him too much and pay homage to his simplicity and selflessness. His ideas and thoughts will motivate us for years to come.
Here is a still taken in his university chamber during my US visit in 2011

शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2015

विषयान्तर ? पसन्द नहीं

************संप्रग की सत्तावधि में भ्रष्टाचारियों ने खुलकर देश को लूटा और काँग्रेस की लुटिया डुबाई। अब राजग में वे सत्य एवँ निष्ठा का दुपट्टा ओढ़ कर लूट रहे हैं। बगुला भगत की कहानी चरितार्थ हो रही है। देश में आशा की किरण रूप एक नई "मोदी संस्कृति "का अभ्युदय हुआ है जिसमें भ्रष्टाचार के प्रति शून्य सहनशीलता का उद्घोष है। इसका प्रभाव बड़े भ्रष्टाचारियों पर तो स्पष्ट रूप से दिखने लगा है। परन्तु देशव्यापी मझोले एवँ निचले स्तर के भ्रष्टाचारियों की दुनियाँ में एक नया जोखिम गुणक या रिस्क फैक्टर भी उभरा है जिसे वे मोदी रिस्क फैक्टर का नाम देते हैं और इस जोखिम के चलते पहले से अधिक उगाही कर रहे हैं। आम लोग यह नया परिदृश्य भी भुगत रहे हैं और सरकार की ओर से यह कथन सुन कर हैरान हैं कि भ्रष्टाचार पर अंकुश लग गया है। प्रत्यक्ष तो यह है कि न लूट की संपत्ति देश को मिली ,न लुटेरों को धरा -पकड़ा गया ,न अभियोजन चलाया गया ,न जेल भेजा गया और न ही जनता की लूट बन्द हुई।सुहाने सपने कहीं गुम हो रहे हैं। लोकसभा चुनाव के समय भाजपा ने आम भारतीय को सुशासन एवँ सुराज का स्वप्न दिखाते हुए अपने लिए सत्तासुख का सपना देखा। जनता ने भाजपा के सपने को एवमस्तु कर दिया परन्तु अपने सपने की कोई डोर या  छोर उसे कहीं से पकड़ में आती नहीं दीख रही है। आम लोग एक किनारे ठिठक गए हैं और विस्मृत हैं कि उन्हें अपेक्षा से इतर क्या कुछ परोसा जा रहा है।
************अब उद्धव !बाँह गहे की लाज।परिस्थिति से खिन्न लोग भाजपा का साथ छोड़ने की बात तो नहीं सोच रहे हैं परन्तु पकड़ को शिथिल अवश्य करने का मन बना रहे हैं।दिल्ली में तत्काल विधान सभा के लिए संपन्न हुआ चुनाव एवँ इसका परिणाम इस शिथिलता का स्पष्ट प्रमाण दे रहा है। भाजपा की दिल्ली में हुई पराजय न तो श्रीमती किरण बेदी को बाहर से लाकर मुख्यमंत्री पद की दावेदारी से हुई न हर्षवर्धन जी या किसी अन्य स्थानीय नेता की उपेक्षा से हुई बल्कि लोकसभा चुनाव के समय किए गए वादों को प्रतिबद्धता से न लेने के कारण हुई। चुनाव में भाजपा नेताओं ने यह नहीं बताया कि काले धन को वापस लाने , भ्रष्टाचार मिटाने रोजगार के अवसर बढ़ाने और महँगाई  पर नियंत्रण केलिए सरकार ने प्रतिदिन क्या प्रयास किया , कठिनाइयाँ क्या हैँ और विलंब क्यों।विशिष्ठ संस्कृति  की ओर बढ़ती भाजपा विलंब  एवँ ढिलाई केलिए क्षमा माँगना भूल कर दम्भी बनती जा रही है। शंका तो यहाँ तक होने लगी है कि जिसे जनता भ्रष्टाचार मानती है ,वह भाजपा सरकार  की समझ वाले भ्रष्टाचार से अलग कुछ और तो नहीं है। यह शंका निर्मूल भी नहीं है क्योंकि  सभी सहमत हैं कि केंद्र सरकार तन्मयता से काम कर रही है फिर भी जिन बुराइयों से जनता छुटकारा चाहती है,वे अपनी पकड़ और बढाती जा रही हैं। तत्काल विमर्श की आवश्यकता है कि चुनाव के समय भाजपा ने जो वादे किए थे जनता के सन्दर्भ में उनके अर्थ क्या हैं। अन्यथा बहुत देर हो जाय गी।
************वर्तमान दशाब्दी में भारतीय जनाकांछाओं का सटीक प्रतिनिधित्व केवल अन्ना हजारे कर रहे हैं और वे जिस भ्रष्टचार की बात करते हैं वही आम जन को बेहाल करने वाला महा दानव है जिसका संहार किये बिना सुराज एवं सुशासन का अवतरण हो ही नहीं सकता।अन्ना ने जिस लोकपाल एवँ लोकायुक्त की बात की वे ही इस भ्रष्टाचार को मारने वाले सक्षम शस्त्र हैं परन्तु आज की सरकारों के लिए ये सन्दर्भ परिधि से बाहर हैं। केंद्रीय सतर्कता आयोग शासन बदलने के बाद भी देश में भ्रष्टाचार की वर्तमान स्थिति पर अपना नियमित रिपोर्ट तक नहीं दे रहा है।  केंद्र और राज्य की सरकारें यह न भूलें की जनता हर दिन हर पल भ्रष्टाचार और काले धन पर प्रहार होते देखना चाहती है।चाहें भी क्यों न ? इनके चलते जनता को अपनी दुश्वारियाँ दिखाई देती हैं न कि दिल्ली की अंतर्राष्ट्रीय डिप्लोमेसी। अपनी दिनचर्या में जब वह घर से बाहर सड़क पर होता है तो गड्ढों में डूबती सड़कें उसे अभियन्ताओं व ठेकेदारों के भ्रष्टाचरण की याद दिलाते हैं और चौराहों पर दिखते पुलिस वाले लूट -खसोट की याद दिलाते हैं। जब अपने कार्य वश किसी कार्यालय में होता है तो बाबुओं की प्रभुता व रिश्वतखोरी सताती है और जब कभी किसी शिक्षा ,चिकित्सा या न्याय के आलय में होता है तो वहाँ की निर्दय लूट सताती है। और तो और किराना एवँ फल सब्जी की दुकानों से मिलावट तथा कालाबाजारी का शिकार होते हुए साँझ तक घर पहुँच कर वह निढाल पड़ जाता है। सुराज और सुशासन हर भारतीय को सुख पहुँचाने वाले कारक हैं। यदि ये सुख जनता को मिल जांय तो संप्रग सरकार के सारे कार्यक्रम जैसे स्वच्छता अभियान ,बेटी बचाओ -बेटी पढ़ाओ ,स्वच्छ गंगा ,अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की बढ़ती छवि इत्यादि उनके सुख को और बढ़ा सकेंगे। सुख हो तो उसको बढ़ाने वाली बातें अच्छी लगेंगी।जनता विषयान्तर नहीं चाहती है। पहले वादा भर दे दिया जाय फिर उससे ज्यादा की बात हो। राष्ट्रवादी सरकार के सामने योजना बनाने का नहीं क्रियान्वयन का समय आ गया है।
************देखन में छोटे लगें ,घाव करें गम्भीर। मध्य प्रदेश देश का एक प्यारा सा प्रान्त है। वहाँ से प्रायः समाचार आता है कि अमुक विभाग के अमुक स्थान एवँ पद पर कार्यरत अमुक के यहाँ भ्रष्टाचार निरोधक इकाई /लोकायुक्त का छापा पड़ा  है और करोड़ों की आय से अधिक सम्पत्ति पकड़ी गई है। वहाँ आईएएस से लेकर चपरासी जी तक भ्रष्टाचार में पकड़े जा चुके हैं। वहाँ के शासन की इस प्रतिबद्धता की हर आम आदमी प्रसंशा करता है। मध्य प्रदेश के सीधे ,सरल मुख्य मन्त्री ,वहाँ की लोकायुक्त व्यवस्था,शासन की सतर्क कार्यशैली तथा भ्रष्टाचारियों से निपटने में दृढ़ता अन्य राज्यों व केंद्र के लिए अनुकरणीय होनी चाहिए।कुछ अन्य प्रान्तों जैसे कर्नाटक ,उत्तराखण्ड इत्यादि में भी अच्छे लोकायुक्त प्रावधान हैं पर शायद जुनून नहीं।  यदि नेकनीयती से देश की सभी सरकारें वैसे ही कानून ,वैसे ही लोकायुक्त और लोकपाल की टोली के साथ भ्रष्टाचार पर चोट करने लगें तो भ्रष्टाचार को गम्भीर रूप में घायल होने और भारत की धरती से विदा होने में देर नहीं लगेगी।तभी काले धन एवँ भ्रष्टाचार मुक्त भारत  में विकास एवँ निवेश की गति तेज होगी ,महँगाई से छुटकारा मिलेगा और युवकों को बेहतर रोजगार के अवसर सुलभ होंगे।
************सपाट सा सन्देश है कि अन्नावाद ही आज की समस्या का सर्वमान्य समाधान है। जो सरकारें इस धारा को नकारने या भोथरी करने का प्रयास करेंगी वे सत्ता से बाहर जाएँगी।निसंदेह आज की राजनीति में हमारे प्रधान मंत्री सुयोग्यतम, कर्मठतम एवँ सर्वाधिक लोकप्रिय नेता हैं जिन्हे जनता अपनी अपेक्षाओं पर खरा उतरते देखना चाहती है। अतः अन्ना की चाहत ,सुराज व सुशासन की परिकल्पना और चुनाव के समय किये गए वादों की पूर्ति के लिए भाजपा सरकार को मोदी जी के नेतृत्व में अपनी पूरी ऊर्जा झोंक देनी चाहिए। पारदर्शी क्रियान्वयन ,सविनय व्यवहार एवँ विशिष्ठ  संस्कृति से वैराग्य ही वे कारक हैं जो  इस दल को देश के कोने -कोने में स्थापित कर सकते हैं।भाजपा के भविष्य एवँ विस्तार का निर्णय उसके कृतित्व से होगा जबकि सौ टके कि बात यह है कि जनता को विषयान्तर बिल्कुल पसन्द नहीं है।भारत के अन्य राजनीतिक दलों केलिए भी कुछ ऐसी ही करो या मरो की स्थिति है।
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अंततः
रामचरितमानस में कागभुशुण्डि ने गरूङ की जिज्ञासा शांत करते हुए कलियुग अर्थात वर्तमान समय का बड़ा ही मार्मिक श्रव्यचित्र प्रस्तुत किया है। सन्दर्भ को आगे बढाती कुछ पंक्तियाँ यूँ हैं -
द्विज श्रुति बेचक भूप प्रजासन। कोउ नहीं मान निगम अनुसासन।
सोइ  सयान जो  परधन  हारी ।  जो  कर  दम्भ  सो  बड़    आचारी।
जो  कह  झूठ मसखरी   जाना।   कलियुग  सोइ  गुनवंत  बखाना।
अर्थात कलियुग में ब्राह्मण वेदों को बेचने वाले होंगे। राजा प्रजा को खाने वाले होंगे। निगम या स्थापित संस्थाओं के अनुशासन को कोई नहीं मानेगा। जो दूसरे की संपत्ति हड़प लेगा, वही बुद्धिमान समझा जायगा।जो दम्भ करेगा, वही सदाचारी की मान्यता पायेगा। जो मिथ्यावादी या हँसी -दिल्लगी करने वाला होगा, कलियुग में वही गुणवंत माना जायगा।तो क्या राष्ट्रवादी शासन काल में कलियुग का अन्त होगा और सुराज तथा सुशासन वाला रामराज्य देश में स्थापित होगा? यही यक्ष प्रश्न है।--मंगलवीणा
दिनाँक 21 .02 . 2015   ------------------------------mangal-veena.blogspot.com
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शुक्रवार, 26 दिसंबर 2014

भारतीयता के दरकते कगार

************भारत के इतिहास में सन दो हजार चौदह कुछ विशेष उपलब्धियों के लिए सदैव अविस्मरणीय रहे गा। इस वर्ष अंतरिक्ष क्षेत्र में छलाँग लगाते हुए मंगल ग्रह पर पहुँच भारत ने विश्व में अपना डंका बजाया। वंशवाद ,जातिवाद एवँ क्षेत्रवाद की तिकड़ी तोड़ते हुए एक बहुमत वाली सरकार के नेतृत्व में हमारा लोकतंत्र विकास की ओर अग्रसर हुआ। धर्मनिरपेक्षता की छद्म व्याख्या ध्वस्त हुई। भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के लिए देश की जनता ने यह देश हुआ बेगाना की धुन सुनाई।  अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर उभरते भारत के सशक्त प्रतिनिधित्व के लिए प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी को देश ही नहीं पूरे विश्व में अपार लोकप्रियता मिली।श्री मोदी के पहल पर ही संयुक्त राष्ट्र संघ ने विश्व में प्रति वर्ष योग -दिवस मनाने का निर्णय लिया।देश की झोली में शान्ति के लिए एक नोबेल पुरस्कार आया तो देश के योग्यतम पूर्व प्रधानमन्त्रियों में अग्रणी श्री बाजपेई एवँ स्वनामधन्य स्व महामना मालवीय को भारतरत्न से अलंकृत किया गया।इतना ही नहीं भारतीय संस्कृति की झोली में कोच्चि की सडकों से किस ऑफ़ लव का खुला प्रदर्शन भी आया।अधिकतर उपलब्धियों से भारत खुश हुआ.. .  परन्तु इस किस ऑफ़ लव ने विवाद ही नहीं खड़ा किया बल्कि समाज को असहज करते हुए भारतीय संस्कृति के एक कगार को ढहा दिया।
************जब कोच्चि में युवाओं ने विरोध या प्रदर्शन का यह अभिनव प्रयोग किया तो समझ में नहीं आया कि हमारी संस्कृति विकासोन्मुखी फ़ैलाव ले रही है अथवा बाहरी संस्कृतियों के दबाव से संक्रमित होती जा रही है। घटना हुई तो पुलिस उनपर कार्यवाही करती दिखी। वहाँ के उच्च न्यायलय को उसमें हस्तक्षेप करने जैसा कुछ नहीं दिखाई दिया। मीडिया ने पुलिस के मॉरल पुलिसिंग के अधिकार पर बहस करा दिया। भारतीय संस्कृति के परम्परावादियों ने इसे संस्कृति को नष्ट करने  वाला कुत्सित प्रयास माना जबकि आयोजन करने वाले एवँ उन जैसे युवा स्वतन्त्र सोच वाले लोगों ने इसे अपना अधिकार बताया।बताएं भी क्यों न। हमारी संस्कृति को इस पड़ाव तक लाने में सिनेमा ,टीवी एवँ आधुनिक सञ्चार जगत के साथ -साथ इन लोगों ने पचासों वर्षों से भगीरथ प्रयास किया है।इनके योगदान द्वारा ही हम लोग पूर्ण भारतीय परिधान से न्यूनतम परिधान ,एकान्तिक प्यार व्यवस्था से कहीं भी प्यार व्यवहार,दूत सन्देशन से फेस बुक ,एसएमएस इत्यादि सन्देशन ,वात्सल्य चुम्बन से उन्मुक्त श्रृंगारिक चुम्बन ही नहीं अपितु स्वच्छ और शालीन मनोरंजन विधाओं से आगे बढ़ अभद्र एवँ हिंसा फ़ैलाने वाले चलचित्रों व धारावाहिकों  तक पहुँचे हैं।यह उन्हीं की कर्षण शक्ति है जो युवतियों को पबों तक ले जाती है या किसी मेरठ के पार्क में अपने प्रेमी के साथ युगल जोडी बन बैठाती है। फिर सांस्कृतिक विकर्षण से प्रेरित हो श्री राम सेना वाले पब पर टूट पड़ते हैं या पुलिस वाले ऑपरेशन मजनू चला प्रेमी युगलों को पीट देते हैं। संभावना है कि भविष्य में पूर्ण नग्न प्रदर्शन सशक्त विरोध का माध्यम बने और अवरोधक शक्तियाँ व्यवस्था ,तर्क ,निर्णय और समर्थन के समक्ष घुटनें टेक दें। परन्तु इसे कोई नकार नहीं सकता की पार्श्व प्रभाव भारतीय समाज केलिए बहुत ही पीड़ादायी होगा।
************आगे बढ़ती सभ्यता के साथ सांस्कृतिक बदलाव एवँ परिष्करण अवश्यमेव होते रहते हैं। आबाल बृद्ध पूरे  समाज के लिए सहजता के कारण ये बदलाव आत्मसात भी हुए हैं जिससे हमारी अद्भुत संस्कृति अविरल विस्तार पा रही है।चूँकि भूमण्डलीकरण के इस दौर में विश्व की सभी संस्कृतियाँ एक दूसरी से प्रभावित हो रहीं हैं,हर भारतीय का यह कर्तव्य है कि वह अपनी संस्कृति की मूल आत्मा एवँ विशिष्ठता को अछुण्ण रखते हुए इसे और सुन्दर व सरस बनायें। किसी भी नए प्रयोग या कृत्य से यदि समाज असहज हो तो निश्चय ही हम अपने प्रयोग पर पुनर्विचार करें कि अपनी संस्कृति को कहीं उथला तो नहीं कर रहे हैं। जौहर प्रथा ,बाल विवाह ,बहु विवाह ,स्पृश्यता ,पशु बलि इत्यादि  ऐसी  प्रथाएँ थीं जिन्हें हमारी संस्कृति ने असहजता के कारण अतीत में बाहर का रास्ता दिखाया और अपनी समृद्धि बढ़ाई।आज को देखें तो कल तक श्रद्धा और स्नेह से अभिसिंचित रही चरण स्पर्श की आदर्श प्रथा आज चाटुकारिता एवँ स्वार्थपूर्ति की एक विधा बन कर हमें असहज कर रही है। जब कोई पुलिस अधिकारी सैफई महोत्सव में मुलायम परिवार के किसी सदस्य के चरण के पास झुक बैठता है ,कोई पुलिस कर्मी किसी डीआईजी के चरण पकड़ उसके जूते का फीता बाँध रहा होता है या कोई प्रशासनिक अधिकारी किसी मन्त्री का चरण पकड़ते दिखता है तो हम भारतीय असहज हो जाते हैं। अतःपरिष्करण के क्रम में अपनी ही संस्कृति से उपजी इस अपसंस्कृति को समाप्त करने का समय हो चुका है।
************हो सकता है कि नए प्रयोग करने वालों को शंका हो कि उनके कृत्य में गलत क्या है। हमारे धार्मिक ग्रन्थ गीता में जब करने योग्य कर्म और न करने योग्य कर्म के विषय में अर्जुन को संशय हुआ तो कृष्ण ने निर्णय के लिए शास्त्र को प्रमाण मनाने की बात कही।  यथा -
------[तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्यकार्यव्यवस्थितौ। ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तम् कर्म कर्तुमिहार्हसि।]
अतः हर भारतीय संस्कृति धर्मी, प्रश्न चिन्हित कार्य में शास्त्रों को प्रमाण मानते हुए, विकास एवं नए प्रयोगों की ऊँचाइयाँ छुए जिससे सहज रहते हुए समाज अग्रगामी हो सके। समय रहते आत्ममंथन करने से ज्यादा सुसंस्कृत एवँ विकासोन्मुखी नई पीढ़ी सामने आएगी। कल का दायित्व आज पर है।दूसरों की सहजता को दृष्टिगत रखते हुए यदि प्रदर्शन करने वाले ,फिल्मबनाने वाले ,धारावाहिक गढ़ने वाले ,व्यवस्था सुनिश्चित करने वाले ,मीडिया के लोग ,साहित्यकार ,संगीतकार ,वैज्ञानिक ,कलाकार व अन्य सभी वर्गों के लोग नए -नए अनछुए विकासोन्मुखी कार्य समाजहित मे करेंगे तो दो हजार चौदह की भाँति हर नया वर्ष अभूतपूर्व उपलब्धियों से भारत को गौरवान्वित करता रहे गा। रग -रग में भारतीयता दौड़े गी तब हर भारतीय के आभामण्डल से विश्व चमत्कृत होगा ही ।  इति।
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अंततः
ब्लॉग के सभी सुधी पाठकों ,टिप्पणीकारों ,जागरण जंक्शन परिवार के साथियों और अपने शुभेक्षुओं को देहरी तक आ पहुँचे नव वर्ष के लिए मैं शुभ कामनाएँ प्रेषित करता हूँ। वर्ष दो हजार पन्द्रह के भाग्य विधाता से याचना करता हूँ कि वे आप सबको स्वास्थ्य ,समृद्धि ,सहजता एवँ सरसता से ओतप्रोत रखें और पंद्रह चौदह से बेहतर हो। सहकारिता के लिए अपने परिवार को भी कृत्यज्ञता ज्ञापित करता हूँ तथा नववर्ष में उनके साथ और जुड़ाव एवँ सहभागिता का संकल्प लेता हूँ।शुभमस्तु।    ... मंगला सिंह
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वाराणसी दिनाँक 27 . 12 . 2014                               mangal-veena.blogspot@gmail.com
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सोमवार, 15 दिसंबर 2014

ये माफ़ी-वाफी क्या है

************इन दिनों माफ़ी की माँग करने वालों ने देश एवं संसद को सर पर उठा रखा है। विशेषकर माननीयों के ऐसे अमाननीय आचरण पर नागरिक स्तब्ध हैं।प्रतिनिधियों की ऊर्जा रचनात्मक कार्यों से इतर संकीर्ण प्रयोजनों में बर्बाद हो रही है और शालीनता तार -तार ---। धन्य हैं हमारे जनप्रतिनिधि कि लोकसभा की अध्यक्ष महोदया को उनसे पूछना पड़ा कि क्या क्षमा माँगने केलिए नियमित रूप से संसद में एक समय निर्धारित कर दिया जाय। हंगामा करनेवालों को पता है कि वे गांधी की विचारधारा को सर्वाधिक हानि पहुँचा रहे हैं फिर भी अपने  कृत्य केलिए उन्हीं की दुहाई भी। महात्मा की विचारधारा तो यह सिखाती है कि विवादस्पद वक्तव्य देने वाले से पुनर्विचार का आग्रह तो किया जा सकता है परन्तु हठ या बल प्रयोग से उसकी विचारधारा को जीता नहीं  जा सकता।
************किसी व्यक्ति का स्टेटमेंट ,वक्तव्य ,बयान या उद्गार उसके विचार या चिंतन की  धारा का सारांश होता है। जब अनचाही गलती या भूल होती है तो व्यक्ति स्वतः संज्ञान लेता है और अपराधबोध से मुक्ति के लिए माफ़ी माँग लेता है परन्तु जब किसी के वक्तव्य का विपरीत विचारधारा वाले संज्ञान लेते हैं और क्षमा याचना का दबाव बनाते हैं तब वे भूल जाते हैं कि येन केन प्रकारेण क्षमा मँगवाना किसी की विचारधारा को दबाने का बलात प्रयास है। माफ़ी मँगवाने से अहम की संतुष्टि हो सकती है परन्तु माफ़ी माँगनेवाले के ह्रदय परिवर्तन की कोई गारण्टी नहीं।प्रयोग के तौर पर जिन लोगों ने क्षमा याचना किया है ,उनका झूठ पकड़ यंत्र से जाँच करा कर देखा जा सकता है कि उनका ह्रदय परिवर्तन हुआ क्या। गौतम बुद्ध ने अंगुलिमाल से उसकी विचारधारा पर पुनर्विचार का ही मात्र आग्रह किया था परन्तु परिणाम ऐसा कि लोगों के सामने वह दुर्दांत डाकू एक सद्पुरुष के रूप में सामने आया।गांधी जी के सत्य एवँ अहिंसा का यही आग्रह पूरी दूनियाँ में पूजा जाता है।देश की दशा एवँ दिशा में धनात्मक बढ़त एवँ सद्भावना के लिए विपरीत बयानोँ का आग्रहपूर्वक पुरजोर विरोध होना चाहिए। ऐसे विरोध का स्वागत भी होना चाहिए परन्तु विरोध केलिए विरोध अभिब्यक्ति की स्वतंत्रता पर कुठाराघात  है।
************गांधीवाद भारत की एक परमपूज्य विचारधारा है जिसने भारत को स्वतंत्रता ही नहीं दिलाई ;पूरी दुनियाँ को एक नई दार्शनिक सोच दी जिसके समक्ष आधुनिक सभ्यता भी नतमस्तक है। परन्तु भारत के शत प्रतिशत लोग गाँधीवादी ही हों-ऐसा न तो गांधी के समय था ,न आज है न कल होगा। हर भारतीय की गांधी में श्रद्धा निर्विवाद रूप से होनी चाहिए परन्तु विश्वास की अनिवार्यता कदापि नहीं। सन 1944 में जिन लोगों ने सेवा ग्राम पहुँच कर जिन्ना से गाँधी के प्रस्तावित बैठक का उनके सामने विरोध किया था ,वे लोग भी महात्मा में श्रद्धा रखते हुए अन्य सोच के साथ देश के लिए चिंता कर रहे थे।महात्मा गाँधी की हत्या की याद आते ही नाथूराम के लिए मन घृणा से भर जाता है  परन्तु उसपर चर्चा या विमर्श को नकारना क्यों ?किसी न किसी विचारधारा से वह भी प्रेरित एवँ उद्द्वेलित रहा होगा। 30 जनवरी 1948 से पहले के नाथूराम के व्यक्तित्व एवँ कृतित्व के मूल्यांकन की चर्चा प्रासंगिक तो हो ही सकती है।तात्पर्य यह कि नाथूराम के नाम पर उत्तेजित हो उठना किसी उत्कृष्ठता का परिचय नहीं  देता।हमारी संस्कृति तो इतनी शालीन है कि हम रावण व कंस को भी गुनते हैं।
***********मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम की अयोध्या में उनकी  जन्मस्थली पर मंदिर निर्माण भी एक ऐसा विषय है जिसकी पक्षधर विचारधारा पर किसी का वक्तव्य आते ही पहाड़ टूट पड़ता है।यह जानते हुए भी कि सिक्ख ,इस्लाम , ईसाई ,बौद्ध इत्यादि सभी धर्मों से अति प्राचीन धर्म हिंदुत्व है और उसमें भी श्री राम प्रथम पूज्य अवतार हैं ;यदि कोई कह दे कि हम सभी राम के वंशज हैं तो समझिए कि उसने कोई गंभीर अपराध कर दिया।प्रभु के जन्मस्थान पर भव्य मन्दिर बनाने की बात कर दी तो उससे भी बड़ा अपराध।  न्यायालय से जल्दी निर्णय की अपेक्षा कर दे तो न्यायिक प्रक्रिया का बाधक बने और उससे आगे कोई आग्रह हो तो वैमनष्यता का वाहक।संभवतः वोट की राजनीति के कारण विरोध उगलने वाले झुठलाना चाहते हैं कि धर्म के सन्दर्भ में विभिन्न धर्मावलम्बी लोग श्री राम को मानें या न मानें परन्तु हर धर्म के अनुयाई और सारे देशवासी उनमें तथा उनमें स्थापित आदर्शों में अपार श्रद्धा तो रखते ही हैं। यह जानते हुए कि सद्भावना भारतीय जनमानस की आत्मा है; कुछ राजनीति एवँ धर्म के ठेकेदार भृगु ऋषि की भाँति उसकी छाती पर पांव मार रहे हैं और जनाकांछा वाली समस्या के समाधान की बात करने वालों को घसीट रहे हैं। जनता इन्हें पाठ पढ़ाई है और यदि समझ में नहीं आ रहा है तो और स्पष्ट पढ़ाएगी।
************भारतीय संविधान के प्रति शपथबद्ध हर नागरिक को अभिब्यक्ति की स्वतंत्रता है। अभिब्यक्ति यदि शालीनता से विभूषित हो तो सोने में सुगंध।समाज के हित में मन ,वाणी तथा शरीर से चिंतनशील लोगों को दुराग्रह रहित होकर शालीनता से अपना वक्तब्य देते रहना चाहिए।इससे समाज अग्रगामी होता है। विरोध भी तभी गरिमामयी होगा जब वह आग्रह का अनुगामी होगा।जनता तो सब समझती है। ये देश चलानेवाले और देश  चलाने केलिए छटपटानेवाले माननीय लोग क्यों नहीं समझ पा रहे हैं। अरे भाई !ये माफ़ी -वाफी क्या  है।
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************चिन्तन श्रोत :साध्वी निरंजन ज्योति सांसद फतेहपुर ,स्वामी साक्षी महराज सांसद उन्नाव ,योगी आदित्य नाथ सांसद गोरखपुर एवँ माननीय श्री राम नाइक राज्यपाल उत्तर प्रदेश के हाल के वक्तव्य और संसद तथा उसके बाहर विरोधी दल के माननीय सांसदों एवँ नेताओँ द्वारा मचाया गया शोर -शराबा।
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अंततः
************"महाजनों येन गतः स पन्थाः" का तात्पर्य यह भी है कि जिसके चलने से पथ
************ या रास्ते का निर्माण न हो वह महाजन या बड़ा आदमी नहीं हो सकता।।।।।।
दिनाँक 14 . 12 . 2014                                 mangal-veena.blogspot.com@gmail.com
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बुधवार, 1 अक्टूबर 2014

बुहारी के दिन बहुरे

**********किसके सितारे कब चमक जाँय ;यह तो प्रभु जानें या ज्योतिषी जोड़ें ,घटायें। पर यह ध्रुव की भाँति अटल है कि कभीं न कभीं सबके अच्छे दिन आते हैं।कुछ ऐसा ही बुहारी ,बढ़नी ,झाड़ू या कूँचे के साथ हो रहा  है। जो झाड़ू कभी भँगी ,भिस्ती ,मेहतर या झाड़ूबरदार के हाथ रहकर उनको रोटी की आश जगाए रखता था ,वह आज सार्वजनिक स्थानों पर बड़े -बड़े नेताओं ,नौकरशाहों ,उद्योगपतिओं ,समाजसेविओं के हाथ सुशोभित हो रहा है। लोगों को ईर्ष्या होने लगी है कि दिन बहुरे तो झाड़ू की भाँति। यह नंगा फटेहाल देशी झाड़ू अब ब्रांडिंग एवँ पैकेजिंग के साथ शालीन हो चुका है। साथ ही इस कारोवार से जुड़े दस्तकार ,निर्माता ,विक्रेता सभी मस्त हैं। हों भी क्यों न। अब यह भारी खपत और अच्छे मुनाफे का धँधा बन चुका है। कवि रहीम ने ठीक कहा था कि चुपचाप समय का उलट - फेर देखो।जब अच्छे दिन आयगें तो बनते देर नहीं लगेगी। सो हर घर ,गली ,गाँव ,मुहल्ला ,सड़क ,रेल ,दफ्तर,स्कूल  ,अस्पताल ,अत्र-तत्र ,सर्वत्र पूरे भारत में यदि कोई चीज चलन और चर्चा में है तो वह झाड़ू और स्वच्छता ही है।आशा करनी चाहिए कि समग्र स्वच्छता के ईमानदार क्रियान्वयन की निरन्तरता से विश्व में भारत की छवि स्वच्छ भारत के रूप में अवतरित होगी।
**********झाड़ू की सफलता बीते तीन -चार वर्षों के घटनाक्रमों की वर्तमान अभियान में परिणति है।त्वरित सिंघावलोकन करें तो इसका श्रीगणेश अन्ना हजारे की भ्रष्टाचार पर झाड़ू चलाने वाले आन्दोलन के साथ हुआ।अन्ना द्वारा जन लोकपल विधेयक के लिए चलाया गया आन्दोलन वास्तव में स्वतंत्रता के बाद का पहला सामाजिक पुनर्जागरण शँखनाद था जिसने भ्रष्टाचार एवँ सड़ी गली ब्यवस्था के विरोध में  पूरे देश के अंतर्मन को झकझोरा। जनता शनैः शनैः राष्ट्रहित, जनहित एवँ  स्वच्छ सामाजिक ब्यवस्था को जनतांत्रिक तरीकों से आगे बढ़ाने लगी। आन्दोलन में अग्रणी रहे अरबिंद केजरीवाल तथा उनके साथी अवसर का लाभ उठाते हुए एक राजनितिक दल बना लिए और झाड़ू लेकर चल पड़े- राजनितिक एवँ भ्रष्टाचारीय गन्दगी साफ करने। लोगों ने उन्हें सिर आँखों पर बैठाया और झाड़ू लेकर चलने वालों की बाढ़ आ गई।अभिनव प्रयोग में इन्हें दिल्ली राज्य की सत्ता भी मिल गई।परन्तु जल्दी ही जनता समझ गई कि ये भी भ्रष्ट सत्तेबाजों की भाँति सत्ता लोलुप हैं और इनकी महत्वाकांछा भी पूरे देश की सत्ता हथियाने की है नकि अन्ना के संकल्प को सफल करने की।इस प्रकार इनकी सत्ता और संभावना दोनों समाप्त हो गईं। परन्तु जनता ने झाड़ू चलाना तय कर लिया था और उन्हें राष्ट्र स्तर पर नरेंद्र मोदी में सबसे विश्वसनीय  एवँ योग्य झाड़ू चलाने वाला विकल्प दिखने लगा था। अतः ऐतिहासिक सूझ -बूझ का परिचय देते हुए भारी बहुमत ने अपने सपनों का झाड़ू प्रधान सेवक श्री मोदी को पकड़ा दिया। आशा के अनुरूप मोदी जी अनेकानेक क्षेत्रों में पूरी क्षमता से झाड़ू चलाने लगे हैं और झाड़ू का इक़बाल बुलंद हो रहा है। आज कार्यपालिका ,न्यायपालिका ,विधायिका और संचार माध्यम सभी स्वच्छता के प्रति अभूतपूर्व गम्भीर हो गए हैंऔर स्वच्छ भारत मिशन की गाड़ी तेज गति से दौड़ने जा रही है।
**********इस बुहारी के अनेक पर्याय ही नहीं अपितु विस्तार देने वाली ढेर सारी सहायक क्रियाएँ भी हैं यथा पोंछा लगाना ,धूल  झाड़ना ,धुआँ उड़ाना ,प्रकाश करना ,फिनायल ब्लीचिंग या क्लोरिनेट करना ,ऑक्सीजन उत्सर्जन के लिए अधिकाधिक पेंड़ -पौधे लगाना,रासायनिक कचरे का प्रबंधन करना ,कूड़े  का निरंतर अंतिम निस्तारण करना इत्यादि इत्यादि। इन सबसे बड़ी सहायक क्रिया है-- गन्दगी या तो की ही न जाय या न्यूनतम की जाय और कूड़े का निस्तारण बुहारी करने से उसके अस्तित्व मिटाने तक की जाय।इन सभी क्रियाओं को समाहित करते हुए स्वच्छ भारत मिशन की शुरुआत भारत सरकार का एक उत्कृष्ट कदम है। इसकी सफलता के लिए देश के हर नागरिक की सहभागिता अपेक्षित है। यह सहयोग हमें असहज भी नहीं लगाना चाहिए क्योंकि हिन्दुस्तानी संस्कृति ही स्वच्छता की नींव पर खड़ी हुई है। परंपरागत तौर पर हमलोगों की अपनी, अपने घरों एवँ द्वार- दरवाजों की स्वच्छता बेमिशाल होती है यहाँ तक कि हमारी एक पूज्य देवी के हाथ सदैव झाड़ू शोभायमान रहता है।परन्तु उस परिधि से बाहर हमें सार्वजानिक स्थलों जैसे सरकारी चिकित्सालय ,विद्यालय ,कार्यालय ,रेलवे स्टेशन ,बस पड़ाव,गली , सड़क, नदी,बाजार इत्यादि में गन्दगी करने ,देखने और सहने की आदत सी बन गई है। एक प्रचलित कथन है कि जिससे छुटकारा मिलना सम्भव न हो उसके साथ रहना सीख लो।इस सोच से बहार  निकलने और स्वच्छ भारत निर्माण का समय आ गया है क्यों कि झाड़ू के सितारे आसमान छू रहे हैं।
**********महात्मा गाँधी अपने जीवन में स्वतंत्रता से अधिक स्वच्छता को महत्व देते थे। स्वच्छता जीवन पर्यन्त उनकी चर्या में समाहित थी। इसकी छाप आज भी साबरमती या सेवाग्राम आश्रम में द्रष्टब्य है। महात्मा जी की अगुआई में हुई जनजागृति ने हमें स्वतंत्र भारत दिया परन्तु स्वच्छ भारत का स्वप्न वर्षों से स्वप्न बना रहा। अब दूसरी जन जाग्रति ने वर्तमान सरकार की अगुआई में  हमें स्वच्छ भारत देने की ठान ली है। अतः अपनी -अपनी भूमिका निभाते हुए स्वच्छ भारत अभ्युदय का उत्सव मनाना चाहिए। स्वतंत्र भारत का स्वच्छ भारत होना महात्मा की पुनीत जयन्ती पर उन्हें सर्वाधिक प्रिय श्रद्धांजलि होगी। यह झाड़ू की ही बलिहारी है कि स्वच्छ भारत  अवतरित हो रहा है। बुहारी तेरे दिन बार बार बहुरे।
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अंततः
विजय पर्व दशहरा की सभी सुधी प्रिय पाठकों को मंगल कामनाएँ। सुत्योहारमस्तु।___मंगल वीणा
दिनाँक :2 अक्टूबर 2014  स्थान :वाराणसी
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रविवार, 7 सितंबर 2014

असभ्य आचरण

**********आज दुनियाँ में मानवता को पीड़ा पहुँचाने वाले जितने भी कृत्य हो रहे हैं,वे सब के सब असभ्य आचरण की ऊपज हैं।चाहे यूक्रेन के ऊपर से उड़ रहे नागरिक विमान को प्रक्षेपास्त्र द्वारा बेधकर निर्दोष लोगों की हत्या हो ,गाजा में ऐसे लोगों का संहार हो जिन्हे यह पता न हो कि उन्हें क्यों मारा जा रहा है ,बच्चों के हाथ में बन्दूकें थमा उनसे निर्मम हत्या कराई जा रही हो ,धर्म के नाम पर अनेक देशों में हो रहे अधर्म हों अथवा रात -दिन हो रहे बलात्कार ,हत्या या अपहरण हों :-सब की सब आज की सभ्यता से उपजी असभ्यता हैं जिसमें समाज के हर वर्ग के लोगों का प्रत्यक्ष या परोक्ष योगदान है। अब दुनियाँ में घट रही इस तरह की घटनाएँ जब ग्यारह हजार वोल्ट का झटका मार रही हैं तो  मानवता बार -बार चीत्कार रही है और भीष्म पितामहों से पूछ रही है कि अब किस महाभारत की पृष्ठभूमि तैयार हो रही है। आचरण की असभ्यता से होने वाले अपराधों को केवल निन्दा,आलोचना, विरोध एवँ कठोर दण्ड से रोका जा सकता है। चूँकि ये दवाएँ आज के सभ्य समाज को कड़वी लगती हैं अतः तत्काल ऐसे लोगों को असभ्य बता उन्हें हासिए पर कर दिया जाता है।फलतः असभ्यता रूपी बीमारी बढ़ती जा रही है।
**********अतीत में सभी संस्कृतियों, धर्मों एवँ इनके आधार ग्रंथों में मानवता विरोधी कृत्यों को पाप मानते हुए उनकी सदैव निंदा की जाती थी  और कठोर वर्जना के प्रावधान थे। असभ्यता की परिस्थितियाँ पैदा ही न हों ;इसके लिए समाजसुधारक ,धर्माचार्य ,शिक्षक,आलोचक एवँ निंदक को समाज में सर्वोच्च सम्मान था और उनकी किसी भी टिप्पणी को शासन एवं समाज बहुत गंभीरता से लेता था।आहार -व्यवहार एवँ रहन -सहन के कुछ सर्वमान्य अनुशासन होते थे जो सबके लिए सुरक्षा कवच या लक्ष्मण रेखा का काम करते थे। तभी मानव सभ्यता विकास की ऊँचाइयों पर सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़ती गई और आज अपने उत्कर्ष पर है।विश्व की सारी संस्कृतियों का भूमण्डलीकरण हो चुका है। जो चीजें कभी स्वर्ग के देवी -देवताओं के लिए कल्पित थीं या तपोबल से किसी विरले व्यक्ति को प्राप्त होती थीं -वे सब कुछ आज विज्ञान द्वारा आम आदमी को सुलभ  हैं। दूसरे छोर पर इस विकास के साथ समाज में विलासिता और स्वच्छंदता आई। इन्हें पाने एवँ भोगने की अभिलाषा ने हमें सभ्यता की छाया तले असभ्य बना दिया है।यही आज की विडम्बना है कि हम बाहर से सभ्य दिखने वाले अन्दर से असभ्यता पसन्द करते हैँ ,असभ्य आचरण करते हैं और विरोध के स्वर को क्षीण करते रहते हैं।
**********यह असभ्यता मानव जीवन के हर पहलू में घुस -पैठ कर चुकी है। यह वेश -भूषा में आधुनिका बन घूम रही है;नई पीढ़ी की जुबान पर आधुनिकता बन तैर रही है ;कर्म क्षेत्र में मेनका की भाँति विश्वामित्रों को पथभ्रष्ट कर रही है;मनोरंजन में अश्लील हो गई है और अध्यात्म में धनोपार्जन हो गई है।पश्चिमी सभ्यता ,सिनेमा ,टीवी ,इंटरनेट व सोशल नेटवर्किंग्स इस असभ्यता के प्रमुख उत्पादन केंद्र बन गए हैं।असभ्य मनोरंजन, असभ्य हथकंडों से पारित करा कर विपणन की ब्यूहरचना द्वारा, समाज में परोसा जा रहा है और आक्रामक रणनीति अपनाते हुए कहा जाता है कि मनोरंजन में वही दिखाया जा रहा है जो लोग देखना पसन्द करते हैं।  वस्तुतः यह दुराचरण रूपी कालिया अपने अनेकानेक फनों से समाज रूपी यमुना में एक से बढ़ कर एक जघन्य अपराध रूपी विष का वमन कर रहा है और यमुना असह्य पीड़ा को झेलते हुए किसी कृष्ण की प्रतीक्षा कर रही है। आश्चर्य यह है कि कालिया अब अपने प्रमुख फन से हमारी बहनों ,बेटियों और महिलाओं को डसने लगा है।आए दिन दिल दहलाने वाले अपहरण ,बलात्कार एवँ हत्या की घटनाएँ हो रही हैं। एक की चर्चा हो रही होती है ,तबतक दूसरे तीसरे क्रूरतर कृत्य  ताजा मुख्य समाचार बन टीवी पर्दे पर उभरने लगते हैं।
**********यह भी सर्व विदित है कि हमारे देश की लोकतान्त्रिक शासन प्रणाली में ऐसे क्रूर अपराधिओं को कठोरतम दण्ड देने के प्रावधान हैं और इसके लिए हमारे पास  विश्व की मानी -जानी न्याय ब्यवस्था है फिर भी शासन का भय न होने एवँ पुलिस के निष्पक्ष एवं द्रुत अनुसन्धानी न होने से जनता सशंकित रहती है।अतः उसे हो हल्ला या पुलिस प्रशासन और सरकार के विरुद्ध प्रदर्शन करना पड़ता है। इलेक्ट्रानिक व प्रिंट मीडिया के लोग भी कूद पड़ते हैं।भारत में बुद्धजीविओं ,विशेषज्ञों एवँ नेताओं की प्रचुर सम्पदा है सो ये लोग भी विभिन्न चैनलों पर विराज जाते हैं और चैनलों पर शुरू हो जाता है अंतहीन बकवासी बहस। कहाँ किसी शिकार हुई बहन- बेटी की अंतहीन पीड़ा--- कहाँ बहस करने वालों का टीवी पर अपने को दिखाने का दम्भ--- और कहाँ चैनलों का समाचार परिधि से बाहर निकल कर चर्चा कराते हुए अपना टीआरपी बढ़ाने का प्रयास। सदमें में भी सबको अपनी पड़ी रहती है। इससे बड़ी सभ्यता से उपजी असभ्यता क्या हो सकती है ?
**********हद तो तब हो जाती है जब कोई वाजिब चिंतक ऐसे समय बहनों ,बेटिओं और महिलाओं केलिए कुछ ऐसा सुझाव दे देता है कि उन्हें रात में अकेले घर से बाहर नहीं निकलना चाहिए ;या कि उत्तेजक वस्त्र पहन कर घर से बाहर नहीं निकलना चाहिए; अथवा उन्हें स्कूल ,कालेज और कार्यालयों में साड़ी या सलवार -कुर्ता ही पहन कर जाना चाहिए।सुझाव आया नहीं कि महिला संगठनों व अन्य कोनों से आवाज उठी कि यह महिलाओं की स्वतंत्रता पर अंकुश है ,औरतों को पुरुषों जैसी आजादी क्यों नहीं इत्यादि ,इत्यादि। अंततः बात चिंतक महोदय द्वारा क्षमा याचना तक पहुँचती है। बड़ा अजीब है कि असभ्यता का अस्तित्व तो हम मिटा नहीं पाते हैं परन्तु महिलाओं की सुरक्षा एवँ प्रतिष्ठा की वास्तविक चिंता करने वालों को बिना सार्थक चिंतन  के नकार देते हैं। नहीं भूलना चाहिए कि अनुशासन स्वतंत्रता को सुरक्षा प्रदान करता है।
**********बीते पन्द्रह अगस्त को लालकिले की प्राचीर से देशवासियों को सम्बोधित करते हुए प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा आचरण की असभ्यता पर की गई सूक्ष्म टिप्पणी हर परिवार को झकझोर देने वाली है। क्या यह सच नहीं है कि हमारी  बहन ,बेटी या बहुएँ जब घर से बहार निकलती हैं तो हम लोग ;कहाँ जा रही हो ,कैसे जा रही हो ,कौन साथ में है ,कब तक लौटो गी ,जल्दी लौट आना ,मोबाइल पर लोकेशन बताते रहना ,इत्यादि इत्यादि प्रश्न और सुझाव अवश्य देते है।वहीँ घर के लडके जब बाहर निकलते हैं तो हम उनसे ऐसा कुछ नहीं पूछते। वे देर रात तक कहाँ गायब रहते हैं - इसका भी संज्ञान नहीं लेते।स्पष्ट है कि समाज में लडकियों के लिए बन्धन ,अनुशासन और  संस्कार याद कराए जाते हैं जबकि लड़कों के लिए  ऐसा कुछ नहीं बल्कि स्वच्छन्दता ही स्वच्छन्दता। यह स्वच्छन्दता असभ्यता की भी जननी है और असभ्य लोगों में अपराधी बनने की प्रबल सम्भावना होती है। यह भी सभ्य समाज की असभ्यता का ज्वलंत उदहारण ही है कि बेटियों ,बहुओं के लिए घरों में  यहाँ तक कि विद्यालयों में शौचालय तक  उपलब्ध नहीं हैं। इस असभ्यता के चलते ही भारत सरकार हर घर में शौचालय और हर विद्यालय में लड़कियों एवं लड़कों केलिए अलग शौचालय बनाने की बृहद योजना लागू करने जा रही है। इस कदम से महिलाओं के स्वास्थ्य ,सुरक्षा व सम्मान के प्रति संवेदनशीलता दिखा हमलोग  कम से कम असभ्यता का एक कलंक मिटा सकें गे।
**********इसमें कोई संशय नहीं कि असभ्यता सावन -भादों की रात जैसी सर्वत्र पसर गई है। वहीँ पश्चिम से संक्रमित हमारी पूरब की संस्कृति और सभ्यता जीर्ण -शीर्ण हो रही हैंऔर संस्कारशालाओं अर्थात परिवारों व विद्यालयों से संस्कार विहीन पीढ़ियाँ तैयार हो रही हैं। फिर भी अपने ही ढंग में मस्त और ब्यस्त युवक -युवतियाँ अपने आहार -ब्यवहार व शैली को ही उन्नत सभ्यता समझते हैं।पाइथागोरस का तर्क है कि पतन के बाद उत्थान अपरिहार्य है और यह सुखद है कि  हमारी  संस्कृति ,सभ्यता और संस्कार की बेहतर पुनर्स्थापना के संकेत समाज में मिलने लगे हैं।समय चाहता है कि हम हेलो ,हाय ,हॉट एन सेक्सी को जहाँ हैं जैसे हैं ,वहीँ छोड़ कर सौम्य अभिवादन एवँ सम्बोधन से अपनी दिनचर्या आगे बढ़ाएँ , भारत की सोचें ,भारतीयता में जिएं ,भारतीयता को आगे बढ़ाएं और एक महान परंपरा वाले राष्ट्र का नागरिक होने पर  गर्व करना प्रारंभ करें। असभ्यता स्वतः घुटने टेक देगी।
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अंततः
**********विद्यया ,वपुषा ,वाचा ,वस्त्रेण विभवेन च।
**********वकारैः पञ्चभिर्युक्तः नरः प्राप्नोति गौरवम्।
पाँच वकारों अर्थात विद्या ,भब्य शरीर ,वाणी ,वस्त्र और वैभव से युक्त पुरुष गौरव को प्राप्त होता है। अतः इन पाँच वकारों को प्राप्त करने के लिए सतत प्रयत्न करना चाहिए।
दिनाँक: 7 सितम्बर 2014 .                            Mangal-veena.blogspot.com@gmail.com                        
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