मंगलवार, 11 अगस्त 2020
Mangal-Veena: आम आदमी सदमे में
Mangal-Veena: आम आदमी सदमे में: जन्माष्टमी के पावन पर्व पर श्री कृष्ण महाराज के चरणों में समर्पित एक कविता महँगाई क़े नए दौर में ,रूपया लुढ़का ग...
रविवार, 10 मई 2020
Mangal-Veena: श्रवणकुमारों ,तुम्हें नमन
Mangal-Veena: श्रवणकुमारों ,तुम्हें नमन: ***************बीते मदर्स डे के समापन पर करोड़ों भाइयों ,बहनों और बच्चों , जिनके पास माँ हैं ,को यह सौभाग्य बने रहने की शुभ कामनाएँ तथा हजार...
शनिवार, 18 अप्रैल 2020
ग्राम नागरिक (भाग एक )
***********पुण्य सलिला गंगा तीर्थराज प्रयाग में यमुना और सरस्वती को समाहित करती है और यही इनका मोक्षदायी संगम बनता है जहाँ कभी अमृत कुम्भ से कुछ बूँदें गिरीं और इस स्थान को सनातन धर्मियों केलिए अनादि काल से तीर्थराज प्रयाग बना दिया । यही पावन गंगा संगमस्थल से आगे बढ़ कर विन्ध्याचली के गले लगती है और देखते ही देखते शिव प्रिया काशी के गले का चंद्रहार बनती है।समय इस मनोहारी दृश्य का अतीत से साक्षी रहा है और जाने कितने युगों तक भविष्य में साक्षी रहेगा।इस पुरातन काशी की धार्मिक,ऐतिहासिक,सांस्कृतिक,साहित्यिक एवं शैक्षिक महत्ता किसी से छिपी नहीं है ।सदियों से यह नगरी एक जाज्वल्यमान प्रकाश स्तम्भ की तरह मानव सभ्यता की प्रभा अनवरत बिखेरती रही है । ऐसे केंद्र बिन्दु वाले इस वाराणसी जनपद के निवासियों की जीवन शैली भी विविधातापूर्ण एवं अप्रतिम है।
***********इस जनपद में पुण्यसलिला के दोआबे से दो -ढाई किलोमीटर दूर है-- एक गाँव शिवपुरवा जिसकी आबादी ऊँचे -नीचे एक हजार है । लगभग हर जाति और वर्ग के लोग यहाँ रहते हैं । गाँव के बड़े -बूढ़े कहते हैं कि चार सौ साल पहले बलिया से एक राजपूत ,पास के किसी गाँव से एक ब्राह्मण ,एक हेला मुस्लिम ,एक बनिया ,दो हरिजन एवं एक गड़ेरिया (भेड़ बकरी पालने वाला )परिवार आ बसा था ;जो आज एक गाँव का रूप ले चुका है । बाद के वर्षों में कुछ और जाति के लोग भी आ बसे हैं। गाँव में दो -ढाई सौ साल पहले पूर्वजों द्वारा स्थापित शिव मंदिर है जिसके मंडप ,प्रांगण और आँगनबाड़ी का बंध मात्र वह संकुल है ;जिसे गाँव का सार्वजनिक स्थल कहा जा सकता है । तीज -त्यौहार हो ,किसी के घर शादी हो ,सभा -पंचायत हो ,गाँव में किसी साधु -फकीर या अफसर का आगमन हो ;यह शिव मंदिर गतिविधियों का केंद्र बना रहता है । यह वह मंदिर है जहाँ हेला और पंडित दोनों की समान भागीदारी एवं माँग है ।अहाते में एक कुआँ है जिससे श्रमदान केरूप में बाल्टी एवं गागरे से पानी निकाल कर मंदिर की बगिया को गाँव वालों ने क्या हरा भरा कर रखा है कि हठात थोड़ी देर यहाँ बैठ जाने का जी करता है ।
***********गाँव की बढ़ती आबादी के दबाव में बुद्धू गड़ेरिया सपरिवार इसी गाँव के बाहर बाप -दादों से मिली एक बीघे जमीन में अपना नया घर बना कर रहने लगा है । वह अपने वय के छठे दशक की संधि पर है फिर भी हट्टा -कट्ठा गठीला शरीर है और आज भी दस -बारह घंटे काम करने की उसमें मनसा ,वाचा ,कर्मणा क्षमता है । अपने जमाने में दो जमात पास यह बुद्धू गड़ेरिया अपनी सोच ,सादगी ,कला प्रेम ,विचारधारा एवं समाजिकता के लिए शिव पुरवा में ही नहीं आस पास के गाँवों में भी आदर से संबोधित किया जाता है । सब मिलाकर वह शिव पुरवा का कर्मठ ,विचारवान एवं अनुकरणीय नागरिक है । मात्र निवासी नहीं ।
***********मुझे इस नागरिक के जीवन दर्शन में बहुत दिलचस्पी रही है । कभी तथागत की कर्मभूमि ,वेदव्यास एवं उद्दालक ऋषि की तपस्थली व अश्वमेध की उद्घोष करने वाली धरती पर एक गाँव की सीमा तक कार्यशील साधारण व्यक्ति में दूसरों के लिए मार्ग दर्शक व प्रेरणा देने वाले तत्व क्या हो सकते हैं ?यह प्रश्न हैरतअंगेज हो सकता है । परंतु क्या यह इतिहास का जांचा परखा या देखा गया सच नहीं है कि साधारण गुणों को अपने जीवन में सटीक क्रियान्वयन से जोड़नेवाले लोग ही महान मानव साबित हुए हैं ,चाहे उनका नाम गौतम बुद्ध ,कबीर ,गाँधी या कुछ और रहा हो । कम या अधिक इसी साधरणपन के प्रति उसकी प्रतिबद्धता इस गड़ेरिया के जीवन के दो पहलू हैं ,जो उसे आम से खास बनाते हैं और लोग उसे पसंद करते रहे हैं ।बात कला की हो या गाँव के दो कुनबों के बीच कलह की ;समस्या व्यक्तिगत हो या सामूहिक ;बातें गँवई अर्थव्यवस्था की हो या राजनीति की ;इस बुद्धू की टिप्पणी बहुत ही सहज और दो टूक होती है । अतः जब कभी फुरसत होती ,मैं भी कुछ न कुछ जानने की अभिलाषा लिए अपने समय के सदुपयोग के लिए बुद्धू गड़ेरिया के पास पहुँच जाता । सम्बोधन में मैं उन्हे चाचा कहता । उम्र में बहुत छोटा होने के कारण वे मुझे मेरे नाम सुनील से बुलाया करते ।
***********बुद्धू गड़ेरिया का कुनबा इस प्रकार है -पत्नी सुदामा ,दो बेटियाँ प्रभा व प्रतिभा ,एक बेटा प्रयास ,बहू मीरा व उसके दो बेटे राहुल एवं वरुण । बड़ी बेटी का विवाह हो चुका है । पिता ने उसे स्नातक तक की शिक्षा दिलवाई है । प्रयास की उम्र करीब पैंतीस वर्ष है और नौवीं कक्षा तक पढ़ाई के बाद गृहस्थी में लग गया है । वह शहर से गाँव तक ,दवा से आश्रितों के शिक्षा तक ,खान -पान से बाजार तक पारिवारिक रिश्तों से गँवई संबंधों तक सारी जिम्मेदारियाँ बखूबी निभाने लगा है ।बेटी प्रतिभा व दोनों पौत्र क्रमशः ग्यारहवीं ,आठवी एवं छठी कक्षा में पढ़ रहे हैं ।पूरा परिवार वैचारिक ताल मेल के ऐसे सूत्र में पिरोया है जिसमें कहीं किसी गाँठ की आशंका नहीं । सब कुछ सीधा -साधा परंतु कर्मठता की नींव पर आत्मनिर्भरता की बुलंदी पर है ,यह कुनबा । यही आत्म निर्भरता इस परिवार की पूँजी है और यही वह मानक है जो पूरी अर्थ तंत्र व्यवस्था को परिभाषित करने का दम भरता है । अतः इस इकाई से समाज की वर्तमान जटिलताओं को समझने की जिज्ञासा मेरे अंदर सदैव बनी रही है ।
***********इस परिवार का पेशा है -तीन चौथाई बीघे जमीन पर सघन खेती ;छोटे स्तर पर पशुपालन ;भेड़ -बकरिओं के ऊन से देशी कंबल बुनना ;खाली समय में गाँधी चरखे पर सूत कातना ;रस्से बटना ;रहट्टे से खाचिए और झउए बनाना ,खटिए और मचिए बुनना वहीं पत्नी और बहू द्वारा ,जाड़े की मीठी धूप में बैठकर, कास और सरपत से टेकुरी के सहारे रंग -बिरंगी कुरई झपिया ,डलिया जैसी सजावटी समान बनाना तथा शेष महीनों में माँग के अनुसार कुरसिए से सजीली व कलात्मक वस्तुएं बनाना । गाँव की जरुरतमन्द महिलाओं को भी इनके यहाँ काम मिल जाता है ।साधारण गँवई कच्चे माल को यह परिवार अपनी कड़ी मेहनत ,कला और सामयिकता का वह पुट देता है कि इनके उत्पाद का स्थानीय बाजार और गाँव के लोगों में सम्मोहन चलता है । इन सबके पीछे है इनकी कला ,समय की समझ और हाथ में लिए काम के प्रति पूर्ण समर्पण ।
***********जिज्ञासा बस एक बार की बात है मैं ग्राम नागरिक से मिलने उसके घर जा पहुँचा ।वैशाख का महीना । दोपहरी ढल चुकी थी । संयोगवश ग्राम नागरिक थोड़ी देर पहले ही अपनी भेड़ -बकरियों के झुंड को, गाँव के बाहर पगडंडी पर ,अपने बेटे के हवाले कर घर आया था ।तेज धूप जनित थकान से आराम के लिए वह अपने घर से सटे नीम के पेड़ की छाया तले बिछी चारपाई पर निढाल पड़ा था । बगल में उसकी पत्नी एक बाल्टी पानी जमीन पर रखी थी और हाथ में एक लोटा- गिलास लिए खड़ी -खड़ी उससे बातें कर रही थी । उसका पौत्र राहुल गेहूं के नरकुल से बने पंखे से हवा कर रहा था । खटिया पर ही एक किनारे कुरई में गुड़ के कई टुकड़े पड़े थे । पहुँचते ही मैंने उन्हें प्रणाम किया । आवाज पहचानते हुए दोनों चाचा और चाची ने खुश रहो के स्निग्ध प्रत्युत्तर साथ स्वागत किया ।
***********गड़ेरिया उठता है ,मेरी पीठ थपथपाता है और पास में दूसरी खटिया बिछाते हुए उस बैठने का आग्रह करता है । राहुल को मुझे प्रणाम करने और गुड़ के साथ पानी का गिलास मेरे पास रखने का संकेत देता है । गुड़ खा कर पानी पीता हूँ और फिर कुशल क्षेम ।हल्के से पछुआ हवा का झोंका चलता है । नीम के पेड़ से निबौरियाँ गिरती हैं साथ ही हवा नीम के पत्तों से ढुलक कर बदन को जो शीतलता दे जाती है ;वह अनुभव करे सो जाने । सामने मुझे खेत में दिखता है -कहीं पपीता ,कहीं भिंडी, कहीं तोरई ,,कहीं कोंहड़ा तो कहीं लौकी ;सब हरा -भरा ।कतारबद्ध क्यारियाँ एवं बीच में एक गली सा रास्ता आगे उनके अलग से बने तीन कमरे बैठक तक पहुँचाता है । एक में पशुशाला ,दूसरे में चार,हुनर और खेती संबंधी ब्यवस्था और तीसरे में उनकी कार्यशाला है जहाँ वे जीविका की साधना करते हैं । एकाएक मैं देखता हूँ कि बाहर तार पर एक कम्बल लटक रहा है जो बुनाई और ढुलाई के बाद शायद सूखने हेतु टाँगा गया है ।
उस कम्बल पर सूर्यास्त के समय क्षितिज ओर से माल सी आकृति में अपने घर लौटती पंछी ,नीले आकाश में थके सूर्य की किरणों का बिखराव ,रबी फसल कटने के बाद धरती का बड़ा आवरणहीन भूखंड और इस भूखंड पर दूर कहीं अपने गंतव्य की ओर डग भरते पथिक का बड़ा मनोहारी दृश्य उकेरा गया है । रंगों के साथ दृश्यावली का ऐसा जीवंत समायोजन ऐसा लगता है मानो प्रकृति की एक विशेष घटना इस कम्बल रूपी कैनवस में बंद हो गई हो ।यह मूक भाषा में बोलती उनकी कला है ,साथ ही मनोरम छन -छन बदलती प्रकृति का संकेत भी । लेकिन किसी क्षण विशेष को अपने मन मस्तिष्क में बैठा लेना व हाथों से कम्बल के ताने -बाने में पिरोकर हूबहू मूर्त रूप दे देना क्या किसी सामान्य आदमी से संभव है ;बिल्कुल नहीं । निश्चय ही यह संभावना उन्हीं में पलती होगी ,जिनके पास प्रभु प्रदत्त प्रतिभा विशेष होगी । यही विधा तो कला है और इसी साधना के साधक को कलाकार कहते हैं । विषय की तन्मयता में डूबता जा रहा था की ग्राम नागरिक मुझे टोक देता है ,"क्या सोच रहे हो सुनील "
-मैं सामने टँगे कम्बल पर प्रकृति के पल विशेष का दृश्यांकन देख रहा हूँ । कितना वास्तविक और मनोरम है यह दृश्य ।
-हाँ ,इसकी बुनाई में भाव ,मन ,हाथ और कला का अच्छा सामंजस्य बैठ गया है ।तुम्हारी एकाग्रता से लग रहा है कि हमारा छायांकन ठीक ठाक उतर गया ।रुको !तुम्हें ऐसा ही एक प्रकृति चित्रण दिखाता हूँ ।
वह राहुल को इशारा कर थोड़ी दूर पड़ी एक थालीनुमा कुरई मंगाता है और उसकी तलहटी सामने करते हुए बताता है कि यह छायांकन (सीलूएट )इनकी दादी ने सरपत के के रेड़ को विभिन्न रंगों में रंग कर टेकुरी से उकेरा है । दृश्य की आइडिया में में मैंने जरूर मदद किया था ।
मैं इस कुरई को देखता हूँ तो देखता ही रह जाता हूँ । दोआबे की धारा के पास बोरियों में बालू भर कर अपने ऊँटों की पीठ पर लादे दो तीन ऊँटहारे अपने अपने ऊँटों के रस्से पकड़े हुए कतारबद्ध चले जा रहे हैं । पृष्ठभूमि में यहाँ -वहाँ पेड़ दीख रहे हैं । ऊपर दर्शित आकाश का रंग गोधूलि बेला का समय इंगित कर रहा है । रंगों का सामंजश्य बड़ा ही स्वाभाविक है । मेरे मन में विचार उठता है कि सच है ;जब भावुकता या संवेदना किसी कलाकार के मस्तिष्क में कहीं घनीभूत हो जाती है तो उचित अवसर पर वह कला के किसी न किसी विधा के रूप में हमारे सामने अवतरित हो जाती हैं । यदि कविता रूप में उतरी तो कवि ,शिल्प रूप में उतरी तो शिल्पी और चित्र रूप में उतरी तो चित्रकार । ऐसे ही अनेक रूप हैं कला और कलाकार के ।
***********मुझे लगा कि इस गड़ेरिया की आँखों और मस्तिष्क में किसी घटना या दृश्य को पकड़ने (कैच )करने की एवं अपनी किसी कृति में उकेर देने की विलक्षण दक्षता है जिसे हम मानवेतर या दैवी कह सकते हैं । अब मेरा मन परिस्थितिजन्य सोच से उबरने का उपक्रम करने लगा । हवा के मंथर झोंकों का ,मैं चारपाई पर लेट कर ,थोड़ी देर आनन्द लेना चाहता था । दिमाग को झटका दिया और ग्राम नागरिक से बोल पड़ा कि आज कल हमारी गर्मी की छुट्टियाँ हैं और ऐसी ही कुछ इधर उधर की बातों पर आप के अनुभव और सोच को जानने मैं आप के पास आ गया था । कला की गूढ़ता तो मुझे नहीं मालूम परंतु कलाकृतियाँ मुझे अच्छी लगती हैं । मैं कला की इस विधा पर फिर कभी कुछ और जानने की अपेक्षा करूँ गा ।
गँवई प्रसंग में भी आप अपनी बेबाक बातों के लिए जाने जाते हैं । क्या आप बतायें गे कि हमारे शिव पुरवा के लिए स्वराज या आजादी के क्या मायने ,नुकसान या फायदे हुए हैं ?
अच्छा तो सुनो । मैं इस विषय में कुछ स्वतः की अनुभूति बताता हूँ । मेरे गाँव में स्वराज का पहला संदेश चुनाव के रूप में आया था । तब से समय समय पर दस्तक देकर वापस दिल्ली ,लखनऊ चला जाता है और छोड़ जाता है गाँव में गुटबन्दी ,मनमुटाव ,रिश्तों में दरार व सबके सपनों पर पत्थर पानी । पिछले पचास वर्षों में यह स्वराज सड़क के रास्ते दो किलोमीटर दूर ,बिजली के तारों के रास्ते एक किलोमीटर दूर एवं नहर के पानी वाले रास्ते पाँच किलोमीटर दूर पहुँच कर आगे बढ़ गया है । दो वर्ष पहले दौड़ धूप करके प्रधान ने गाँव तक बिजली के तार खिचवा लाया और टेस्टिंग कर शिव पुरवा की पूरी आबादी को बिजली के लट्टुओं से रात में जगमग दिया । उस दिन गाँव में क्या उत्साह था । सबका मन बागबाग हो गया । लोग दौड़ पड़े कि स्वराज आ गया । परंतु कुछ दिनों बाद ए तार बेजान हो गए । सरकारी लश्कर आया और गया परंतु ए बेजान तार यत्र तत्र आज भी बेकार पड़े हैं । उधर खेतों का नहर के पानी से भेंट भी नहीं हुआ कि टैक्स वसूली का दबाव गाँव के काश्तकारों पर पड़ने लगा ।घुरहू ने कभी सहकारिता सोसाइटी से खाद लिया ही नहीं ,परंतु उसके नाम सोसाइटी का कर्ज सुरसा की तरह ब्याज दर ब्याज बढ़ता जा रहा है । उसने मंदिर में शीश झुकाया ,मस्जिद में सजदा किया ,प्रधान ,साहूकार के यहाँ गुहार लगाया । परंतु सोसाइटी के भ्रष्ट सचिव को द्रवित नहीं कर सका । घुरहू आज भी वह दिन याद करता है जब सोसाइटी के सचिव ने गवाही के नाम पर किसी दूसरे कागज पर अंगूठा का निसान लगवा लिया था । क्या यह सचिव किसी क्रूर जमींदार से कम अतताई और भ्रष्ट है ?रामू अहीर ने सचिव के यहाँ पहुँच लगा कर एक भैंस खरीदने के लिए आठ हजार मंजूर कराया । किन्तु बिचौली तिकड़म के उपरांत उसे छः हजार ही मिले । जैसे तैसे जुगाड़ कर एक दूधारु
भैंस खरीदा । गरीब पर गरीबी कुछ ज्यादा ही मेहरबान होती है । कुछ महीने बाद उसकी भैंस बीमार पड़ गई । रामू दौड़ा दौड़ा पास के बाजार में पशु डाक्टर के यहाँ पहुँचा । पता चला कि डाक्टर बाबू तो शहर गए हैं । निराश लौट कर वह अनेक देशी दवाई दिया परंतु अपनी भैंस को बचा न सका । अब ब्लॉक वाले भैंस के मरने का प्रमाण माँग रहे हैं । उत्पीड़न और वसूली वाले दुःस्वप्न का उसके घर साक्षात आगमन हो चुका है । स्वाधीनता से अभी तो कुछ नहीं बदला है । लोगों के जेहन में अंग्रेजीयत यथावत बनी हुई है ।हमें इस चारित्रिक संकट से उबरना ही होगा । जब तक नहीं उबरें गे अपेक्षित स्वराज हम तक नहीं पहुँचे गा ।
बुद्धू गड़ेरिया इतना कहते कहते बहुत गंभीर हो जाता है । चाची आवाज देती हैं "देखिए शायद चरवाहे लौट रहे हैं । दूर ऊपर आकाश में धूल उड़ने लगी है । "
मेरा ध्यान घड़ी पर जाता है । साढ़े चार बज रहे हैं ।
ग्रामनागरिक यह कहते हुए चल देता है कि सुनील तब तक तुम चाची से बात करो । शाम को खाना खा कर जाना ।
चाचा जी फिर कभी कहते हुए उठ पड़ा और उन्हें प्रणाम करते हुए घर की राह लिया ।
(आप ने इस अंक में बुद्धू गड़ेरिया के जीवन के दो आयाम देखा -एक कलाकार का ,दूसरा नागरिक का । एक कलाकार हृदय भी देश में व्याप्त चरित्र संकट से बेचैन है परंतु निराश नहीं । अगले अंकों में इस ग्राम नागरिक के अनेकानेक जीवन आयामों से एवं अंचलिकता का सार्वभौमिकता से मिलन कराने का प्रयास जारी रहेगा । रचना पूर्णरूपेण साहित्यिक एवं काल्पनिक है । ) क्रमशः -----
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second edition
4 th june 2025 ;Varanasi
रविवार, 22 मार्च 2020
जनता कर्फ्यू 22 मार्च 2020
***************माननीय प्रधान मन्त्री जी के अपील का अनुसरण करते हुए पूरा देश आज जनता कर्फ्यू पर है।संकट के इस दौर में यह अच्छा लग रहा है कि हम भारतीय प्रधान मंत्री जी के आह्वान पर इस कर्फ्यू को शत प्रतिशत सफल बनाने जा रहे हैं। इष्ट मित्र व्हाट्सएप्प ,फेसबुक ,ट्विटर ,इत्यादि पर सन्देश के माध्यम से, करोना विभीषिका और उससे निपटने के लिए जनता कर्फ्यू सफल बनाने के लिए सन्देश पर सन्देश की झड़ी लगाए हुए हैं।प्रिंट और टीवी मिडिया का तो कहना ही क्या ;लगता है देश दुनियाँ की अन्य खबरों को करोना ने पहले ही पूर्णरूपेण निगल लिया।पूरे विश्व में मानव जाति के लिए बड़ा कठिन समय है।
***************जब हम घरों बंद हैं हमारे समाज का एक वर्ग पूरी तन्मयता से हमारी सेवा में संलग्न है। उदाहरण के लिए सीमाओं पर सैनिक ;स्वास्थ्य सीमा पर डाक्टर और स्वाथ्य कर्मी ;सफाई मोर्चे पर सफाई कर्मी ; राशन ,सब्जी ,दवा के मोर्चे पर व्यापारी /आपूर्तिकर्ता और सभी के साथ समन्वय तथा व्यवस्था मोर्चे पर प्रशासन और पुलिसकर्मी इस महामारी से जूझने में अहर्निश डटे हुए हैं। अतः हमारा दायित्व बनता है कि हम लोग उनके प्रति कृतज्ञता ब्यक्त करें।ऐसा सन्देश देने के लिए, प्रधान मन्त्री के सुझाव अनुसार, हम सभी लोग घरों से बाहर निकल अपने दरवाजों या बरामदों में आकर आज सायं पॉँच बजे करतल व तुमुल घण्टा घड़ियाल ध्वनि से इन कर्मवीरों के प्रति अपनी कृतज्ञता ब्यक्त करें और इनका हौसला बढ़ाएँ।ये आवश्यक सेवा करने वाले लोग इस विपदा में हमारी लाइफ लाइन हैं।
***************अंततः आशा है कि जनता कर्फ्यू ,लॉक डाउन,क्वारंटीन और सोशल डिस्टैन्सिंग के बहुत अच्छे परिणाम आएँ गे और इस महा संकट से उबरने में भारत कामयाब होगा। इस बीच अपेक्षा है कि हम धैर्य के साथ सोशल डिस्टैन्सिंग और एकान्त वास बढ़ाए रखें।साथ ही हम सब अंतर्मन से प्रार्थना करें कि प्रभु की प्रेरणा हो और कोई विज्ञानी पवन पुत्र बन यथाशीघ्र ऐसी संजीवनी सी दवा ढूंढ़ लाए जो इस करोना का शर्तिया तोड़ सिद्ध हो।आज 'जा पर जा कर सत्य सनेहू। सो तेहि मिलहि न कछु संदेहू।' की भी अग्निपरिच्छा है।विश्व का कल्याण हो और मानवता विजयी।-------------------------------------------------------------------------------------------------मंगला सिंह /मंगलवीणा
वाराणसी ;दिनाँक 22 मार्च 2020 --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------mangal-veena.blogspot.com@gmail.com
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***************जब हम घरों बंद हैं हमारे समाज का एक वर्ग पूरी तन्मयता से हमारी सेवा में संलग्न है। उदाहरण के लिए सीमाओं पर सैनिक ;स्वास्थ्य सीमा पर डाक्टर और स्वाथ्य कर्मी ;सफाई मोर्चे पर सफाई कर्मी ; राशन ,सब्जी ,दवा के मोर्चे पर व्यापारी /आपूर्तिकर्ता और सभी के साथ समन्वय तथा व्यवस्था मोर्चे पर प्रशासन और पुलिसकर्मी इस महामारी से जूझने में अहर्निश डटे हुए हैं। अतः हमारा दायित्व बनता है कि हम लोग उनके प्रति कृतज्ञता ब्यक्त करें।ऐसा सन्देश देने के लिए, प्रधान मन्त्री के सुझाव अनुसार, हम सभी लोग घरों से बाहर निकल अपने दरवाजों या बरामदों में आकर आज सायं पॉँच बजे करतल व तुमुल घण्टा घड़ियाल ध्वनि से इन कर्मवीरों के प्रति अपनी कृतज्ञता ब्यक्त करें और इनका हौसला बढ़ाएँ।ये आवश्यक सेवा करने वाले लोग इस विपदा में हमारी लाइफ लाइन हैं।
***************अंततः आशा है कि जनता कर्फ्यू ,लॉक डाउन,क्वारंटीन और सोशल डिस्टैन्सिंग के बहुत अच्छे परिणाम आएँ गे और इस महा संकट से उबरने में भारत कामयाब होगा। इस बीच अपेक्षा है कि हम धैर्य के साथ सोशल डिस्टैन्सिंग और एकान्त वास बढ़ाए रखें।साथ ही हम सब अंतर्मन से प्रार्थना करें कि प्रभु की प्रेरणा हो और कोई विज्ञानी पवन पुत्र बन यथाशीघ्र ऐसी संजीवनी सी दवा ढूंढ़ लाए जो इस करोना का शर्तिया तोड़ सिद्ध हो।आज 'जा पर जा कर सत्य सनेहू। सो तेहि मिलहि न कछु संदेहू।' की भी अग्निपरिच्छा है।विश्व का कल्याण हो और मानवता विजयी।-------------------------------------------------------------------------------------------------मंगला सिंह /मंगलवीणा
वाराणसी ;दिनाँक 22 मार्च 2020 --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------mangal-veena.blogspot.com@gmail.com
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सोमवार, 30 दिसंबर 2019
वाह फेविकोल वाह
*************************अपने आचरण के विपरीत कोई कोई वाणिज्यिक विज्ञापन भी हमें गुदगुदा जाते हैं।ऐसे विज्ञापन अपने उत्पाद का प्रचार प्रसार तथा विपणन विस्तार तो करते ही हैं;साथ में अपने संवाद संप्रेषण एवँ मिठास के कारण अति लोकप्रिय हो जाते हैं। इस वर्ष एक ऐसा ही विज्ञापन टीवी पर फेविकोल के लिए आया जिसका शीर्ष बोल है "सोफा बनाए तो दिल से बनाए "।अन्य विज्ञापनों से हट कर इस विज्ञापन ने, प्रचार प्रसार का काम करने के साथ साथ , कर्णप्रिय संगीत और प्रेरक सन्देश दिया है। सबसे बड़ी विशेषता यह कि शर्माईन के यहाँ से चल कर बंगालन तक पहुँचने वाली सोफे की साठ साल की यात्रा वयान करते करते पीडिलाइट इंडिया ने ,तेजी से, भारत के बदलते परिदृश्य का बड़ा ही सजीव प्रस्तुतीकरण किया है।सफलता का राज भी तो यही है कि प्रयास दिल से किया जाय।मुझे ऐसा लगता है कि इस विज्ञापन ने आप का भी ध्यान अवश्य आकृष्ट किया होगा। अस्तु फिर कभी इसे जरा ध्यान से सुनिए गा और इसके सन्देश को महसूसिए गा।अच्छा लगे तो फिर सुनिए गा। प्रणाम। ------------------------------------------------------मंगलवीणा
वाराणसी :सोमवार दिनाँक 30 दिसम्बर 2019
वाराणसी :सोमवार दिनाँक 30 दिसम्बर 2019
गुरुवार, 19 दिसंबर 2019
Mangal-Veena: इतिहास बनाए तो ऐसे बनाए
Mangal-Veena: इतिहास बनाए तो ऐसे बनाए: ***************किसी भी देश या समाज का इतिहास उसके अतीत में घटित घटनाओं और उनके प्रभावी आयामों का यथार्थ अभिलेखन होता है।कालक्रम में बिना कि...
बुधवार, 18 दिसंबर 2019
इतिहास बनाए तो ऐसे बनाए
***************किसी भी देश या समाज का इतिहास उसके अतीत में घटित घटनाओं और उनके प्रभावी आयामों का यथार्थ अभिलेखन होता है।कालक्रम में बिना किसी दूसरे समाज या संस्कृति से दबे या चोट खाए जो समाज अपनी संस्कृति और सभ्यता का विकास जारी रखते हुए उसे सही रूप में अभिलेखित कर पाता है वह अपने लिए गौरवान्वित करने वाले इतिहास का सृजन करता है अन्यथा संघर्ष में पराजित होने या पिछड़ने पर उसे झेंपाने और ग्लानि देने वाले छद्म इतिहास का उत्तराधिकारी बनाया जाता है।यही कारण है कि सम्पूर्ण भारत के परिपेक्ष्य में पृथ्वीराज चौहान के बाद सन उन्नीस सौ सैंतालीस में देश को स्वतंत्र होने तक हमारा इतिहास, कुछ अपवाद खंडों को छोड़ कर, झेंपने- झेंपाने वाला बनाया और बताया गया। जो देश सांस्कृतिक सभ्यता एवं मानवता विकास का आदि काल से विश्व में सबसे अग्रणी भूभाग रहा उसके मध्य कालीन एवँ आधुनिक इतिहास को शासकों के इशारे पर वदनियत इतिहासकारों ने विद्रूप कर दिया।गणतंत्र बनने के बाद भी सत्ता में बैठे विदेशी संस्कृति वाले देशी लोग हमारे देश को औपनिवेशिक शासकों के ढर्रे पर चलाते रहे। उनके संरक्षण में हमें हीन बताने वाला छद्म इतिहास पढ़ाया जाता रहा और हिन्दू बहुल समाज अपने अतीत के प्रति हो रहे दुराग्रह से छटपटाता और छला महसूस करता रहा।इस बीच भारत और भारतीयता पर गर्व करने वाले महापुरुषों एवँ संगठनों के नेतृत्व में सामाजिक एवँ सांस्कृतिक पुनरुत्थान के पुरजोर प्रयास भी जारी रहे । परिस्थितियाँ बनती गईं और सन दो हजार चौदह आते आते हिंदू (भारतीय ) संस्कृति और राष्ट्रवाद का पूरे देश में ऐसा प्रचण्ड ज्वार उठा कि राष्ट्रवाद सह हिन्दू संस्कृति की उपेक्षा करने वाली विचार धाराएँ तहस नहस होने लगीं और भारतीय जनमानस ने मन ही नहीं बनाया बल्कि अपने राष्ट्र और संस्कृति को विश्वपटल पर स्थापित करने के लिए मोदी नीत भाजपा को बहुमत से केंद्रीय सत्ता में बैठा दिया।
*************** फिर क्या पिछले छः वर्षों के बेहतरीन घटनाक्रमों से सजा भारतीय इतिहास स्वर्णाक्षरों से अंकित हो रहा है। साथ ही पूर्व के इतिहास को भी सत्य एवँ यथार्थ के कसौटी पर कसा जा रहा है।सन दो हजार चौदह से वर्तमान वर्ष के पूर्वार्द्ध वाले पाँच वर्षीय कालखण्ड में नए धरातल पर खड़ी भाजपा सरकार ने ,जनता से प्राप्त विश्वास के अनुरूप एक से बढ़ कर एक निर्णय एवँ क्रियान्वयन से, देश तथा दुनियाँ को चकाचौंध किया। जनता एवँ सरकार से इस कालखण्ड को स्वर्णिम कालखण्ड बनानेवाली अनेकानेक महत्वपूर्ण घटनाएँ उपजीं जो पूरी दुनियाँ में नई दृष्टि से देखी ,चर्चित और प्रशंसित हुई हैं। उल्लेख के लिए भारत के संसदीय चुनाव प्रणाली में पहली बार अमेरिका की भाँति पूरे देश में चुनाव केवल एक मुद्दे पर लड़ा गया कि श्री नरेंद्र मोदी देश के प्रधान मंत्री हों या न हों। कौन सांसद पद प्रत्याशी बनाया गया ,गौण हो गया। भाजपा को बहुमत देकर जनता द्वारा स्पष्ट सन्देश दिया गया कि शासन उसे सौपा जायगा जो भारत ,भारतीयता और भारतीय संस्कृति को पुनर्स्थापित करते हुए देश को पूरे विश्व में सम्मान और गौरव दिलाए गा।तथास्तु ,मोदी जी ने जनता के प्रबल जनसमर्थन को देश ही नहीं पूरी दुनियाँ में आत्मविश्वास के साथ प्रतिध्वनित किया। वे दुनियाँ में जहाँ भी गए ,वहाँ बसे प्रवासी भारतीयों ने उन्हें हाथोहाथ लिया और वे पूरे विश्व में सबसे बड़े लोकतंत्र के सर्वाधिक जनप्रिय नेता के रूप में प्रतिष्ठित हुए।नए भारत के इस नए नेता ने देश का ऐसा गौरव बढ़ाया कि दुनियाँ वालों का भारतीयों को देखने व उनसे व्यवहार का दृष्टिकोण ही बदल गया।लोग गर्व से कहने लगे कि हम भारतीय हैं।दूसरी ओर पश्चिमी सीमा पर प्रतिद्वंदी पाकिस्तान को उनके दुस्साहस का उत्तर सर्जिकल स्ट्राइक एवँ एयर स्ट्राइक से देकर कड़ा सन्देश दिया गया कि नया भारत किसी भी प्रकार का आतंकवाद या भृकुटि विक्षेप सहन नहीं करे गा । ऐसा ही सन्देश चीन जैसी महा शक्ति को ढ़ोकलाम में दिया गया। नया भारत अब एक उदार देश वाली छवि से बाहर निकल एक दृढ़ इच्छाशक्ति वाला देश हो गया ।
***************अंतरिक्ष और रक्षा क्षेत्र में सराहनीय कार्यों के साथ साथ देश के अंदर वीआईपी संस्कृति और भ्रष्टाचार पर प्रहार ,स्वच्छ भारत अभियान ,उज्ज्वला एवँ पीएम आवास जैसी योजनायें या गरीब सवर्णों को दस प्रतिशत आरक्षण देना कुछ ऐसे कार्य थे जो समाज के हर वर्ग को सुखद स्पर्श दिए। परिणामस्वरूप विरोधिओं द्वारा वोट के लिए खड़ी जातिवाद और धर्म की छद्म दीवार तेजी से ढहीं।समाज से तुमुल ध्वनि हुई कि धर्मनिर्पेक्षता के मायने केवल अल्पसंख्यकों के हित की बात करना ही नहीं बल्कि भारत में बहुसंख्यकों की उससे पहले बात करना भी है।मोदी जी का "सबका साथ- सबका विकास परन्तु तुष्टिकरण किसी का नहीं "नारा समाज में विश्वसनीयता के धरातल पर उतर गया।सच तो यह है की देशव्यापी समर्थन के बाद भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचार क्रियान्वित होने लगे और हमारी संस्कृति पुरानी जड़ों की ओर वापस लौट पड़ी परन्तु भारतीय संसद के ऊपरी सदन में राजग का बहुमत न होने और विरोधियों के असहयोग के कारण देश की कुछ अति महत्वपूर्ण समस्याएँ हल नहीं हो पा रही थीं। अतः इस वर्ष के पूर्वार्द्ध में संपन्न हुए लोकसभा चुनाव के लिए एजेंडा में उन मुद्दों को पुनः समाहित करते हुए भाजपा ने राष्ट्रवाद से आगे प्रखर राष्ट्रवाद का नारा दे दिया। फल आशातीत रहा और भाजपा नीत राजग दो तिहाई बहुमत का आँकड़ा पार कर गया।समय और प्रवंधन के बल पर अब भाजपा राज्यसभा में भी बहुमत सिद्ध करने की स्थिति में थी और वह समय आ गया कि युगान्तकारी निर्णय लिए जाँय।
***************हमारे इतिहास में अल्पावधि में उल्लेखनीय कार्यों के लिए शेरशाह सूरी का रिकार्ड था परन्तु यह क्या छः महीने में वे दीर्घकालिक समस्याएँ हल कर दी गईं जिनको माना जा रहा था कि इनको छेड़ने से देश के अस्तित्व को संकट है।स्वतन्त्रता के बाद से मोदी सरकार की दूसरी पारी शुरू होने तक कश्मीर समस्या देश के लिए नासूर सी कष्ट दे रही थी। कई हजार सैनिक ,नागरिक और कश्मीरी पण्डित जान गँवा चुके थे। पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद ने पूरी घाटी को रक्तरंजित कर रखा था। लाखों कश्मीरी पण्डितों को घाटी से पलायन कर देश के अन्य भागों में शरण लेना पड़ा परन्तु विगत काँग्रेस सरकार हाथ पर हाथ धरे सत्ता सुख लेती रही। घाटी के अलगाववादी नेता कश्मीर के अलग होने का भय दिखाकर केंद्र से बेतहाशा धन लूटते रहे और धमकाते रहे कि यदि कश्मीर से धारा 370 या 35 ए हटाया गया तो घाटी में भारतीय ध्वज को कोई कन्धा देने वाला नहीं होगा। कमाल देखिए दृढ़ निश्चयी मोदी जी एवं उनकी सरकार का कि पहले मानसून सत्र के पाँच अगस्त को संसद में प्रस्ताव पास करा कर कश्मीर से धारा 370 एवँ 35 ए को समाप्त कर दिया और राज्य को जम्मू और कश्मीर तथा लद्दाख नाम से दो केंद्र शासित प्रदेशों में पुनर्गठित कर दिया। इस निर्णय पर कतिपय देशद्रोहियों को छोड़कर समूचा देश झूम पड़ा। सरकार ने संसद के इसी सत्र में जम्मू और कश्मीर विधेयक से पहले तीस जुलाई को मुसलमानों में प्रचलित तीन तलाक कानून को अवैध करने वाला विधेयक पास कर करोड़ों मुस्लिम महिलाओं के आँसू पोछा और समाज में सम्मानजनक जीवन का अधिकार दिया।यह सामान्य नागरिक संहिता की दिशा में बढ़ता एक कदम भी था।
**************पूरा देश उल्लसित था कि अयोध्या विवाद पर उच्चतम न्यायलय के पाँच जजों वाले बेंच ने नौ नवम्बर को सुप्रीम फैसला दे दिया कि विवादित भूमि राम लला विराजमान की है और उस पर बाबरी मस्जिद का निर्माण अवैध था।पूरी दुनियाँ साक्षी है कि राम मंदिर बाबरी मस्जिद विवाद हिन्दुओं और मुस्लिमों के बीच चार सौ वर्षों से चल रहा सर्वाधिक त्रासद विवाद रहा है।आजादी के बाद भी तुष्टिकरण के चलते पूर्व सत्ताधारी और आज के विपक्षी सदैव मुस्लिमों के पक्ष में बात एवं आचरण करते रहे जब कि भाजपा, राष्ट्रीय स्वयँ सेवक तथा विश्व हिन्दू परिषद् ,अनेक हिन्दू एवँ संत संघटनों के साथ, लगातार राम मंदिर के पक्ष में संघर्षरत थे।इस प्रसंशनीय निर्णय को देश के हिन्दू और मुसलमानों ने अत्यंत सहजता और शान्ति से सर माथे लेकर भाई चारे का वह प्रकाश स्तम्भ बनाया जो भविष्य के इतिहास को भी प्रकाशित करता रहे गा।संसद का शीतकालीन सत्र समाप्त होते होते सरकार ने नागरिकता संशोधन विधेयक भी दोनों सदनों से पास करा कर राष्ट्रपति से स्वीकृति ले ली जिससे पड़ोसी मुस्लिम देशों से उत्पीड़ित होकर सन चौदह से पहले भारत आए हिन्दू ,सिख ,ईसाई ,बौद्ध ,पारसी या जैन शरणार्थियों को भारत की नागरिकता मिलने का रास्ता खुल गया। अब ऐसे लोग देश के एक आम नागरिक की भाँति जीवन यापन कर सकें गे।
***************निःसंदेह उपर्युक्त उपलब्धियाँ इतिहास में स्वर्णाक्षरीय हैं परन्तु कुछ विधेयकों का क्रियान्वयन उन्हें संसद से पारित कराने की अपेक्षा ज्यादा कठिन होगा क्योंकि अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे विपक्षी, सरकार को असफल करने में, कोई कोर कसर नहीं छोड़ें गे वरन उनके वंशवाद ,तुष्टिकरण और तथाकथित धर्मनिरपेक्षता का भविष्य क्या होगा।आने वाला समय संदर्भित निर्णयों के क्रियान्वयन की सफलता तथा देश की प्रगति में इनके योगदान का आकलन करे गा और इस अल्प काल खण्ड के इतिहास में परिणामी आयाम जोड़े गा परन्तु आज तक की अद्यतन स्थिति यह है कि देखते ही देखते तीन तलाक ,कश्मीर की धारा 370 और 35 ए ,अयोध्या का राम जन्मस्थान विवाद और शरणार्थियों के लिए नागरिकता जैसी विकराल राष्ट्रीय समस्याओं का चंद महीनों में निराकारण हो गया है ।सारांशतः देश के प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी की नेतृत्व वाली भाजपा सरकार और आज के भारत के लिए यह कहना समय संगत होगा कि इतिहास बनाए तो ऐसे बनाए।अब मोदी जी का पूरे विश्व में चर्चित नारा है ,"सबका साथ -सबका विकास और सबका विश्वास।साथ ही पूरे देश में एक धारणा बन गई है कि कोई भी असंभव या दुष्कर कार्य हो; वह मोदी जी के लिए संभव है अर्थात मोदी हैं तो मुमकिन है। यह है मोदी जी का करिश्माई व्यक्तित्व।अच्छा है कि देश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है और मोदी जी हमारे प्रधान मंत्री।अस्तु।----------------------------------------------मंगलवीणा
वाराणसी ;दिनाँक 17 दिसम्बर 2019 mangal-veena.blogspot.com
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अंततः
***************प्रिय पाठकों ! वर्ष दो हजार उन्नीस हम भारतीयों को श्री रामजन्मभूमि जैसा हर्षद उपहार देते हुए अपनी विदाई के अन्तिम पादन पर है। निजी जीवन में हम सभी के लिए वर्ष मिश्रित फल देने वाला रहा। महँगाई और बच्चों की असहनीय मँहगी शिक्षा ने तो त्राहि माम् की गुहार लगाने को विवश कर रखा है।न जाने कब हमारे देश में प्रारम्भिक एवँ माध्यमिक शिक्षा माफियाओं के चंगुल से मुक्त हो पाए गी। भरोसे की डोर पकड़ प्रतीक्षा करें कि देश हित में एक से बढ़ कर चमत्कारी निर्णय लेने वाली सरकार शायद आने वाले वर्षों में आम जन की समस्याओं पर ज्यादा संवेदनशील होगी। प्रार्थना है कि हम भारतवासियों पर अयोध्या नरेश प्रभु श्री राम की अपार कृपा बनी रहे।इसी के साथ आँग्ल नव वर्ष की मंगलमयी कामनाएँ और प्रणाम -----------------------------------------------------मंगलवीणा
वाराणसी ;दिनाँक 17 दिसम्बर 2019
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*************** फिर क्या पिछले छः वर्षों के बेहतरीन घटनाक्रमों से सजा भारतीय इतिहास स्वर्णाक्षरों से अंकित हो रहा है। साथ ही पूर्व के इतिहास को भी सत्य एवँ यथार्थ के कसौटी पर कसा जा रहा है।सन दो हजार चौदह से वर्तमान वर्ष के पूर्वार्द्ध वाले पाँच वर्षीय कालखण्ड में नए धरातल पर खड़ी भाजपा सरकार ने ,जनता से प्राप्त विश्वास के अनुरूप एक से बढ़ कर एक निर्णय एवँ क्रियान्वयन से, देश तथा दुनियाँ को चकाचौंध किया। जनता एवँ सरकार से इस कालखण्ड को स्वर्णिम कालखण्ड बनानेवाली अनेकानेक महत्वपूर्ण घटनाएँ उपजीं जो पूरी दुनियाँ में नई दृष्टि से देखी ,चर्चित और प्रशंसित हुई हैं। उल्लेख के लिए भारत के संसदीय चुनाव प्रणाली में पहली बार अमेरिका की भाँति पूरे देश में चुनाव केवल एक मुद्दे पर लड़ा गया कि श्री नरेंद्र मोदी देश के प्रधान मंत्री हों या न हों। कौन सांसद पद प्रत्याशी बनाया गया ,गौण हो गया। भाजपा को बहुमत देकर जनता द्वारा स्पष्ट सन्देश दिया गया कि शासन उसे सौपा जायगा जो भारत ,भारतीयता और भारतीय संस्कृति को पुनर्स्थापित करते हुए देश को पूरे विश्व में सम्मान और गौरव दिलाए गा।तथास्तु ,मोदी जी ने जनता के प्रबल जनसमर्थन को देश ही नहीं पूरी दुनियाँ में आत्मविश्वास के साथ प्रतिध्वनित किया। वे दुनियाँ में जहाँ भी गए ,वहाँ बसे प्रवासी भारतीयों ने उन्हें हाथोहाथ लिया और वे पूरे विश्व में सबसे बड़े लोकतंत्र के सर्वाधिक जनप्रिय नेता के रूप में प्रतिष्ठित हुए।नए भारत के इस नए नेता ने देश का ऐसा गौरव बढ़ाया कि दुनियाँ वालों का भारतीयों को देखने व उनसे व्यवहार का दृष्टिकोण ही बदल गया।लोग गर्व से कहने लगे कि हम भारतीय हैं।दूसरी ओर पश्चिमी सीमा पर प्रतिद्वंदी पाकिस्तान को उनके दुस्साहस का उत्तर सर्जिकल स्ट्राइक एवँ एयर स्ट्राइक से देकर कड़ा सन्देश दिया गया कि नया भारत किसी भी प्रकार का आतंकवाद या भृकुटि विक्षेप सहन नहीं करे गा । ऐसा ही सन्देश चीन जैसी महा शक्ति को ढ़ोकलाम में दिया गया। नया भारत अब एक उदार देश वाली छवि से बाहर निकल एक दृढ़ इच्छाशक्ति वाला देश हो गया ।
***************अंतरिक्ष और रक्षा क्षेत्र में सराहनीय कार्यों के साथ साथ देश के अंदर वीआईपी संस्कृति और भ्रष्टाचार पर प्रहार ,स्वच्छ भारत अभियान ,उज्ज्वला एवँ पीएम आवास जैसी योजनायें या गरीब सवर्णों को दस प्रतिशत आरक्षण देना कुछ ऐसे कार्य थे जो समाज के हर वर्ग को सुखद स्पर्श दिए। परिणामस्वरूप विरोधिओं द्वारा वोट के लिए खड़ी जातिवाद और धर्म की छद्म दीवार तेजी से ढहीं।समाज से तुमुल ध्वनि हुई कि धर्मनिर्पेक्षता के मायने केवल अल्पसंख्यकों के हित की बात करना ही नहीं बल्कि भारत में बहुसंख्यकों की उससे पहले बात करना भी है।मोदी जी का "सबका साथ- सबका विकास परन्तु तुष्टिकरण किसी का नहीं "नारा समाज में विश्वसनीयता के धरातल पर उतर गया।सच तो यह है की देशव्यापी समर्थन के बाद भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचार क्रियान्वित होने लगे और हमारी संस्कृति पुरानी जड़ों की ओर वापस लौट पड़ी परन्तु भारतीय संसद के ऊपरी सदन में राजग का बहुमत न होने और विरोधियों के असहयोग के कारण देश की कुछ अति महत्वपूर्ण समस्याएँ हल नहीं हो पा रही थीं। अतः इस वर्ष के पूर्वार्द्ध में संपन्न हुए लोकसभा चुनाव के लिए एजेंडा में उन मुद्दों को पुनः समाहित करते हुए भाजपा ने राष्ट्रवाद से आगे प्रखर राष्ट्रवाद का नारा दे दिया। फल आशातीत रहा और भाजपा नीत राजग दो तिहाई बहुमत का आँकड़ा पार कर गया।समय और प्रवंधन के बल पर अब भाजपा राज्यसभा में भी बहुमत सिद्ध करने की स्थिति में थी और वह समय आ गया कि युगान्तकारी निर्णय लिए जाँय।
***************हमारे इतिहास में अल्पावधि में उल्लेखनीय कार्यों के लिए शेरशाह सूरी का रिकार्ड था परन्तु यह क्या छः महीने में वे दीर्घकालिक समस्याएँ हल कर दी गईं जिनको माना जा रहा था कि इनको छेड़ने से देश के अस्तित्व को संकट है।स्वतन्त्रता के बाद से मोदी सरकार की दूसरी पारी शुरू होने तक कश्मीर समस्या देश के लिए नासूर सी कष्ट दे रही थी। कई हजार सैनिक ,नागरिक और कश्मीरी पण्डित जान गँवा चुके थे। पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद ने पूरी घाटी को रक्तरंजित कर रखा था। लाखों कश्मीरी पण्डितों को घाटी से पलायन कर देश के अन्य भागों में शरण लेना पड़ा परन्तु विगत काँग्रेस सरकार हाथ पर हाथ धरे सत्ता सुख लेती रही। घाटी के अलगाववादी नेता कश्मीर के अलग होने का भय दिखाकर केंद्र से बेतहाशा धन लूटते रहे और धमकाते रहे कि यदि कश्मीर से धारा 370 या 35 ए हटाया गया तो घाटी में भारतीय ध्वज को कोई कन्धा देने वाला नहीं होगा। कमाल देखिए दृढ़ निश्चयी मोदी जी एवं उनकी सरकार का कि पहले मानसून सत्र के पाँच अगस्त को संसद में प्रस्ताव पास करा कर कश्मीर से धारा 370 एवँ 35 ए को समाप्त कर दिया और राज्य को जम्मू और कश्मीर तथा लद्दाख नाम से दो केंद्र शासित प्रदेशों में पुनर्गठित कर दिया। इस निर्णय पर कतिपय देशद्रोहियों को छोड़कर समूचा देश झूम पड़ा। सरकार ने संसद के इसी सत्र में जम्मू और कश्मीर विधेयक से पहले तीस जुलाई को मुसलमानों में प्रचलित तीन तलाक कानून को अवैध करने वाला विधेयक पास कर करोड़ों मुस्लिम महिलाओं के आँसू पोछा और समाज में सम्मानजनक जीवन का अधिकार दिया।यह सामान्य नागरिक संहिता की दिशा में बढ़ता एक कदम भी था।
**************पूरा देश उल्लसित था कि अयोध्या विवाद पर उच्चतम न्यायलय के पाँच जजों वाले बेंच ने नौ नवम्बर को सुप्रीम फैसला दे दिया कि विवादित भूमि राम लला विराजमान की है और उस पर बाबरी मस्जिद का निर्माण अवैध था।पूरी दुनियाँ साक्षी है कि राम मंदिर बाबरी मस्जिद विवाद हिन्दुओं और मुस्लिमों के बीच चार सौ वर्षों से चल रहा सर्वाधिक त्रासद विवाद रहा है।आजादी के बाद भी तुष्टिकरण के चलते पूर्व सत्ताधारी और आज के विपक्षी सदैव मुस्लिमों के पक्ष में बात एवं आचरण करते रहे जब कि भाजपा, राष्ट्रीय स्वयँ सेवक तथा विश्व हिन्दू परिषद् ,अनेक हिन्दू एवँ संत संघटनों के साथ, लगातार राम मंदिर के पक्ष में संघर्षरत थे।इस प्रसंशनीय निर्णय को देश के हिन्दू और मुसलमानों ने अत्यंत सहजता और शान्ति से सर माथे लेकर भाई चारे का वह प्रकाश स्तम्भ बनाया जो भविष्य के इतिहास को भी प्रकाशित करता रहे गा।संसद का शीतकालीन सत्र समाप्त होते होते सरकार ने नागरिकता संशोधन विधेयक भी दोनों सदनों से पास करा कर राष्ट्रपति से स्वीकृति ले ली जिससे पड़ोसी मुस्लिम देशों से उत्पीड़ित होकर सन चौदह से पहले भारत आए हिन्दू ,सिख ,ईसाई ,बौद्ध ,पारसी या जैन शरणार्थियों को भारत की नागरिकता मिलने का रास्ता खुल गया। अब ऐसे लोग देश के एक आम नागरिक की भाँति जीवन यापन कर सकें गे।
***************निःसंदेह उपर्युक्त उपलब्धियाँ इतिहास में स्वर्णाक्षरीय हैं परन्तु कुछ विधेयकों का क्रियान्वयन उन्हें संसद से पारित कराने की अपेक्षा ज्यादा कठिन होगा क्योंकि अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे विपक्षी, सरकार को असफल करने में, कोई कोर कसर नहीं छोड़ें गे वरन उनके वंशवाद ,तुष्टिकरण और तथाकथित धर्मनिरपेक्षता का भविष्य क्या होगा।आने वाला समय संदर्भित निर्णयों के क्रियान्वयन की सफलता तथा देश की प्रगति में इनके योगदान का आकलन करे गा और इस अल्प काल खण्ड के इतिहास में परिणामी आयाम जोड़े गा परन्तु आज तक की अद्यतन स्थिति यह है कि देखते ही देखते तीन तलाक ,कश्मीर की धारा 370 और 35 ए ,अयोध्या का राम जन्मस्थान विवाद और शरणार्थियों के लिए नागरिकता जैसी विकराल राष्ट्रीय समस्याओं का चंद महीनों में निराकारण हो गया है ।सारांशतः देश के प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी की नेतृत्व वाली भाजपा सरकार और आज के भारत के लिए यह कहना समय संगत होगा कि इतिहास बनाए तो ऐसे बनाए।अब मोदी जी का पूरे विश्व में चर्चित नारा है ,"सबका साथ -सबका विकास और सबका विश्वास।साथ ही पूरे देश में एक धारणा बन गई है कि कोई भी असंभव या दुष्कर कार्य हो; वह मोदी जी के लिए संभव है अर्थात मोदी हैं तो मुमकिन है। यह है मोदी जी का करिश्माई व्यक्तित्व।अच्छा है कि देश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है और मोदी जी हमारे प्रधान मंत्री।अस्तु।----------------------------------------------मंगलवीणा
वाराणसी ;दिनाँक 17 दिसम्बर 2019 mangal-veena.blogspot.com
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वाराणसी ;दिनाँक 17 दिसम्बर 2019
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सोमवार, 22 अप्रैल 2019
Mangal-Veena: नवभारत का राष्ट्रवाद
Mangal-Veena: नवभारत का राष्ट्रवाद: ***************भारत में सत्रहवीं लोकसभा के सात चरणों में होने वाले चुनाव की प्रक्रिया चल रही है। राजनीतिक दलों द्वारा अपने अनुकूल मुद्दों क...
शुक्रवार, 19 अप्रैल 2019
नवभारत का राष्ट्रवाद
***************भारत में सत्रहवीं लोकसभा के सात चरणों में होने वाले चुनाव की प्रक्रिया चल रही है। राजनीतिक दलों द्वारा अपने अनुकूल मुद्दों को उछालने एवँ प्रतिकूल मुद्दों को विरोधियों का षड्यंत्र बताने का बेहया प्रयास जारी है।इस बीच देश के जनमानस में एक बहुत बड़ा मुद्दा राष्ट्रवाद के रूप में उभरा है। केंद्र की भाजपानीत मोदी सरकार के विगत पाँच वर्षीय शासन काल में राष्ट्रवाद, सबका साथ सबका विकास के साथ, चल रहा था परन्तु चौदह फरवरी को फुलवामा (कश्मीर) में केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल के ऊपर पाकिस्तान प्रायोजित जैश आतंकी हमला होते ही सरकार व जनता में पाकिस्तान को पाठ पढ़ाने की ज्वाला फूट पड़ी।प्रधान मंत्री मोदी जी का बयान आया कि पाकिस्तान एवँ उसके आतंकियों ने बड़ी गलती कर दी और उन्हें इसकी बड़ी कीमत चुकानी होगी। हुआ भी ऐसा ही,भारतीय वायुसेना ने 25 /26 फरवरी की रात में पाक अधिकृत कश्मीर में चल रहे आतंकी शिविरों पर सफल एयर स्ट्राइक किया।विश्व के अधिकाँश राष्ट्र जैसे अमेरिका ,इंग्लॅण्ड ,फ्राँस ,सोवियत रूस,जापान इत्यादि देश भारत के साथ खड़े हो गए।अमेरिका ने तो यहाँ तक कह दिया कि भारत को प्रतिकार का पूरा हक़ है।जब पाकिस्तानी वायु सेना ने 27 फरवरी को भारत पर जवाबी हमला किया ,विंग कमाण्डर अभिनन्दन ने मिग से उड़ान भर कर एक पाकिस्तानी ऍफ़ -16 जंगी जहाज को मार गिराया और खुद पैराशूट से छलाँग लगा लिया परन्तु दैववश पाकिस्तानी सीमा में जा गिरा। भारतीय और अंतर्राष्ट्रीय दबाव के आगे झुकते हुए लाचार पाकिस्तान को दो दिनों के अंदर(एक मार्च 2019 )ही अभिनन्दन वर्तमान को वापस सौंपना पड़ा।मोदी जी के नेतृत्व में भारत के बढ़ते दबदबा और सामरिक शक्ति से पूरा देश झूम उठा।साथ ही इन सोलह -सत्रह दिनों में भारत ने एक बदलाव का तीव्र आवेग देखा।यह बदलाव था प्रखर राष्ट्रवाद ,जिसकी अगुवाई प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में करोड़ों राष्ट्रवादी भारतीय करने लगे थे। सदिओं से एक नरम राज्य के रूप में पहचाने जाने वाला भारत एक कठिन राज्य बन गया अर्थात एक थप्पड़ मारने वाले को दस थप्पड़ मारने वाला भारत बन गया। फिर क्या ; सत्रहवीं लोकसभा चुनाव की घोषणा होते ही राष्ट्रवाद सारे मुद्दों व प्राथमिकताओं को पीछे छोड़ते हुए चुनाव का सबसे बड़ा मुद्दा बन गया।
*************** वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत इस चुनाव में ऐसा पहली बार हुआ है कि भुखमरी,पेट्रोल ,मँहगाई ,बिजली ,सड़क ,स्वास्थ्य ,शिक्षा जैसी समस्याएँ चुनावी नैपथ्य के पीछे चली गईं हैं और देशभक्ति ,देशद्रोह, घुसपैठ ,कश्मीर संवंधित धारा 370 एवं 35 A ,सेना को अशान्त क्षेत्रों में अधिकाधिक सुरक्षा कवच ,आतंक को कुचलने की रणनीति और भारत की सामरिक एवँ आर्थिक शक्ति बढ़ाने वाली या इनको क्षीण करने वाली या कुछ एक को समाप्त करने वाली घोषणाएँ रंगमंच पर परवान चढ़ रही हैं। ए सारे मुद्दे राष्ट्रवाद के ही अलग अलग धनात्मक या ऋणात्मक आयाम हैं। जहाँ मोदी जी के नेतृत्व में भाजपा इन राष्ट्रवादी मुद्दों को पूरे जोश से उठा रही है वहीं भारतीय जन मानस भी इन मुद्दों पर भाजपा को भरपूर समर्थन दे रहा है।विपक्ष इन्हीं मुद्दों के ऋणात्मक आयाम को अपने घोषणापत्र में डाल कर जोर शोर से अपनी ढफली बजा रहा है।सारे विपक्षी दल का एक जुट होकर राष्ट्रवाद पर प्रश्नचिन्ह लगाना जनता में उनके प्रति गलत सन्देश दे रहा है कि ए मात्र अपने निजी एवँ दलगत स्वार्थ सिद्धि के लिए मोदी जी को सत्ता से हटाना चाहते हैं।वहीं राष्ट्रवाद पर खरा उतर रहे मोदी जी एवं भाजपा में जनता का विश्वास बढ़ता ही जा रहा है। देश विदेश के सारे सर्वेक्षणों में मोदी जी के सामने पसंदगी में किसी नेता का न टिक पाना ;इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है।चुनाव जैसे जैसे आगे बढ़ रहा है भाजपा का राष्ट्रवाद प्रखर राष्ट्रवाद का रूप लेता जा रहा है और मतदाताओं को भी इसमें भारत की बुलंद तसवीर दिख रही है। इसके विपरीत विपक्षी अनेक प्रकार के गठजोड़ ,झूठे वादे व जातीय समीकरण के बल पर सत्ता पाने का हर हथकंडा अपना रहे हैं।
***************वर्तमान चुनाव में विपक्षी मात्र मोदी विरोध और मोदी हटाओ अभियान पर केंद्रित हैं तथा इसके लिए इन लोगों ने अभूतपूर्व ढंग से पूरे देश में असमतल ध्रुवीकरण किया है।सारा खेल जनता समझ रही है। सभी दलों के कथनी ,करनी और विश्वसनीयता पर भी मन्थन हो रहा है और सभी चैतन्य मतदाता इस बात से चिन्तित हैं कि ए विपक्षी राष्ट्रवाद और विकास के मुद्दे पर ढुलमुल क्यों हैं। यदि विश्व समुदाय में भारत की प्रतिष्ठा एवँ क्षमता मोदी जी के नेतृत्व में बढी है तो विरोधियों द्वारा मुक्त कण्ठ से उसकी प्रशंसा क्यों नहीं होती है। प्रशंसा करते हुए भी तो विपक्षी इस मुद्दे को राष्ट्रहित के सन्दर्भ में और आगे बढ़ाने की बात कर सकते हैं।ऐसा भी नहीं कि ए विपक्षी यह नहीं जानते कि राष्ट्रवाद क्या है और इसके विरुद्ध आचरण करने वाले को क्या कहा जाता है। फिर भी सारे विपक्षी राष्ट्र द्रोहियों का समर्थन करते हैं क्योंकि उन्हें जातिवाद और मुस्लिमवाद पर भरोसा रहा है और अब भी है। हिन्दुओं के मत को जाति के नाम पर तितर वितर करना ,मुस्लिमों के मत का अपने पक्ष में ध्रुवीकरण करना और चुनाव जीतकर सत्तासुख भोगना ही इनके लिए राष्टवाद है।फिर देश और देश का भविष्य ? ऐसी परिस्थिति में हर भारतीय जागृत मतदाता समझता है कि यदि किसी राज्य की व्यवस्था ढुलमुल हो जाय , वंशवादी सत्ता में जड़ें जमा लें, बहुमत के लिए जाति और धर्म की चाल चलें, धर्म निरपेक्षता के नाम पर बहुसंख्यकों का निरादर हो और देश की सीमाएँ असुरक्षित रहें तो राज्य के अस्तित्व पर संकट मँडराते हैं।समय की माँग है कि विरोधी अपने आचरण और मुद्दों में सकारात्मक बदलाव लाएँ और राष्ट्रवाद को अपने मन ,कर्म और वाणी में वैसे ही बैठा लें जैसे कि श्री मोदी ,एक सीमा प्रहरी सैनिक या एक आम राष्ट्रवादी नागरिक। राष्ट्रवाद राष्ट्रवाद है और इसका अर्थ भी राष्ट्रवाद है ,इसके दाएं बाएँ कुछ नहीं।यह राष्ट्रवाद प्रखर तो हो सकता है परन्तु ढुलमुल कदापि नहीं।
***************वस्तुतः जिस राष्ट्रवाद ,प्रखर राष्ट्रवाद या सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की आज चतुर्दिक चर्चा है इसका उद्भव भाजपा के पैतृक सांस्कृतिक संगठन राष्ट्रीय स्वयँसेवक संघ के विचार धारा रूपी प्रांगण से हुआ। फिर संघ ने उद्देश्यों की समग्र उपलब्धि के लिए अनेक और सगठन खड़ा किया जिसमें राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए पूर्व की जनसंघ आज की भाजपा बनी।वर्षों राष्ट्रवाद का ध्वज लिए अनवरत चलते हुए यही भारतीय जनता पार्टी न केवल भारत या विश्व की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बनी है अपितु सवा सौ करोड़ भारतीयों के गौरव को बढ़ाते हुए उनके आकांछा को परिणाम के धरातल पर उतारने वाली इकलौती राष्ट्रीय पार्टी है तथा श्री नरेंद्र मोदी इस दल के यूएसपी हैं। इनके कथनी करनी और विश्वसनीयता पर आम लोगों का जाँचा परखा भरोसा है।इस दल में न वंशवाद है न तुष्टिकरण है।यहाँ न छद्म धर्म निर्पेक्षता है और न भ्रष्टाचार। विगत पाँच वर्षों में भाजपा सरकार ने आवश्यक आवश्यकता जैसे बिजली ,सड़क ,आवास ,शौचालय रसोई गैस,स्वच्छता पर ध्यान दिया जिससे भारत में विकास की एक अच्छी यात्रा हुई। अनुकूल समर्थन से अन्तरिक्ष विज्ञानिकों ने कई मील के पत्थर गाड़े। आतंक और नक्सलवाद पर अंकुश लगा। सैनिकों का सम्मान बढ़ा और सीमाएँ जबरदस्त ढंग से जल ,थल ,नभ में सुरक्षित हुई हैं। बढ़ती सामरिक और आर्थिक शक्ति के साथ साथ सफल विदेश नीति से आज पूरी दुनियाँ में भारत के नागरिकों के साथ सम्मान का व्यवहार हो रहा है। देश विदेश जहाँ कहीं भी हमारे प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी जाते हैं; मोदी- मोदी के नारों से उनका स्वागत होता है।आचरण की शुद्धता के साथ श्री मोदी में नेतृत्व ,सूझबूझ और निर्णय की अतुल्य क्षमता है जो उन्हें अन्य नेताओं से बहुत ऊपर प्रतिष्ठित करती है। यही कारण है कि प्रधान मंत्री की दावेदारी में वे निरंतर पहली पसंद बने हुए हैं।नव भारत में राष्ट्रवाद की पर्याय बन चुकी भाजपा यदि सोना है तो श्री मोदी सोने में सुहागा। अस्तु यदि भाजपा पुनः सत्ता में लौटती है तो अगला पाँच वर्षीय कालखण्ड देशवासियों की आकांछा पूर्ति वाला स्वर्णयुग हो सकता है। मंगलवीणा
वाराणसी ;दिनाँक 22 अप्रैल 2019 ----------------------------------mangal-veena.blogspot.com
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आज के उद्धरण
1 . राष्ट्रवाद राष्ट्रवाद है और इसका अर्थ भी राष्ट्रवाद है ,इसके दाएं बाएँ कुछ नहीं।यह राष्ट्रवाद प्रखर तो हो सकता है परन्तु ढुलमुल कदापि नहीं।
2 नव भारत में राष्ट्रवाद की पर्याय बन चुकी भाजपा यदि सोना है तो श्री मोदी सोने में सुहागा। अस्तु यदि भाजपा पुनः सत्ता में लौटती है तो अगला पाँच वर्षीय कालखण्ड देशवासियों की आकांछा पूर्ति वाला स्वर्णयुग हो सकता है।------------------------------------------------- मंगलवीणा
वाराणसी ;दिनाँक 22 अप्रैल 2019
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*************** वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत इस चुनाव में ऐसा पहली बार हुआ है कि भुखमरी,पेट्रोल ,मँहगाई ,बिजली ,सड़क ,स्वास्थ्य ,शिक्षा जैसी समस्याएँ चुनावी नैपथ्य के पीछे चली गईं हैं और देशभक्ति ,देशद्रोह, घुसपैठ ,कश्मीर संवंधित धारा 370 एवं 35 A ,सेना को अशान्त क्षेत्रों में अधिकाधिक सुरक्षा कवच ,आतंक को कुचलने की रणनीति और भारत की सामरिक एवँ आर्थिक शक्ति बढ़ाने वाली या इनको क्षीण करने वाली या कुछ एक को समाप्त करने वाली घोषणाएँ रंगमंच पर परवान चढ़ रही हैं। ए सारे मुद्दे राष्ट्रवाद के ही अलग अलग धनात्मक या ऋणात्मक आयाम हैं। जहाँ मोदी जी के नेतृत्व में भाजपा इन राष्ट्रवादी मुद्दों को पूरे जोश से उठा रही है वहीं भारतीय जन मानस भी इन मुद्दों पर भाजपा को भरपूर समर्थन दे रहा है।विपक्ष इन्हीं मुद्दों के ऋणात्मक आयाम को अपने घोषणापत्र में डाल कर जोर शोर से अपनी ढफली बजा रहा है।सारे विपक्षी दल का एक जुट होकर राष्ट्रवाद पर प्रश्नचिन्ह लगाना जनता में उनके प्रति गलत सन्देश दे रहा है कि ए मात्र अपने निजी एवँ दलगत स्वार्थ सिद्धि के लिए मोदी जी को सत्ता से हटाना चाहते हैं।वहीं राष्ट्रवाद पर खरा उतर रहे मोदी जी एवं भाजपा में जनता का विश्वास बढ़ता ही जा रहा है। देश विदेश के सारे सर्वेक्षणों में मोदी जी के सामने पसंदगी में किसी नेता का न टिक पाना ;इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है।चुनाव जैसे जैसे आगे बढ़ रहा है भाजपा का राष्ट्रवाद प्रखर राष्ट्रवाद का रूप लेता जा रहा है और मतदाताओं को भी इसमें भारत की बुलंद तसवीर दिख रही है। इसके विपरीत विपक्षी अनेक प्रकार के गठजोड़ ,झूठे वादे व जातीय समीकरण के बल पर सत्ता पाने का हर हथकंडा अपना रहे हैं।
***************वर्तमान चुनाव में विपक्षी मात्र मोदी विरोध और मोदी हटाओ अभियान पर केंद्रित हैं तथा इसके लिए इन लोगों ने अभूतपूर्व ढंग से पूरे देश में असमतल ध्रुवीकरण किया है।सारा खेल जनता समझ रही है। सभी दलों के कथनी ,करनी और विश्वसनीयता पर भी मन्थन हो रहा है और सभी चैतन्य मतदाता इस बात से चिन्तित हैं कि ए विपक्षी राष्ट्रवाद और विकास के मुद्दे पर ढुलमुल क्यों हैं। यदि विश्व समुदाय में भारत की प्रतिष्ठा एवँ क्षमता मोदी जी के नेतृत्व में बढी है तो विरोधियों द्वारा मुक्त कण्ठ से उसकी प्रशंसा क्यों नहीं होती है। प्रशंसा करते हुए भी तो विपक्षी इस मुद्दे को राष्ट्रहित के सन्दर्भ में और आगे बढ़ाने की बात कर सकते हैं।ऐसा भी नहीं कि ए विपक्षी यह नहीं जानते कि राष्ट्रवाद क्या है और इसके विरुद्ध आचरण करने वाले को क्या कहा जाता है। फिर भी सारे विपक्षी राष्ट्र द्रोहियों का समर्थन करते हैं क्योंकि उन्हें जातिवाद और मुस्लिमवाद पर भरोसा रहा है और अब भी है। हिन्दुओं के मत को जाति के नाम पर तितर वितर करना ,मुस्लिमों के मत का अपने पक्ष में ध्रुवीकरण करना और चुनाव जीतकर सत्तासुख भोगना ही इनके लिए राष्टवाद है।फिर देश और देश का भविष्य ? ऐसी परिस्थिति में हर भारतीय जागृत मतदाता समझता है कि यदि किसी राज्य की व्यवस्था ढुलमुल हो जाय , वंशवादी सत्ता में जड़ें जमा लें, बहुमत के लिए जाति और धर्म की चाल चलें, धर्म निरपेक्षता के नाम पर बहुसंख्यकों का निरादर हो और देश की सीमाएँ असुरक्षित रहें तो राज्य के अस्तित्व पर संकट मँडराते हैं।समय की माँग है कि विरोधी अपने आचरण और मुद्दों में सकारात्मक बदलाव लाएँ और राष्ट्रवाद को अपने मन ,कर्म और वाणी में वैसे ही बैठा लें जैसे कि श्री मोदी ,एक सीमा प्रहरी सैनिक या एक आम राष्ट्रवादी नागरिक। राष्ट्रवाद राष्ट्रवाद है और इसका अर्थ भी राष्ट्रवाद है ,इसके दाएं बाएँ कुछ नहीं।यह राष्ट्रवाद प्रखर तो हो सकता है परन्तु ढुलमुल कदापि नहीं।
***************वस्तुतः जिस राष्ट्रवाद ,प्रखर राष्ट्रवाद या सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की आज चतुर्दिक चर्चा है इसका उद्भव भाजपा के पैतृक सांस्कृतिक संगठन राष्ट्रीय स्वयँसेवक संघ के विचार धारा रूपी प्रांगण से हुआ। फिर संघ ने उद्देश्यों की समग्र उपलब्धि के लिए अनेक और सगठन खड़ा किया जिसमें राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए पूर्व की जनसंघ आज की भाजपा बनी।वर्षों राष्ट्रवाद का ध्वज लिए अनवरत चलते हुए यही भारतीय जनता पार्टी न केवल भारत या विश्व की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बनी है अपितु सवा सौ करोड़ भारतीयों के गौरव को बढ़ाते हुए उनके आकांछा को परिणाम के धरातल पर उतारने वाली इकलौती राष्ट्रीय पार्टी है तथा श्री नरेंद्र मोदी इस दल के यूएसपी हैं। इनके कथनी करनी और विश्वसनीयता पर आम लोगों का जाँचा परखा भरोसा है।इस दल में न वंशवाद है न तुष्टिकरण है।यहाँ न छद्म धर्म निर्पेक्षता है और न भ्रष्टाचार। विगत पाँच वर्षों में भाजपा सरकार ने आवश्यक आवश्यकता जैसे बिजली ,सड़क ,आवास ,शौचालय रसोई गैस,स्वच्छता पर ध्यान दिया जिससे भारत में विकास की एक अच्छी यात्रा हुई। अनुकूल समर्थन से अन्तरिक्ष विज्ञानिकों ने कई मील के पत्थर गाड़े। आतंक और नक्सलवाद पर अंकुश लगा। सैनिकों का सम्मान बढ़ा और सीमाएँ जबरदस्त ढंग से जल ,थल ,नभ में सुरक्षित हुई हैं। बढ़ती सामरिक और आर्थिक शक्ति के साथ साथ सफल विदेश नीति से आज पूरी दुनियाँ में भारत के नागरिकों के साथ सम्मान का व्यवहार हो रहा है। देश विदेश जहाँ कहीं भी हमारे प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी जाते हैं; मोदी- मोदी के नारों से उनका स्वागत होता है।आचरण की शुद्धता के साथ श्री मोदी में नेतृत्व ,सूझबूझ और निर्णय की अतुल्य क्षमता है जो उन्हें अन्य नेताओं से बहुत ऊपर प्रतिष्ठित करती है। यही कारण है कि प्रधान मंत्री की दावेदारी में वे निरंतर पहली पसंद बने हुए हैं।नव भारत में राष्ट्रवाद की पर्याय बन चुकी भाजपा यदि सोना है तो श्री मोदी सोने में सुहागा। अस्तु यदि भाजपा पुनः सत्ता में लौटती है तो अगला पाँच वर्षीय कालखण्ड देशवासियों की आकांछा पूर्ति वाला स्वर्णयुग हो सकता है। मंगलवीणा
वाराणसी ;दिनाँक 22 अप्रैल 2019 ----------------------------------mangal-veena.blogspot.com
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आज के उद्धरण
1 . राष्ट्रवाद राष्ट्रवाद है और इसका अर्थ भी राष्ट्रवाद है ,इसके दाएं बाएँ कुछ नहीं।यह राष्ट्रवाद प्रखर तो हो सकता है परन्तु ढुलमुल कदापि नहीं।
2 नव भारत में राष्ट्रवाद की पर्याय बन चुकी भाजपा यदि सोना है तो श्री मोदी सोने में सुहागा। अस्तु यदि भाजपा पुनः सत्ता में लौटती है तो अगला पाँच वर्षीय कालखण्ड देशवासियों की आकांछा पूर्ति वाला स्वर्णयुग हो सकता है।------------------------------------------------- मंगलवीणा
वाराणसी ;दिनाँक 22 अप्रैल 2019
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शुक्रवार, 5 अप्रैल 2019
Mangal-Veena: चुनावी आचार संहिता
Mangal-Veena: चुनावी आचार संहिता: ***************भारत वर्ष में सत्रहवीं लोकसभा गठन हेतु आम चुनाव का डंका बज चुका है। अब इससे उत्पन्न तुमुल ध्वनियाँ कानों में धमकने लगी हैं ...
चुनावी आचार संहिता
***************भारत वर्ष में सत्रहवीं लोकसभा गठन हेतु आम चुनाव का डंका बज चुका है। अब इससे उत्पन्न तुमुल ध्वनियाँ कानों में धमकने लगी हैं ,पल पल रंग बदलती दृश्यावली आँखों में घूमने लगी हैं और सुरसा सी बढ़ती चुनावी गर्मी दिनचर्या को झेलाने लगी हैं।चुनाव की घोषणा के साथ चुनाव आयोग द्वारा आदर्श चुनाव संहिता भी लागू कर दी गई है।करें भी क्यों न ;यही एक चाबुक है जिससे आयोग सम्पूर्ण चुनावी गतिविधियाँ नियंत्रित करता है।वरन सांसदी के अधिकाँश भ्रष्ट प्रत्याशी हर संभव कदाचार के अपकीर्तिमान को स्थापित करने से न चूकें। आश्चर्य होता है कि एक आदर्श शिष्टाचारी परम्परा वाले देश में हम इतने आचार विहीन हो चुके हैं कि चुनाव के खातिर हम पर आचार रूपी अंकुश लगता है और बताया जाता है कि हम क्या करें और क्या न करें ।जहाँ तक नेताओं , प्रत्याशियों और समर्थकों की बात है ,वे चुनाव संपन्न होने तक आचार संहिता के साथ तूँ डार -डार मैं पात -पात का जम कर खेल खेलें गे परन्तु स्वभाव से आचारशील नागरिक इस संहिता से बुरी तरह प्रताड़ित होते हैं।निश्चय ही लोकतंत्र में चुनाव एक पर्व है जिसे हर नागरिक को बढ़चढ़ कर मनाना चाहिए और हर मतदाता को अपना मत अवश्य डालना चाहिए परन्तु यह भी अपेक्षित है कि चुनाव के नाम पर नागरिकों का प्रताड़न न हो। अन्यथा प्रश्न तो उठे गा कि प्रताडन और पर्व साथ साथ कैसे।
***************यथार्थ की जमीन पर उतरें तो सबको मालूम है कि ध्वनि प्रदूषण स्वाथ्य के लिए बहुत ही हानिकारक है फिर भी चुनाव में ध्वनि विस्तारक यंत्रों की दहाड़ से हम सभी को त्रस्त होना पड़ता है। घर,गली ,सड़क ,चौराहा ,पार्क ,मैदान कहीं भी जाइये ;इन भोंपुओं पर अपने प्रत्याशियों के लिए चीखने चिल्लाने वाले समर्थकों से बच नहीं सकते।टीवी पर समाचार चैनलों को खोलिए तो वही कर्कश और कुतर्की परिचर्चा ;एंकर का प्रश्न कुछ तो प्रवक्ताओं का जवाब कुछ और। सब बेसुरी ढफली बजाते मिलते हैं। ऐसा वातावरण शायद यह मान कर बनता है कि अब लोग ऊँचा सुनने लगे हैं।रात्रि में यह प्रदूषण नियंत्रित कर लिया जाता है ;यह भी कहना कठिन है।घर से किसी गंतव्य के लिए निकलिए तो यह संभव ही नहीं कि संहिता की छाया में चेकिंग के नाम पर पुलिस अवरोध और रौब से यहाँ- वहाँ दो चार न होना पड़े। किसी कार्यालय से कोई काम करना तो कोई सोच भी नहीं सकता क्योंकि सबसे एक ही जवाब मिलता है कि चुनाव बाद मिलिए। सबसे अधिक साँसत तो उन भद्र लोगों की होती है जिनके पास सुरक्षा के लिए लइसेंसी असलहे होते हैं।पुलिस वाले इसे थाने या शस्त्र दुकानों पर जमा करने का मौखिक दबाव बनाने लगते हैं। समझ से परे है कि चुनाव के समय शस्त्र पास न रहने पर लाइसेंसधारिओं की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित हो जाती है। ऐसा प्रतीत होने लगता है कि पुलिस को अवैध असलहे धारी असामाजिक तत्वों पर तो सिकंजा कसना ही है परन्तु भद्र लोगों को भी चुनाव के समय चैन से नहीं रहने देना है।
*************** जब संहिता पालन की बात राजनीतिक दलों ,चुनाव लड़ रहे प्रत्याशियों एवँ नेताओं पर हो तो आयोग उनसे जूझता दिखता है। चुनाव में प्रत्याशियों के लिए खर्च निर्धारित करना और निगरानी कराना एक बात है परन्तु उसे सुनिश्चित कराना और बात है।सामान्यतया माना जाता है कि पैसे जैसे संसाधन से प्रत्याशी अपनी विचारधारा और जनसेवा के संकल्प को अपने मतदाता तक पहुँचाते हैं ;अतः इस खर्च का हिसाब वे आसानी से आयोग को दे सकते हैं। वस्तुस्थिति इससे विल्कुल इतर है। आज के चुनाव इस अच्छे आचरण वाले परदे के पीछे लड़े जाते हैं जहाँ काले धन का ताण्डव होता है ;मतदाताओं तक पैसे ,प्रलोभन और दावतें पहुँचा कर मत खरीदने का खड्यंत्र होता है। यही नहीं बड़े बड़े असामाजिक तत्व विभिन्न दलों के शीर्ष नेताओं को करोड़ों रूपए का काला धन टिकट केलिए भेंट करते हैं। अब तो मिडिया वाले स्टिंग ऑपरेशन कर ऐसे काले धन्धों का खेल सबको प्रत्यक्ष दिखाने भी लगे हैं।आम आदमी बहुत चिंतित है कि ऐसी बेशर्म ,भ्रष्ट और आचरणहीन राजनीति देश को कहाँ पहुँचाने को उद्यत है।वर्तमान की बहती बयार में भारतीय लोकतंत्र के सामने सबसे ज्वलंत प्रश्न है कि आयोग एक हाथ आचार संहिता लिए और दूजे हाथ प्रशासनिक शक्तियाँ लिए क्या क्या करता है या क्या कर सकता है।
***************चाहे कितनी भी विस्तारित परिचर्चा की जाय सत्य यही है कि आदर्श आचार किसी संहिता से नहीं संस्कारों से उपजता और पलता है। साथ ही यदि चोर सिपाही से शक्तिशाली होगा तो कानून की बेवसी बढ़ती है। आचार संहिता और आयोग की शक्तिओं के साथ कुछ ऐसा ही हो रहा है।आगे इससे भी बड़ा सत्य यह है कि हमारा भारत बदल रहा है। शिक्षा के साथ इलेट्रॉनिक , प्रिंट और सोशल मीडिया ने हमारे समाज में जागरूकता की एक अभूतपूर्व क्रान्ति ला दी है और इसी जन जागरण से चुनावी भ्रष्टाचार का संहार होने भी लगा है।विशेष रूप से नई पीढ़ी के रंगमंच पर उदित होने से राजनितिक भ्रष्टाचार के दिन और तेजी से लदने लगे हैं।सब मिलाकर बदलती हवाएँ शुभ संकेत दे रही हैं कि भविष्य में आचारशील चुनाव आयोग ,आचारशील नेता, आचारशील मतदाता और आचारशील नागरिक अपने भारत को इसके स्वर्णिम युग की ओर अग्रसर करें गे।
***************परन्तु वर्तमान चुनावी परिदृश्य में हर परेशानी से ऊपर उठ कर भारत के प्रत्येक मतदाता का प्रथम दायित्व है कि वह मतदान अवश्य करे और स्वविवेक से सबसे बेहतर प्रत्याशी को मत दे। नदी की धारा को मोड़ने का यही बेहतर तरीका है और इसी प्रकार मतदान द्वारा देश को सुरक्षित हाथों में सौंपा जा सकता है।नए भारत की इसी जनाकांछा की परिणीति का ज्वलन्त उदाहरण आज की भाजपानीत केंद्र सरकार है। वर्तमान चुनाव में भी जनाकांछा उसी भाजपा के मोदी जी पर टिकी हुई है।और यह संभव हुआ था- पिछले चुनाव में मतदान की आँधी से। इस चुनाव में भी ऐसे ही प्रबलतर आँधी की परिस्थितियाँ बन रही हैं। अस्तु हमारी प्रतिबद्धता और शुभकामना हो कि भारत का चुनाव आयोग तथा उसकी घोषित आचार संहिता 2019 चल रहे लोक सभा चुनाव को अच्छे से संपन्न करने में सफल हों और नागरिकों को कोई असुविधा भी न हो।------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- मंगलवीणा
वाराणसी ,चैत्र कृष्ण अमावस्या सँ. 2076
दिनाँक 05 अप्रैल 2019
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अंततः
आइए एक नेता जी से मिलें जो पूर्व में माननीय मंत्री जी रह चुके हैं। हर सीधी उलटी कोशिश के बावजूद किसी जिताऊ पार्टी से सांसदी का टिकट नहीं मिल पा रहा है सो जल बिन मछली की भाँति छटपटा रहे हैं और अपनी व्यथा कुछ यूँ व्यक्त कर रहे हैं।
भाई ! मोहि कुर्सी विसरत नाहिं।
मन डोलत ही इच्छा पूरी ,जादू कुर्सी माहिं।
ढके कुकर्म सभी खादी में ,महामहिम कहलाहिं। भाई ------
दिन जनता दरबार बैठना ,निशा मौज़ क्लब माहिं।
न्याय नियम को फेंक किनारे ,लूटम लूट मचाहिं। भाई ------
बन गाँधी के छद्मी वारिस ,मॉल मलाई खाहिं।
राजा रजवाड़ों से न्यारे , नेता भारत माहिं। भाई --------
गर एक टिकट पुनः मत भारी ,शक्र देइ बरसाहिं।
वहि इन्द्रासन फिर मिल जाए,सुफल जनम होइ जाहिं। भाई ------
-----------------अब उनकी ब्यथा सुन आम आदमी की क्या दशा होगी ;यह विचारणीय है। इति।
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--------------- पुनः सभी सुधी पाठकों एवँ शुभेच्छुओं को चैत्र की नवरात्रि एवँ पावन राम नवमी की शुभ कामनायें। नया विक्रम सँवत वर्ष आप के लिए स्वास्थ्यप्रद ,यशप्रद एवं सुखप्रद हो ;यह हमारी कामना है।------------------------------------------------- --मंगलवीणा
वाराणसी ;चैत्र कृष्ण अमावस्या सँ. 2076 ------------------------ mangal-veena ,blogspot .com
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***************यथार्थ की जमीन पर उतरें तो सबको मालूम है कि ध्वनि प्रदूषण स्वाथ्य के लिए बहुत ही हानिकारक है फिर भी चुनाव में ध्वनि विस्तारक यंत्रों की दहाड़ से हम सभी को त्रस्त होना पड़ता है। घर,गली ,सड़क ,चौराहा ,पार्क ,मैदान कहीं भी जाइये ;इन भोंपुओं पर अपने प्रत्याशियों के लिए चीखने चिल्लाने वाले समर्थकों से बच नहीं सकते।टीवी पर समाचार चैनलों को खोलिए तो वही कर्कश और कुतर्की परिचर्चा ;एंकर का प्रश्न कुछ तो प्रवक्ताओं का जवाब कुछ और। सब बेसुरी ढफली बजाते मिलते हैं। ऐसा वातावरण शायद यह मान कर बनता है कि अब लोग ऊँचा सुनने लगे हैं।रात्रि में यह प्रदूषण नियंत्रित कर लिया जाता है ;यह भी कहना कठिन है।घर से किसी गंतव्य के लिए निकलिए तो यह संभव ही नहीं कि संहिता की छाया में चेकिंग के नाम पर पुलिस अवरोध और रौब से यहाँ- वहाँ दो चार न होना पड़े। किसी कार्यालय से कोई काम करना तो कोई सोच भी नहीं सकता क्योंकि सबसे एक ही जवाब मिलता है कि चुनाव बाद मिलिए। सबसे अधिक साँसत तो उन भद्र लोगों की होती है जिनके पास सुरक्षा के लिए लइसेंसी असलहे होते हैं।पुलिस वाले इसे थाने या शस्त्र दुकानों पर जमा करने का मौखिक दबाव बनाने लगते हैं। समझ से परे है कि चुनाव के समय शस्त्र पास न रहने पर लाइसेंसधारिओं की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित हो जाती है। ऐसा प्रतीत होने लगता है कि पुलिस को अवैध असलहे धारी असामाजिक तत्वों पर तो सिकंजा कसना ही है परन्तु भद्र लोगों को भी चुनाव के समय चैन से नहीं रहने देना है।
*************** जब संहिता पालन की बात राजनीतिक दलों ,चुनाव लड़ रहे प्रत्याशियों एवँ नेताओं पर हो तो आयोग उनसे जूझता दिखता है। चुनाव में प्रत्याशियों के लिए खर्च निर्धारित करना और निगरानी कराना एक बात है परन्तु उसे सुनिश्चित कराना और बात है।सामान्यतया माना जाता है कि पैसे जैसे संसाधन से प्रत्याशी अपनी विचारधारा और जनसेवा के संकल्प को अपने मतदाता तक पहुँचाते हैं ;अतः इस खर्च का हिसाब वे आसानी से आयोग को दे सकते हैं। वस्तुस्थिति इससे विल्कुल इतर है। आज के चुनाव इस अच्छे आचरण वाले परदे के पीछे लड़े जाते हैं जहाँ काले धन का ताण्डव होता है ;मतदाताओं तक पैसे ,प्रलोभन और दावतें पहुँचा कर मत खरीदने का खड्यंत्र होता है। यही नहीं बड़े बड़े असामाजिक तत्व विभिन्न दलों के शीर्ष नेताओं को करोड़ों रूपए का काला धन टिकट केलिए भेंट करते हैं। अब तो मिडिया वाले स्टिंग ऑपरेशन कर ऐसे काले धन्धों का खेल सबको प्रत्यक्ष दिखाने भी लगे हैं।आम आदमी बहुत चिंतित है कि ऐसी बेशर्म ,भ्रष्ट और आचरणहीन राजनीति देश को कहाँ पहुँचाने को उद्यत है।वर्तमान की बहती बयार में भारतीय लोकतंत्र के सामने सबसे ज्वलंत प्रश्न है कि आयोग एक हाथ आचार संहिता लिए और दूजे हाथ प्रशासनिक शक्तियाँ लिए क्या क्या करता है या क्या कर सकता है।
***************चाहे कितनी भी विस्तारित परिचर्चा की जाय सत्य यही है कि आदर्श आचार किसी संहिता से नहीं संस्कारों से उपजता और पलता है। साथ ही यदि चोर सिपाही से शक्तिशाली होगा तो कानून की बेवसी बढ़ती है। आचार संहिता और आयोग की शक्तिओं के साथ कुछ ऐसा ही हो रहा है।आगे इससे भी बड़ा सत्य यह है कि हमारा भारत बदल रहा है। शिक्षा के साथ इलेट्रॉनिक , प्रिंट और सोशल मीडिया ने हमारे समाज में जागरूकता की एक अभूतपूर्व क्रान्ति ला दी है और इसी जन जागरण से चुनावी भ्रष्टाचार का संहार होने भी लगा है।विशेष रूप से नई पीढ़ी के रंगमंच पर उदित होने से राजनितिक भ्रष्टाचार के दिन और तेजी से लदने लगे हैं।सब मिलाकर बदलती हवाएँ शुभ संकेत दे रही हैं कि भविष्य में आचारशील चुनाव आयोग ,आचारशील नेता, आचारशील मतदाता और आचारशील नागरिक अपने भारत को इसके स्वर्णिम युग की ओर अग्रसर करें गे।
***************परन्तु वर्तमान चुनावी परिदृश्य में हर परेशानी से ऊपर उठ कर भारत के प्रत्येक मतदाता का प्रथम दायित्व है कि वह मतदान अवश्य करे और स्वविवेक से सबसे बेहतर प्रत्याशी को मत दे। नदी की धारा को मोड़ने का यही बेहतर तरीका है और इसी प्रकार मतदान द्वारा देश को सुरक्षित हाथों में सौंपा जा सकता है।नए भारत की इसी जनाकांछा की परिणीति का ज्वलन्त उदाहरण आज की भाजपानीत केंद्र सरकार है। वर्तमान चुनाव में भी जनाकांछा उसी भाजपा के मोदी जी पर टिकी हुई है।और यह संभव हुआ था- पिछले चुनाव में मतदान की आँधी से। इस चुनाव में भी ऐसे ही प्रबलतर आँधी की परिस्थितियाँ बन रही हैं। अस्तु हमारी प्रतिबद्धता और शुभकामना हो कि भारत का चुनाव आयोग तथा उसकी घोषित आचार संहिता 2019 चल रहे लोक सभा चुनाव को अच्छे से संपन्न करने में सफल हों और नागरिकों को कोई असुविधा भी न हो।------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- मंगलवीणा
वाराणसी ,चैत्र कृष्ण अमावस्या सँ. 2076
दिनाँक 05 अप्रैल 2019
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अंततः
आइए एक नेता जी से मिलें जो पूर्व में माननीय मंत्री जी रह चुके हैं। हर सीधी उलटी कोशिश के बावजूद किसी जिताऊ पार्टी से सांसदी का टिकट नहीं मिल पा रहा है सो जल बिन मछली की भाँति छटपटा रहे हैं और अपनी व्यथा कुछ यूँ व्यक्त कर रहे हैं।
भाई ! मोहि कुर्सी विसरत नाहिं।
मन डोलत ही इच्छा पूरी ,जादू कुर्सी माहिं।
ढके कुकर्म सभी खादी में ,महामहिम कहलाहिं। भाई ------
दिन जनता दरबार बैठना ,निशा मौज़ क्लब माहिं।
न्याय नियम को फेंक किनारे ,लूटम लूट मचाहिं। भाई ------
बन गाँधी के छद्मी वारिस ,मॉल मलाई खाहिं।
राजा रजवाड़ों से न्यारे , नेता भारत माहिं। भाई --------
गर एक टिकट पुनः मत भारी ,शक्र देइ बरसाहिं।
वहि इन्द्रासन फिर मिल जाए,सुफल जनम होइ जाहिं। भाई ------
-----------------अब उनकी ब्यथा सुन आम आदमी की क्या दशा होगी ;यह विचारणीय है। इति।
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--------------- पुनः सभी सुधी पाठकों एवँ शुभेच्छुओं को चैत्र की नवरात्रि एवँ पावन राम नवमी की शुभ कामनायें। नया विक्रम सँवत वर्ष आप के लिए स्वास्थ्यप्रद ,यशप्रद एवं सुखप्रद हो ;यह हमारी कामना है।------------------------------------------------- --मंगलवीणा
वाराणसी ;चैत्र कृष्ण अमावस्या सँ. 2076 ------------------------ mangal-veena ,blogspot .com
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रविवार, 5 अगस्त 2018
सोशल मिडिया पर प्रवचन -प्रलय
***************बात चौंकने की नहीं ,रंच समय देने व विचार करने की है। वर्षा ऋतु अपनी चढान पर है।पूरे भारत में जल या पानी -प्रलय से हाहाकार मचा हुआ है।समूचे पहाड़ी ,समुद्र तटीय और मैदानी राज्यों में सामान्य जन जीवन अस्त -व्यस्त है। सैकड़ों जनधन,हजारों पशुधन और अरबों की संपत्ति बीते बर्षों की भाँति इस पानी प्रलय को भेंट चढ़ रही हैं।इस प्रलय प्रहार से भारत ही नहीं चीन ,जापान इत्यादि देश भयावह रूप से प्रकोपित हैं।परन्तु यदि थोड़े दिन पहले ही बीते ग्रीष्म की बात करें तो सर्वत्र जल संकट ,गिरते भू जलस्तर और जल संचयन की चर्चा थी।दोनों स्थितियों का मिलान करें तो यही परिणाम मिलता है कि जलवायु और ऋतुएँ हमारे अनुकूल नहीं संचलित हो रही हैं या कि मानव जलवायु या ऋतुओं के विपरीत आचरण कर रहा है जिससे हम प्राकृतिक आपदाओं से आए दिन दो चार हो रहे हैं।आजकल लोग जल प्रलय जैसा ही एक और प्रलय, जिसे प्रवचन प्रलय कह सकते हैं , व्हाट्सप्प ,फेसबुक ,मेसेंजर ,ट्वीटर, टीवी इत्यादि पर, झेल रहे हैं। प्रत्यक्ष तथा परोक्ष मित्रों की मुफ्त वाली शुभेच्छाओं एवँ अन्यार्थी संदेशों ने नाकों दम कर रक्खा है।जो इस प्रवचन प्रलय से मानसिक तौर पर सकुशल बचा रहे ,सच मानिए उसपर ईश्वर की असीम अनुकम्पा है।
***************साधारणतया लोग अपने मित्रों एवँ सम्बन्धियों को आत्मीयता या शुभेच्छा जताने अथवा तत्काल सूचना पहुँच हेतु कविता, प्रवचन ,उद्धरण ,नीति वाक्य ,बधाई,श्रव्य और दृश्य सन्देश इन नए द्रुतगामी माध्यमों से भेजते और प्राप्त करते हैं और आशा भी की जाती है कि विज्ञान प्रदत्त इन माध्यमों से समाज ,संस्कृति ,सभ्यता और जन जीवन की आर्थिक एवँ चारित्रिक जीवन स्तर की बेहतरी होगी। परन्तु व्यवहार में ऐसा नहीं हो रहा है। मनुष्य दोहरा चरित्र जीने की ओर अग्रसर है ;एक तरफ वह सभ्य दिखने के सारे उपक्रम कर रहा है तो दूसरी तरफ उस सभ्यता के तले उसकी असभ्यता हिलोरें मार रही हैं जिससे हमारी स्वच्छ परम्पराओं के टीले एक एक कर ढहते जा रहे हैं। उदहारण के लिए व्हाट्सप्प जैसे सन्देश वाहक मंच पर गौर किया जा सकता है।इस मंच पर रात दिन प्रेषित हो रहे अधिकांश सन्देश मिथ्याचरण की पराकाष्ठा हैं।भ्रामक ,घृणास्पद ,द्वेषकारी ,स्वार्थप्रेरित या अंधविश्वास को बढ़ाने वाले सन्देश; शुभेच्छा के आवरण में इतर उद्देश्यों के साथ; व्हाट्सप्प पर इधर से उधर भेजे जा रहे हैं जो तत्काल वायरल हो कर समाज में दिग्भ्रम की स्थिति उत्पन्न कर रहे हैं। अब तो बात साईबर क्राइम की चल रही है क्योंकि ए माध्यम अपराध के कारण भी बन रहे हैं। तात्पर्यतः मित्रों ,सम्बन्धियों और किसी न किसी के माध्यम से परचित लोगों द्वारा आपसी संपर्क हेतु बनाए गए व्हाट्सएप्प - संजाल में आज अधिकांशतःपर उपदेश कुशल बहुतेरे वाले प्रवचन,धर्मभीरू बनाने वाले उपदेश,अधकचरी शुभेक्षाएँ, अनावश्यक सलाह और भ्रमात्मक सूचनाएँ नदियों की बाढ़ की भाँति आपसी संवाद ,सूचना तथा कुशल क्षेम को रौंद रही हैं।
***************अब आमतौर पर लोगों द्वारा बनाए गए ग्रुप या समूह में कोई भी व्यक्ति श्रृंखलात्मक पहुँच द्वारा समूह के बाहर से ,कहीं से, किसी भी प्रकार का प्रवचन समूह अंदर तक अग्रसारित कर देता है और ए सन्देश बहुत ही ब्यापक स्तर पर जन -जन तक पहुँच जाते हैं। यहाँ तक कि एक ही सन्देश एक व्यक्ति को कई कई बार कई लोगों द्वारा अग्रसारित हो कर मिलता है और हर क्लिक पर वही बात देख या पढ़ कर अजीब सी खीझ होती है। हद तो तब हो जाती है जब धार्मिक प्रताड़न भरे संदेशों की बाढ़ आती है यथा यदि यह संदेश अपने इतने मित्रों को अग्रसारित करें गे तो इनकी क़ृपा होगी अन्यथा यह अनिष्ट हो जाय गा।इसी प्रकार घोर संसारी एवँ गृहस्थ लोग भी प्रवचन भेजने में बड़े बड़े योगी ,ऋषियों ,मुनियों ,दार्शनिकों व सरस्वती साधकों को मात दे रहे हैं। जिन्हे स्वयँ सुधरने की आवश्यकता है वे सोशल मीडिया पर प्रवचन की झड़ी लगा दूसरे को सुधार रहे हैं। नेताओं व अन्य गुरु घण्टालों के लोग उन्हें चमकाने व आगे बढ़ाने के लिए रात दिन अपने प्रवचन धकेल रहे हैं। रही सही कमी व्यवसाय व विज्ञापन वाले पूरा कर दे रहे हैं। अब स्मार्ट फोन ,टीवी और इन्टरनेट पर सकून तलाशने वाला ब्यक्ति इस प्रवचन वाले महा प्रलय से बचे तो बचे कैसे ?
*****************जब लोग इस प्रवचन प्रलय को झेलने को विवश ही हैं तो प्रवचनों के मन्तव्य,पूर्ण सत्य ,अर्ध सत्य और मिथ्य को तर्क की कसौटी पर भी कसना अपरिहार्य हो जाता है क्योंकि दुःख के प्रति समझ का बढ़ना ही दुःख का निवारण है।जहाँ तक मन्तब्य की बात है तो अधिकांश का जुड़ाव स्वार्थ या बाह्याडम्बर ,कुछ का परार्थ एवं नगण्य का परमार्थ(सत्य ) हेतु होता है।अतः अपने सीमित स्वार्थ या आवश्यकता से अधिक हमें सोशल मीडिया पर सक्रिय रहना ही नहीं चाहिए।पुनः आशा तो नहीं है कि प्रवचन प्रेषित करने वाले समझेंगे परन्तु क्षीर नीर भेद तो प्रवाचक बनने से पहले जान लेना चाहिए ही।वह यह है कि हम आप जो भी प्रवचनों की हेरा फेरी करते हैं वे अर्ध सत्य और मिथ्या के बीच के हमारे विचार हैं जो प्रथम दृष्ट्या प्रेषकों को प्रबुद्ध होने एवँ प्राप्तकर्ता को अनुगृहीत होने वाले छल हैं परन्तु तर्क पर वे वहम से ज्यादा कुछ नहीं होते हैं।अतः सोशल मीडिया पर सक्रिय लोगों से अपेक्षा है कि वे न ऐसे भ्रम पालें ,न ऐसे भ्रम भेजें और न ऐसे भ्रम पाएँ।इसी प्रकार सोशल मीडिया पर चहक चहक कर बलात्कार व बलात्कारियों की चर्चा न हो ( यह अच्छा नहीं लगता है।) बल्कि यह बताया जाय कि कितने बलात्कारियों को फाँसी हुई ,कितने को आजीवन कारावास और कितनी जल्दी और कैसे। पुलिस और न्यायपालिका की सफलता की कहानी बताई जाय । बलात्कार पर अपने आप लगाम लग जाएगी।जैसे ही इन माध्यमों का सार्थक उपयोग बढे गा ,प्रवचन प्रलय तिरोहित हो जाय गा और सोशल मीडिया हमारे लिए अमूल्य वरदान सिद्ध होने लगेगी। किसी के उस पल की प्रसन्नता की कल्पना करें जब फेस बुक या व्हाट्सएप्प उसे उसके किसी पुराने बिछड़े मित्र या संबंधी से संपर्क करा देता है। ----------------------------------------------------------------------------------मंगलवीणा
वाराणसी ,दिनाँक :5 अगस्त 2018
mangal-veena.blogspot.com
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अन्ततः
***************बात उन्नीस फरवरी वर्ष २०११ के सांध्य बेला की है जब मैं जीप द्वारा गोरखपुर से वाराणसी आ रहा था। सड़क थोड़ी खाली थी ,सो स्वभाववश चालक ने रफ़्तार भी बढ़ा दिया था। एक व एक हेड लाईट की रोशनी आगे चल रही ट्रक के पश्च भाग पर पड़ी। उस पर लिखे एक उद्धरण ने हमें चौका दिया। काफी देर तक ट्रक के पीछे चलते हुए मैं उस उद्धरण को बार बार पढ़ता रहा। उस दिन की वह घटना मेरे स्मृतिपटल पर अंकित हो गई ।तब ऐसा झटका लगा था कि मेरी दिन भर की थकान ही मिट गई थी। आज भी कभी कभी सोचता हूँ कि यह सत्य है या असत्य या कि अर्ध सत्य।आप भी सोचिये कि क्या ,"विश्वास केवल वहम है और सच्चाई मात्र झूठ। "? क्या कभी ऐसा नहीं लगता की जिस बात की स्थापना विजेता करे वह सत्य और जिसकी स्थापना पराजित करे वह झूठ वरन यह सच कैसे हो सकता है कि नेकी कर जूता खा।अधिक क्या,इन ट्रक वालों की महिमा भी अनन्त है।-------------------------------------------------------------------------------------------------------------- मंगलवीणा
वाराणसी ;श्रावण कृष्ण अष्टमी संवत २०७५
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***************साधारणतया लोग अपने मित्रों एवँ सम्बन्धियों को आत्मीयता या शुभेच्छा जताने अथवा तत्काल सूचना पहुँच हेतु कविता, प्रवचन ,उद्धरण ,नीति वाक्य ,बधाई,श्रव्य और दृश्य सन्देश इन नए द्रुतगामी माध्यमों से भेजते और प्राप्त करते हैं और आशा भी की जाती है कि विज्ञान प्रदत्त इन माध्यमों से समाज ,संस्कृति ,सभ्यता और जन जीवन की आर्थिक एवँ चारित्रिक जीवन स्तर की बेहतरी होगी। परन्तु व्यवहार में ऐसा नहीं हो रहा है। मनुष्य दोहरा चरित्र जीने की ओर अग्रसर है ;एक तरफ वह सभ्य दिखने के सारे उपक्रम कर रहा है तो दूसरी तरफ उस सभ्यता के तले उसकी असभ्यता हिलोरें मार रही हैं जिससे हमारी स्वच्छ परम्पराओं के टीले एक एक कर ढहते जा रहे हैं। उदहारण के लिए व्हाट्सप्प जैसे सन्देश वाहक मंच पर गौर किया जा सकता है।इस मंच पर रात दिन प्रेषित हो रहे अधिकांश सन्देश मिथ्याचरण की पराकाष्ठा हैं।भ्रामक ,घृणास्पद ,द्वेषकारी ,स्वार्थप्रेरित या अंधविश्वास को बढ़ाने वाले सन्देश; शुभेच्छा के आवरण में इतर उद्देश्यों के साथ; व्हाट्सप्प पर इधर से उधर भेजे जा रहे हैं जो तत्काल वायरल हो कर समाज में दिग्भ्रम की स्थिति उत्पन्न कर रहे हैं। अब तो बात साईबर क्राइम की चल रही है क्योंकि ए माध्यम अपराध के कारण भी बन रहे हैं। तात्पर्यतः मित्रों ,सम्बन्धियों और किसी न किसी के माध्यम से परचित लोगों द्वारा आपसी संपर्क हेतु बनाए गए व्हाट्सएप्प - संजाल में आज अधिकांशतःपर उपदेश कुशल बहुतेरे वाले प्रवचन,धर्मभीरू बनाने वाले उपदेश,अधकचरी शुभेक्षाएँ, अनावश्यक सलाह और भ्रमात्मक सूचनाएँ नदियों की बाढ़ की भाँति आपसी संवाद ,सूचना तथा कुशल क्षेम को रौंद रही हैं।
***************अब आमतौर पर लोगों द्वारा बनाए गए ग्रुप या समूह में कोई भी व्यक्ति श्रृंखलात्मक पहुँच द्वारा समूह के बाहर से ,कहीं से, किसी भी प्रकार का प्रवचन समूह अंदर तक अग्रसारित कर देता है और ए सन्देश बहुत ही ब्यापक स्तर पर जन -जन तक पहुँच जाते हैं। यहाँ तक कि एक ही सन्देश एक व्यक्ति को कई कई बार कई लोगों द्वारा अग्रसारित हो कर मिलता है और हर क्लिक पर वही बात देख या पढ़ कर अजीब सी खीझ होती है। हद तो तब हो जाती है जब धार्मिक प्रताड़न भरे संदेशों की बाढ़ आती है यथा यदि यह संदेश अपने इतने मित्रों को अग्रसारित करें गे तो इनकी क़ृपा होगी अन्यथा यह अनिष्ट हो जाय गा।इसी प्रकार घोर संसारी एवँ गृहस्थ लोग भी प्रवचन भेजने में बड़े बड़े योगी ,ऋषियों ,मुनियों ,दार्शनिकों व सरस्वती साधकों को मात दे रहे हैं। जिन्हे स्वयँ सुधरने की आवश्यकता है वे सोशल मीडिया पर प्रवचन की झड़ी लगा दूसरे को सुधार रहे हैं। नेताओं व अन्य गुरु घण्टालों के लोग उन्हें चमकाने व आगे बढ़ाने के लिए रात दिन अपने प्रवचन धकेल रहे हैं। रही सही कमी व्यवसाय व विज्ञापन वाले पूरा कर दे रहे हैं। अब स्मार्ट फोन ,टीवी और इन्टरनेट पर सकून तलाशने वाला ब्यक्ति इस प्रवचन वाले महा प्रलय से बचे तो बचे कैसे ?
*****************जब लोग इस प्रवचन प्रलय को झेलने को विवश ही हैं तो प्रवचनों के मन्तव्य,पूर्ण सत्य ,अर्ध सत्य और मिथ्य को तर्क की कसौटी पर भी कसना अपरिहार्य हो जाता है क्योंकि दुःख के प्रति समझ का बढ़ना ही दुःख का निवारण है।जहाँ तक मन्तब्य की बात है तो अधिकांश का जुड़ाव स्वार्थ या बाह्याडम्बर ,कुछ का परार्थ एवं नगण्य का परमार्थ(सत्य ) हेतु होता है।अतः अपने सीमित स्वार्थ या आवश्यकता से अधिक हमें सोशल मीडिया पर सक्रिय रहना ही नहीं चाहिए।पुनः आशा तो नहीं है कि प्रवचन प्रेषित करने वाले समझेंगे परन्तु क्षीर नीर भेद तो प्रवाचक बनने से पहले जान लेना चाहिए ही।वह यह है कि हम आप जो भी प्रवचनों की हेरा फेरी करते हैं वे अर्ध सत्य और मिथ्या के बीच के हमारे विचार हैं जो प्रथम दृष्ट्या प्रेषकों को प्रबुद्ध होने एवँ प्राप्तकर्ता को अनुगृहीत होने वाले छल हैं परन्तु तर्क पर वे वहम से ज्यादा कुछ नहीं होते हैं।अतः सोशल मीडिया पर सक्रिय लोगों से अपेक्षा है कि वे न ऐसे भ्रम पालें ,न ऐसे भ्रम भेजें और न ऐसे भ्रम पाएँ।इसी प्रकार सोशल मीडिया पर चहक चहक कर बलात्कार व बलात्कारियों की चर्चा न हो ( यह अच्छा नहीं लगता है।) बल्कि यह बताया जाय कि कितने बलात्कारियों को फाँसी हुई ,कितने को आजीवन कारावास और कितनी जल्दी और कैसे। पुलिस और न्यायपालिका की सफलता की कहानी बताई जाय । बलात्कार पर अपने आप लगाम लग जाएगी।जैसे ही इन माध्यमों का सार्थक उपयोग बढे गा ,प्रवचन प्रलय तिरोहित हो जाय गा और सोशल मीडिया हमारे लिए अमूल्य वरदान सिद्ध होने लगेगी। किसी के उस पल की प्रसन्नता की कल्पना करें जब फेस बुक या व्हाट्सएप्प उसे उसके किसी पुराने बिछड़े मित्र या संबंधी से संपर्क करा देता है। ----------------------------------------------------------------------------------मंगलवीणा
वाराणसी ,दिनाँक :5 अगस्त 2018
mangal-veena.blogspot.com
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अन्ततः
***************बात उन्नीस फरवरी वर्ष २०११ के सांध्य बेला की है जब मैं जीप द्वारा गोरखपुर से वाराणसी आ रहा था। सड़क थोड़ी खाली थी ,सो स्वभाववश चालक ने रफ़्तार भी बढ़ा दिया था। एक व एक हेड लाईट की रोशनी आगे चल रही ट्रक के पश्च भाग पर पड़ी। उस पर लिखे एक उद्धरण ने हमें चौका दिया। काफी देर तक ट्रक के पीछे चलते हुए मैं उस उद्धरण को बार बार पढ़ता रहा। उस दिन की वह घटना मेरे स्मृतिपटल पर अंकित हो गई ।तब ऐसा झटका लगा था कि मेरी दिन भर की थकान ही मिट गई थी। आज भी कभी कभी सोचता हूँ कि यह सत्य है या असत्य या कि अर्ध सत्य।आप भी सोचिये कि क्या ,"विश्वास केवल वहम है और सच्चाई मात्र झूठ। "? क्या कभी ऐसा नहीं लगता की जिस बात की स्थापना विजेता करे वह सत्य और जिसकी स्थापना पराजित करे वह झूठ वरन यह सच कैसे हो सकता है कि नेकी कर जूता खा।अधिक क्या,इन ट्रक वालों की महिमा भी अनन्त है।-------------------------------------------------------------------------------------------------------------- मंगलवीणा
वाराणसी ;श्रावण कृष्ण अष्टमी संवत २०७५
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शनिवार, 23 जून 2018
भ्रष्टाचारियों से पिटती नासमझ भाजपा
***************जो भारतीय जनता पार्टी चार वर्ष पूर्व जनाकांछा बन पूरे देश पर छा गई और अगले तीन वर्ष या उत्तर प्रदेश के विगत विधान सभा चुनाव तक अपने उत्कर्ष पर रही ,वह अब बुरी तरह जनाक्रोश का शिकार होने लगी है। जनाक्रोश भी ऐसा की जनता उसे महा भ्रष्टाचारी नेताओं और उनके दलों से पिटवा रही है।किसी संस्कारी ,ईमानदार और राष्ट्रवादी पार्टी से यदि भाजपा पिटती तो ठीक ही होता परन्तु दुर्भाग्य कि यह पार्टी अब बेईमान , भ्रष्टाचारी और राष्ट्रद्रोही दलों से पिट रही है। यदि मारीच को मरना है तो रावण के हाथ मरना तो बद से बदतर होगा।अच्छा होता कि इस काम के लिए भारतीय राजनैतिक क्षितिज पर किसी बेहतर दल का अभ्युदय होता। परन्तु ऐसा हुआ नहीं और जनता प्रबल संकेत देने लगी है कि बस बहुत देख लिया ;अहितकर ईमानदारों से हितकर बेईमान भले।
***************आजकल पत्रकारिता ,सोशल मीडिया ,टीवी एवँ सामान्य जन में यत्र तत्र ,सर्वत्र बीजेपी के विरुद्ध जनमत एवँ विपक्षियों के ध्रुवीकरण की चर्चा है।उपचुनाओं में जहाँ भी ऐसे प्रयोग प्रस्तुत हो रहे हैं ,अधिकांश स्थानों पर भाजपा पिट रही है।शनैः शनैः परिस्थितियाँ कुछ ऐसी बनने लगी हैं कि जनता के लिए किसी गैर भाजपाई को चुनने में गुण दोष नामक पैमाना भी अनावश्यक होता दिख रहा है।बिलकुल साधारण गणित काम कर रही है कि यदि सारे विपक्षी ध्रुवीकृत होकर जनता के सामने आएंगे तो जनता भी भाजपा के विरुद्ध उन्हें विजय श्री का हार पहनाए गी क्योंकि भाजपा से कोई उम्मीद नहीं बची है।सच ही कहा है कि कलियुगे शक्ति संघे। विपक्षियों के लिए यह सूत्र वाक्य निश्चित सफलता की कुँजी सिद्ध हो सकती है। संघ चाहे कुसंघ हो या सुसंघ ;इससे जातियों और उपजातियों में बँटी जनता में कोई अन्तर नहीं पड़ता।भुक्तभोगी जनता ने अनुभव किया है कि कुसंघियों (विपक्षी दलों ) के सत्ता में रहते जो कठिनाइयाँ थीं वे सुसंघियों (भाजपा)के शासन में भी यथावत या उससे बदतर बनी हुई हैं।
***************जब सरकार की लोकप्रियता इतनी तीब्रता से गिर रही हो तब लोकसभा चुनाव पूर्व भाजपा द्वारा जनता से किये गए वादों और उनके पूरा न होने के कारणों पर परिचर्चा सामयिक हो जाती है और इसके लिए कुछ ज्वलंत उदहारण पर्याप्त हो सकते हैं जैसे यदि भ्रष्टाचार की बात करें तो भाजपा ने देश को भ्रष्टाचार मुक्त सरकार देने की बात की थी।लगता है कि उनके लिए इसका तात्पर्य मात्र भ्रष्टाचार मुक्त मंत्री व प्रधान मंत्री देना था। भुक्तभोगी जनता ने तो व्यवहार में यही पाया कि सरकारी तंत्र और बाबू तो जम कर उन्हें अब भी लूट रहे हैं और बिना भय के लूट रहे हैं। फिर मंत्री जी भ्रष्टाचरी नहीं हैं ;से जनता को क्या राहत ?कोई चौराहा ,तिराहा , नुक्कड़ या कार्यालय नहीं जहाँ सरकार के निम्नतम पादन के कर्मचारी ,सिपाही या होमगार्ड जनता को खुलेआम न लूट रहे हों।उनसे ऊपर मध्यम और उच्च पादन पर बैठे बाबुओं की रौबदार लूट का तो कहना ही क्या। ठेकेदारी व्यवस्था से मूलभूत संरचना का त्वरित विस्तार भी बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रहा है। इस लूट के प्रतिफल में कानून के राज की धज्जियाँ उड़ रही हैं।
***************विगत लोकसभा चुनाव पूर्व भाजपा ने यह भी खूब उछाला था कि सत्ता में आने पर वर्षों से जनता व देश को लूट रहे नेता और बाबू सलाखों के पीछे होंगे ;परन्तु ऐसा हुआ नहीं। अब वे ही भाजपा वाले कहते हैं कि यह भ्रष्टाचार निरोधी एजेंसियों एवँ न्यायपालिका का काम है। काले धन पर चर्चा में अब वे विभिन्न देशों के साथ संयुक्त प्रयास की बात करते हैं जो बालू से तेल निकालने जैसा है।जब भी राम मन्दिर या कश्मीर की धारा तीन सौ सत्तर की बात होती है ये कछुए सी रणनीति अपनाते हैं ;कभी गर्दन बाहर तो कभी गर्दन भीतर। यहाँ तक कि मध्यम वर्ग, जिसने इन्हें सत्ता पर बैठाया, उसके लिए कुछ करना तो दूर उलटे उन्हें प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों से वर्ष दर वर्ष निराश करते गए।अरुण जेटली जैसे गैरजमिनी ,अप्रायोगिक और प्रत्याकर्षक नेताओं ने आम जन का ध्यान रखे बिना साल के बाद साल ऐसे ऐसे बजट प्रस्तुत किए कि जनता सोचती कि सोचती रह गई।
***************मँहगाई के मोर्चे पर पर भी पेट्रोल एवँ डीज़ल की बढ़ती कीमतों ने कोढ़ में खाज का काम किया है और घरेलू बाजार में महँगाई का पलीता लगने लगा है।पेट्रोलियम पदार्थों की महँगाई पर सरकार ऐसे मौन है मानो उनका इस गम्भीर समस्या से कोई सरोकार नहीं। शायद भाजपा अपनी यूएसपी ही भूल बैठी है।वर्तमान परिदृश्य जनता को ऐसे कुठाँव मारती जा रही है कि मोह भंग का रंग और पक्का बनता जा रहा है।यह वास्तविकता जन जन तक पहुँच गई है कि भाजपा के प्रधान मंत्री,मुख्य मंत्री तथा उनके मंत्रिमंडल के मंत्री ईमानदार होते हुए भी एक ईमानदार और सक्षम सरकार नहीं दे सकते हैं।पिछले सारे प्रयोग यही इंगित करते हैं कि इन्हें शासन करना आता ही नहीं।
***************ठीक है कि मोदी जी के नेतृत्व में अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में भारत की साख और भूमिका बढ़ी है ;साथ ही एक उभरती अर्थव्यवस्था के रूप में अंतर्राष्ट्रीय साझेदारी भी। विदेशों में बसे भारतीयों को भारतीय होने या कहने में अब गर्व का अनुभव होता है और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में उन्हें बड़े सम्मान से देखा जाने लगा है।बेहतर विदेशी निवेश के लिए वर्तमान सरकार सराहनीय कार्य कर रही है। परन्तु इनसे पूर्ववर्ती सरकारों की भाँति पाकिस्तान रूपी महाव्याधि की कोई प्रभावी दवा इनके पास भी नहीं दिख रही है। दुर्भाग्य है कि पश्चिमी सीमा पर हमारे जवान जान गँवा रहे हैं परन्तु राजनैतिक अनिर्णय के कारण हम बांग्ला देश जैसा इतिहास नहीं रच पा रहे हैं।सरकार पड़ोसी पाकिस्तान से सठ के साथ सठ जैसा तत्कालिक व्यवहार कर रही है परन्तु स्थाई समाधान का कोई अता पता नहीं।कश्मीर मुद्दे पर जनता को भाजपा से बहुत उम्मीद थी जिसपर यह सरकार पाकिस्तान परस्त श्रीमती महबूबा की पीडीपी के साथ मिल वहाँ राज्य सरकार बना कर पानी फेरती दीख रही थी।एक सर्जिकल स्ट्राइक को छोड़ ऐसा कोई चमत्कारी कार्य नहीं हुआ जिसके लिए भाजपा जानी जाती है और वह इतिहास की स्वर्णिम घटनाओं में सम्मिलित हो सके।(देर सही परन्तु दुरुस्त कि भाजपा ने पीडीपी से अपने को अलग कर लिया और कश्मीर में राज्यपाल शासन लागू हो गया। भाजपा के पास अब भी इस क्षति नियंत्रण के लिए पर्याप्त समय है।)
***************इन विपरीत परिस्थितिओं के होते हुए भी पूरी संभावना है कि आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा पुनः विपक्षिओं पर भारी पड़े गी और विपक्षियों को बुरी तरह पीटेगी। इसका सबसे बड़ा कारण प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी का राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उभरा सक्रिय,समर्पित, निष्कलंक एवँ जादुई व्यक्तित्व है जिसकी तुलना में विपक्ष का कोई नेता कहीं ठहरता ही नहीं।उतना ही या सबसे अहं कारण राष्ट्रवाद है जिस पर जनता अन्य दलों की अपेक्षा भाजपा पर सर्वाधिक भरोसा करती है। अन्य कारणों में राममंदिर, धारा तीन सौ सत्तर,समान नागरिक संहिता भी ऐसे मुद्दे हैं जिनपर भाजपा के अतिरिक्त किसी भी विपक्षी दल से देश को कोई उम्मीद नहीं है।आज भारत वर्ष में वास्तविक धर्मनिरपेक्षता की ध्वजावाहक भी मात्र भाजपा ही है जब कि शेष विपक्षी दल धर्मनिरपेक्षता के नाम पर कुछ धर्म और जातियों की तुष्टिकरण पर्याय हैं। जनता विपक्षियों द्वारा सत्ता के बन्दरबाँट से भी सचेत है जिसके चलते भाजपा एक स्वाभाविक चयन है।जाति ,धर्म ,भाषा,परिवारवाद ,भ्रष्टाचार और क्षेत्रियता पर खड़ी पार्टियां सत्ता के लिए एक गठबंधन बना कर चुनाव लड़ पाएं गी ;यह तो गधे को सींग जैसी घटना लगती है।
***************अतएव भाजपा आगामी चुनाव में भी विपक्षी गठबंधन से पिटे गी; यह उन द्वारा देखा जाने वाला दिवा स्वप्न है।इस बीच यदि एक भी ऊपर उल्लिखित मुद्दा भाजपा के पक्ष में क्लिक (खड़क )कर गया तो जनता फिर भाजपा को भारी बहुमत से सर आँखों पर बैठाए गी और परिवारवादी विपक्षी भ्रष्टाचारी पार्टियाँ हमेशा के लिए धराशाई हो जायँगी।ऐसा होने पर संभावना है कि चुनाव बाद भाजपा के सामने एक नए शिष्ट एवँ ईमानदार राष्ट्रीय दल का उदय हो।अन्यथा दूसरी स्थिति में भाजपा कठिनाई से केंद्र में सरकार बना पाए गी।तीसरी स्थिति में भाजपा की लगातार लोक प्रियता घटने पर सत्ता का विपक्षियों में बन्दर बाँट होगा जिससे केंद्र सरकार कमजोर होगी और विभिन्न प्रांतों में क्षेत्रीय क्षत्रप निरंकुशता के साथ केंद्र का हाथ मरोड़े गे। यह स्थिति देश की उभरती अर्थ व्यवस्था एवं अखण्डता के लिए अहितकर होगी। आदर्श और सर्वाधिक संभाव्य स्थिति यही है और होगी कि भाजपा को आगामी लोक सभा चुनाव में जनता बहुमत दे ताकि वह अपने अच्छे वादों को पूरा कर पाए।तब तक कई राज्यों में होने वाले विधान सभा चुनाव इसे शीर्ष चर्चा का विषय बनाये रखें गे।----- मंगलवीणा
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दिनाँक :२४ जून २०१८ ,वाराणसी------------------------- mangal-veena.blogspot.com
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***************आजकल पत्रकारिता ,सोशल मीडिया ,टीवी एवँ सामान्य जन में यत्र तत्र ,सर्वत्र बीजेपी के विरुद्ध जनमत एवँ विपक्षियों के ध्रुवीकरण की चर्चा है।उपचुनाओं में जहाँ भी ऐसे प्रयोग प्रस्तुत हो रहे हैं ,अधिकांश स्थानों पर भाजपा पिट रही है।शनैः शनैः परिस्थितियाँ कुछ ऐसी बनने लगी हैं कि जनता के लिए किसी गैर भाजपाई को चुनने में गुण दोष नामक पैमाना भी अनावश्यक होता दिख रहा है।बिलकुल साधारण गणित काम कर रही है कि यदि सारे विपक्षी ध्रुवीकृत होकर जनता के सामने आएंगे तो जनता भी भाजपा के विरुद्ध उन्हें विजय श्री का हार पहनाए गी क्योंकि भाजपा से कोई उम्मीद नहीं बची है।सच ही कहा है कि कलियुगे शक्ति संघे। विपक्षियों के लिए यह सूत्र वाक्य निश्चित सफलता की कुँजी सिद्ध हो सकती है। संघ चाहे कुसंघ हो या सुसंघ ;इससे जातियों और उपजातियों में बँटी जनता में कोई अन्तर नहीं पड़ता।भुक्तभोगी जनता ने अनुभव किया है कि कुसंघियों (विपक्षी दलों ) के सत्ता में रहते जो कठिनाइयाँ थीं वे सुसंघियों (भाजपा)के शासन में भी यथावत या उससे बदतर बनी हुई हैं।
***************जब सरकार की लोकप्रियता इतनी तीब्रता से गिर रही हो तब लोकसभा चुनाव पूर्व भाजपा द्वारा जनता से किये गए वादों और उनके पूरा न होने के कारणों पर परिचर्चा सामयिक हो जाती है और इसके लिए कुछ ज्वलंत उदहारण पर्याप्त हो सकते हैं जैसे यदि भ्रष्टाचार की बात करें तो भाजपा ने देश को भ्रष्टाचार मुक्त सरकार देने की बात की थी।लगता है कि उनके लिए इसका तात्पर्य मात्र भ्रष्टाचार मुक्त मंत्री व प्रधान मंत्री देना था। भुक्तभोगी जनता ने तो व्यवहार में यही पाया कि सरकारी तंत्र और बाबू तो जम कर उन्हें अब भी लूट रहे हैं और बिना भय के लूट रहे हैं। फिर मंत्री जी भ्रष्टाचरी नहीं हैं ;से जनता को क्या राहत ?कोई चौराहा ,तिराहा , नुक्कड़ या कार्यालय नहीं जहाँ सरकार के निम्नतम पादन के कर्मचारी ,सिपाही या होमगार्ड जनता को खुलेआम न लूट रहे हों।उनसे ऊपर मध्यम और उच्च पादन पर बैठे बाबुओं की रौबदार लूट का तो कहना ही क्या। ठेकेदारी व्यवस्था से मूलभूत संरचना का त्वरित विस्तार भी बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रहा है। इस लूट के प्रतिफल में कानून के राज की धज्जियाँ उड़ रही हैं।
***************विगत लोकसभा चुनाव पूर्व भाजपा ने यह भी खूब उछाला था कि सत्ता में आने पर वर्षों से जनता व देश को लूट रहे नेता और बाबू सलाखों के पीछे होंगे ;परन्तु ऐसा हुआ नहीं। अब वे ही भाजपा वाले कहते हैं कि यह भ्रष्टाचार निरोधी एजेंसियों एवँ न्यायपालिका का काम है। काले धन पर चर्चा में अब वे विभिन्न देशों के साथ संयुक्त प्रयास की बात करते हैं जो बालू से तेल निकालने जैसा है।जब भी राम मन्दिर या कश्मीर की धारा तीन सौ सत्तर की बात होती है ये कछुए सी रणनीति अपनाते हैं ;कभी गर्दन बाहर तो कभी गर्दन भीतर। यहाँ तक कि मध्यम वर्ग, जिसने इन्हें सत्ता पर बैठाया, उसके लिए कुछ करना तो दूर उलटे उन्हें प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों से वर्ष दर वर्ष निराश करते गए।अरुण जेटली जैसे गैरजमिनी ,अप्रायोगिक और प्रत्याकर्षक नेताओं ने आम जन का ध्यान रखे बिना साल के बाद साल ऐसे ऐसे बजट प्रस्तुत किए कि जनता सोचती कि सोचती रह गई।
***************मँहगाई के मोर्चे पर पर भी पेट्रोल एवँ डीज़ल की बढ़ती कीमतों ने कोढ़ में खाज का काम किया है और घरेलू बाजार में महँगाई का पलीता लगने लगा है।पेट्रोलियम पदार्थों की महँगाई पर सरकार ऐसे मौन है मानो उनका इस गम्भीर समस्या से कोई सरोकार नहीं। शायद भाजपा अपनी यूएसपी ही भूल बैठी है।वर्तमान परिदृश्य जनता को ऐसे कुठाँव मारती जा रही है कि मोह भंग का रंग और पक्का बनता जा रहा है।यह वास्तविकता जन जन तक पहुँच गई है कि भाजपा के प्रधान मंत्री,मुख्य मंत्री तथा उनके मंत्रिमंडल के मंत्री ईमानदार होते हुए भी एक ईमानदार और सक्षम सरकार नहीं दे सकते हैं।पिछले सारे प्रयोग यही इंगित करते हैं कि इन्हें शासन करना आता ही नहीं।
***************ठीक है कि मोदी जी के नेतृत्व में अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में भारत की साख और भूमिका बढ़ी है ;साथ ही एक उभरती अर्थव्यवस्था के रूप में अंतर्राष्ट्रीय साझेदारी भी। विदेशों में बसे भारतीयों को भारतीय होने या कहने में अब गर्व का अनुभव होता है और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में उन्हें बड़े सम्मान से देखा जाने लगा है।बेहतर विदेशी निवेश के लिए वर्तमान सरकार सराहनीय कार्य कर रही है। परन्तु इनसे पूर्ववर्ती सरकारों की भाँति पाकिस्तान रूपी महाव्याधि की कोई प्रभावी दवा इनके पास भी नहीं दिख रही है। दुर्भाग्य है कि पश्चिमी सीमा पर हमारे जवान जान गँवा रहे हैं परन्तु राजनैतिक अनिर्णय के कारण हम बांग्ला देश जैसा इतिहास नहीं रच पा रहे हैं।सरकार पड़ोसी पाकिस्तान से सठ के साथ सठ जैसा तत्कालिक व्यवहार कर रही है परन्तु स्थाई समाधान का कोई अता पता नहीं।कश्मीर मुद्दे पर जनता को भाजपा से बहुत उम्मीद थी जिसपर यह सरकार पाकिस्तान परस्त श्रीमती महबूबा की पीडीपी के साथ मिल वहाँ राज्य सरकार बना कर पानी फेरती दीख रही थी।एक सर्जिकल स्ट्राइक को छोड़ ऐसा कोई चमत्कारी कार्य नहीं हुआ जिसके लिए भाजपा जानी जाती है और वह इतिहास की स्वर्णिम घटनाओं में सम्मिलित हो सके।(देर सही परन्तु दुरुस्त कि भाजपा ने पीडीपी से अपने को अलग कर लिया और कश्मीर में राज्यपाल शासन लागू हो गया। भाजपा के पास अब भी इस क्षति नियंत्रण के लिए पर्याप्त समय है।)
***************इन विपरीत परिस्थितिओं के होते हुए भी पूरी संभावना है कि आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा पुनः विपक्षिओं पर भारी पड़े गी और विपक्षियों को बुरी तरह पीटेगी। इसका सबसे बड़ा कारण प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी का राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उभरा सक्रिय,समर्पित, निष्कलंक एवँ जादुई व्यक्तित्व है जिसकी तुलना में विपक्ष का कोई नेता कहीं ठहरता ही नहीं।उतना ही या सबसे अहं कारण राष्ट्रवाद है जिस पर जनता अन्य दलों की अपेक्षा भाजपा पर सर्वाधिक भरोसा करती है। अन्य कारणों में राममंदिर, धारा तीन सौ सत्तर,समान नागरिक संहिता भी ऐसे मुद्दे हैं जिनपर भाजपा के अतिरिक्त किसी भी विपक्षी दल से देश को कोई उम्मीद नहीं है।आज भारत वर्ष में वास्तविक धर्मनिरपेक्षता की ध्वजावाहक भी मात्र भाजपा ही है जब कि शेष विपक्षी दल धर्मनिरपेक्षता के नाम पर कुछ धर्म और जातियों की तुष्टिकरण पर्याय हैं। जनता विपक्षियों द्वारा सत्ता के बन्दरबाँट से भी सचेत है जिसके चलते भाजपा एक स्वाभाविक चयन है।जाति ,धर्म ,भाषा,परिवारवाद ,भ्रष्टाचार और क्षेत्रियता पर खड़ी पार्टियां सत्ता के लिए एक गठबंधन बना कर चुनाव लड़ पाएं गी ;यह तो गधे को सींग जैसी घटना लगती है।
***************अतएव भाजपा आगामी चुनाव में भी विपक्षी गठबंधन से पिटे गी; यह उन द्वारा देखा जाने वाला दिवा स्वप्न है।इस बीच यदि एक भी ऊपर उल्लिखित मुद्दा भाजपा के पक्ष में क्लिक (खड़क )कर गया तो जनता फिर भाजपा को भारी बहुमत से सर आँखों पर बैठाए गी और परिवारवादी विपक्षी भ्रष्टाचारी पार्टियाँ हमेशा के लिए धराशाई हो जायँगी।ऐसा होने पर संभावना है कि चुनाव बाद भाजपा के सामने एक नए शिष्ट एवँ ईमानदार राष्ट्रीय दल का उदय हो।अन्यथा दूसरी स्थिति में भाजपा कठिनाई से केंद्र में सरकार बना पाए गी।तीसरी स्थिति में भाजपा की लगातार लोक प्रियता घटने पर सत्ता का विपक्षियों में बन्दर बाँट होगा जिससे केंद्र सरकार कमजोर होगी और विभिन्न प्रांतों में क्षेत्रीय क्षत्रप निरंकुशता के साथ केंद्र का हाथ मरोड़े गे। यह स्थिति देश की उभरती अर्थ व्यवस्था एवं अखण्डता के लिए अहितकर होगी। आदर्श और सर्वाधिक संभाव्य स्थिति यही है और होगी कि भाजपा को आगामी लोक सभा चुनाव में जनता बहुमत दे ताकि वह अपने अच्छे वादों को पूरा कर पाए।तब तक कई राज्यों में होने वाले विधान सभा चुनाव इसे शीर्ष चर्चा का विषय बनाये रखें गे।----- मंगलवीणा
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दिनाँक :२४ जून २०१८ ,वाराणसी------------------------- mangal-veena.blogspot.com
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रविवार, 13 मई 2018
श्रवणकुमारों ,तुम्हें नमन
***************बीते मदर्स डे के समापन पर करोड़ों भाइयों ,बहनों और बच्चों , जिनके पास माँ हैं ,को यह सौभाग्य बने रहने की शुभ कामनाएँ तथा हजारों भाई बहनों को कोटिशः नमन जो अपने माँ और बाप के लिए तीन सौ पैंसठ दिन श्रवणकुमार की भूमिका में हैं। हमने मात्र हजारों का अंकन इस लिए किया क्योंकि ऐसे देव एवँ देवी तुल्य लोग इस धरा पर दुर्लभ होते जा रहे हैं।
*******************पिछले दिनों व्हाट्सअप तथा फेसबुक पर मदर्स डे के उपलक्ष्य पर सैकड़ों सन्देश मिले।टीवी और समाचार पत्रों ने भी अपनी पहुँच तक सबको व्यापारिक मातृभावना से ओतप्रोत कर दिया। ऐसा लगा कि सतयुग ने भारत भूमि पर दस्तक दे दिया है। पर जब भ्रम से उबरे तथा इनमें से कुछ लोगों के पारिवारिक पटल पर विहंगम दृष्टि डाला तो बड़ी निराशा हाथ आई।काहे के माँ -बाप ;काहे का उत्सव। अपने परिवार के लिए अहर्निश जूझती अधिकांश माताअों को तो इस उत्सव की भनक तक नहीं।यदि भनक है भी इसका उनसे कोई सम्बन्ध नहीं। उनकी पीड़ा तो उनके अंतर्मन में यथावत ही दबी हैं।ऐसे में मदर्स डे पर युग द्रष्टा गोस्वामी जी को भी श्रद्धा सुमन अर्पित करना ही चाहिए जिन्होंने हमारे आचरण का पूर्वानुमान यूँ किया -
-----सुत मानहि मातु पिता तब लौं। अबलानन दीख नहीं जब लौं ।
-----ससुरारि पिआरि लगी जब तें । रिपु रूप कुटुम्ब भए तब तें । रामचरितमानस
****************अंततः विदेश की वह संस्कृति भी वधाई की अधिकारिणी है जिसने माँ के लिए तीन सौ पैंसठ दिनों में कम से कम एक दिन आरक्षित तो किया।अच्छा होता कि मदर्स डे के स्थान पर हर दिन कुछ घण्टों के लिए मदर्स आवर होता।थोड़ी देर केलिए नित्य इनके मुखारविंद पर मृदुल मुस्कान होती और हमारे लिए आशीष वर्षा। मानवता साक्षात् दर्शन पाती कि इस धरती पर कहीं स्वर्ग है तो वह माँ के आँचल तले।
***************काश ऐसा होता। फिर भी जो है उस बीच, हमारी सबसे विनम्र विनती है कि शेष तीन सौ चौंसठ दिनों के लिए माताओं को उनके नियति , सामाजिक परिस्थियों एवँ जिह्वा सेवादारों पर न छोड़ें क्योंकि हमारे अस्तित्व की कर्ता और कारण वहीँ हैं।माँ तुम्हें नमन। इस अवसर पर अपनी स्वर्गीय माता श्री को भी श्रद्धानत निर्मल स्मृति गुच्छ अर्पित करता हूँ।------------------मंगलवीणा
वाराणसी।;दिनाँक 14 मई 2018---------------------- mangal-veena.blogspot.com
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*******************पिछले दिनों व्हाट्सअप तथा फेसबुक पर मदर्स डे के उपलक्ष्य पर सैकड़ों सन्देश मिले।टीवी और समाचार पत्रों ने भी अपनी पहुँच तक सबको व्यापारिक मातृभावना से ओतप्रोत कर दिया। ऐसा लगा कि सतयुग ने भारत भूमि पर दस्तक दे दिया है। पर जब भ्रम से उबरे तथा इनमें से कुछ लोगों के पारिवारिक पटल पर विहंगम दृष्टि डाला तो बड़ी निराशा हाथ आई।काहे के माँ -बाप ;काहे का उत्सव। अपने परिवार के लिए अहर्निश जूझती अधिकांश माताअों को तो इस उत्सव की भनक तक नहीं।यदि भनक है भी इसका उनसे कोई सम्बन्ध नहीं। उनकी पीड़ा तो उनके अंतर्मन में यथावत ही दबी हैं।ऐसे में मदर्स डे पर युग द्रष्टा गोस्वामी जी को भी श्रद्धा सुमन अर्पित करना ही चाहिए जिन्होंने हमारे आचरण का पूर्वानुमान यूँ किया -
-----सुत मानहि मातु पिता तब लौं। अबलानन दीख नहीं जब लौं ।
-----ससुरारि पिआरि लगी जब तें । रिपु रूप कुटुम्ब भए तब तें । रामचरितमानस
****************अंततः विदेश की वह संस्कृति भी वधाई की अधिकारिणी है जिसने माँ के लिए तीन सौ पैंसठ दिनों में कम से कम एक दिन आरक्षित तो किया।अच्छा होता कि मदर्स डे के स्थान पर हर दिन कुछ घण्टों के लिए मदर्स आवर होता।थोड़ी देर केलिए नित्य इनके मुखारविंद पर मृदुल मुस्कान होती और हमारे लिए आशीष वर्षा। मानवता साक्षात् दर्शन पाती कि इस धरती पर कहीं स्वर्ग है तो वह माँ के आँचल तले।
***************काश ऐसा होता। फिर भी जो है उस बीच, हमारी सबसे विनम्र विनती है कि शेष तीन सौ चौंसठ दिनों के लिए माताओं को उनके नियति , सामाजिक परिस्थियों एवँ जिह्वा सेवादारों पर न छोड़ें क्योंकि हमारे अस्तित्व की कर्ता और कारण वहीँ हैं।माँ तुम्हें नमन। इस अवसर पर अपनी स्वर्गीय माता श्री को भी श्रद्धानत निर्मल स्मृति गुच्छ अर्पित करता हूँ।------------------मंगलवीणा
वाराणसी।;दिनाँक 14 मई 2018---------------------- mangal-veena.blogspot.com
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सोमवार, 16 अप्रैल 2018
बजट ,तूँ मारेसि मोहि कुठाँव
***************हमारे देश में निम्न मध्यम आय वाले नौकरी पेशेवर बेहद तन्मयता से बजट की प्रतीक्षा करते हैं , उनकी वैसी तन्मयता शायद ही किसी अन्य वस्तु की चाहत में दिखती है। देश में एक और महत्वपूर्ण वर्ग है जो कुछ ऐसे ही या यूँ कहें कि प्यासे चकोर की भाँति केंद्रीय बजट की बाट जोहता है और वह है मध्यम आय वाली महिलाओं का वर्ग।केंद्रीय सत्ता में बैठा कोई भी योजनाकार यदि इन दोनों वर्ग की पीड़ा को नहीं जानता या जानते हुए उनकी उपेक्षा करता है तो मानिए कि वह हिंदुस्तान को नहीं जानता या उसे प्रफुल्लित नहीं देखना चाहता।आशा तो नहीं थी कि मोदी युग में ऐसा होगा परन्तु दुर्भाग्य कि ऐसा ही हो रहा है।इस वर्ष के केंद्रीय बजट द्वारा वित्त मंत्री ने फिर परिलक्षित कर दिया है कि इनके शोषण पर ही हमारा लोकतंत्र खड़ा है।रोटी ,कपड़ा, मकान , महँगाई ,शिक्षा ,स्वास्थ्य,सुरक्षा,भ्रष्टाचार,राजस्व व राजतन्त्र सभी इनका बेहिचक शोषण कर रहे हैं।आर्थिक तथा सामाजिक लाभ मे अहर्निश हमारे देश में अनुसूचितों और पिछड़ों की बात होती है ,लुटेरे अमीरों की बात होती है,देश को वर्वाद करने वाले निरंकुश नेताओं के विशेषाधिकार व आय बढ़ोत्तरी की बात होती है परन्तु दो पाटन के बीच पिसती इन खालिस वासिंदों की कहीं गिनती नहीं।इन्हें मात्र श्रोत और साधन माना जाता है।
***************आज करोड़ों कर्मचारी परिवारों के साथ साथ मध्यम आय वर्ग की महिलाएँ भी ठगी सी निहार रही हैं कि उनके सपनों की सरकार को किसकी बुरी नजर लग गई।उन्हें तो बताया गया था कि जीएसटी के बाद रोजमर्रा उपयोग की जींस सस्ती हो जाँय गी परन्तु हुआ ठीक उसका उलट।बताया गया था कि बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य तक सबकी सहनीय पहुँच सुनिश्चित की जाय गी परन्तु ये दोनों ही आवश्यकताएँ दुष्प्राप्य एवँ दिवालिया बनाने वाली सिद्ध हो रही हैं।इस वर्ग पर तीसरी सर्वाधिक प्रभाव डालने वाली वस्तु पेट्रोलियम एवँ पेट्रोलियम उत्पाद की तो पूछिए मत जिनकी कीमतें सरकारें मनमाने ढंग से बढ़ा रही हैं और अब वे आसमान से बातें कर रही हैं।आमदनी की बात हो तो सातवें वेतन आयोग की सस्तुतियाँ न तो समय सापेक्ष उनकी चाहत के अनुरूप आईं न कर्मचारी संगठनों की माँग पर सरकार गम्भीर हुई। इस निराशा और बढ़ती बेरोजगारी का परोक्ष प्रभाव निजी क्षेत्र में काम करने वाले पेशेवरों पर भी पड़ा जिससे उनकी वेतन बढ़ोत्तरी पर बुरा प्रभाव पड़ा है;ऊपर से आयकर की क्रूर कैंची साल दर साल उनकी आय को कतरती जा रही है।भ्रष्टाचार मिटाने की पुरजोर शंखध्वनि हुई थी परन्तु आकण्ठ भ्रष्टाचार में डूबी संस्थाएँ व व्यवस्था पहले से ज्यादा पल्लवित ,पुष्पित हो रही हैं और इस बड़े उपभोक्ता वर्ग को अपनी आय का कुछ अंश यदा कदा रिश्वत मद में भी ब्यय करने केलिए विवश कर रही हैं।इस प्रकार मध्यम वर्ग की घटती क्षमता और उनपर बढ़ते बोझ का सरकार द्वारा आकलन और समायोजन न कर पाना भविष्य में गम्भीर सामाजिक समस्याओं को जन्म दे सकता है।
*************** सरकारों के राजस्व में सर्वाधिक योगदान इसी वर्ग का है। फिर सरकार के ध्यान पर भी इसी वर्ग का सर्वाधिक हक़ बनता है। परन्तु सरकारों का कृतित्व अक्षरशः इसके विपरीत है।प्रत्यक्ष प्रमाण के रूप में चालू वित्त वर्ष के लिए केन्द्र सरकार के आय व्यय विवरण का अनुशीलन पर्याप्त है।उदहारण चाहिए तो सरकार की राष्ट्रीय स्वास्थ्य संरक्षण योजना पर ध्यान दिया जा सकता है।सरकार पचास करोड़ गरीब लोगों को पाँच लाख प्रति परिवार स्वास्थ्य बीमा देने जा रही है।अब इनसे कौन पूछे कि मध्यम वर्ग को क्यों नहीं ?क्या वित्त मन्त्री इतना अनभिज्ञ हो सकते हैं कि उन्हें ज्ञात न हो कि एक मध्यम वर्ग का परिवार किसी बीमारी पर पाँच लाख रुपये खर्च करने के बाद निम्न आय वर्ग में फिसल सकता है।अतः उन्हें भी ऐसी सुविधाएं मिलती रहें जो कम से कम उन्हें मध्यम वर्ग में बनाए रखें।बजट व योजना वही बने जिससे सबका लाभ और विकास हो परन्तु राम राज्य की बातें करने वाले उसे धरातल पर उतारने के लिए कुछ भी करते हुए नहीं दीख रहे हैं।रामराज्य का निदेश है ---
_______________मुखिया मुख सो चाहिए खान पान कहुँ एक ।
______________पालइ पोषइ सकल अँग तुलसी सहित बिबेक ।
____राजधरम सरबसु एतनोई। जिमि मन माहँ मनोरथ गोई।(रामचरितमानस )
फिर क्यों न ऐसी धारणा बने कि सरकार सकल अंग का तात्पर्य सांसद ,विधायक ,गरीब ,निम्न वर्ग ,आरक्षित वर्ग ही समझती है और इसके लिए ये लोग ही साध्य हैं ;शेष मध्यम वर्ग के लोग साधन।
***************कमियों को उजागर करना यदि लेखन दायित्व है तो उन कमियों को दूर करने के लिए व्यक्तिगत सुझाव देना भी वांछनीय लेखन धर्म।उदाहरण पर उतरें तो चुनाव के समय जिन भ्रष्टाचारी नेताओं को नित्य याद किया जाता था ,उन्हें कारागारों में पहुँच जाना चाहिए था।विदेशों में छिपाया धन देश वापस लाना चाहिए था और उसकी त्रैमासिक प्रगति दरबार -ए -आम में नियमित पढ़ी जानी चाहिए थी। प्रचारित किया गया था कि जी एस टी से रोजमर्रा उपयोग की चीजें सस्ती होंगी तो बजट में परिलक्षित होना चाहिए था और धरातल पर ऐसा ही दिखना चाहिए था।पेट्रोलियम पदार्थों को जी एस टी से बाहर रखने से तो सरकार की नीयत ही कठघरे में खड़ी हो गई है क्योंकि यही एक वस्तु है जो सस्ती होने पर सस्ताई और महँगी होने पर पूरे अर्थ व्यवस्था में महँगाई लाती है।इसकी कीमतें नियंत्रित कर रसोई घरों की रौनक बढ़ाई जा सकती थी। देश और अपनी पार्टी की भलाई चाहने वाली सरकार को अब भी चाहिए कि वचनवद्धता एवँ पारदर्शिता को अविलम्ब पुनः गले का हार बना ले।दिशा निर्देशों के बल पर सांसद और विधायक चाहे माननीय कहला लें या संवैधानिक शक्तियों से अपना वेतन भत्ता कल्पना की हद से परे तक बढ़ा लें , आम लोग इन्हें अनुज्ञाप्राप्त लुटेरा , अति निंदनीय प्राणी और योग्यता की कसौटी पर सरकारी ढांचे के न्यूनतम वेतन के लिए भी अयोग्य मानते हैं। अतः आम आदमी से जुटाए राजस्व को इनके ऊपर इस हद तक लुटाना जनता को बहुत चुभने लगा है। इस विषय पर युवा भारत की सोच को सांसद वरुण गाँधी ने आवाज देने का प्रयास किया परन्तु इन सर्व शक्तिमान लोगों को लूट पर मुहर लगवाने से वे नहीं रोक पाए।भारतीय संविधान आम आदमी के सब्र को ऐसे कब तक बाँध रखे गा; यह भारत भाग्य विधाता ही जानें।हमें भी पता है ,सरकार को भी पता है कि आज पाँच लाख रुपये वार्षिक आय से एक परिवार का पालन पोषण कितना दुष्कर है फिर भी ऐसे लोगों को आयकर में घसीटा जा रहा है। आवश्यकता थी कि उन्हें इस बन्धन से मुक्त किया जाता और दस लाख की सीमा तक कर देयता दस प्रतिशत कर दी गई होती।सबके साथ सामान व्यवहार के आधार पर कृषि क्षेत्र को कर के दायरे में लाना चाहिए था।सर्वोपरि बात है कि हम सभी भारतीय कर देते हैं। अतः सभी का सरकारी सुविधाओं पर यथेष्ठ अधिकार है और वह हमें मिलना ही चाहिए।बहुत हो चुका असमान वितरण। अब नहीं चले गा।
***************वर्ष दो हजार चौदह में हुए लोकसभा चुनाव की पूरी दुनियाँ साक्षी बनी जब हमारे देश में शासन की राष्ट्रपति प्रणाली न होने पर भी यह चुनाव हूबहू वैसे ही श्री नरेंद्र मोदी के लिए लड़ा गया और भाजपा अच्छी खासी बहुमत के साथ श्री मोदी जी नेतृत्व में सत्तारूढ़ हुई। जन जन ने उनके 'सबका साथ ,सबका विकास 'पर विश्वास किया। परन्तु जैसे जैसे समय बीतता गया, सरकार अपने वादों से दूरतर होती पाई गई।सरकार नित्य नए विचार व क्रियान्वयन के साथ जनता के बीच आती रही और चुनावी वादे व उनके क्रियान्वयन पीछे छूटते रहे। मोदी जी उत्तम किस्म के राजनीतिज्ञ होते हुए भी उसी प्रकार आधारहीन चाटुकार नेताओं से घिर गए जैसे कभी कांग्रेस का नेतृत्व घिरा रहता था। यदि मोदी जी जन धन की चौकीदारी ही सुनिश्चित कर दिए होते तो उन्हें आमजन को कुठाँव न मारना पड़ता।निःसंदेह जनता में अब भी मोदी जी की लोकप्रियता किसी भी अन्य नेता से अधिक बनी हुई है और सरकारी गाड़ियों से अति विशिष्ठता दर्शाने वाली लाल- नीली बत्ती पर प्रतिबंध या स्वच्छता अभियान की भूरि भूरि प्रसंशा भी हुई है परन्तु यह तय है कि जनता आगामी चुनाव के समय उनसे सबके विकास ,चौकीदारी ,काले धन ,भ्रष्टाचार ,पारदर्शिता ,खुशहाली सूचकांक , स्वच्छ प्रशासन ,धारा तीन सौ सत्तर ,राम मन्दिर ,रोजगार इत्यादि पर प्रगति आख्या माँगे गी।यह और रोचक होगा जब माननीयों की आर्थिक दीनता की चर्चा होगी क्योंकि सरकार की दृष्टि में वे ही गाँधी जी द्वारा रेखांकित पंक्ति में सबसे पीछे खड़े नजर आए हैं।सरकार के लिए गंभीर सोच का विषय है कि जिनसे देश बनता है ,समाज बनता है ,संस्कृति बनती है और सरकारें बनती हैं उनके साथ कैसा व्यवहार होना चाहिए। आज मध्यम वर्ग आर्थिक चोट से घायल है और मोदी जी से निराश।------------------------------------------------------------------------------------------------------------मंगलवीणा
वाराणसी ;दिनाँक 16 अप्रैल 2018. mangal-veena.blogspot.com
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अंततःऋतु चर्चा
बसन्त को परास्त कर ग्रीष्म ऋतु ने अपने आगमन की भेरी बजवा दी है। भूमि जलस्तर, जलसंरक्षण,वृक्ष लगाओ ,वृक्ष बचाओ ,पर्यावरण इत्यादि पर कागजी और मीडिया वाली मौखिक परिचर्चाएँ भी प्रारम्भ हो चुकी हैं। इस बीच संयुक्त राज्य अमेरिका में कार्यरत मेरे जेष्ठ बेटे ने चार अप्रैल को व्हाट्सएप्प पर एक बड़ा ही मर्मभेदी सन्देश भेजा जिसे मैं प्रासंगिकतावश आप सभी के अनुशीलन हेतु प्रस्तुत कर रहा हूँ। कृपया देखें ," आम ,नीम ,पीपल और बरगद के पेड़ काटकर घर में मनी प्लांट लगाने वाले बुद्धिजीवियों को भीषण गर्मी की शुभ कामना। "और फिर भारतेन्दु जी की इन पंक्तियों को गुनगुनायें ,"हम क्या थे ,क्या हो गए और क्या होंगे अभी ?
ग्रीष्म सबके लिए मंगलमय हो। इस शुभेच्छा के साथ ---------------------------------मंगलवीणा
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***************आज करोड़ों कर्मचारी परिवारों के साथ साथ मध्यम आय वर्ग की महिलाएँ भी ठगी सी निहार रही हैं कि उनके सपनों की सरकार को किसकी बुरी नजर लग गई।उन्हें तो बताया गया था कि जीएसटी के बाद रोजमर्रा उपयोग की जींस सस्ती हो जाँय गी परन्तु हुआ ठीक उसका उलट।बताया गया था कि बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य तक सबकी सहनीय पहुँच सुनिश्चित की जाय गी परन्तु ये दोनों ही आवश्यकताएँ दुष्प्राप्य एवँ दिवालिया बनाने वाली सिद्ध हो रही हैं।इस वर्ग पर तीसरी सर्वाधिक प्रभाव डालने वाली वस्तु पेट्रोलियम एवँ पेट्रोलियम उत्पाद की तो पूछिए मत जिनकी कीमतें सरकारें मनमाने ढंग से बढ़ा रही हैं और अब वे आसमान से बातें कर रही हैं।आमदनी की बात हो तो सातवें वेतन आयोग की सस्तुतियाँ न तो समय सापेक्ष उनकी चाहत के अनुरूप आईं न कर्मचारी संगठनों की माँग पर सरकार गम्भीर हुई। इस निराशा और बढ़ती बेरोजगारी का परोक्ष प्रभाव निजी क्षेत्र में काम करने वाले पेशेवरों पर भी पड़ा जिससे उनकी वेतन बढ़ोत्तरी पर बुरा प्रभाव पड़ा है;ऊपर से आयकर की क्रूर कैंची साल दर साल उनकी आय को कतरती जा रही है।भ्रष्टाचार मिटाने की पुरजोर शंखध्वनि हुई थी परन्तु आकण्ठ भ्रष्टाचार में डूबी संस्थाएँ व व्यवस्था पहले से ज्यादा पल्लवित ,पुष्पित हो रही हैं और इस बड़े उपभोक्ता वर्ग को अपनी आय का कुछ अंश यदा कदा रिश्वत मद में भी ब्यय करने केलिए विवश कर रही हैं।इस प्रकार मध्यम वर्ग की घटती क्षमता और उनपर बढ़ते बोझ का सरकार द्वारा आकलन और समायोजन न कर पाना भविष्य में गम्भीर सामाजिक समस्याओं को जन्म दे सकता है।
*************** सरकारों के राजस्व में सर्वाधिक योगदान इसी वर्ग का है। फिर सरकार के ध्यान पर भी इसी वर्ग का सर्वाधिक हक़ बनता है। परन्तु सरकारों का कृतित्व अक्षरशः इसके विपरीत है।प्रत्यक्ष प्रमाण के रूप में चालू वित्त वर्ष के लिए केन्द्र सरकार के आय व्यय विवरण का अनुशीलन पर्याप्त है।उदहारण चाहिए तो सरकार की राष्ट्रीय स्वास्थ्य संरक्षण योजना पर ध्यान दिया जा सकता है।सरकार पचास करोड़ गरीब लोगों को पाँच लाख प्रति परिवार स्वास्थ्य बीमा देने जा रही है।अब इनसे कौन पूछे कि मध्यम वर्ग को क्यों नहीं ?क्या वित्त मन्त्री इतना अनभिज्ञ हो सकते हैं कि उन्हें ज्ञात न हो कि एक मध्यम वर्ग का परिवार किसी बीमारी पर पाँच लाख रुपये खर्च करने के बाद निम्न आय वर्ग में फिसल सकता है।अतः उन्हें भी ऐसी सुविधाएं मिलती रहें जो कम से कम उन्हें मध्यम वर्ग में बनाए रखें।बजट व योजना वही बने जिससे सबका लाभ और विकास हो परन्तु राम राज्य की बातें करने वाले उसे धरातल पर उतारने के लिए कुछ भी करते हुए नहीं दीख रहे हैं।रामराज्य का निदेश है ---
_______________मुखिया मुख सो चाहिए खान पान कहुँ एक ।
______________पालइ पोषइ सकल अँग तुलसी सहित बिबेक ।
____राजधरम सरबसु एतनोई। जिमि मन माहँ मनोरथ गोई।(रामचरितमानस )
फिर क्यों न ऐसी धारणा बने कि सरकार सकल अंग का तात्पर्य सांसद ,विधायक ,गरीब ,निम्न वर्ग ,आरक्षित वर्ग ही समझती है और इसके लिए ये लोग ही साध्य हैं ;शेष मध्यम वर्ग के लोग साधन।
***************कमियों को उजागर करना यदि लेखन दायित्व है तो उन कमियों को दूर करने के लिए व्यक्तिगत सुझाव देना भी वांछनीय लेखन धर्म।उदाहरण पर उतरें तो चुनाव के समय जिन भ्रष्टाचारी नेताओं को नित्य याद किया जाता था ,उन्हें कारागारों में पहुँच जाना चाहिए था।विदेशों में छिपाया धन देश वापस लाना चाहिए था और उसकी त्रैमासिक प्रगति दरबार -ए -आम में नियमित पढ़ी जानी चाहिए थी। प्रचारित किया गया था कि जी एस टी से रोजमर्रा उपयोग की चीजें सस्ती होंगी तो बजट में परिलक्षित होना चाहिए था और धरातल पर ऐसा ही दिखना चाहिए था।पेट्रोलियम पदार्थों को जी एस टी से बाहर रखने से तो सरकार की नीयत ही कठघरे में खड़ी हो गई है क्योंकि यही एक वस्तु है जो सस्ती होने पर सस्ताई और महँगी होने पर पूरे अर्थ व्यवस्था में महँगाई लाती है।इसकी कीमतें नियंत्रित कर रसोई घरों की रौनक बढ़ाई जा सकती थी। देश और अपनी पार्टी की भलाई चाहने वाली सरकार को अब भी चाहिए कि वचनवद्धता एवँ पारदर्शिता को अविलम्ब पुनः गले का हार बना ले।दिशा निर्देशों के बल पर सांसद और विधायक चाहे माननीय कहला लें या संवैधानिक शक्तियों से अपना वेतन भत्ता कल्पना की हद से परे तक बढ़ा लें , आम लोग इन्हें अनुज्ञाप्राप्त लुटेरा , अति निंदनीय प्राणी और योग्यता की कसौटी पर सरकारी ढांचे के न्यूनतम वेतन के लिए भी अयोग्य मानते हैं। अतः आम आदमी से जुटाए राजस्व को इनके ऊपर इस हद तक लुटाना जनता को बहुत चुभने लगा है। इस विषय पर युवा भारत की सोच को सांसद वरुण गाँधी ने आवाज देने का प्रयास किया परन्तु इन सर्व शक्तिमान लोगों को लूट पर मुहर लगवाने से वे नहीं रोक पाए।भारतीय संविधान आम आदमी के सब्र को ऐसे कब तक बाँध रखे गा; यह भारत भाग्य विधाता ही जानें।हमें भी पता है ,सरकार को भी पता है कि आज पाँच लाख रुपये वार्षिक आय से एक परिवार का पालन पोषण कितना दुष्कर है फिर भी ऐसे लोगों को आयकर में घसीटा जा रहा है। आवश्यकता थी कि उन्हें इस बन्धन से मुक्त किया जाता और दस लाख की सीमा तक कर देयता दस प्रतिशत कर दी गई होती।सबके साथ सामान व्यवहार के आधार पर कृषि क्षेत्र को कर के दायरे में लाना चाहिए था।सर्वोपरि बात है कि हम सभी भारतीय कर देते हैं। अतः सभी का सरकारी सुविधाओं पर यथेष्ठ अधिकार है और वह हमें मिलना ही चाहिए।बहुत हो चुका असमान वितरण। अब नहीं चले गा।
***************वर्ष दो हजार चौदह में हुए लोकसभा चुनाव की पूरी दुनियाँ साक्षी बनी जब हमारे देश में शासन की राष्ट्रपति प्रणाली न होने पर भी यह चुनाव हूबहू वैसे ही श्री नरेंद्र मोदी के लिए लड़ा गया और भाजपा अच्छी खासी बहुमत के साथ श्री मोदी जी नेतृत्व में सत्तारूढ़ हुई। जन जन ने उनके 'सबका साथ ,सबका विकास 'पर विश्वास किया। परन्तु जैसे जैसे समय बीतता गया, सरकार अपने वादों से दूरतर होती पाई गई।सरकार नित्य नए विचार व क्रियान्वयन के साथ जनता के बीच आती रही और चुनावी वादे व उनके क्रियान्वयन पीछे छूटते रहे। मोदी जी उत्तम किस्म के राजनीतिज्ञ होते हुए भी उसी प्रकार आधारहीन चाटुकार नेताओं से घिर गए जैसे कभी कांग्रेस का नेतृत्व घिरा रहता था। यदि मोदी जी जन धन की चौकीदारी ही सुनिश्चित कर दिए होते तो उन्हें आमजन को कुठाँव न मारना पड़ता।निःसंदेह जनता में अब भी मोदी जी की लोकप्रियता किसी भी अन्य नेता से अधिक बनी हुई है और सरकारी गाड़ियों से अति विशिष्ठता दर्शाने वाली लाल- नीली बत्ती पर प्रतिबंध या स्वच्छता अभियान की भूरि भूरि प्रसंशा भी हुई है परन्तु यह तय है कि जनता आगामी चुनाव के समय उनसे सबके विकास ,चौकीदारी ,काले धन ,भ्रष्टाचार ,पारदर्शिता ,खुशहाली सूचकांक , स्वच्छ प्रशासन ,धारा तीन सौ सत्तर ,राम मन्दिर ,रोजगार इत्यादि पर प्रगति आख्या माँगे गी।यह और रोचक होगा जब माननीयों की आर्थिक दीनता की चर्चा होगी क्योंकि सरकार की दृष्टि में वे ही गाँधी जी द्वारा रेखांकित पंक्ति में सबसे पीछे खड़े नजर आए हैं।सरकार के लिए गंभीर सोच का विषय है कि जिनसे देश बनता है ,समाज बनता है ,संस्कृति बनती है और सरकारें बनती हैं उनके साथ कैसा व्यवहार होना चाहिए। आज मध्यम वर्ग आर्थिक चोट से घायल है और मोदी जी से निराश।------------------------------------------------------------------------------------------------------------मंगलवीणा
वाराणसी ;दिनाँक 16 अप्रैल 2018. mangal-veena.blogspot.com
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अंततःऋतु चर्चा
बसन्त को परास्त कर ग्रीष्म ऋतु ने अपने आगमन की भेरी बजवा दी है। भूमि जलस्तर, जलसंरक्षण,वृक्ष लगाओ ,वृक्ष बचाओ ,पर्यावरण इत्यादि पर कागजी और मीडिया वाली मौखिक परिचर्चाएँ भी प्रारम्भ हो चुकी हैं। इस बीच संयुक्त राज्य अमेरिका में कार्यरत मेरे जेष्ठ बेटे ने चार अप्रैल को व्हाट्सएप्प पर एक बड़ा ही मर्मभेदी सन्देश भेजा जिसे मैं प्रासंगिकतावश आप सभी के अनुशीलन हेतु प्रस्तुत कर रहा हूँ। कृपया देखें ," आम ,नीम ,पीपल और बरगद के पेड़ काटकर घर में मनी प्लांट लगाने वाले बुद्धिजीवियों को भीषण गर्मी की शुभ कामना। "और फिर भारतेन्दु जी की इन पंक्तियों को गुनगुनायें ,"हम क्या थे ,क्या हो गए और क्या होंगे अभी ?
ग्रीष्म सबके लिए मंगलमय हो। इस शुभेच्छा के साथ ---------------------------------मंगलवीणा
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बुधवार, 7 मार्च 2018
महिला दिवस
महिला दिवस ,आठ मार्च 2018
***************महिला का प्रथम नाम शक्ति ,दूसरा महिला नारी वुमन ,तीसरा अबला इत्यादि व चौथा आधुनिक अनेक नाम हैं जो आज के चलचित्रों व टीवी के कार्यक्रमों में दिखाई दे रहे हैं।यह भी निर्विवाद है कि हमारे सामाजिक ताने -बाने में शक्ति का सन्तुलन सदैव महिलाओं के पक्ष में रहा है परन्तु इस शक्ति का महिला समाज में समान वितरण नहीं रहा है।इसी कारण महिला के अनेक उचित, अनुचित पर्याय बनते गए। क्या यह सच नहीं है कि महिलाओं के कुछ रूप, शक्ति सम्पन्नता के कारण, स्वामिनी जैसे हो जाते हैं तो कुछ ,शक्ति विपन्नता के कारण, दासी जैसे। गौर करने के लिए सास -बहू ,सधवा -विधवा ,मालकिन -धाय ,कुल बधू -नगर बधू के उदहारण पर्याप्त होंगे।आप हमेशा भाई चारा की बात सुनते होंगे परन्तु महिलाओं में बहिनत्व या बहिन चारे की बात कभी नहीं। कभी सपने में सुन भी लिए होंगे तो देखना तो गधे की सींग जैसी घटना होगी।
***************महिला दिवस पर महिलाओं को एक दूसरे को शक्ति के समतल पर लाने का प्रण करना चाहिए और बहिनत्व का नारा बुलन्द करना चाहिए। सच ही कहा गया है कि हम बदलें गे --युग बदले गा।जहाँ तक पुरुष की बात है ,वह महिला की संस्कारशाला से ही निकला उन्ही के साथ उन्हीं के लिए व्यवस्थाधीन जीने वाला प्राणी है और यदि कभी कोई पुरुष महिलाओं के साथ अभद्र होता है तो फिर ध्यान संस्कार की ओर ही जाता है।हाँ , पुरुषों का परम कर्तव्य है कि वह महिलाओं में श्रद्धा भाव सदैव व प्रति पल रखे। छायावादी महा रचनाकार स्व जय शंकर प्रसाद जी ने भी कामायनी में यही कहा है कि ----
नारी तुम केवल श्रद्धा हो ही,
विश्वास रजत नग पद तल में।
पियूष श्रोत सी बहा करो,
जीवन के सुन्दर समतल में।
***************आज महिलाओं को ध्यान देना होगा कि वे न तो अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी बनें और न ही तू चीज बड़ी है -- बनें।उन्हें अपनी प्रगति के वर्तमान दौर में उपभोक्तावाद संस्कृति से सावधान रहते हुए अपनी गरिमा बनाए रखना होगा।श्रद्धा के लिए आचरण की योग्यता रखना महिलाओं का सर्वोपरि दायित्व है। यदि महिलाओं में यह योग्यता नहीं होगी तो वे आज की अपसंस्कृति की शिकार होती रहें गी। अतः आदरणीया या श्रद्ध्येया को सत्यशः आदरणीया या श्रद्ध्येया ही बने रहना चाहिए।
***************यद्यपि आज महिलाएं जीवन के हर क्षेत्र जैसे विज्ञान ,अंतरिक्ष ,कला ,साहित्य ,शिक्षा ,खेलकूद ,राजनीति ,नौकरी ,उद्यमिता इत्यादि में आसमान छूने छूने लगी हैं ;फिर भी उनकी सहभागिता सँख्या ऊँट के मुँह में जीरा जैसी ही है। समाज अपवाद की उन्नति से नहीं बनता है, समाज सामान्य की उन्नति से बनता है और यह तभी सम्भव होगा जब महिलाएं स्वयँ बढे गी और बहिनत्व भाव से अन्य महिलाओं को आगे बढ़ाएं गी।नारी शक्ति के प्रति श्रद्धा भाव जताते हुए आज हम उन्हें उनकी शक्ति का सादर स्मरण कराते हैं। ----- मंगलवीणा
वाराणसी ;दिनाँक 08 . 03 . 2018
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अपनी बात भी -
***************वर्षों से आज का दिन मेरे लिए तो अविस्मरणीय रहा है क्योंकि तैंतालीस वर्ष पूर्व सन 1975 में आज के दिन ही मैं अपनी पत्नी वीणा सिंह के साथ परिणय सूत्र में बँधा था। जीवन में इस संयोग के लिए मैं अपने को बहुत ही भाग्यशाली मानता हूँ।मेरी धर्म पत्नी जी एक सशक्त महिला हैं और हमारे परिवार संचालन में अपनी सशक्त भूमिका निभा रही हैं।सहमति- असहमति, प्रेम- तकरार,उतार -चढ़ाव के बीच हम दोनों अच्छे सहयात्री हैं और अपनी नई पीढ़ी को सँवारने में ब्यस्त हैं। यह मंगलवीणा ब्लॉग जो वर्षों से आप स्नेही पाठकों एवँ मित्रों के समक्ष प्रस्तुत हो रहा है , हम दोनों के नाम युग्म का ही पुष्प गुच्छा है।अंततः महिला दिवस पर दुनियाँ की समस्त महिलाओं का सादर अभिनन्दन एवँ इस सुखद संयोग का आभार।-----------------------------------मंगला सिंह
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***************महिला का प्रथम नाम शक्ति ,दूसरा महिला नारी वुमन ,तीसरा अबला इत्यादि व चौथा आधुनिक अनेक नाम हैं जो आज के चलचित्रों व टीवी के कार्यक्रमों में दिखाई दे रहे हैं।यह भी निर्विवाद है कि हमारे सामाजिक ताने -बाने में शक्ति का सन्तुलन सदैव महिलाओं के पक्ष में रहा है परन्तु इस शक्ति का महिला समाज में समान वितरण नहीं रहा है।इसी कारण महिला के अनेक उचित, अनुचित पर्याय बनते गए। क्या यह सच नहीं है कि महिलाओं के कुछ रूप, शक्ति सम्पन्नता के कारण, स्वामिनी जैसे हो जाते हैं तो कुछ ,शक्ति विपन्नता के कारण, दासी जैसे। गौर करने के लिए सास -बहू ,सधवा -विधवा ,मालकिन -धाय ,कुल बधू -नगर बधू के उदहारण पर्याप्त होंगे।आप हमेशा भाई चारा की बात सुनते होंगे परन्तु महिलाओं में बहिनत्व या बहिन चारे की बात कभी नहीं। कभी सपने में सुन भी लिए होंगे तो देखना तो गधे की सींग जैसी घटना होगी।
***************महिला दिवस पर महिलाओं को एक दूसरे को शक्ति के समतल पर लाने का प्रण करना चाहिए और बहिनत्व का नारा बुलन्द करना चाहिए। सच ही कहा गया है कि हम बदलें गे --युग बदले गा।जहाँ तक पुरुष की बात है ,वह महिला की संस्कारशाला से ही निकला उन्ही के साथ उन्हीं के लिए व्यवस्थाधीन जीने वाला प्राणी है और यदि कभी कोई पुरुष महिलाओं के साथ अभद्र होता है तो फिर ध्यान संस्कार की ओर ही जाता है।हाँ , पुरुषों का परम कर्तव्य है कि वह महिलाओं में श्रद्धा भाव सदैव व प्रति पल रखे। छायावादी महा रचनाकार स्व जय शंकर प्रसाद जी ने भी कामायनी में यही कहा है कि ----
नारी तुम केवल श्रद्धा हो ही,
विश्वास रजत नग पद तल में।
पियूष श्रोत सी बहा करो,
जीवन के सुन्दर समतल में।
***************आज महिलाओं को ध्यान देना होगा कि वे न तो अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी बनें और न ही तू चीज बड़ी है -- बनें।उन्हें अपनी प्रगति के वर्तमान दौर में उपभोक्तावाद संस्कृति से सावधान रहते हुए अपनी गरिमा बनाए रखना होगा।श्रद्धा के लिए आचरण की योग्यता रखना महिलाओं का सर्वोपरि दायित्व है। यदि महिलाओं में यह योग्यता नहीं होगी तो वे आज की अपसंस्कृति की शिकार होती रहें गी। अतः आदरणीया या श्रद्ध्येया को सत्यशः आदरणीया या श्रद्ध्येया ही बने रहना चाहिए।
***************यद्यपि आज महिलाएं जीवन के हर क्षेत्र जैसे विज्ञान ,अंतरिक्ष ,कला ,साहित्य ,शिक्षा ,खेलकूद ,राजनीति ,नौकरी ,उद्यमिता इत्यादि में आसमान छूने छूने लगी हैं ;फिर भी उनकी सहभागिता सँख्या ऊँट के मुँह में जीरा जैसी ही है। समाज अपवाद की उन्नति से नहीं बनता है, समाज सामान्य की उन्नति से बनता है और यह तभी सम्भव होगा जब महिलाएं स्वयँ बढे गी और बहिनत्व भाव से अन्य महिलाओं को आगे बढ़ाएं गी।नारी शक्ति के प्रति श्रद्धा भाव जताते हुए आज हम उन्हें उनकी शक्ति का सादर स्मरण कराते हैं। ----- मंगलवीणा
वाराणसी ;दिनाँक 08 . 03 . 2018
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अपनी बात भी -
***************वर्षों से आज का दिन मेरे लिए तो अविस्मरणीय रहा है क्योंकि तैंतालीस वर्ष पूर्व सन 1975 में आज के दिन ही मैं अपनी पत्नी वीणा सिंह के साथ परिणय सूत्र में बँधा था। जीवन में इस संयोग के लिए मैं अपने को बहुत ही भाग्यशाली मानता हूँ।मेरी धर्म पत्नी जी एक सशक्त महिला हैं और हमारे परिवार संचालन में अपनी सशक्त भूमिका निभा रही हैं।सहमति- असहमति, प्रेम- तकरार,उतार -चढ़ाव के बीच हम दोनों अच्छे सहयात्री हैं और अपनी नई पीढ़ी को सँवारने में ब्यस्त हैं। यह मंगलवीणा ब्लॉग जो वर्षों से आप स्नेही पाठकों एवँ मित्रों के समक्ष प्रस्तुत हो रहा है , हम दोनों के नाम युग्म का ही पुष्प गुच्छा है।अंततः महिला दिवस पर दुनियाँ की समस्त महिलाओं का सादर अभिनन्दन एवँ इस सुखद संयोग का आभार।-----------------------------------मंगला सिंह
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मंगलवार, 19 दिसंबर 2017
चक्रव्यूह में फँसता भारतीय इतिहास
***************मध्यकाल से अब तक भारतीय इतिहास के तोड़ मरोड़ का क्रम जारी है। पद्मावती नाम के चलचित्र पर इस समय चल रहा विवाद इसका ज्वलन्त उदहारण है।इतिहास में रूचि रखने वाले हैरान हैं कि हजारों क्षत्राणियों के साथ जौहर करने वाली महारानी पद्मावती के चरित्र में फिल्म बनाने वालों ने मनोरंजन का कौन सा विषय गढ़ लिया कि फिल्माँकन कर दौलत बटोरने की सोच ली। भारतीय इतिहास में हाथ डालने से पहले इन फिल्मकारों को भारतीय सिनेमा के इतिहास को याद कर स्वयँ झेंप लेना चाहिए कि ये लोग मनोरंजन को राजा हरिश्चन्द्र से पद्मावती तक की यात्रा में कहाँ से कहाँ पहुँचा दिए।शायद निर्माता और उसके कलाकारों को अनुभूति नहीं कि पद्मावती किन उच्च भारतीय आदर्शों का प्रतिनिधित्व करती हैं।यदि किसी फिल्म निर्माता को ऐतिहासिक पद्मावती पर फिल्म बनानी है तो वह बनाने को तो स्वतन्त्र है परन्तु उसे शत प्रतिशत यह सुनिश्चित तो करना ही होगा कि उसकी अभिनेत्री हूबहू पद्मावती का चरित्र अभिनीत करे। उसे रंचमात्र भी चरित्रान्तर या स्वयँ नायिका बनने का अवसर नहीं दिया जा सकता है। उन्हें बहुत स्पष्ट होना होगा कि वह पद्मावती का अभिनय कर रही हैं न कि वे स्वयँ किसी फिक्सन ,गल्प या दंतकहानी की नायिका हैं।
*************** फिल्मों में अभिनय करने वाले लोग हमारे समाज या इतिहास के नायक -नायिका या हीरो- हीरोइन नहीं हैं। ये मात्र अभिनेता और अभिनेत्री हैं।जिस पद्मावती फिल्म पर आज पूरे देश में विवाद व विरोध है वह पद्मावती भारत की ऐतिहासिक एवँ सांस्कृतिक गौरव की अद्वितीय नायिका हैं। उन्हें फिल्म निर्माता भन्साली ने अपनी कल्पना से नहीं उपजाया है कि व्यावसायिक हित में उसे जैसा चाहें वैसा गढ़ दें।अतः उन्हें यह छूट बिल्कुल नहीं मिलती कि हमारे ऐसी बेजोड़ नायिका के व्यक्तित्व को कहीं से भी हल्का करें। पद्मावती मनोरंजन नहीं गौरव गाथा की प्रकाश पुञ्ज हैं। पद्मावती वह गौरव गाथा है जिसे चित्तौड़ में अनुभव किया जा सकता है , राजपूताने में आज भी भाटों -चारणों से सुना जा सकता है,कर्नल टाड ,ओझा या इतिहासकारों को पढ़ा जा सकता है या मालिक मुहम्मद जायसी के पद्मावत को गाया जा सकता है।
***************किसी भी देश की जनता एवँ उनकी सरकारों का प्रथम कर्तव्य होता है कि वे अपने इतिहास को किसी दशा में विकृत या निज संस्कृति आक्षेपी न होने दें ताकि पीढ़ियाँ उस पर गर्व कर सकें ,उससे प्रेरित हो सकें और उनकी संस्कृति अबाध आगे बढ़ती रहे। यह ठीक है कि अतीत में भारतीय प्रायद्वीप की परिस्थितियाँ बहुत विषम थीं और इतिहास भी छोटे छोटे भूखण्डों में विभक्त होता रहा और इसका लाभ उठाते हुए विदेशी हमलावरों,मुग़लों तथा बाद में अंग्रेजों ने भी भारत के इतिहास को ऐसे अंकित करने का प्रयास किया कि हम भारतीयों को हमारा अतीत लज्जाजनक लगे और बहुसंख्यकों में हीन भावना पनपती रहे। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद बामपन्थी ,काँग्रेसी ,मुस्लिमपंथी एवँ तुष्टिपंथी - इतिहासकार भी एक निर्दिष्ट उद्देश्य पूर्ति के लिए हमारे इतिहास को पूर्ववर्तियों की दिशा में घसीटते रहे। ऐसे लोगों का सुनियोजित प्रयास रहा है कि मध्यकालीन आक्रमणकारियों और नेहरू एवँ उनके परिवार जैसे लोगों की नायक वाली विरासत स्थापित हो सके तथा राणा प्रताप ,सुभाष चन्द्र बोस और बल्लभ भाई पटेल जैसे लोग इतिहास पटल पर मद्धिम होते जाँय । यहाँ तक कि इतिहास और हिन्दुत्व के खलनायकों को नायक और नायकों को खलनायक के रूप में प्रस्तुत करने का क्रम जारी है।लोग भूले नहीं हैं कि हाल में सत्ताधारी काँग्रेस द्वारा बैंगलुरु में टीपू सुल्तान की जयन्ती मनाई गई। ये वही टीपू सुल्तान थे जो धुर हिन्दू विरोधी थे और तलवार के बल पर लाखों हिन्दुओं का धर्म परिवर्तन कराया था।
*************** इस तरह की मानसिकता से प्रमाणित होता है कि भारतीय इतिहास ,समृद्ध सांस्कृतिक विरासत व प्राचीनतम सभ्यता को लगातार चोट पहुँचाने का प्रयास जारी है और फिल्म निर्माता संजय लीला भन्साली इसकी अद्यतन कड़ी हैं।बहुसंख्यकों की सहनशीलता का लाभ उठाते हुए ये लोग स्वार्थी इरादों के साथ इतिहास के गर्भगृह में घुसकर उसे नष्ट भ्रष्ट करने का दुस्साहस दिखाने लगे हैं।रानी पद्मावती ; बाजीराव की मस्तानी , वैशाली की नगर बधु,आम्रपाली या चित्रलेखा ; नहीं हैं अतः उनका फिल्मांकन भी वैसे नहीं हो सकता कि भंसाली अलाउद्दीन खिलजी के रूप में स्वप्न लोक पहुँचे और अप्रतिम सुंदरी पद्मावती को नृत्य करते देंखें। भारतीय सिनेमा ने हमारे नैतिक मूल्यों को बहुत हानि पहुँचाया है। चलचित्र जगत के लोग बहुधा कहते हैं कि वे दर्शकों को वही दिखाते हैं जो दर्शक देखना चाहते हैं। फिर सिनेमा वालों को मालूम हो जाना चाहिए कि वे भन्साली द्वारा बनाई गई पद्मावती बिलकुल नहीं देखना चाहते हैं और ऐसे सिनेमा न बनाये जाँय।वर्तमान रोष तो एक चेत वाणी है कि आने वाले समय में हमारे पौराणिक ,धार्मिक ,सांस्कृतिक एवँ ऐतिहासिक नायक ,नायिकाओं एवं अन्य चरित्रों के चित्रण में छेड़ छाड़ का विरोध और प्रचण्ड होता जाय गा।
***************परिस्थितियाँ करवट ले चुकी हैं। आज पूरी दुनियाँ में हमारी उत्कृष्ट मानवतावादी सोच , संस्कृति ,दर्शन ,विरासत और प्रतिभा का डंका बजने लगा है और हम भारतवासी भारतीय कहलाने पर गर्व कर रहे हैं। देशवासियों और नई पीढ़ी को राष्ट्र के आतंरिक घातियों की समझ हो चुकी है और वे समय समय पर विरोध व प्रदर्शन कर ऐसे लोगों को सँभल जाने का सन्देश दे रहे हैं। सरकारें भी ऐसे षड्यंत्रकारियों पर नियंत्रण की दिशा में काम कर रही हैं।अतः समय की माँग है कि मनोरंजन अपने को मनोरंजन की सीमा में समेटे हुए चले तथा हमारे किसी भी अतीत और वर्तमान के नायक या नायिका के चरित्रान्तर का प्रयास न करे। लोकतंत्र तभी परिपक्व माना जाता है जब उसके नागरिक स्वतः अनुसाशन का आचरण करें और विरोध की स्थिति ही न बने। तब तक यदि हमारे इतिहास को चक्रव्यूह में फँसाया जायगा तो व्यूह रचने वाले नई पीढ़ी द्वारा बुरी तरह पराजित होंगे।
----------------------------------------------------------------------------------------------मंगलवीणा
वाराणसी :दिनाँक 19 दिसम्बर 2017 ---------------------mangal-veena.blogspot.com
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अन्ततः
**हेमन्त बीतने जा रहा है और जाड़े की दुंदुभी बज उठी है। जो वातावरण शादियों के रेलम रेल व गुजरात के चुनाव से ही गरम था वह क्रमशः खरमास (15 दिसम्बर से प्रारम्भ ) व 18 दिसम्बरागमन के साथ ठंढा पड़ चुका है और बढ़ती ठंढ में अब ऊनी पहनावे के साथ कम्बल रजाई से ही गर्मी की आस है।
**भला हो गुजरात के उन मतदाताओं का जिन्होंने गुजरात मॉडल को बचा लिया और हमारे विश्वख्यात नेता नरेंद्र मोदी के साख को गृहराज्य में आँच नहीं लगने दिया।आशा है भाजपानीत सरकार गहन विश्लेषण करे गी और लोकहित की ओर तेजी से अग्रसर होगी। कुछ ऐसी शक्तियां भाजपा के अन्दर अवश्य हैं जो उससे जनाकांछा की शनैः शनैः अनदेखी करा रहीं हैं। यदि भाजपा नहीं संभलती है तो सोच ले कि प्रधान मंत्री जी के लिए जनता कब तक अपने अहित को सहन कर पाए गी।
**आगे इस ब्लॉग के माध्यम से सभी सुधी पाठकों को क्रिस्मस पर्व की शुभ कामनायेँ एवँ हार्दिक बधाई। हो सके तो जिन गर्म कपड़ों को अब हम न पहनते हों , जरुरतमन्दों को ढूंढ़ कर उन्हें सादर हस्तगत करें। इस छोटे प्रयास से मानवता की बड़ी सेवा होगी।प्रणाम।-----------------मंगलवीणा
वाराणसी ;दिनाँक 19 दिसम्बर 2017 -----------------------mangal-veena.blogspot.com
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*************** फिल्मों में अभिनय करने वाले लोग हमारे समाज या इतिहास के नायक -नायिका या हीरो- हीरोइन नहीं हैं। ये मात्र अभिनेता और अभिनेत्री हैं।जिस पद्मावती फिल्म पर आज पूरे देश में विवाद व विरोध है वह पद्मावती भारत की ऐतिहासिक एवँ सांस्कृतिक गौरव की अद्वितीय नायिका हैं। उन्हें फिल्म निर्माता भन्साली ने अपनी कल्पना से नहीं उपजाया है कि व्यावसायिक हित में उसे जैसा चाहें वैसा गढ़ दें।अतः उन्हें यह छूट बिल्कुल नहीं मिलती कि हमारे ऐसी बेजोड़ नायिका के व्यक्तित्व को कहीं से भी हल्का करें। पद्मावती मनोरंजन नहीं गौरव गाथा की प्रकाश पुञ्ज हैं। पद्मावती वह गौरव गाथा है जिसे चित्तौड़ में अनुभव किया जा सकता है , राजपूताने में आज भी भाटों -चारणों से सुना जा सकता है,कर्नल टाड ,ओझा या इतिहासकारों को पढ़ा जा सकता है या मालिक मुहम्मद जायसी के पद्मावत को गाया जा सकता है।
***************किसी भी देश की जनता एवँ उनकी सरकारों का प्रथम कर्तव्य होता है कि वे अपने इतिहास को किसी दशा में विकृत या निज संस्कृति आक्षेपी न होने दें ताकि पीढ़ियाँ उस पर गर्व कर सकें ,उससे प्रेरित हो सकें और उनकी संस्कृति अबाध आगे बढ़ती रहे। यह ठीक है कि अतीत में भारतीय प्रायद्वीप की परिस्थितियाँ बहुत विषम थीं और इतिहास भी छोटे छोटे भूखण्डों में विभक्त होता रहा और इसका लाभ उठाते हुए विदेशी हमलावरों,मुग़लों तथा बाद में अंग्रेजों ने भी भारत के इतिहास को ऐसे अंकित करने का प्रयास किया कि हम भारतीयों को हमारा अतीत लज्जाजनक लगे और बहुसंख्यकों में हीन भावना पनपती रहे। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद बामपन्थी ,काँग्रेसी ,मुस्लिमपंथी एवँ तुष्टिपंथी - इतिहासकार भी एक निर्दिष्ट उद्देश्य पूर्ति के लिए हमारे इतिहास को पूर्ववर्तियों की दिशा में घसीटते रहे। ऐसे लोगों का सुनियोजित प्रयास रहा है कि मध्यकालीन आक्रमणकारियों और नेहरू एवँ उनके परिवार जैसे लोगों की नायक वाली विरासत स्थापित हो सके तथा राणा प्रताप ,सुभाष चन्द्र बोस और बल्लभ भाई पटेल जैसे लोग इतिहास पटल पर मद्धिम होते जाँय । यहाँ तक कि इतिहास और हिन्दुत्व के खलनायकों को नायक और नायकों को खलनायक के रूप में प्रस्तुत करने का क्रम जारी है।लोग भूले नहीं हैं कि हाल में सत्ताधारी काँग्रेस द्वारा बैंगलुरु में टीपू सुल्तान की जयन्ती मनाई गई। ये वही टीपू सुल्तान थे जो धुर हिन्दू विरोधी थे और तलवार के बल पर लाखों हिन्दुओं का धर्म परिवर्तन कराया था।
*************** इस तरह की मानसिकता से प्रमाणित होता है कि भारतीय इतिहास ,समृद्ध सांस्कृतिक विरासत व प्राचीनतम सभ्यता को लगातार चोट पहुँचाने का प्रयास जारी है और फिल्म निर्माता संजय लीला भन्साली इसकी अद्यतन कड़ी हैं।बहुसंख्यकों की सहनशीलता का लाभ उठाते हुए ये लोग स्वार्थी इरादों के साथ इतिहास के गर्भगृह में घुसकर उसे नष्ट भ्रष्ट करने का दुस्साहस दिखाने लगे हैं।रानी पद्मावती ; बाजीराव की मस्तानी , वैशाली की नगर बधु,आम्रपाली या चित्रलेखा ; नहीं हैं अतः उनका फिल्मांकन भी वैसे नहीं हो सकता कि भंसाली अलाउद्दीन खिलजी के रूप में स्वप्न लोक पहुँचे और अप्रतिम सुंदरी पद्मावती को नृत्य करते देंखें। भारतीय सिनेमा ने हमारे नैतिक मूल्यों को बहुत हानि पहुँचाया है। चलचित्र जगत के लोग बहुधा कहते हैं कि वे दर्शकों को वही दिखाते हैं जो दर्शक देखना चाहते हैं। फिर सिनेमा वालों को मालूम हो जाना चाहिए कि वे भन्साली द्वारा बनाई गई पद्मावती बिलकुल नहीं देखना चाहते हैं और ऐसे सिनेमा न बनाये जाँय।वर्तमान रोष तो एक चेत वाणी है कि आने वाले समय में हमारे पौराणिक ,धार्मिक ,सांस्कृतिक एवँ ऐतिहासिक नायक ,नायिकाओं एवं अन्य चरित्रों के चित्रण में छेड़ छाड़ का विरोध और प्रचण्ड होता जाय गा।
***************परिस्थितियाँ करवट ले चुकी हैं। आज पूरी दुनियाँ में हमारी उत्कृष्ट मानवतावादी सोच , संस्कृति ,दर्शन ,विरासत और प्रतिभा का डंका बजने लगा है और हम भारतवासी भारतीय कहलाने पर गर्व कर रहे हैं। देशवासियों और नई पीढ़ी को राष्ट्र के आतंरिक घातियों की समझ हो चुकी है और वे समय समय पर विरोध व प्रदर्शन कर ऐसे लोगों को सँभल जाने का सन्देश दे रहे हैं। सरकारें भी ऐसे षड्यंत्रकारियों पर नियंत्रण की दिशा में काम कर रही हैं।अतः समय की माँग है कि मनोरंजन अपने को मनोरंजन की सीमा में समेटे हुए चले तथा हमारे किसी भी अतीत और वर्तमान के नायक या नायिका के चरित्रान्तर का प्रयास न करे। लोकतंत्र तभी परिपक्व माना जाता है जब उसके नागरिक स्वतः अनुसाशन का आचरण करें और विरोध की स्थिति ही न बने। तब तक यदि हमारे इतिहास को चक्रव्यूह में फँसाया जायगा तो व्यूह रचने वाले नई पीढ़ी द्वारा बुरी तरह पराजित होंगे।
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अन्ततः
**हेमन्त बीतने जा रहा है और जाड़े की दुंदुभी बज उठी है। जो वातावरण शादियों के रेलम रेल व गुजरात के चुनाव से ही गरम था वह क्रमशः खरमास (15 दिसम्बर से प्रारम्भ ) व 18 दिसम्बरागमन के साथ ठंढा पड़ चुका है और बढ़ती ठंढ में अब ऊनी पहनावे के साथ कम्बल रजाई से ही गर्मी की आस है।
**भला हो गुजरात के उन मतदाताओं का जिन्होंने गुजरात मॉडल को बचा लिया और हमारे विश्वख्यात नेता नरेंद्र मोदी के साख को गृहराज्य में आँच नहीं लगने दिया।आशा है भाजपानीत सरकार गहन विश्लेषण करे गी और लोकहित की ओर तेजी से अग्रसर होगी। कुछ ऐसी शक्तियां भाजपा के अन्दर अवश्य हैं जो उससे जनाकांछा की शनैः शनैः अनदेखी करा रहीं हैं। यदि भाजपा नहीं संभलती है तो सोच ले कि प्रधान मंत्री जी के लिए जनता कब तक अपने अहित को सहन कर पाए गी।
**आगे इस ब्लॉग के माध्यम से सभी सुधी पाठकों को क्रिस्मस पर्व की शुभ कामनायेँ एवँ हार्दिक बधाई। हो सके तो जिन गर्म कपड़ों को अब हम न पहनते हों , जरुरतमन्दों को ढूंढ़ कर उन्हें सादर हस्तगत करें। इस छोटे प्रयास से मानवता की बड़ी सेवा होगी।प्रणाम।-----------------मंगलवीणा
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बुधवार, 15 नवंबर 2017
गुजरात से शँखनाद या साइरन ?
***************आज की तिथि में गुजरात हमारे देश के कतिपय सर्वाधिक विकसित राज्यों में एक है और हमारी प्रगति का पर्याय है ।सकल घरेलू उत्पाद या प्रति व्यक्ति सालाना आय अथवा खुशहाल जिंदगी के मानक आँकड़ों की बात न कर केवल विभिन्न राज्यों से गुजरात जाकर वहाँ अपनी जीविका चलाने वालों की संख्या तथा उस राज्य के विकास पर उनकी राय ले कर गुजरात विकास की चकाचौंध करने वाली सच्चाई समझी जा सकती है।न्यूनाधिक सभी राज्यों , विशेषतया पिछड़े राज्यों, के लोग गुजरात के विभिन्न शहरों या कस्बों में काम करते मिल जाँयगे जबकि व्यवसाय से इतर जीविका के लिए अन्य राज्यों में गुजराती न के समतुल्य मिलें गे। यही है गुजरात का विकास मॉडल जो आम लोगों को दिखता है।
***************परन्तु हमारे देश के तथाकथित यायावर नेता जो पीढ़ियों से गरीब देश के अमीर लुटेरे हैं और जिनके लिए यूरोपीय व अमेरिकन देश सुगम व सुरम्य सैर- गाह हैं ,उन्हें गुजरात में कहीं विकास दिखता ही नहीं। ये वही लुटेरे हैं जिनकी मान्यता है कि जहाँ लूट के अवसर नहीं वहाँ विकास कैसा। सन दो हजार चौदह तक देश की गद्दी जुगाड़े इन लुटेरों का कृत्य जन जन को पता है फिर भी निर्लज्ज बगुला भगत सा विश्वास पाले गुजरात के मैदान में धर्म ,जाति ,सवर्ण , पिछडों और दलितों का जहर घोल कर ये विजय की आशा पाल रहे हैं।इन हारे हुए काँग्रेसी खिलाडियों के पास हारने को कुछ नहीं है पर खेल बिगाड़ने को बहुत कुछ है। वहीँ गुजरात की जनता एक बड़ी कसौटी पर चढ़ी हुई है। वह या तो भारतीय जनता पार्टी को विजय देगी या पराजय ।
***************देश के हर राष्ट्रप्रेमी नागरिक की आकांछा है कि गुजरात के लोग भाजपा को विजयश्री पहना कर श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार द्वारा चलाये जा रहे आर्थिक , सामाजिक तथा सामरिक सुधारों पर मुहर लगायें ताकि देश विदेश को एक संदेश मिल सके कि जिस मोदी ने वर्षों तक गुजरातियों की बेहतरी के लिए साधना किया और जिस जनता ने उन्हें आज प्रधान मन्त्री के पद तक पहुँचाया वे आज भी थोड़ी दुश्वारियों के बावजूद एक दूसरे के लिए चट्टान की भाँति खड़े हैं। याद रहे कि आर्थिक उतार- चढ़ाव तथा मत भिन्नता के बाद भी मोदी जी राष्ट्रवाद ,राष्ट्रभक्ति ,राष्ट्रगौरव व सर्वोपरि -राष्ट्र वाली अवधारणा के बेजोड़ नायक व आशा के किरण पुञ्ज हैं। इस तथ्य को हमें किसी भी पल दृष्टि से ओझल नहीं कर सकते क्योंकि सावधानी हटी कि देश लुटा।
***************दूसरी अर्थात पराजय की स्थिति में स्थिति के कारण महत्वपूर्ण हो जाँयगे और सारे विपक्षी नेता एक होकर देश को सन चौदह से पूर्व की स्थिति में घसीट ले जाने व सत्ता सुख के बंदरबाँट का पुरजोर प्रयास करेंगे।फलतः बचे डेढ़ वर्षों में केंद्र सरकार को उग्र विपक्षी विरोध का सामना करना होगा जिससे सरकार की दृढ इच्छाशक्ति डगमगा सकती है।हार भाजपा की होगी परन्तु खुशियाँ विघटनकारी नेता व पार्टियाँ मनाएँ गी। जो कारण मतदाताओं को भाजपा के विरोध में जाने को प्रेरित कर सकते हैं वे क्रमशः पाटीदारों का आरक्षण के नाम पर प्रबल विरोध ,दलितों में उकसाया गया छद्म असंतोष ,व्यवसाय पर जीएसटी का कुप्रभाव ,पेट्रोलियम पदार्थों की घटी कीमतों का लाभ जनता को न देना ,स्थानीय भाजपा नेताओं के प्रति विकर्षण तथा सबसे ऊपर राज्य स्तर पर मोदी जी जैसे चमत्कारी नेता की अनुपलब्धता हैं।
*************** निश्चय ही राष्ट्रवाद की छाँव में भाजपा यह भूल रही है की सरकार अपनी जनता के लिए एक चुनी हुई कल्याणकारी संस्था होती है और बिना कोई संकट की स्थिति आए वह जनता को आर्थिक बेहतरी के बदले आर्थिक बदहाली नहीं दे सकती।आम जन की जेब पर दबाव पड़ेगा तो समर्थन भी घटे गा।फिर भी दबाव ने कोई लक्ष्मण रेखा नहीं पार किया है कि जिस दल के सरकार ने गुजरात में वर्षों तक बेहतरीन परफॉर्मन्स दिया ,गुजरात को आधुनिक गुजरात बनाया व देश को मोदी जी जैसा अद्वितीय नायक दिया ;उसे राज्य से सत्ताच्युत कर दिया जाय।
***************सरकारी सेवा में रहते हुए उन्नीस सौ नवासी से वानवे तक मुझे गुजरात के विभिन्न स्थानों पर भ्रमण करने व वहाँ के विभिन्न वर्ग व समुदाय के लोगों के साथ जब संपर्क का अवसर मिला तो समझ आई कि प्रभु श्रीकृष्ण को द्वारकापुरी रास क्यों आई याकि गाँधी जैसे सत्य एवँ अहिँसावादी और पटेल जैसे लौहपुरुष वहीँ क्यों उपजे। वहीँ समझ सका कि पानी की कमी से जूझते प्रदेश में अमूल जैसी श्वेत क्रान्ति ,खूबसूरत दस्तकारी ,वस्त्रोत्पादन ,हीरा उद्योग या अन्य भारी उद्योग क्यों परवान चढ़ पाए।वास्तव में शुद्ध भारतीय परिवेश व मीठासमयी संस्कृति को सँजोए हुए गुजरातियों में गजब की उद्यमिता एवँ संघर्ष क्षमता है। उन्हें सरकार से मात्र सरकार जैसी व्यवहार की अपेक्षा रहती है। उन्हें सरकार से सार्वजानिक सुविधा ,संरचना ,सुरक्षा और व्यवसाय परक वातावरण चाहिए न कि व्यक्तिगत सुविधाएँ। इस राज्य में मोदी जी के सफलता का मन्त्र भी यही रहा है। आज के संशय का कारण भी स्थानीय भाजपा नेताओं द्वारा इस मंत्र का थोड़ा बहुत विकृत किया जाना लगता है।
***************सभी धन ऋण विचारों के समायोजनोपरान्त कहा जा सकता है कि मोदी जी के बाद की प्रदेश सरकार यदि पूर्ववत जनता के प्रति संकल्पित रही है और स्थानीय भाजपा के नेता जनता से मित्रवत संवाद में रहे हैं तो राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानते हुए गुजरात के मतदाता भाजपा को विजय श्री देंगे। उभरते भारत में हो रहे बदलाव के दौर में जीएसटी से उत्पन्न अस्थाई व्यावसायिक कठिनाइयोँ के कारण भी वे भाजपा को नहीं नकारें गे। हिमाँचल प्रदेश की भाँति वहाँ एन्टी इनकम्बेंसी जैसा कोई गुणक भी काम नहीं करेगा। ऐसे में भाजपा के हार की सम्भावना बहुत दूर तक नहीं है। हारे गी तभी यदि सत्तारूढ़ सरकार ने सरकार के लिए निर्धारित लक्ष्मण रेखा का अतिक्रमण किया होगा। जीत से भाजपा नीत केंद्र सरकार के आर्थिक सुधारों व विकास कार्यक्रमों को और तीब्र आवेग (मोमेंटम )मिले गा अन्यथा हार, आवेग में अस्थाई ठहराव का,गुजरात से एक साइरन होगा। फिर सिंहावलोकन की स्थिति बने गी और पुनः नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में इन्हीं सुधारों व विकास को प्रचंड समर्थन मिलेगा क्योंकि भारत को दुनियाँ मेँ अपना मुकाम पाना है और हम आम भारतीयों के लिए सबसे पहले भारत है।
वाराणसी ;दिनाँक 14 नवम्बर 2017 ------------------------------------ मंगलवीणा
******************************************************************************************
अंततः
**********समूचे उत्तरभारत में दीपावली से आरम्भ हुए नव वर्ष का स्वागत धुन्ध ,धुँए ,गुबार व कुहरे से हुआ है। स्वागत भी ऐसा कि लोगों का श्वाँस लेना दुश्वार। सभ्य भाषा में स्मॉग कहर बरपा रहा है और हम लोग जैसी करनी वैसी भरनी पा रहे हैं।
**********आश्चर्य होता है कि नए वर्ष का शुभारम्भ हुआ है और अगहन या मार्गशीर्ष का वह मनोहारी महीना चल रहा है जिसकी महत्ता में प्रभु कृष्ण ने अर्जुन से कहा था कि ऋतुओं में बसन्त ऋतु और महीनों में मार्गशीर्ष का महीना मैं ही हूँ।यथा -
*****बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहं।
*****मासानां मार्गशीर्षः अहम् ऋतुनां कुसुमाकरः। 35 /10 श्रीमद्भगवद्गीता
**********ऐसे महीने में पर्यावरण को स्वयं प्रदूषित कर मानवता कराह रही है। धन्य हैं विज्ञान के उत्कर्ष युग या इस कल युग में जीने वाले हम विद्वान् लोग कि धरती को स्वर्ग न बना नरक बना डाले।क्यों न हम अपनी तुलना मूर्ख कालिदास से करें और कवि कालिदास की ओर अग्रसर हों।
वाराणसी -------- मंगलवीणा
दिनाँक:14 नवम्बर 2017 mangal-veena.blogspot.com
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***************परन्तु हमारे देश के तथाकथित यायावर नेता जो पीढ़ियों से गरीब देश के अमीर लुटेरे हैं और जिनके लिए यूरोपीय व अमेरिकन देश सुगम व सुरम्य सैर- गाह हैं ,उन्हें गुजरात में कहीं विकास दिखता ही नहीं। ये वही लुटेरे हैं जिनकी मान्यता है कि जहाँ लूट के अवसर नहीं वहाँ विकास कैसा। सन दो हजार चौदह तक देश की गद्दी जुगाड़े इन लुटेरों का कृत्य जन जन को पता है फिर भी निर्लज्ज बगुला भगत सा विश्वास पाले गुजरात के मैदान में धर्म ,जाति ,सवर्ण , पिछडों और दलितों का जहर घोल कर ये विजय की आशा पाल रहे हैं।इन हारे हुए काँग्रेसी खिलाडियों के पास हारने को कुछ नहीं है पर खेल बिगाड़ने को बहुत कुछ है। वहीँ गुजरात की जनता एक बड़ी कसौटी पर चढ़ी हुई है। वह या तो भारतीय जनता पार्टी को विजय देगी या पराजय ।
***************देश के हर राष्ट्रप्रेमी नागरिक की आकांछा है कि गुजरात के लोग भाजपा को विजयश्री पहना कर श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार द्वारा चलाये जा रहे आर्थिक , सामाजिक तथा सामरिक सुधारों पर मुहर लगायें ताकि देश विदेश को एक संदेश मिल सके कि जिस मोदी ने वर्षों तक गुजरातियों की बेहतरी के लिए साधना किया और जिस जनता ने उन्हें आज प्रधान मन्त्री के पद तक पहुँचाया वे आज भी थोड़ी दुश्वारियों के बावजूद एक दूसरे के लिए चट्टान की भाँति खड़े हैं। याद रहे कि आर्थिक उतार- चढ़ाव तथा मत भिन्नता के बाद भी मोदी जी राष्ट्रवाद ,राष्ट्रभक्ति ,राष्ट्रगौरव व सर्वोपरि -राष्ट्र वाली अवधारणा के बेजोड़ नायक व आशा के किरण पुञ्ज हैं। इस तथ्य को हमें किसी भी पल दृष्टि से ओझल नहीं कर सकते क्योंकि सावधानी हटी कि देश लुटा।
***************दूसरी अर्थात पराजय की स्थिति में स्थिति के कारण महत्वपूर्ण हो जाँयगे और सारे विपक्षी नेता एक होकर देश को सन चौदह से पूर्व की स्थिति में घसीट ले जाने व सत्ता सुख के बंदरबाँट का पुरजोर प्रयास करेंगे।फलतः बचे डेढ़ वर्षों में केंद्र सरकार को उग्र विपक्षी विरोध का सामना करना होगा जिससे सरकार की दृढ इच्छाशक्ति डगमगा सकती है।हार भाजपा की होगी परन्तु खुशियाँ विघटनकारी नेता व पार्टियाँ मनाएँ गी। जो कारण मतदाताओं को भाजपा के विरोध में जाने को प्रेरित कर सकते हैं वे क्रमशः पाटीदारों का आरक्षण के नाम पर प्रबल विरोध ,दलितों में उकसाया गया छद्म असंतोष ,व्यवसाय पर जीएसटी का कुप्रभाव ,पेट्रोलियम पदार्थों की घटी कीमतों का लाभ जनता को न देना ,स्थानीय भाजपा नेताओं के प्रति विकर्षण तथा सबसे ऊपर राज्य स्तर पर मोदी जी जैसे चमत्कारी नेता की अनुपलब्धता हैं।
*************** निश्चय ही राष्ट्रवाद की छाँव में भाजपा यह भूल रही है की सरकार अपनी जनता के लिए एक चुनी हुई कल्याणकारी संस्था होती है और बिना कोई संकट की स्थिति आए वह जनता को आर्थिक बेहतरी के बदले आर्थिक बदहाली नहीं दे सकती।आम जन की जेब पर दबाव पड़ेगा तो समर्थन भी घटे गा।फिर भी दबाव ने कोई लक्ष्मण रेखा नहीं पार किया है कि जिस दल के सरकार ने गुजरात में वर्षों तक बेहतरीन परफॉर्मन्स दिया ,गुजरात को आधुनिक गुजरात बनाया व देश को मोदी जी जैसा अद्वितीय नायक दिया ;उसे राज्य से सत्ताच्युत कर दिया जाय।
***************सरकारी सेवा में रहते हुए उन्नीस सौ नवासी से वानवे तक मुझे गुजरात के विभिन्न स्थानों पर भ्रमण करने व वहाँ के विभिन्न वर्ग व समुदाय के लोगों के साथ जब संपर्क का अवसर मिला तो समझ आई कि प्रभु श्रीकृष्ण को द्वारकापुरी रास क्यों आई याकि गाँधी जैसे सत्य एवँ अहिँसावादी और पटेल जैसे लौहपुरुष वहीँ क्यों उपजे। वहीँ समझ सका कि पानी की कमी से जूझते प्रदेश में अमूल जैसी श्वेत क्रान्ति ,खूबसूरत दस्तकारी ,वस्त्रोत्पादन ,हीरा उद्योग या अन्य भारी उद्योग क्यों परवान चढ़ पाए।वास्तव में शुद्ध भारतीय परिवेश व मीठासमयी संस्कृति को सँजोए हुए गुजरातियों में गजब की उद्यमिता एवँ संघर्ष क्षमता है। उन्हें सरकार से मात्र सरकार जैसी व्यवहार की अपेक्षा रहती है। उन्हें सरकार से सार्वजानिक सुविधा ,संरचना ,सुरक्षा और व्यवसाय परक वातावरण चाहिए न कि व्यक्तिगत सुविधाएँ। इस राज्य में मोदी जी के सफलता का मन्त्र भी यही रहा है। आज के संशय का कारण भी स्थानीय भाजपा नेताओं द्वारा इस मंत्र का थोड़ा बहुत विकृत किया जाना लगता है।
***************सभी धन ऋण विचारों के समायोजनोपरान्त कहा जा सकता है कि मोदी जी के बाद की प्रदेश सरकार यदि पूर्ववत जनता के प्रति संकल्पित रही है और स्थानीय भाजपा के नेता जनता से मित्रवत संवाद में रहे हैं तो राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानते हुए गुजरात के मतदाता भाजपा को विजय श्री देंगे। उभरते भारत में हो रहे बदलाव के दौर में जीएसटी से उत्पन्न अस्थाई व्यावसायिक कठिनाइयोँ के कारण भी वे भाजपा को नहीं नकारें गे। हिमाँचल प्रदेश की भाँति वहाँ एन्टी इनकम्बेंसी जैसा कोई गुणक भी काम नहीं करेगा। ऐसे में भाजपा के हार की सम्भावना बहुत दूर तक नहीं है। हारे गी तभी यदि सत्तारूढ़ सरकार ने सरकार के लिए निर्धारित लक्ष्मण रेखा का अतिक्रमण किया होगा। जीत से भाजपा नीत केंद्र सरकार के आर्थिक सुधारों व विकास कार्यक्रमों को और तीब्र आवेग (मोमेंटम )मिले गा अन्यथा हार, आवेग में अस्थाई ठहराव का,गुजरात से एक साइरन होगा। फिर सिंहावलोकन की स्थिति बने गी और पुनः नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में इन्हीं सुधारों व विकास को प्रचंड समर्थन मिलेगा क्योंकि भारत को दुनियाँ मेँ अपना मुकाम पाना है और हम आम भारतीयों के लिए सबसे पहले भारत है।
वाराणसी ;दिनाँक 14 नवम्बर 2017 ------------------------------------ मंगलवीणा
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अंततः
**********समूचे उत्तरभारत में दीपावली से आरम्भ हुए नव वर्ष का स्वागत धुन्ध ,धुँए ,गुबार व कुहरे से हुआ है। स्वागत भी ऐसा कि लोगों का श्वाँस लेना दुश्वार। सभ्य भाषा में स्मॉग कहर बरपा रहा है और हम लोग जैसी करनी वैसी भरनी पा रहे हैं।
**********आश्चर्य होता है कि नए वर्ष का शुभारम्भ हुआ है और अगहन या मार्गशीर्ष का वह मनोहारी महीना चल रहा है जिसकी महत्ता में प्रभु कृष्ण ने अर्जुन से कहा था कि ऋतुओं में बसन्त ऋतु और महीनों में मार्गशीर्ष का महीना मैं ही हूँ।यथा -
*****बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहं।
*****मासानां मार्गशीर्षः अहम् ऋतुनां कुसुमाकरः। 35 /10 श्रीमद्भगवद्गीता
**********ऐसे महीने में पर्यावरण को स्वयं प्रदूषित कर मानवता कराह रही है। धन्य हैं विज्ञान के उत्कर्ष युग या इस कल युग में जीने वाले हम विद्वान् लोग कि धरती को स्वर्ग न बना नरक बना डाले।क्यों न हम अपनी तुलना मूर्ख कालिदास से करें और कवि कालिदास की ओर अग्रसर हों।
वाराणसी -------- मंगलवीणा
दिनाँक:14 नवम्बर 2017 mangal-veena.blogspot.com
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बुधवार, 11 अक्टूबर 2017
आपदाओं के भँवर में फँसती मानवता
***************मानवता के हत्यारों में एक और नाम स्टीफन पैडक जुड़ गया।अमेरिका के लॉस वेगास शहर में संगीत कॉन्सर्ट देख रहे आम जन समूह पर इस क्रूर हैवान ने पास के एक होटल के बत्तीसवें तल पर स्थित कमरे से चंद मिनटों में इतनी गोलियाँ बरसाई कि पचास के आस पास लोगों की जानें गई और कई सौ लोग गंभीर रूप से घायल हुए।इस भयावह मास शूटिंग की घटना को सदियों तक भूला नहीं जा सके गा।घटना के बाद रस्मी तौर पर हम तथाकथित सभ्य लोग मृतकों की आत्मा की शान्ति के लिए पूर्व की भाँति प्रभु से प्रार्थना कर रहे हैं परन्तु भविष्य में ऐसी कृतिम आपदाएँ कहर न ढायें,इसके लिए न तो हम मतैक्य से सुदृढ़ व्यवस्था बनायेँ गे,न अपराध बोध के लिए प्रभु से क्षमा माँगेगे और न ही मानवता को सन्मति देने के लिए महात्मा गाँधी की भाँति नियमित समूह प्रार्थना करेंगे ।
***************यह दुखद किन्तु सत्य है कि तकनीक के वर्तमान दौर में कृतिम या मानव निर्मित आपदाएँ धरती के हर हिस्से में प्राकृतिक आपदाओं की तुलना में ज्यादा भयावह और दिल दहलाने वाली कहर ढा रही हैं । मजबूर एवँ असहाय मानवता जब और जहाँ कृतिम आपदाओं से हत हो रही है,पीड़ित लोग अश्रु भरे आँखों से एक ही प्रश्न पूछते हैं कि उनकी गलती क्या थी ?उत्तर सभी को पता है परन्तु निदान के नाम पर सारे राष्ट्र व सारी संस्थाएँ अंधकार में लाठी पीटने जैसा स्वाँग कर रही हैं।अधिक क्या कहा जाय ; अमेरिका जैसा संपन्न एवं शक्तिशाली राष्ट्र भी ऐसी कृतिम आपदाओं को रोकने में दृढ़ इच्छाशक्ति नहीं दिखा पा रहा है। इस धरती पर बसने वाली सम्पूर्ण मानवता न जाने किस दिन की प्रतीक्षा कर रही है।
***************वैसे तो प्राकृतिक आपदाओं जैसे अतिवृष्टि,जलप्रलय , बादलों का फटना ,भूकंप ,ज्वालामुखी ,समुद्री या चक्रवाती तूफान इत्यादि को मनुष्य अपने उद्भव काल से आज तक अनवरत झेलता आ रहा है और ये आपदाएँ वैसी ही भयावह और विनाशकारी बनी हुई हैं।फिर भी इन्हे हम इस लिए झेल जाते हैं क्योंकि ये प्रकृति प्रदत्त हैं जिन पर मनुष्य का दैव -दैव कहने के सिवा कोई वश नहीं है। दूजे इन आपदाओं से निपटने में सारी मानवता सामंजस्य बिठा कर एक साथ खड़ी हो जाती है। और तीजे सभ्यता एवं वैज्ञानिक प्रगति के साथ मनुष्य ने इनके प्रभाव को कमतर करने में दक्षता भी प्राप्त कर लिया है। परन्तु इनसे भी विनाशकारी आपदाओं का कहर आदमी ,आदमी पर, बार -बार और लगातार ढा रहा है जिसके लिए न हम दैव -दैव कर सकते हैं न प्रकृति को कोस सकते हैं।सुरक्षा या संहार के नाम पर मानव निर्मित एटमी हथियार आज दुनियाँ में किसी भी प्राकृतिक आपदा से ज्यादा प्रलयंकरी आपदा हैं।सबसे बड़ा डर है कि कहीं मानव निर्मित नाभिकीय आपदाएँ कभी इस प्यारी धरती को पूर्णरूपेण मानव विहीन न कर दें।वस्तुतः इतिहास प्रमाण है कि जहाँ कहीं कृतिम आपदाओं से नरसंहार हुए हैं या हो रहे हैं ,उनके पीछे विचार धारा या सत्तात्मक वर्चस्व ,धार्मिक या नश्ली द्वेष किंवा लापरवाही या संवेदन शून्यता जैसे मूल कारण ही पाए गए हैं।
***************वर्तमान समय में इस विश्व व्यापिनी आपदा ने पूरी एशिया और विशेषतया भारत को अपने ताण्डव की रंगभूमि बना डाली है। प्राकृतिक आपदाएँ जैसे बाढ़ ,सूखा ,शहरों में जल प्रलय ,समुद्री तूफान इत्यादि से तो हम दो चार तो होते ही रहते हैं परन्तु कृतिम आपदाएं तो पूरे देश को निरन्तर रुला रही हैं।राजनीति से निर्मित आपदा का ज्वलंत उदहारण सन उन्नीस सौ सैतालिस में हुआ भारत का विभाजन है जिसने लाखों लोगों की जाने ले ली और करोड़ों लोगों को जन्मभूमि छोड़ने व बेघर होने को विवश किया। पीढ़ियाँ उस आपदा के दंश से अब भी पीड़ित हैं। उसी आपदा के पार्श्व प्रभाव में आए दिन पश्चिमी सीमा पर आज भी गोली बारी से वहाँ के निवासियों व सीमा प्रहरियों की जानें जा रही है।धार्मिक कट्टरवाद व देश विघटन के लिए प्रायोजित आतंकवाद या नक्सलवाद जैसी जघन्य और अमानवीय आपदाएँ मानव निर्मित ही तो हैं। धार्मिक आपदाओं का तो कहना क्या। स्नान ,दर्शन और प्रवचन श्रवण के लिए भीड़ ,अव्यवस्था फिर भगदड़ और अनगिनत मौतें इस देश में प्रायः सुनाई देती हैं।मानवीय लापरवाही के चलते अस्पताल , रेल ,बस कार व अन्य सड़क दुर्घटनाओं द्वारा प्रति वर्ष कई हजार लोग काल कवलित हो रहे हैं। जाँच होती रहती है,सीख़ लेने और भविष्य में इनकी पुनरावृत्ति न होने देने की बात भी होती है परन्तु ये आपदाएँ हैं कि मानती नहीं और यत्र तत्र सर्वत्र कहर बरपाती ही रहती हैं।इस समाज में कहीं भी किसी बेटी या बहन का किसी दरिन्दे द्वारा बलात्कार हो जाना उस पीड़ित परिवार के लिए सबसे दुसह आपदा है।और तो और जिस देश में गौतम और महात्मा जैसे महामानवों ने अहिंसा का सीख दिया हो उस देश में हिंसक प्रवृत्ति का बढ़ना किस आपदा से कमतर है।
***************इन सारी आपदाओं के बीच मानव सभ्यता के पास कुछ ऐसी संजीवनी विशेष तो है कि परिस्थितियों से जूझते और उनपर विजय पाते हुए वह सभ्यतर होती रही है।यह संजीवनी ही परिणामी रूप में व्यवस्था है जिसे सदैव हर रचनात्मक या विध्वंसक उपलब्धि से ज्यादा सक्षम और चुस्त - दुरुस्त बनाना होगा ताकि बिपरीत परिस्थितियों में मानव निर्मित आपदाओं को घटने की स्थिति ही न आने दे।इस समूची धरती पर मनुष्य के लिए मनुष्य के प्रति प्रेम,सहकार तथा सहयोग से ऐसी व्यवस्था साकार हो सकती है।यह ठीक है कि ऐसी व्यवस्था की स्थापना में अभी हम वाँछित सफलता नहीं पाए हैं। फिर भी प्रयास जारी रहना चाहिए क्योंकि प्रयासी कभी असफल नहीं होते।ऐसे ही राह पर आई कैन नामक संस्था, धरती को नाभिकीय आयुधों से मुक्त करने के लिए,अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रयासरत है।वर्ष दो हजार सत्रह के लिए शांति का नोबेल पुरस्कार इंटरनेशनल कम्पेन फॉर अबॉलिशन ऑफ़ न्यूक्लियर वेपन (ICAN) को देकर नोबेल समिति ने इस प्रयास पथ पर मुहर लगा दिया है। अतः उसे साधुवाद और सराहना मिलनी ही चाहिए। ऐसे ही समन्वित प्रयास से उपजी व्यवस्था हमें आपदाओं के भँवर से सदैव बाहर निकालती रहे गी और बेहतरी की यात्रा आगे बढ़े गी ।अनादि काल से न जिंदगी कभी थमी है न कभी थमे गी क्योंकि यह धरती परमेश्वर और प्रकृति की अनूठी कृति है।--------------------------------------------------------------------------------------------मंगलवीणा
वाराणसी ;दिनाँक 12 अक्टूबर 2017 . mangal-veena.blogspot.com
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***************यह दुखद किन्तु सत्य है कि तकनीक के वर्तमान दौर में कृतिम या मानव निर्मित आपदाएँ धरती के हर हिस्से में प्राकृतिक आपदाओं की तुलना में ज्यादा भयावह और दिल दहलाने वाली कहर ढा रही हैं । मजबूर एवँ असहाय मानवता जब और जहाँ कृतिम आपदाओं से हत हो रही है,पीड़ित लोग अश्रु भरे आँखों से एक ही प्रश्न पूछते हैं कि उनकी गलती क्या थी ?उत्तर सभी को पता है परन्तु निदान के नाम पर सारे राष्ट्र व सारी संस्थाएँ अंधकार में लाठी पीटने जैसा स्वाँग कर रही हैं।अधिक क्या कहा जाय ; अमेरिका जैसा संपन्न एवं शक्तिशाली राष्ट्र भी ऐसी कृतिम आपदाओं को रोकने में दृढ़ इच्छाशक्ति नहीं दिखा पा रहा है। इस धरती पर बसने वाली सम्पूर्ण मानवता न जाने किस दिन की प्रतीक्षा कर रही है।
***************वैसे तो प्राकृतिक आपदाओं जैसे अतिवृष्टि,जलप्रलय , बादलों का फटना ,भूकंप ,ज्वालामुखी ,समुद्री या चक्रवाती तूफान इत्यादि को मनुष्य अपने उद्भव काल से आज तक अनवरत झेलता आ रहा है और ये आपदाएँ वैसी ही भयावह और विनाशकारी बनी हुई हैं।फिर भी इन्हे हम इस लिए झेल जाते हैं क्योंकि ये प्रकृति प्रदत्त हैं जिन पर मनुष्य का दैव -दैव कहने के सिवा कोई वश नहीं है। दूजे इन आपदाओं से निपटने में सारी मानवता सामंजस्य बिठा कर एक साथ खड़ी हो जाती है। और तीजे सभ्यता एवं वैज्ञानिक प्रगति के साथ मनुष्य ने इनके प्रभाव को कमतर करने में दक्षता भी प्राप्त कर लिया है। परन्तु इनसे भी विनाशकारी आपदाओं का कहर आदमी ,आदमी पर, बार -बार और लगातार ढा रहा है जिसके लिए न हम दैव -दैव कर सकते हैं न प्रकृति को कोस सकते हैं।सुरक्षा या संहार के नाम पर मानव निर्मित एटमी हथियार आज दुनियाँ में किसी भी प्राकृतिक आपदा से ज्यादा प्रलयंकरी आपदा हैं।सबसे बड़ा डर है कि कहीं मानव निर्मित नाभिकीय आपदाएँ कभी इस प्यारी धरती को पूर्णरूपेण मानव विहीन न कर दें।वस्तुतः इतिहास प्रमाण है कि जहाँ कहीं कृतिम आपदाओं से नरसंहार हुए हैं या हो रहे हैं ,उनके पीछे विचार धारा या सत्तात्मक वर्चस्व ,धार्मिक या नश्ली द्वेष किंवा लापरवाही या संवेदन शून्यता जैसे मूल कारण ही पाए गए हैं।
***************वर्तमान समय में इस विश्व व्यापिनी आपदा ने पूरी एशिया और विशेषतया भारत को अपने ताण्डव की रंगभूमि बना डाली है। प्राकृतिक आपदाएँ जैसे बाढ़ ,सूखा ,शहरों में जल प्रलय ,समुद्री तूफान इत्यादि से तो हम दो चार तो होते ही रहते हैं परन्तु कृतिम आपदाएं तो पूरे देश को निरन्तर रुला रही हैं।राजनीति से निर्मित आपदा का ज्वलंत उदहारण सन उन्नीस सौ सैतालिस में हुआ भारत का विभाजन है जिसने लाखों लोगों की जाने ले ली और करोड़ों लोगों को जन्मभूमि छोड़ने व बेघर होने को विवश किया। पीढ़ियाँ उस आपदा के दंश से अब भी पीड़ित हैं। उसी आपदा के पार्श्व प्रभाव में आए दिन पश्चिमी सीमा पर आज भी गोली बारी से वहाँ के निवासियों व सीमा प्रहरियों की जानें जा रही है।धार्मिक कट्टरवाद व देश विघटन के लिए प्रायोजित आतंकवाद या नक्सलवाद जैसी जघन्य और अमानवीय आपदाएँ मानव निर्मित ही तो हैं। धार्मिक आपदाओं का तो कहना क्या। स्नान ,दर्शन और प्रवचन श्रवण के लिए भीड़ ,अव्यवस्था फिर भगदड़ और अनगिनत मौतें इस देश में प्रायः सुनाई देती हैं।मानवीय लापरवाही के चलते अस्पताल , रेल ,बस कार व अन्य सड़क दुर्घटनाओं द्वारा प्रति वर्ष कई हजार लोग काल कवलित हो रहे हैं। जाँच होती रहती है,सीख़ लेने और भविष्य में इनकी पुनरावृत्ति न होने देने की बात भी होती है परन्तु ये आपदाएँ हैं कि मानती नहीं और यत्र तत्र सर्वत्र कहर बरपाती ही रहती हैं।इस समाज में कहीं भी किसी बेटी या बहन का किसी दरिन्दे द्वारा बलात्कार हो जाना उस पीड़ित परिवार के लिए सबसे दुसह आपदा है।और तो और जिस देश में गौतम और महात्मा जैसे महामानवों ने अहिंसा का सीख दिया हो उस देश में हिंसक प्रवृत्ति का बढ़ना किस आपदा से कमतर है।
***************इन सारी आपदाओं के बीच मानव सभ्यता के पास कुछ ऐसी संजीवनी विशेष तो है कि परिस्थितियों से जूझते और उनपर विजय पाते हुए वह सभ्यतर होती रही है।यह संजीवनी ही परिणामी रूप में व्यवस्था है जिसे सदैव हर रचनात्मक या विध्वंसक उपलब्धि से ज्यादा सक्षम और चुस्त - दुरुस्त बनाना होगा ताकि बिपरीत परिस्थितियों में मानव निर्मित आपदाओं को घटने की स्थिति ही न आने दे।इस समूची धरती पर मनुष्य के लिए मनुष्य के प्रति प्रेम,सहकार तथा सहयोग से ऐसी व्यवस्था साकार हो सकती है।यह ठीक है कि ऐसी व्यवस्था की स्थापना में अभी हम वाँछित सफलता नहीं पाए हैं। फिर भी प्रयास जारी रहना चाहिए क्योंकि प्रयासी कभी असफल नहीं होते।ऐसे ही राह पर आई कैन नामक संस्था, धरती को नाभिकीय आयुधों से मुक्त करने के लिए,अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रयासरत है।वर्ष दो हजार सत्रह के लिए शांति का नोबेल पुरस्कार इंटरनेशनल कम्पेन फॉर अबॉलिशन ऑफ़ न्यूक्लियर वेपन (ICAN) को देकर नोबेल समिति ने इस प्रयास पथ पर मुहर लगा दिया है। अतः उसे साधुवाद और सराहना मिलनी ही चाहिए। ऐसे ही समन्वित प्रयास से उपजी व्यवस्था हमें आपदाओं के भँवर से सदैव बाहर निकालती रहे गी और बेहतरी की यात्रा आगे बढ़े गी ।अनादि काल से न जिंदगी कभी थमी है न कभी थमे गी क्योंकि यह धरती परमेश्वर और प्रकृति की अनूठी कृति है।--------------------------------------------------------------------------------------------मंगलवीणा
वाराणसी ;दिनाँक 12 अक्टूबर 2017 . mangal-veena.blogspot.com
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रविवार, 6 अगस्त 2017
मित्रता दिवस
स्वार्थ की तीन स्थितियाँ होती हैं -जुड़ाव, टकराव और न जुड़ाव न टकराव ।
पहली से मित्र व सम्बन्धी बनते हैं,दूसरी से शत्रु तथा तीसरी से तटस्थ अर्थात न मित्र न शत्रु जैसे सड़क, रास्ते या अन्यत्र कहीं किसी का मिल जाना ।
मित्रता दिवस पर हमें संकल्प लेना चाहिए कि हम अपने स्वार्थ को कभी भी अपने सम्बन्धी या मित्र के स्वार्थ से टकराने नहीं देंगे ताकि वे हमारे अपने सदैव बने रहें ।शुभम्अस्तु ।-------मंगलवीणा
वाराणसी ,दिनाँक 0 6 अगस्त 2017 -------------------------------------------mangal-veena.blogspot.com
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पहली से मित्र व सम्बन्धी बनते हैं,दूसरी से शत्रु तथा तीसरी से तटस्थ अर्थात न मित्र न शत्रु जैसे सड़क, रास्ते या अन्यत्र कहीं किसी का मिल जाना ।
मित्रता दिवस पर हमें संकल्प लेना चाहिए कि हम अपने स्वार्थ को कभी भी अपने सम्बन्धी या मित्र के स्वार्थ से टकराने नहीं देंगे ताकि वे हमारे अपने सदैव बने रहें ।शुभम्अस्तु ।-------मंगलवीणा
वाराणसी ,दिनाँक 0 6 अगस्त 2017 -------------------------------------------mangal-veena.blogspot.com
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