बुधवार, 15 नवंबर 2017

गुजरात से शँखनाद या साइरन ?

***************आज की तिथि में गुजरात हमारे देश के कतिपय सर्वाधिक विकसित राज्यों में एक है और हमारी प्रगति का पर्याय है ।सकल घरेलू उत्पाद या प्रति व्यक्ति सालाना आय अथवा खुशहाल जिंदगी के मानक आँकड़ों की बात न कर केवल विभिन्न राज्यों से गुजरात जाकर वहाँ अपनी जीविका चलाने वालों की संख्या तथा उस राज्य के विकास पर उनकी राय ले कर गुजरात विकास की चकाचौंध करने वाली सच्चाई समझी जा सकती है।न्यूनाधिक सभी राज्यों , विशेषतया पिछड़े राज्यों, के लोग गुजरात के विभिन्न शहरों या कस्बों में काम करते मिल जाँयगे जबकि व्यवसाय से इतर जीविका के लिए अन्य राज्यों में गुजराती न के समतुल्य मिलें गे। यही है गुजरात का विकास मॉडल जो आम लोगों को दिखता है।
***************परन्तु हमारे देश के तथाकथित यायावर नेता जो पीढ़ियों से गरीब देश के अमीर लुटेरे हैं और जिनके लिए यूरोपीय व अमेरिकन देश सुगम व सुरम्य सैर- गाह हैं ,उन्हें गुजरात में कहीं विकास दिखता ही नहीं। ये वही लुटेरे हैं जिनकी मान्यता है कि जहाँ लूट के अवसर नहीं वहाँ विकास कैसा। सन दो हजार चौदह तक देश की गद्दी जुगाड़े इन लुटेरों का कृत्य जन जन को पता है फिर भी निर्लज्ज बगुला भगत सा विश्वास पाले गुजरात के मैदान में धर्म ,जाति ,सवर्ण , पिछडों और दलितों का जहर घोल कर ये विजय की आशा पाल रहे हैं।इन हारे हुए काँग्रेसी खिलाडियों के पास हारने को कुछ नहीं है पर खेल बिगाड़ने को बहुत कुछ है। वहीँ गुजरात की जनता एक बड़ी कसौटी पर चढ़ी हुई है। वह या तो भारतीय जनता पार्टी को विजय देगी या पराजय ।
***************देश के हर राष्ट्रप्रेमी नागरिक की आकांछा है कि गुजरात के लोग भाजपा को विजयश्री पहना कर श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार द्वारा चलाये जा रहे आर्थिक , सामाजिक तथा सामरिक सुधारों पर मुहर लगायें ताकि देश विदेश को एक संदेश मिल सके कि जिस  मोदी ने वर्षों तक गुजरातियों की बेहतरी के लिए साधना किया और जिस जनता ने उन्हें आज प्रधान मन्त्री के पद तक पहुँचाया वे आज भी थोड़ी दुश्वारियों के बावजूद  एक दूसरे के लिए चट्टान की भाँति खड़े हैं। याद रहे कि आर्थिक उतार- चढ़ाव तथा मत भिन्नता के बाद भी मोदी जी राष्ट्रवाद ,राष्ट्रभक्ति ,राष्ट्रगौरव व सर्वोपरि -राष्ट्र वाली अवधारणा के बेजोड़ नायक व आशा के किरण पुञ्ज हैं। इस तथ्य को हमें किसी भी पल दृष्टि से ओझल नहीं कर सकते क्योंकि सावधानी हटी कि देश लुटा।
***************दूसरी अर्थात पराजय की स्थिति में स्थिति के कारण महत्वपूर्ण हो जाँयगे और सारे विपक्षी नेता एक होकर देश को सन चौदह से पूर्व की स्थिति में घसीट ले जाने व सत्ता सुख के बंदरबाँट का पुरजोर प्रयास करेंगे।फलतः बचे डेढ़ वर्षों में केंद्र सरकार को उग्र विपक्षी विरोध का सामना करना होगा जिससे सरकार की दृढ इच्छाशक्ति डगमगा सकती है।हार भाजपा की होगी परन्तु खुशियाँ विघटनकारी नेता व पार्टियाँ मनाएँ गी। जो  कारण मतदाताओं को भाजपा के विरोध में जाने को प्रेरित कर सकते हैं वे क्रमशः पाटीदारों का आरक्षण के नाम पर प्रबल विरोध ,दलितों में उकसाया गया छद्म असंतोष ,व्यवसाय पर जीएसटी का कुप्रभाव ,पेट्रोलियम पदार्थों की घटी कीमतों का लाभ जनता को न देना ,स्थानीय भाजपा नेताओं के प्रति विकर्षण तथा सबसे ऊपर राज्य स्तर पर मोदी जी जैसे चमत्कारी नेता की अनुपलब्धता हैं।
*************** निश्चय ही राष्ट्रवाद की छाँव में भाजपा  यह भूल रही है की सरकार अपनी जनता के लिए एक चुनी हुई कल्याणकारी संस्था होती है और बिना कोई संकट की स्थिति आए वह जनता को आर्थिक बेहतरी के बदले आर्थिक बदहाली नहीं दे सकती।आम जन की जेब पर दबाव पड़ेगा तो समर्थन भी घटे गा।फिर भी दबाव ने कोई लक्ष्मण रेखा नहीं पार किया है कि जिस दल के सरकार ने गुजरात में वर्षों तक बेहतरीन परफॉर्मन्स दिया ,गुजरात को आधुनिक गुजरात बनाया व देश को मोदी जी जैसा अद्वितीय नायक दिया ;उसे राज्य से सत्ताच्युत कर दिया जाय।
***************सरकारी सेवा में रहते हुए उन्नीस सौ नवासी से वानवे तक मुझे गुजरात के विभिन्न स्थानों पर भ्रमण करने व वहाँ के विभिन्न वर्ग व समुदाय के  लोगों के साथ जब संपर्क का अवसर मिला तो समझ आई  कि प्रभु श्रीकृष्ण को द्वारकापुरी  रास क्यों आई याकि गाँधी जैसे सत्य एवँ अहिँसावादी और पटेल जैसे  लौहपुरुष वहीँ क्यों उपजे। वहीँ समझ सका कि पानी की कमी से जूझते प्रदेश में  अमूल जैसी श्वेत क्रान्ति ,खूबसूरत दस्तकारी ,वस्त्रोत्पादन ,हीरा उद्योग या अन्य भारी उद्योग क्यों परवान चढ़ पाए।वास्तव में शुद्ध भारतीय परिवेश व मीठासमयी संस्कृति को सँजोए हुए गुजरातियों में गजब की उद्यमिता एवँ संघर्ष क्षमता है। उन्हें सरकार  से मात्र  सरकार जैसी व्यवहार की अपेक्षा रहती है। उन्हें सरकार से सार्वजानिक सुविधा ,संरचना ,सुरक्षा और व्यवसाय परक वातावरण चाहिए न कि व्यक्तिगत सुविधाएँ। इस राज्य में मोदी जी के सफलता का मन्त्र भी यही रहा है। आज के संशय का कारण भी स्थानीय भाजपा नेताओं द्वारा इस मंत्र का थोड़ा बहुत विकृत किया जाना लगता है।
***************सभी धन ऋण  विचारों के समायोजनोपरान्त कहा जा सकता है कि मोदी जी के बाद की प्रदेश सरकार यदि पूर्ववत जनता के प्रति संकल्पित रही है और स्थानीय भाजपा के नेता जनता से मित्रवत संवाद में रहे हैं तो राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानते हुए गुजरात के मतदाता भाजपा को विजय श्री देंगे। उभरते भारत में हो रहे बदलाव के दौर में जीएसटी से उत्पन्न अस्थाई व्यावसायिक कठिनाइयोँ  के कारण भी वे भाजपा को नहीं नकारें गे। हिमाँचल प्रदेश की भाँति वहाँ एन्टी इनकम्बेंसी जैसा कोई गुणक भी काम नहीं करेगा। ऐसे में भाजपा के हार की सम्भावना बहुत दूर तक नहीं है। हारे गी तभी यदि सत्तारूढ़ सरकार ने सरकार के लिए निर्धारित लक्ष्मण रेखा का अतिक्रमण किया होगा। जीत से भाजपा नीत केंद्र सरकार के आर्थिक सुधारों व विकास कार्यक्रमों  को और तीब्र आवेग (मोमेंटम )मिले गा अन्यथा  हार, आवेग में अस्थाई ठहराव का,गुजरात से एक साइरन होगा। फिर सिंहावलोकन की स्थिति बने गी और पुनः नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में  इन्हीं सुधारों व विकास को प्रचंड समर्थन मिलेगा  क्योंकि भारत को दुनियाँ मेँ अपना मुकाम पाना है और हम आम भारतीयों के लिए सबसे पहले भारत है।
वाराणसी ;दिनाँक 14 नवम्बर 2017         ------------------------------------ मंगलवीणा
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अंततः
 **********समूचे उत्तरभारत में दीपावली से आरम्भ हुए नव वर्ष का स्वागत धुन्ध ,धुँए ,गुबार व कुहरे से हुआ है। स्वागत भी ऐसा कि लोगों का श्वाँस लेना दुश्वार। सभ्य भाषा में स्मॉग  कहर बरपा रहा है और हम लोग जैसी करनी वैसी भरनी पा रहे हैं।
**********आश्चर्य होता है कि नए वर्ष का शुभारम्भ हुआ है और अगहन या मार्गशीर्ष का वह मनोहारी महीना चल रहा है जिसकी महत्ता में  प्रभु कृष्ण ने अर्जुन से कहा था कि ऋतुओं में बसन्त ऋतु और महीनों में मार्गशीर्ष का महीना मैं ही हूँ।यथा -
*****बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहं।
*****मासानां मार्गशीर्षः अहम् ऋतुनां कुसुमाकरः। 35 /10 श्रीमद्भगवद्गीता
**********ऐसे महीने में पर्यावरण को स्वयं प्रदूषित कर मानवता कराह रही है। धन्य हैं विज्ञान के उत्कर्ष युग या इस कल युग में जीने वाले हम विद्वान् लोग कि धरती को स्वर्ग न बना नरक बना डाले।क्यों न हम अपनी तुलना मूर्ख कालिदास से करें और कवि कालिदास की ओर अग्रसर हों।
वाराणसी                                                                              -------- मंगलवीणा
दिनाँक:14 नवम्बर 2017                                     mangal-veena.blogspot.com
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बुधवार, 11 अक्टूबर 2017

आपदाओं के भँवर में फँसती मानवता

***************मानवता के हत्यारों में एक और नाम स्टीफन पैडक जुड़ गया।अमेरिका के लॉस वेगास शहर में संगीत कॉन्सर्ट देख रहे आम जन समूह पर इस क्रूर हैवान ने पास के एक होटल के बत्तीसवें तल पर स्थित कमरे से चंद मिनटों में इतनी गोलियाँ बरसाई कि पचास के आस पास लोगों की जानें गई और कई सौ लोग गंभीर रूप से घायल हुए।इस भयावह मास शूटिंग की घटना को सदियों तक भूला नहीं जा सके गा।घटना के बाद रस्मी तौर पर हम तथाकथित सभ्य लोग मृतकों की आत्मा की शान्ति के लिए पूर्व की भाँति प्रभु से प्रार्थना कर रहे हैं परन्तु भविष्य में ऐसी कृतिम आपदाएँ कहर न ढायें,इसके लिए न तो हम मतैक्य से सुदृढ़ व्यवस्था बनायेँ गे,न अपराध बोध के लिए प्रभु से क्षमा माँगेगे और न ही मानवता को सन्मति देने के लिए महात्मा गाँधी की भाँति  नियमित समूह प्रार्थना करेंगे ।
***************यह दुखद किन्तु सत्य है कि तकनीक के वर्तमान दौर में कृतिम या मानव निर्मित आपदाएँ धरती के हर हिस्से में प्राकृतिक आपदाओं की तुलना में ज्यादा भयावह और दिल  दहलाने  वाली कहर ढा रही  हैं । मजबूर एवँ असहाय मानवता जब और जहाँ कृतिम आपदाओं से हत हो रही है,पीड़ित लोग अश्रु भरे आँखों से एक ही प्रश्न पूछते हैं कि उनकी गलती क्या थी ?उत्तर सभी को पता है परन्तु निदान के नाम पर सारे राष्ट्र व सारी संस्थाएँ अंधकार में लाठी पीटने जैसा स्वाँग कर रही हैं।अधिक क्या कहा जाय ; अमेरिका जैसा संपन्न एवं शक्तिशाली राष्ट्र भी ऐसी कृतिम आपदाओं को रोकने में दृढ़ इच्छाशक्ति नहीं दिखा पा रहा है। इस धरती पर बसने वाली सम्पूर्ण मानवता न जाने किस दिन की प्रतीक्षा कर रही है।
***************वैसे तो प्राकृतिक आपदाओं जैसे अतिवृष्टि,जलप्रलय , बादलों का फटना ,भूकंप ,ज्वालामुखी ,समुद्री या चक्रवाती तूफान इत्यादि को मनुष्य अपने उद्भव काल से आज तक अनवरत झेलता आ रहा है और ये आपदाएँ वैसी ही भयावह और विनाशकारी बनी हुई हैं।फिर भी इन्हे हम इस लिए झेल जाते हैं क्योंकि ये प्रकृति प्रदत्त हैं जिन पर मनुष्य का दैव -दैव कहने के सिवा कोई वश नहीं है। दूजे इन आपदाओं से निपटने में सारी मानवता सामंजस्य बिठा कर एक साथ खड़ी हो जाती है। और तीजे सभ्यता एवं वैज्ञानिक प्रगति के साथ मनुष्य ने इनके प्रभाव को कमतर करने में दक्षता  भी प्राप्त कर लिया है। परन्तु इनसे भी विनाशकारी आपदाओं का कहर आदमी ,आदमी पर, बार -बार और लगातार ढा रहा है जिसके लिए न हम दैव -दैव कर सकते हैं न प्रकृति को कोस सकते हैं।सुरक्षा या संहार के नाम पर मानव निर्मित एटमी हथियार आज   दुनियाँ में किसी भी प्राकृतिक आपदा से ज्यादा प्रलयंकरी आपदा हैं।सबसे बड़ा डर है कि कहीं मानव निर्मित नाभिकीय आपदाएँ कभी इस प्यारी धरती को पूर्णरूपेण मानव विहीन न कर दें।वस्तुतः इतिहास प्रमाण है कि जहाँ  कहीं कृतिम आपदाओं से नरसंहार हुए हैं या हो रहे हैं ,उनके पीछे विचार धारा  या सत्तात्मक  वर्चस्व ,धार्मिक या नश्ली द्वेष किंवा लापरवाही या संवेदन शून्यता जैसे मूल कारण ही पाए गए हैं।
***************वर्तमान समय में इस विश्व व्यापिनी आपदा ने पूरी एशिया और विशेषतया भारत को अपने ताण्डव की रंगभूमि बना डाली है। प्राकृतिक आपदाएँ जैसे बाढ़ ,सूखा ,शहरों में जल प्रलय ,समुद्री तूफान इत्यादि से तो हम दो चार तो होते ही रहते हैं परन्तु कृतिम आपदाएं तो पूरे देश को निरन्तर रुला रही हैं।राजनीति से निर्मित आपदा का ज्वलंत उदहारण सन उन्नीस सौ सैतालिस में हुआ भारत का विभाजन है जिसने लाखों लोगों की जाने ले ली और करोड़ों लोगों को जन्मभूमि छोड़ने व बेघर होने को विवश किया। पीढ़ियाँ उस आपदा के दंश से अब भी पीड़ित हैं। उसी आपदा के पार्श्व प्रभाव में  आए दिन पश्चिमी सीमा पर आज भी गोली बारी से वहाँ के निवासियों व सीमा प्रहरियों की जानें जा रही  है।धार्मिक कट्टरवाद व देश विघटन के लिए प्रायोजित आतंकवाद या नक्सलवाद जैसी जघन्य और अमानवीय आपदाएँ मानव निर्मित ही तो हैं। धार्मिक आपदाओं का तो कहना क्या। स्नान ,दर्शन और प्रवचन श्रवण के लिए भीड़ ,अव्यवस्था फिर भगदड़  और अनगिनत मौतें इस देश में प्रायः सुनाई देती हैं।मानवीय लापरवाही के चलते अस्पताल , रेल ,बस कार व अन्य सड़क दुर्घटनाओं द्वारा प्रति वर्ष कई हजार लोग काल कवलित हो रहे हैं। जाँच होती रहती है,सीख़ लेने और भविष्य में इनकी पुनरावृत्ति न होने देने की बात भी होती है परन्तु ये आपदाएँ हैं कि मानती नहीं और यत्र तत्र सर्वत्र कहर बरपाती ही रहती हैं।इस समाज में कहीं भी किसी बेटी या बहन का किसी दरिन्दे द्वारा बलात्कार हो जाना उस पीड़ित परिवार के लिए सबसे दुसह आपदा है।और तो और जिस देश में गौतम और महात्मा जैसे महामानवों ने अहिंसा का सीख दिया हो उस देश में हिंसक प्रवृत्ति का बढ़ना किस आपदा से कमतर है।
***************इन सारी आपदाओं के बीच मानव सभ्यता के पास कुछ ऐसी संजीवनी विशेष तो है कि परिस्थितियों से जूझते और उनपर विजय पाते हुए वह सभ्यतर होती रही है।यह संजीवनी ही परिणामी रूप में व्यवस्था है जिसे सदैव हर रचनात्मक या विध्वंसक उपलब्धि से ज्यादा  सक्षम और चुस्त - दुरुस्त बनाना होगा ताकि बिपरीत परिस्थितियों में मानव निर्मित आपदाओं को घटने की स्थिति ही न आने दे।इस समूची धरती पर मनुष्य के लिए मनुष्य के प्रति प्रेम,सहकार तथा सहयोग से ऐसी व्यवस्था साकार हो सकती है।यह ठीक है कि ऐसी व्यवस्था की स्थापना में अभी हम वाँछित सफलता नहीं पाए हैं। फिर भी प्रयास जारी रहना चाहिए क्योंकि प्रयासी कभी असफल नहीं होते।ऐसे ही राह पर आई कैन नामक संस्था, धरती को नाभिकीय आयुधों से मुक्त करने के लिए,अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर  प्रयासरत है।वर्ष दो  हजार सत्रह के लिए शांति का नोबेल पुरस्कार इंटरनेशनल कम्पेन फॉर अबॉलिशन ऑफ़ न्यूक्लियर वेपन (ICAN)  को देकर नोबेल समिति ने इस प्रयास पथ पर मुहर लगा दिया है। अतः उसे साधुवाद और सराहना मिलनी ही चाहिए। ऐसे ही समन्वित प्रयास  से उपजी व्यवस्था हमें आपदाओं के भँवर से  सदैव बाहर निकालती रहे गी और बेहतरी की यात्रा आगे बढ़े गी ।अनादि काल से न जिंदगी कभी थमी है न कभी थमे गी क्योंकि यह धरती परमेश्वर और प्रकृति की अनूठी कृति है।--------------------------------------------------------------------------------------------मंगलवीणा
वाराणसी ;दिनाँक 12 अक्टूबर 2017 .                          mangal-veena.blogspot.com
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रविवार, 6 अगस्त 2017

मित्रता दिवस

स्वार्थ की तीन स्थितियाँ होती हैं -जुड़ाव, टकराव और न जुड़ाव न टकराव ।
पहली से मित्र व सम्बन्धी बनते हैं,दूसरी से शत्रु तथा तीसरी से तटस्थ अर्थात न मित्र न शत्रु जैसे सड़क, रास्ते या अन्यत्र कहीं किसी का मिल जाना ।
मित्रता दिवस पर हमें संकल्प लेना चाहिए कि हम अपने स्वार्थ को कभी भी अपने सम्बन्धी या मित्र के स्वार्थ से टकराने नहीं देंगे ताकि वे हमारे अपने सदैव बने रहें ।शुभम्अस्तु ।-------मंगलवीणा
वाराणसी ,दिनाँक 0 6 अगस्त 2017 -------------------------------------------mangal-veena.blogspot.com
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मंगलवार, 4 जुलाई 2017

किसान भी बदल गए

***************निश्चय ही भारत बदल रहा है। वोटतन्त्र के कारण हमारे देश में  आरक्षण ,सुविधा  एवं छूट माँगने तथा उन्हें पाने वालों की संख्या दिन दूनी रात चौगुनी  बढ़ती जा रही है।जनता के लिए सुविधाओं का बढ़ना जहाँ अर्थ ब्यवस्था के बढ़ते सामर्थ्य  की परिचायक है वहीँ आरक्षण और छूट देश की प्रगति में सबसे बड़े वाधक हैं।इन्हीं बाधाओं के परिपेक्ष्य में कृषि ऋण माफ़ी के लिए किसानों का,अपने मूल स्वभाव की लक्ष्मण रेखा लाँघ कर, आन्दोलित होना  इस वर्ष की सर्वाधिक अचंभित करने करने वाली घटना है।इसे अन्य आंदोलनों की दृष्टि से देखना बहुत बड़ी भूल होगी क्योंकि इतिहास के क्रम  में आज भारत जहाँ पहुँचा है; उसका प्रथम श्रेय भारत के कृषक एवं कृषि को जाता है और कल भारत विश्वपटल पर कहाँ होगा ;यह भी कृषि के विकास एवं कृषक की खुशहाली पर निर्भर होगा।  अतः तमिल- नाडु  ,महाराष्ट्र ,मध्यप्रदेश ,पंजाब ,राजस्थान ,कर्नाटक व अन्य राज्यों में उठे किसान आंदोलन ,उनकी पृष्ठभूमि ,कारण और निवारण पर गहन विमर्श की आवश्यकता है। जिसे समाज अन्नदाता और जीवन दाता कहता रहा वह उचित मूल्य पर  साधन ,सुविधा की अपेक्षा से हट कर सरकारों से ऋण माफ़ी ,मुफ्त की बिजली ,छूट की खाद ,छूट के अन्य सारे संसाधन व फसल की ऊँचे दाम पर सुविधापूर्ण विक्री माँग रहा है।बहुत अटपटी बात है कि सास्वत दाता आदाता की भूमिका में सामने है।
***************विगत कुछ वर्षों से किसानों में आत्महत्या की घटनाएँ बढ़ी हैं परन्तु आत्महत्या करने वालों की सूची में केवल  किसान ही हैं ;ऐसा नहीं है। नौकरी या सेवा क्षेत्र के लोग ,उद्योग करने वाले ,व्यवसायी ,छात्र ,व अन्य सभी वर्ग के लोग भी आत्महत्या करते रहे हैं और उनकी आत्महत्या के लिए उत्तरदायी आर्थिक ,वैयक्तिक  व मनोवैज्ञानिक कारणों की चर्चा भी सामने आती रही हैं।सारी दशाएँ समान होते हुए मात्र कृषक होना कोई ऐसा कारण नहीं है जो सहानुभूति विशेष की पृष्ठभूमि बनाती हो। हाँ ,चूँकि हमारा देश कृषि प्रधान देश है और आधा से ज्यादा आबादी कृषि से जुड़ी है,अतः इसकी बेहतरी के लिए सरकार एवं समाज के अन्य वर्गों द्वारा सर्वाधिक ध्यान  देने एवं सुविधाएँ बढ़ाने की अपेक्षा है।यदि तकनीक ,ऋण ,बिजली ,सिंचाई ,कृषि बीमा ,खाद ,बीज ,उत्पाद विपणन व  भण्डारण के साथ किसानों को नियमित विशेषज्ञ परामर्श की सुविधा मिलती रहे तो पारिवारिक ,सामाजिक एवं राष्ट्रीय दायित्व निर्वाह के लिए उसे अग्रिम पंक्ति में खड़ा दीखना चाहिए। उपभोक्तावाद के चलते विलासिता की वस्तुयें भले ही आज किसानों के लिए भी अपरिहार्य हो गई हैं परन्तु एक किसान को ऐसी इच्छा पूर्ति के लिए कभी भी फसली ऋण नहीं लेना चाहिए और हर हाल में अपनी रफ एवं टफ की छवि बनाये रखना चाहिए। स्व लाल बहादुर शास्त्री जी द्वारा दिया गया 'जय जवान -जय किसान 'का नारा किसानों को भी बहुत गहरा सन्देश देता है।एक किसान की जो छवि लोगों की दिलों में है ;उससे विरत होने पर आज उनकी गरिमा खण्डित हो रही है।
*************** किसान और किसानी को वर्तमान पड़ाव तक पहुँचाने वाले निमित्तों की जानकारी हेतु  उनसे जुड़ी मूल बातों पर ध्यान देना सन्दर्भ सहायक होगा।यथा साधरणतया खाद्यान्न, तेल ,मसाले, दूध  ,फल -सब्जी,गन्ना ,कपास इत्यादि  के उत्पादन ,पशुपालन ,बागवानी व उनसे जुड़े अन्य विविध क्रियाकलापों को खेती या किसानी तथा इन कामों में लगे लोगों को खेतिहर या किसान कहते हैं और खेती का सीधा सम्बन्ध खेत या जमीन से होता  है।फिर बात जब खेत और किसान की की जाय तो जहाँ हमारे देश में खेती योग्य जमीन घट कर आधी से भी कम बची हैं ,वहीँ सारे विकास और औद्योगीकरण के बाद भी कृषि पर निर्भर कुल जन संख्या देश की पूरी जनसँख्या की आधा से अधिक है।आज की स्थिति यह है कि आबादी के बढ़ते और परिवारों के बँटते तीन चौथाई से अधिक किसानों के पास चार बीघे या उससे कम कृषि योग्य जमीन बची हैं। इतना ही नहीं ,गाँवों में देश के सर्वाधिक बेरोजगार बसते हैं और वे भी अपने परिवारिक कृषि से जुड़ जाते हैं। ऐसे में लघु और सीमांत स्तर की खेती व इससे जुड़े अन्य उद्यमों में इतनी उत्पादकता शेष नहीं है कि इतनी बड़ी जनसँख्या को समाहित कर उपभोक्तावादी खुशियाँ सुनिश्चित कर सके।यह भी तथ्य कान खड़ा करने वाला है कि इतनी बड़ी मात्रा में मानव संसाधन एवं कृषि भूमि खपने के बाद भी भारत की कुल सकल घरेलू उत्पाद में कृषि क्षेत्र का योगदान सप्तमांश के आस पास ही है। संकेत स्पष्ट है कि कृषि क्षेत्र में सराहनीय प्रगति के बावजूद विगत वर्षों में योजनाकारों ने इस क्षेत्र की सारी समस्याओं एवं भावी परिदृश्य पर ध्यान नहीं दिया।उल्टे वोट की राजनीति ने इन समस्याओं और अनुचित प्रलोभनों को सत्ता पाने का हथियार बना डाला।परिणाम सामने है। राजनीति से सुचिता गई और कृषि की मर्यादा डगमगाई ।
***************यदि राजनीति एवं अनुचित लोभ को अलग रख कर देखा जाय तो देश की प्रगति  में अद्वितीय योगदान के लिए  हर देशवासी को  किसानों पर सदैव गर्व  रहा है।ये किसान ही हैं जिन्होंने खाद्यन्न के लिए देश को आत्मनिर्भर ही नहीं निर्यातक भी बनाया। उनके ही पसीने से जहाँ उत्पादन में कई  गुणा बढ़ोत्तरी हुई वहीँ कृषि में नए -नए अवसर व विविधताएँ जुड़ी। भविष्य में इनके और बढ़ने की अपार  संभावनाएं हैं।एक समय था  जब खाद्यान्न की कमी के कारण देशवासियों से सप्ताह में एक दिन अन्न न खाने की अपील हुआ करती थी तथा पी एल चार सौ अस्सी के अंतर्गत आयातित गेहूँ ,मक्के के आटा पाने को भागम -भाग मचती थी ,आज उसी भारत के गोदामों मेँ पड़े अधिशेषों  का निष्तारण कठिन हो रहा है। इसका सम्पूर्ण श्रेय दीर्घावधि की हरित व श्वेत क्रांति जैसी सफल योजनाओं एवं हमारे कृषकों को ही जाती है। आज उन्नत कृषि का वह दौर है जब हमारे राज्यों में  कृषि उत्पादन बढ़ाने व किसानों की कमाई बढ़ाने की होड़ मची है और मध्यप्रदेश जैसे राज्य अधिक उत्पादन से उपजी समस्या झेल रहे हैं क्योंकि कृषकों के उत्पाद खरीदने वाले नहीं मिल रहे हैं। आपूर्ति बढ़ रही है परन्तु माँग परंपरागत एवं पूर्ववत है।फसल न बिकने ,उचित मूल्य न मिलने या फसल वर्बाद होनेसे ऋण लेने वाले किसान बैंकों को ऋण की अदायगी नहीं कर पा रहे हैं ,जिस कारण तनावग्रस्त हो रहे हैं।यही समस्यायें किसानों को आत्महत्या या आंदोलनों के लिए प्रेरित कर रही हैं।परन्तु स्वभावतः कठिनाइयों से जूझने वाले किसान, जिनसे संयम ,साहस और सहनशीलता भी परिभाषित होते रहे हों ,उनका उद्वेलित होना , हिंसात्मक आंदोलन पर उतरना,ऋण माफ़ी जैसा प्रगति विरोधी माँग करना या अवसादग्रस्त हो आत्महत्या करना सबको चौंका रहा है। कहाँ हैं स्व मैथिली शरण गुप्त की कविता में वर्णित किसान --
---------------------------------घनघोर वर्षा हो रही है ,गगन गर्जन कर रहा 
----------------------------------घर से निकलने को गरज कर ,वज्र वर्जन कर रहा 
----------------------------------तो भी कृषक मैदान में करते निरंतर काम हैं 
----------------------------------किस लोभ में वे आज भी,लेते नहीं विश्राम हैं  
 ***************  समय का निर्देश है कि आमदनी  के लिए किसानों द्वारा उपजाई पैदावार की शत प्रतिशत एवं उचित मूल्य पर त्वरित विक्री सुनिश्चित हो साथ ही उनके फसल ,पशुधन व बाग -बगीचों की व्यावहारिक एवं प्रचुर बीमा हो।शत प्रतिशत खरीद या खपत तभी सम्भव हो सकती है जब बहुत बड़े स्तर पर भण्डारण ,संरक्षण ,प्रसंस्करण और उत्पाद विविधीकरण हेतु उद्योगों की श्रृंखला स्थापित हों।कृषि उत्पादों को देश के एक कोने से दूसरे कोने तक त्वरित पहुँच के लिए एक अलग विशेष यातायात संजाल  की स्थापना भी समस्या समाधन की अनेक उपायों में एक है। इन नई आवश्यकताों से उपजी कृषि क्रान्ति को धरातल पर उतारने का समय है और सरकारें भी इसके लिए गंभीरता से आगे बढ़ रही हैं।देश की कृषि पर आधारित आबादी कितनी भी बढ़ जाय ,हमारी जोत जमीन की उर्वरा शक्ति एवं जलवायु की विविधता सबको समायोजित करने एवं खुशहाल रखने की सामर्थ्य रखती हैं। आवश्यकता है तो मात्र कुशल प्रबन्धन ,संयम एवं सही दिशा की।समस्याओं से अवसर पैदा होते है।अतः धैर्य पूर्वक समस्याओं से जूझना चाहिए। आत्महत्या कर अपने परिवार को बिपत्तिओं में झोंक जाना या हिंसा कर किसी और का घर उजाड़ देना,अथवा देश की सम्पत्तिओं को छति पहुँचाना, हमारे अन्नदाता किसान का चरित्र नहीं हो सकता है। ऐसे में विचारणीय है कि कहीं छद्म किसानों ने तो किसान आंदोलन नहीं खड़ा किया है या कृषक बन कर इतर लोग तो बैंकों से इतर उद्देश्यों के लिए ऋण ले- लिवा रहे हैं; फिर माफ़ी के लिए आन्दोलन चला रहे हैं।एक बार ऋण माफ़ी हो भी जाय तो क्या इसकी पुनरावृत्ति हो सके गी ? नीर क्षीर विलगाव न होने से यह बात आम हो रही है कि किसान भी बदल गए।---------------------------------------------------------मंगल वीणा
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वाराणसी ,दिनाँक 4 जुलाई 2017                                              mangal-veena.blogspot.com
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शुक्रवार, 2 जून 2017

एक अशिष्ठता का अवसान

***************सच है भारत बदल रहा है।आदत के विपरीत सडकों पर बदला -बदला सा माहौल व यातायात की थोड़ी बढ़ी सुगमता अच्छी लगने के साथ अजीब लग रही है। ऐसा लगता है कि साहबों और सरकारों का रेला कहीं बाहर गया है।फिर याद आता है कि कर्मयोगी एवं योगी के सरकारों ने लाल ,नीली बत्ती और हूटरबाजी बन्द करा दिया है ;यह उसी का परिणाम है ! भला हो भारतीय जनता पार्टी के  सरकारों की , कि वे जनता द्वारा सत्ता सौंपे जाने पर जनता सी व्यवहार करते दीख रही हैं।सरकारें व उनके लोग लाल- नीली बत्ती व हूटर का त्याग कर जनता के सीने पर कोदो दरना बन्द कर दिए हैं ,यह मोदी सरकार के तीन वर्ष की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि है। इसके लिए वह शत प्रतिशत अंक पाने की हक़दार है।सिवा निर्णय के सरकार को कुछ खर्च करना नहीं पड़ा ,परन्तु इस निर्णय ने जनता के दिल को छू लिया। इसे कहते हैं हर्रे लगी न फिटकिरी ,रंग चोखा।
 *************** जिस लाल बत्ती को  नेता ,नौकरशाह या ओहदेदार अपनी हनक मानते रहे हैं और आम भारतवासी उनकी अशिष्ठता ;अंततः उनके अवसान की पटकथा लिख दी गई।हमारे देश में स्वार्थ सिध्यार्थी नेता और नौकरशाह जो हर अच्छे - बुरे हथकंडे अपना कर विशिष्ठ  होने का परम सुख पाते रहे हैं,वे जल के अभाव में मछली वाली तड़प की पास आती आहट सुनने लगे हैं। ये लोग आम आदमी सा होने की कल्पना मात्र से घबरा रहे हैं। इन्हें कौन समझाए कि इनकी  जीविका एवँ प्रत्यक्ष और परोक्ष  सुविधाएँ जनता से प्राप्त विभिन्न राजस्व से प्राप्त  होती हैं।अतः जनता उनसे सेवक सी भूमिका की अपेक्षा करती है न कि स्वामी सी।इससे बड़ी राष्ट्रीय विडम्बना क्या हो सकती है कि  स्वतंत्रता प्राप्ति से  आज तक ये अंग्रेजों के देशी संस्करण वाले लोग स्वामित्व का सिकंजा कसते हुए वीआईपी वाली रौब तले देश को लूटते गए जब कि आम जनता इनसे बेहद घृणा करते हुए भी इनकी चरणपादुका ढोने को मजबूर होती रही। इस उलट आचरण और मानसिकता वाले मिथक को तोड़ने में सात दसाब्दी बीत गए ,तब  कहीं जा कर यह अति  विशिष्ठ या स्वामी भाव वाली अहंकारी दीवाल दरकी है।याद रखना होगा कि यह मात्र शुभारंभ है न कि शुभांत।  इसे पूर्ण रूप से ध्वस्त होने में सुधार वाले ढेर सारे हथौड़ों की आवश्यकता होगी जब कि वीआईपी होने का सुख लूटने वाले इसे आसानी से ढहने नहीं देंगे।
***************यह सर्व विदित है कि भारत में दुनियाँ के किसी भी देश से अधिक वीआईपी हैं जिनकी सुरक्षा एवँ सुविधाएँ राजाओं जैसी हैं। देश से राजशाही तो सरदार पटेल के सौजन्य से चली गई परन्तु अनुवादित अति विशिष्ठवाद  ने अपनी जड़ें और जमा लीं। संसाधन, सुरक्षा , सुविधाओं एवँ विकास पर पहला हक़ इनका बन गया और जो शेष बच गया वह जनता का।इस नवोदित राजशाही के चलते ही लोकतंत्र में लोक उपहास का भारत अप्रतिम उदहारण बना और इसके चलते ही देश का अपेक्षित विकास सदैव वाधित रहा।परन्तु हर आम भारतीय के लिए आदर्श सत्य यह है कि लोकमत से इतर यह संस्कृति हर रूप में अशिष्ठ एवँ भ्रष्ट है। एक उदहारण से इसे समझा जा सकता है कि जब आम आदमी के साथ कोई घटना घट जाती है तो पुलिस को मात्र  घटना स्थल तक  पहुँचने  में घंटों लग जाते हैं जब कि दर्जनों की संख्या में ये पुलिस वाले हर वीआईपी को सुरक्षा देने के लिए उन्हें चौबीस घण्टे घेरे रहते हैं।यह मान्यताप्राप्त भ्रष्टाचार और अशिष्ठता नहीं तो और क्या है। ऐसी ही अनगिनत सुविधाएँ हैं जो सरकारों ने इनके कदमों में बिछा रखी हैं और हर नई सरकार इनके लिए कुछ न कुछ नई सुविधा बढ़ा जाती है।
***************ज्यादा दिन बीते नहीं हैं ;नई सरकार के केंद्र में सत्तारूढ़ होने के बाद डीजीसीए ने प्राइवेट एयरलाइन्स द्वारा वीआईपी को विशेष आतिथ्य एवँ सुविधा देने का एक निर्देश निर्गत किया था। चूँकि निजी एयरलाइन्स सभी टिकट धारकों को सामान शिष्टाचार व सामान व्यवहार देती रही,इसलिए उन्हें अति विशिष्ठों के सामने एयर इंडिया के महाराजा की भाँति झुकना आवश्यक था।अतएव निर्देशित किया गया कि जब कोई सांसद यात्री रूप में आयें उन्हें द्रुत गति से सुरक्षा जाँच ,लाउन्ज पहुँच ,फ्रिल नहीं ,चाय -कॉफी और प्रोटोकॉल के अनुसार सौहार्द सुलभ कराया जाय ताकि वहाँ भी इन आधुनिक सामंतों के शान -शौकत एवँ रुतबे का प्रदर्शन शेष यात्रियों एवँ उपस्थित कर्मियों के बीच हो सके।वरन जब सभी यात्रियों के पास  यात्रा टिकट है ,निर्धारित  सीट संख्या है और सबको यात्रा में दी जाने वाली सुविधाएँ निर्धारित हैं फिर विशिष्ठता क्यों।बात नेताओं तक ही नहीं है। नौकरशाहों के लिए तो ये एयर लाइनें या अन्य जन सम्पत्तियाँ  उनकी निजी संपत्ति सी हैं। कभी किसी सम्बन्धित कर्मी से बात कर ये आतंरिक बातें जानी जा सकती हैं।
***************तीसरा उदहारण लें। गरमी का दिन और पानी की कमी है। लोग विधायक ,सांसद के पास उनके कोटे से एक  हैण्डपम्प पाने के लिए दौड़ रहे हैं। यह भिखारी बनाने वाली  बात ही तो है।ये नेता, नेता निधि और फरियाद क्यों ?केवल अति विशिष्ठवाद। इच्छा शक्ति हो तो  इन कार्यों के लिए एक विशिष्ठता और चाटुकारिता विहीन सुन्दर माँग व्यवस्था बनाई जा सकती है।कमाल है पैसा जनता का और निधि सांसदों एवँ विधायकों की।वस्तुतः यह विशिष्ठवाद से उपजी आम जन की व्यथा कहानी अन्तहीन है।राम चरित मानस में सीताहरण के बाद अशोक वाटिका में निरुद्ध जानकी की  मनोदशा का वर्णन ,सीता माता का पता लगा कर लौटे। हनुमान ने प्रभु राम से यह कह कर किया था "सीता कै अति बिपति विसाला। बिनहि कहे भलि दीनदयाला। "आज भी स्थिति हूबहू वैसी ही है।  हम जिसे आम जन कहते हैं उनके अंतहीन कष्ट का तथा जिन्हे हम वीआईपी कहते हैं उनकी अशिष्टता , भ्रष्टाचारिता  एवँ  विलासिता का वर्णन कठिन है।यही कारण है कि मोदी सरकार द्वारा वीआईपी संस्कृति के विरुद्ध उठाये पहले कदम की जनता भूरि -भूरि प्रसंशा कर रही है और इस संस्कृति के समूल नाश की आशा बाँध रही है।
***************आशाएं नहीं मरीं। हमारी न्यायपालिका को इसका सर्वाधिक श्रेय जाता है।समय समय पर वह सरकारों व अति विशिष्ठ जनों को लोकतंत्र का आईना दिखाती रही है और अन्यायपूर्ण कृत्यों के विरुद्ध निर्णय तथा लताड़ देती रही है।इसके विपरीत दूसरी ओर सरकारों व विशिष्ठ जनों के घालमेल से अति विशिष्ठता के नए नए आयाम और रास्ते भी बनते रहे हैं।समय अनुकूलता का शुभ संकेत दे रहा है कि जनता और सरकारों का घालमेल बढ़ रहा है। जो जनता है वही सरकार है। फिर अति विशिष्ठ कौन ,क्यों और किस लिए ?एक झटके में अति विशिष्ठता रूपी सामाजिक अशिष्ठता एवं भ्रष्टाचारिता का अवसान करना होगा। चाहे राष्ट्रपति हों या प्रधान मंत्री ,सांसद हों या विधायक ,भारतीय प्रशासनिक सेवा के हों या राज्य सेवा के ,इतर कर्मी हों या चतुर्थश्रेणी के ,सबको जनता और देश सेवा में उनके योगदान के सापेक्ष सुवधाएँ ,सुरक्षा व सम्मान मिलना चाहिए।  जब कर्तव्यनिष्ठ सेवकों द्वारा  देश और जन की हो रही सेवा का पारदर्शी समानुपातिक संबन्ध उन्हें दी जाने वाली सुविधाओं से बना दिया जाय गा,तब एक भारत एवं विश्वश्रेष्ठ भारत दुनियाँ के सामने होगा। जनता मालिक होगी और उसे अपने सेवकों पर गर्व होगा।अपसंस्कृति से मोहभंग करते हुए जनहितकारी कठोर निर्णय का समय है ताकि एक सभ्य समाज का उदय हो। सही समय पर सही निर्णय न लेने पर संदर्भित समय त्रुटियों वाले  काल खण्ड की सूची में चला जाता है।इतिहास का यही चक्र है। -------------------------------------------------------------------------------------------मंगलवीणा
वाराणसी ,दिनाँक 7 जून 2017------------------------mangal-veena.blogspot.com
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अंततः
उफ़ गर्मी।
 इस ग्रीष्म ऋतु में प्रलयंकरी गर्मी ने सर्वत्र हाहाकार मचा दिया है। नदी ,बाँध ,तालाब ,कुँए सभी पानी के लिए तरस रहे हैं ,फिर आदमी ,जीव -जन्तु व पंछियों की प्यास  कैसे बुझे ?बिन पानी सब सून। समाचार पत्रों और इलेक्ट्रानिक मिडिया के माध्यम से मौसम विज्ञानी ग्रीष्म की निष्ठुरता व उसके कारणों की नित्य जानकारी दे रहे हैं।अब आइए कुछ हिंदी कवियों की दृष्टि से इस ताप को देखा जाय। यथा -
जाने क्या हुआ कि सूरज इतना लाल हुआ
प्यासी हवा हाँफती फिर -फिर पानी खोज रही
सूखे कण्ठ कोकिला ,मीठी बानी खोज रही
नीम द्वार का छाया खोजे, पीपल गाछ तलाशें
नदी खोजती धार, कूल कब से बैठे हैं प्यासे
पानी पानी रटे रात -दिन, ऐसा ताल हुआ। जाने क्या हुआ ----डा.जगदीश ब्योम
ग्रीष्म की लय में बढ़ते हुए अब बदलाव की प्रतीक्षा करनी चाहिए। अश्विन गाँधी के शब्दों में -

यह सब कुछ याद रहे
मौसम का साथ रहे
ग्रीष्म ऋतु भी जाएगी
फिर रहे गी प्रतीक्षा 

अगले मौसम की----- 
बहार की-------
***************तब तक हम सबका सर्वोच्च कर्तव्य है कि पानी बचाएँ और प्यासों को पानी उपलब्ध कराएँ।एक प्यासे पँछी को भी यदि हम पानी पिला पाए तो यह सृष्टि की बड़ी सेवा होगी।---------------------------------------------------------------------------------------------------- मंगलवीणा
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सोमवार, 8 मई 2017

शादी समारोह


 *************** हाल मे दो एक संबंधियो के यहाँ आयोजित विवाहोत्सव मे निमंत्रण के कारण सम्मिलित होना पड़ा । समझ मे नही आया कि अब लोग निमंत्रण देते क्यों हैं?यदि किसी आयोजन मे  परंपरा,व्यवस्था ,संचालन एवं समयबद्धता संभव न हो तो ऐसे आयोजन मे  इन मान्यताओं के पथिकों  को आमंत्रित करना क्या उन्हे पीड़ा पहुंचाना नहीं है ?शुभ कामनाएं  एवं आशीर्वाद बटोरने के तो अब बहुत सारे सस्ते माध्यम सुलभ हैं और वे प्रयोग में लाये जा सकते हैं।
***************अपनी परंपरा जब विक्रित हो रही हो , अन्य  समाजों की कुछ अच्छी बाते लोग क्यो नही आचरित करते ? ध्यान देना चाहिए कि हर कृत्य किसी को आकर्षित तो किसी को विकर्षित करता है ।अतः खुशियो केलिए आकर्षण को ही चुनना चाहिए ।विकर्षण की अनुपस्थिति अप्रिय टिपण्णी की संभावना से बचाती भी है।बीते दिनों की मान्यता थी -अतिथि देवो भव।लगता है कि  आज की मान्यता है अतिथि दासो भव,तदकर्मं कुरु ।  ----------------------मंगलवीणा
वाराणसी ;दिनांक 09 . 05 . 2017 

मंगलवार, 4 अप्रैल 2017

कर्मयोगी से योगी तक

***************युवा भारत की नई सोच की बलिहारी कि देश को पहले प्रधान मंत्री के रूप में एक कर्मयोगी मिला फिर विश्व को योग दिवस मिला और अब राम कृष्ण की धरती को एक योगी। निःसंदेह ये सारी उपलब्धियाँ देश के नव जागृति क्रम में हो रही हैं। सन दो हजार चौदह में भारत में संपन्न हुए लोकसभा से अभी तक संपन्न हुए विधान सभा के चुनावों का  यदि सूक्ष्म विश्लेषण किया जाय तो ये युगान्तक घटनायें ही स्थापित नहीं होती हैं ,वरन आर्यावर्त में आगामी संभाव्य दृश्यावली भी लगती हैं। सोच बदलाव का ऐसा दौर चला है कि धर्मनिरपेक्षता ,अल्पसंख्यक ,पिछड़ा ,मुस्लिम आदि जैसे नारे, जो सत्ता पाने के लिए ब्रह्मास्त्र माने जाते थे,सब भोथरे हो गए। तुष्टीकरण रसातल में मिल गया।सच है, भारत नए युग में प्रवेश को मचल रहा है वरन मुस्लिम मतदाता जो भारतीय जनता पार्टी एवं इसके विचारधारा का पारंपरिक धुर विरोधी रहा है ,इसे विजय के लिए मतदान न करता।जनमत ने सीधा संकेत दिया है कि प्रगति और विकास के लिए आतुर भारतवासी को सरकार के रूप में उसे पोषक शासन चाहिये न कि शोषक।ऐसा लगने लगा है कि जो शोषक तथा विकास के बाधक बनें गे उन्हें नाकारा ही नहीं जाय गा बल्कि जनता के पैसे के दुरुपयोग के लिए कठघरे में भी खड़ा होते देखा जाय गा।भारत की बढ़ती आर्थिकशक्ति,राजनीतिक दक्षता व जनता को प्रदत्त बेहतरी से पडोसी देश भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकेंगे।ऐसे में आगे चल कर आर्यावर्त या वृहद् भारत विश्व पटल पर उभर सकता है।
***************आज के पड़ाव पर पहुंचने से पहले भारतीय लोक तंत्र की यात्रा कुछ यूँ हुई। आजाद भारत के तत्कालीन स्वप्न द्रष्टा नेताओं ने अपने सपने के भारत अभ्युदय के लिए उस समय गाँधी विचार तले दो सर्वोच्च संवैधानिक व्यवस्था समाज को दिया। उनमें पहली थी धर्मनिरपेक्ष लोकतान्त्रिक व्यवस्था व् दूसरी थी सामाजिक रूप से दलितों एवं पिछड़ों को आरक्षण की व्यवस्था।समय के साथ जैसे -जैसे हमारा लोकतंत्र आगे बढ़ा ,नेताओं ने इन ब्यवस्था की बहुमत के लिए ऐसी कुब्यवस्था कर डाली कि पूरा देश वर्गवाद ,धर्मवाद ,संख्यावाद,क्षेत्रवाद  व् जातिवाद में बँटता गया और इन गोलबन्दी के बाहर बचे देशप्रेमी हिन्दू उपेक्षा के शिकार होने लगे। अल्पसंख्यकों एवं अनुसूचित जातियों की बात कर कुलीन कांग्रेसी लंबे समय तक नेहरू परिवार को सत्ता पर बैठाये रहे। इस बीच हर उभरते वाद में नए स्वयं स्थापित नेतृत्व पैदा हुए और बंदरबाँट की सरकारें बनने लगीं। नेताओं का परम धर्म सरकार बनाना  और अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए सरकार बनाये रखना हो गया।वंशवाद ,भ्रष्टाचार और सामाजिक विघटन विशाल बट बृक्ष होते गए। यह गौण हो गया कि सरकारें बनाई क्यों जाती हैं। साधन को साध्य बनते देख आम लोग भौंचक थे। सब कुछ ऐसा था जैसे आदमी अपनी आवश्यकता एवं इच्छा पूर्ति के लिए पैसे न कमा कर मात्र पैसा संचय के लिए पैसा कमाये । थक हार कर जनता  ने मन बना लिया कि मृग मरीचिका का छलावा देने वालों को बता दिया जाय कि यह जनता है जो सब जानती है।
***************बढ़ती शिक्षा ,वैश्वीकरण ,सोशल व् इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़ाव तथा विदेशों के साथ बढ़ते आवागमन से देश में नव जागरण की हवा प्रबल हुई। लोग जान पाए कि क्षमता के बावजूद  देश विकसित क्यों नहीं हो पा रहा है।लोग जान पाए कि देश से बाहर एक भारतीय; चाहे हिन्दू हो ,चाहे मुसलमान हो या कोई अन्य  धर्मावलंबी; की पहचान कैसे होती है और उसी भारतीय की  देश के अन्दर कैसी पहचान बताई जाती है।इन प्रश्नों के मंथन से ही सारे जन मन विरोधी दल नकारे जा रहे हैं और कभी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद तथा  हिन्दू गौरव के लिए हाशिये पर रखी गई पार्टी आज नव जागरण की जन वाणी बन गई।भारत के हर नागरिक की बिना लाग लपेट यह अपेक्षा है कि उसे बेहतर से बेहतर शिक्षा ,स्वास्थ्य सेवा ,सड़क ,सुरक्षा ,शिष्टाचार तथा साथियाना अवसर मिले।साथ ही साथ सरकारें विश्व पटल  पर भारतवासियों को  भारतीयता और भारतीय संस्कृति अर्थात हिन्दू संस्कृति पर गौरवान्वित कराने वाली हों जैसे कि पूरे विश्व में प्रति वर्ष योगदिवस आयोजन से हमारी भारतीय संस्कृति गरिमामयी हुई है।हमारी हिन्दू संस्कृति ही हमारी विशिष्ठता  है जो वसुधैव कुटुम्बकं की बात करती है। अतः सबका साथ लेते हुए सबका आर्थिक ,सामाजिक और सांस्कृतिक विकास सुनिश्चित करना होगा।आज की सरकारों को यह हर पल याद रखना होगा कि जनता ने उन्हें जनता की सेवा करने के लिए सत्ता सौंपी है न कि जनता से सेवा कराने और अति विशिष्ठ बनने के लिए।वादों पर मुहर लग चुकी हैं ,अब परिणाम देने की बारी है।
***************नए नेतृत्व के सामने दो काम हैं। पहला है दिए गए दायित्व या मिशन को अक्षरशः बिना किसी किन्तु - परन्तु के पूरा करना तथा दूसरा है जनता की स्नायु को पकड़ना कि आगे वह सरकारों के लिए क्या लक्ष्य देने वाली है।मिशन और विज़न में कोई भी लोच हुआ नहीं कि  आगे का अवसर छिना। इतना इशारा काफी है कि अति विशिष्ठ संस्कृति ,काले धन  ,भ्रष्ट नौकरशाही ,नेताओं के अपार धन स्वामित्व ,माफियागिरी तथा कानून के गिरगिटिया रूप से जनता की घृणा अहर्निश बढ़ती जा रही है।शुभ संकेत यह है कि नव  जागरण का नेतृत्व योगियों के हाथ है जिनकी  कर्मयोग निष्ठा निर्विवाद है। नेतृत्व की अनुकूलता एवं प्रतिबद्धता से जनता की उम्मीदें अँगड़ाइयाँ लेने लगी हैं। अपेक्षा रहे गी कि उम्मीदें फलीभूत हों । ------------------------------------------------------------------मंगलवीणा
वाराणसी ;दिनाँक 4.4 . 2017
चैत्र शुक्ल अष्टमी मंगलवार संवत २०७४
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अंततः
सभी स्नेही पाठकों ,साथियों ,आलोचकों व् देशवासियों को मर्यादा पुरुषोत्तम राम के जन्मोत्सव राम नवमी की मधुमासी शुभ कामनाएं।
चूँकि मधुमास में ही लोग गर्मी से झुलसने लगे हैं ;आइये , त्रेता युग में रामजन्म के समय  अवध के जलवायु का तनिक सानिद्ध्य लिया जाय -
*****नौमी तिथि  मधुमास  पुनीता।सुकल पच्छ अभिजित हरिप्रीता।
*****मध्य  दिवस अति  सीत न घामा। पावन  काल  लोक  विश्रामा।
*****सीतल  मन्द  सुरभि  बह  बाऊ । हरषित  सुर संतन  मन चाऊ।
***** बन कुसुमित गिरिगन मनियारा।स्रवहिं सकल सरितामृतधारा।-------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------गोस्वामीतुलसीदास
अब मिल बैठ सब सोंचे कि वैसा मधुमास और वैसी परिस्थितियाँ कैसे अवतरित हों ?जलवायु और पर्यावरण को हमने ही तो वर्वाद किया।----------------------------------------------------------मंगलवीणा
वाराणसी ;दिनाँक 4.4 . 2017
चैत्र शुक्ल अष्टमी मंगलवार संवत २०७४ ------------mangal-veena.blogspot.com
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रविवार, 19 मार्च 2017

योगी को उत्तर प्रदेश की सत्ता

योगी आदित्य नाथ ने आज तक सार्वजनिक जीवन में जितना कार्य किया उसका फल उन्हे उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री के रूप मे मिला ।इसके लिए उन्हे हार्दिक बधाई ।अब उन्हे प्रदेश वासियों की अपेक्षा पर खरा उतरना होगा ।प्रदेश के अमन चैन, विकास और भाजपा के लिए जनाधार बढ़ाने की अब उनकी सीधी जिम्मेदारी होगी ।योगी पर योगेश्वर की कृपा हो।पूर्वाग्रह से टिप्पणी करना उचित नहीं है ।
सदियों से गुलामी के कारण हिन्दू बहुत दब्बू हो गये थे ।उन्हे उस मानसिकता से उबारने के लिए नव जागरण की नितांत आवश्यकता थी ।नई पीढ़ी के आते आते यह मिशन पूरा हुआ ।अब विकास की दरिया बहानी है और मोदी जी के नेतृत्व मे भारत को बहुत आगे बढाना है ।योगी जी के मूल्यांकन का समय शुरू होता है अब ।शुभ कामनायें ।----मंगलवीणा

शनिवार, 11 मार्च 2017

विनयी भव

प्रधान मंत्री जी एवं अग्रणी कार्यकर्ताओं के साथ - साथ भारतीय जनता पार्टी की अन्तिम पंक्ति में खड़े हम जैसे कार्यकर्ताओं के गिलहरी प्रयास ,भावना एवं शुभ कामनाओं को भी उत्तर प्रदेश के विधान सभा चुनाव में मनोबल बढ़ाने वाला सहकार मिला जिसके लिए हम सभी राष्टवादी विचार धारा वाले ईस्ट मित्रों को हार्दिक बधाई एवं शुभ होली सन्देश प्रेषित करते हैं। सबको गुझिया रूपी ख़ुशी की स्निग्ध मिठास मिले।--मंगला सिंह 


रविवार, 18 दिसंबर 2016

विकास कि बकवास

  ***********[नोटबंदी एवं संसद गतिरोध पर एक प्रतिक्रियात्मक लेख ]**********
*************** निश्चय ही हमारे देश का हर क्षेत्र में त्वरित विकास हो रहा है परन्तु  बकवास भी  बहुत अधिक एवं सर्वत्र हो रहा है। कहीं बकवास की विषयवस्तु के लिए राई जैसे विकास का पहाड़ सरीखा हो-हल्ला हो रहा है तो कहीं सराहनीय विकास पर भी बकवास हो रहा है। जहाँ हमारा सराहनीय विकास युवा संसाधन आधारित है वहीं इस युवा पीढ़ी को  यह भी अनुभूति होने लगी है कि अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए अधिकांश नेताओं  के बकवास  भी विकास में गतिरोधक बने हुए हैं।आज के भारतीय लोकतंत्र में बकवास के कोहरे से दूसरों द्वारा किये गए विकास की दृश्यता को धुंधला करना सरकारों व विरोधियों का परम ध्येय बन गया है। नेता तो मान कर चलते हैं कि जनता उनके स्वार्थीपन व छुद्रता को उतना नहीं जानती जितना वे हैं ,वही जनता है कि वह उनके रवा  -रत्ती जानने लगी है और उनसे उतनी ही घृणा करने लगी है।आम जन को यह पच नहीं रहा है कि देखते ही देखते बिना योग्यता एवं जिम्मेदारी के दौलत एवं दाम बटोरू इस नेतागीरी विभाग में इतने पद सृजित हो गये हैं कि जहाँ देखो वहाँ नेता।आज देश में कृषि के बाद नेतागीरी सबसे बड़ा क्षेत्र है जिसमें रोजगार की मनचाही संभावनायें हैं। चूँकि कमाई के बदले बकवास का उत्पादन इनका मुख्य काम है ,अतः बकवास का उत्पादन भी बुलंदियों पर है।
***************स्वतंत्र भारत के अभिलेखों में प्रमुखता से उद्धरणीय एक निर्णय,वर्तमान सरकार द्वारा लिया गया , नोटबन्दी का निर्णय है जिसके फल प्रतिफल पर गहन विमर्श की आवश्यकता है। ऐसे दूरगामी परिणाम देने वाले निर्णय ,जिनका व्यापक प्रभाव राजा से रंक तक सब पर पड़ता है,  किसी राष्ट्र में कभी -कभार होते हैं ।एक ईमानदार प्रधान मंत्री पर विश्वास कर राष्ट्र बेहतरी के लिए जनता मुद्रा संकट से जूझ रही है परन्तु इसके इतर स्वार्थी तत्व एवं विरोधी नेता इस पहल को निष्प्रभावी ही नहीं दुष्प्रभावी करने के लिए बकवास पर बकवास की झड़ी लगाए हुए हैं। ऐसा भी नहीं है कि जनता नोटबन्दी के आसन्न परिणाम पर सशंकित नहीं है या वह जानना नहीं चाहती है कि वस्तुतः इस अग्नि परीक्षा के परिणाम क्या मिलें गे। सबकी  अपेक्षा थी कि देश की शीर्ष सभा" भारतीय संसद" के अभी बीते सत्र में माननीय बन चुके नेतागण इस विषय पर व्यापक बहस करेंगे और जनता के शंकाओं का समाधान हो जाय गा। परंतु हुआ क्या -जनता के करोड़ों रुपये की छति के बदले मिला सिर्फ बकवास ,बकवास और बकवास। संसद में विरोधी दल के सांसदों ने जो गैर जिम्मेदार आचरण किया उससे प्रधान मंत्री में जनता का विश्वास और दृढ हो गया ।यदि ये माननीय लोग निर्लज्ज न होते तो जितने दिन सदननहीं चला उतने दिन का वे वेतन ,भत्ता नहीं लेते  और शेष बचे क्षति की भरपाई  आपसी अंशदान से कर देते। परन्तु ऐसा होगा नहीं क्योंकि आज के अधिकांश नेता निर्लज्ज हैं और उनका नैतिकता से कोई मतलब नहीं।
***************इतना ही नहीं इस बकवास की माया यहाँ वहाँ सर्वत्र है। व्यवस्था ,जिसके कन्धे पर नोटों के बदलने की जिम्मेदारी थी ,ने भी इस क्रियान्वयन को चोट पहुँचाया।पिछले दरवाजे से  काले धन वालों के पास नए नोटों के खेप पहुंचने लगे और उनके पुराने नोट बैंकों में भरने लगे। जनता बैंक के द्वारों पर भिखारी की तरह खड़ी रही और बैंकरों की ओर देखती रही।  काले धन के पोषक नेता लोग उनके धैर्य पर नमक छिडकने और उन्हें भड़काने का प्रयास करते रहे।जब बैंकों की सत्यनिष्ठा के बिपरीत आचरण की गतिविधियाँ सरकार के संज्ञान में आईं और मीडिया तथा समाचारपत्रों ने उजागर करना शुरू किया तो फिर सिद्ध हुआ कि हमारी ब्यवस्था भी बकवास हो चुकी है।इतना ही नहीं विभिन्न चैनलों पर माँगी मुराद पाए अनेक स्वयं भ्रमित विशेषज्ञ तो बकवास की ताताथैया करने लगे हैं।जनता मीडिया को बहुत पसन्द करती है ,अतः उन्हें बकवास परोसने वालों से दूर रहना चाहिए।परिवर्तन के वर्तमान दौर में तंत्र के इस चौथे स्तम्भ मीडिया से जनता को बहुत अपेक्षा है। आशा कि जानी चाहिए कि जनता के धैर्य और मीडिया के आईना से व्यवस्था को सन्देश मिले गा और वे जनाकांछा के अनुरूप व्यवहार करें गे ताकि भविष्य में उनके विरोध में उठनेवाली हर चर्चा को बकवास कहा जा सके।
***************रही बात विकास की। तो विकास वही जो जनता के द्वार तक पहुंचे न कि वह जिसे जनता के मन ,मस्तिष्क में विज्ञापनों व शोरगुल द्वारा बैठाया जाय। यदि कोई विकास का कार्य होता है तो वह दिखता है, जनता को उसे मिलने की सुखद अनुभूति होती है ,उसके जीवन में बेहतरी आती है और देश प्रगति पथ पर आगे बढ़ता है।अतः प्रचार -प्रसार के बल पर जनता को विकास जताना भी बकवास है।अभी उत्तर प्रदेश ,पंजाब आदि राज्यों में चुनाव निकट हैं। जो दल सत्ता में हैं वे अपने द्वारा किये गए झूठ -सच विकास कार्यों की ढफली बजाने लगे हैं और उनके विरोधी दल उसे  झूठ तथा धोखा बताने लगे हैं।  सरकारें ऐसे भी विकास कार्यों की गिनती करा रही हैं जिनको ढूंढना होगा कि कहाँ हुआ ,कितना हुआ ,कब हुआ और किसका लाभ हुआ। मेनिफेस्टो की तो बात करना भी बकवास है।फिर भी विभिन्न नेता संगठनों का प्रयास होगा कि किसी तरह उनका सम्मोहन जनता पर चल जाय और सरकार बन जाय। फिर तो पाँच वर्ष के लिए वे ही माननीय ,उन्ही की दौलत उन्ही की सोहरत और वोट देने वाली जनता उनके लिए बकवास।उलझन तो यह रही है कि बकवासी जनता के बीच से उपजते हैं और वे विधायिका ,कार्यपालिका ,न्यायपालिका को भी अपने लायक बनाने का प्रयास करते रहते हैं इसीलिए उन्हें घेरने के सामान्य फंदे कमजोर पड़ते हैं और देश का विकास वाधित होता है।जो हुआ सो हुआ ;उलझन सुलझाने का समय आ गया है कि विकास विरोधी नेताओं एवं दलों को नैपथ्य में भेजा जाय। मोदी सरकार को जनता ने इसी लिए सत्ता सौंपी है कि तीनों तंत्रों में जितने भी छिद्र हैं उन्हें सख्ती से बंद कर दिया जाय ताकि लुटेरे कहीं से भाग न सकें।
***************हमारा देश बदल रहा है ।अब न तो जनता बकवास कहलाने को ,न सुनने को और न ही देश द्रोहियोँ को केवल बकवास कह कर छोड़ने को तैयार  है।इक्कीसवीं सदी भारत की है।सुयोग से प्रधान मंत्री श्री मोदी के सारथीत्व में  देश के करोड़ों युवाओं की  ऊर्जा  विकास रथ को आगे बढ़ाने में लग गई है।बकवास रूपी प्रतिरोध से गति धीमी करने का प्रयास हो रहा है और होगा परंतु इस चुनौती का अवसर में बदल जाना तय है।बैंकों और एटीएम के बाहर पंक्तियों में खड़े लोगों ने मोदी -मोदी का उद्घोष कर  विरोधी  नेताओं ,भ्रष्टाचारियों ,काले धन स्वामियों तथा देशद्रोहियों को स्पष्ट संदेश  दे दिया है कि वे राष्ट्र हित के लिए मोदी जी के साथ हैं और इससे भी बड़ी चुनौतियाँ लेने को तैयार हैं।उन्होंने बकवासियों को यह भी पूर्वाभास कराया है कि वे या तो विकास के साथ होलें या मिटने का मन बना लें।मोदी जी भारतीय जनाकांछा  की उपज हैं। मोदी मिशन में ही जन -जन की खुशहाली ,एवं देश के सर्वांग  विकास  की प्रबल संभावनाएँ हैं। सभी को स्वच्छ मन ,वाणी और कर्म से इस हवन में आहुति देना होगा।परिणाम में विकास और खुशहाली की ऐसी घटाटोप वर्षा होगी कि देशवासियों का मनमयूर नाच उठेगा और सबसे आगे होंगे भारतवासी। आइए हम भारत वासी मोदी जी के सारथीत्व में देश को विश्व के  पाँचवीं आर्थिक शक्ति से प्रथम आर्थिक शक्ति बनाने का तथैव संकल्प लें।
वाराणसी ;दिनाँक 20 दिसम्बर 2016                                                         मंगलवीणा
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गुरुवार, 1 दिसंबर 2016

सर्जिकल स्ट्राइक कि बोरोप्लस

***************इतिहास का यही क्रम है कि वर्ष के बाद वर्ष अपने विशिष्ठ पहचान के साथ इसके पृष्ठों  में जुड़ते जाते हैं और उसी विशिष्ठिता से वे याद किये जाते हैं। कुछ ऐसे ही,भारत के इतिहास में वर्ष दो हजार सोलह ईयर ऑव सर्जिकल स्ट्राइक के नाम से जाना जाय गा। इस अस्त्र का पहला प्रत्यक्ष प्रयोग भारतीय सेना के रणबाँकुरों ने, पिछले वर्ष दस मई को,सीमा से सटे म्यांमार में किया जब वे मणिपुर में सक्रिय रहे डेढ़ सौ से अधिक आतंकियों को रात के चंद घण्टों में मौत की नींद देकर सकुशल वापस आ गए। इस सर्जिकल स्ट्राइक की देश में बड़ी वाहवाही भी हुई परंतु वर्तमान वर्ष में तो हमारे देश में सर्जिकल स्ट्राइक ने धूम मचा दिया ।पूरे विश्व का ध्यान उभरते भारत की ओर तब खिंचा जब उन्तीस सितम्बर को  वर्तमान दृढ़निश्चयी सरकार क़ी अपेक्षा के अनुरूप उच्च मनोबल वाली पेशेवर भारतीय सेना ने पाकिस्तान के अंदर घुस कर आतंकियों एवं पाकिस्तानी सैनिकों पर आशातीत सर्जिकल स्ट्राइक कर दिया। भारतवासियों ने झूम कर दीपावली सा उत्सव मनाया।पाकिस्तान की हेकड़ी चूर हुई तो भारत के नेतृत्व व सैन्य दक्षता को पूरे विश्व में सराहा गया। विपक्षी दलों को सरकार के लिए जनता द्वारा की गई सराहना रास नहीं आई। काँग्रेसियों ने तो यहाँ तक कह डाला कि उनके शासन काल में सेना ने ऐसे बहुत सारे सर्जिकल स्ट्राइक किये थे लेकिन उन्होंने कभी इन्हें सार्वजानिक नहीं किया।पुनः दीपावली बीतते ही आठ अक्टूबर की सांझ को भारत में आर्थिक मोर्चे  पर  एक  दूसरी ऐसी सर्जिकल  स्ट्राइक  हुई  कि  काले   धन  वाले, नेता,ठेकेदार, अभियंता,अधिवक्ता, चिकित्सक , व्यापारी ,नौकर शाह ,नक्सली ,आतंकी ,रियल इस्टेट,इत्यादि के कारोबारी एक साथ धराशायी हो गए। दूसरे दिन प्रातः देशवासियों ने क्षितिज से नए भारत को उगते देखा।
***************तब से जनता बैंकों व एटीएम मशीनों के सामने पैसे के लिए घण्टों कतार में खड़ी हो रही है।परन्तु इस स्ट्राइक से जनता इतनी प्रसन्न है कि कतार में लगने से कोई थकान ही नहीं। कतार में खड़े -खड़े वे कभी मोदी जी की सराहना करते हैं तो कभी मोदी -मोदी के नारे लगाते हैं। कभी कोई नेता दिखने पर घृणापूरित व्यंग करते हैं तो कभी रियल इस्टेट व लाकर वालों पर भी सर्जिकल स्ट्राइक के लिए मोदी जी से अपील करते हैं।देश के हर कोने तथा हर वर्ग से यही आवाज उठ रही है कि ये भारत माँगे मोर।जनता कोई भी कठिनाई झेलने को तैयार है परंतु काले धन वालों को अब समूल नष्ट होते देखना चाहती है। यहाँ तक कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के लोग भी मोदी जी के इस साहसिक प्रयोग की सराहना कर रहे हैं ओर अच्छे परिणाम की अपेक्षा कर रहे हैं।
*************** दूसरी ओर आतंरिक मोर्चे पर काले धन का केंद्र बने हुए विभिन्न विरोधी दलों के नेताओं में खलबली मची हुई है। उन्हें नोटबन्दी के विरोध का कोई नैतिक कारण नहीं मिल रहा है तो जनता के कतार में घण्टों खड़ा होने की दुहाई दे रहे हैं या बिना तैयारी के क्रियान्वयन की बात कर रहे हैं।निःसंदेह ये नेता ही हैं जो काले धन का नेतृत्व कर रहे हैं ,संसद की कार्यवाही ठप कर रहे हैं तथा भारतबन्द करने का प्रयास कर रहे हैं।उनकी इस मुद्दे पर दंगा फसाद कराने की हर कोशिश बेकार जा रही है क्योंकि यह जो भारत की पब्लिक है ; सब जानती है।नोटबन्दी तो टूटने वाली नहीं है परन्तु सत्ता पक्ष व बिहार के देशप्रेमी मुख्यमंत्री को छोड़ अन्य सभी नेताओं ने यह अवश्य सिद्ध कर दिया कि वे काले धन के समान पक्षधर हैं।सराहनीय हैं प्रधान मंत्री जी एवं धन्य है सर्जिकल स्ट्राइक कि जनाकांछा को  परवान चढ़ने का अवसर मिला।
***************अब तो आम लोगों की समझ में मोदी जी ,सुचिता,राष्ट्रभक्ति और सर्जिकल स्ट्राइक एकरूप हो चुके हैं।मोदी विरोध का सीधा अर्थ है कालाधनी,बेईमान व राष्ट्रद्रोही होना।इस धारणा को पुष्ट करने में अनैतिक एवम लुटेरे विपक्षियों का बहुत बड़ा योगदान है।  नए सपनों के भारत का हर नागरिक चाहता है कि मोदी जी अपने उद्देश्य में सफल हों तथा  भविष्य में उनके द्वारा की जाने वाली हर सर्जिकल स्ट्राइक सफल हो।साधारण सोच है कि पश्चिमी सीमा ,रियल इस्टेट और बेनामी संपत्ति पर और सर्जिकल  स्ट्राइक की आवश्यकता है। भारत के सुनहरे भविष्य का पदार्पण इन स्ट्राइक की सफलता पर ही निर्भर है और जनता के मूड को मोदी जी से बेहतर समझने वाला कोई दूसरा नेता नहीं है। इतना ही नहीं जब तक भारत में वीआईपी संस्कृति पर सर्जिकल स्ट्राइक नहीं होती,यह क्रम जारी रहना चाहिए। जिस दिन ऐसा होगा ,इन नेताओं को पता लगे गा एक ईमानदार साधारण नागरिक क्या होता है और उसकी अपेक्षा क्या होती है।
***************फिर हाल सर्जिकल स्ट्राइक्स का स्वागत है और निकट भविष्य में ऐसी ढेर सारी स्ट्राइक्स के लिए शुभ कामनाएं।इस एक ब्रह्मास्त्र में बहुत कुछ साधने एवं भारत को महाशक्ति बनाने की क्षमता है।यद्यपि काला होने के आधार पर हाथी के साथ काली हांड़ी की तुलना नहीं हो सकती फिर भी यह कहने को दिल करता है कि यह सर्जिकल स्ट्राइक है कि बोरोप्लस।इस प्रसंग में गोस्वामी तुलसी दास कि निम्न लिखित पंक्तियाँ भी विचार योग्य हैं -
---------------ग्रह भेषज जल पवन पट ,पाइ कुजोग सुजोग।
---------------होइँ कुवस्तु सुवस्तु जग ,लखइ बिलच्छन लोग।
अस्तु सुयोग बना रहे ;सब ठीक ही होगा।बस कर्मयोगी की कर्मसाधना अनवरत चलनी चाहिए। ----------------------------------------------------------------------- मंगलवीणा
वाराणसी ,दिनाँक:01 दिसम्बर 2016                  mangal-veena.blogspot.com
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शुक्रवार, 12 अगस्त 2016

कश्मीर पर ऊहापोह

***************कश्मीर की अशान्ति से पूरा देश बेचैन है। वहाँ की शान्ति के लिए हमारे सपूत सुरक्षा प्रहरी अपने जान की बाजी खेल रहे हैं तो दूसरी ओर आन्दोलनकारियों के साथ उनके बहकावे में आकर शान्ति भंग करने वाले भोले -भाले लोग भी हताहत हो रहे हैं। अवसर है, तो राजनेता ,विचारक ,विश्लेषक ,विशेषज्ञ और मीडिया के लोग भी मन माँगी मुराद पूरी कर रहे हैं। अधिकांश को समस्या समाधान की चिन्ता है तो कुछ को अपने प्रतिद्वंदियों को पटकने की। अभी राज्यसभा में कश्मीर पर पूरे दिन चर्चा हुई। माननीय सांसदों  में किसी ने कश्मीरियों से दिली संबंध जोड़ने ,तो किसी ने ऐतिहासिक गलतियों की बात की। किसी ने पडोसी देश को कोसा तो किसी ने पाकिस्तान पोषित आतंकी संगठनों को। किसी ने जम्मू और लद्दाख के परिपेक्ष्य में कश्मीर समस्या की यात्रा कराया तो किसी ने सरकार को विफल बताया। माननीय गृह मंत्री का निचोड़ वक्तव्य आया कि अब पाकिस्तान से बात होगी तो सिर्फ पाक अधिकृत कश्मीर पर होगी। यह तो भविष्य बताएगा कि भविष्य क्या होगा। परन्तु यह कौन बताए गा कि कश्मीर अन्य राज्यों के विपरीत ,सविधान प्रदत्त अलगाव से या एक राज्य दो कानून से कब मुक्त होगा ? बहु आयामी अलगाववाद कश्मीर की नीयति बन गई है।धार्मिक अलगाववाद ,सामाजिक अलगाववाद ,राजनितिक अलगाववाद ,संवैधानिक अलगाववाद यहाँ तक कि सांस्कृतिक अलगाववाद ,सब के सब  इस देश की मुकुटमणि से चिपक गए हैं।
***************यथास्थिति की बात की जाय तो भारत के हर राज्य व् जनपद में भारत के हर कोने के कम या ज्यादा परिवार मिल जाँयगे। कश्मीरी भी सर्वत्र मिल जाँयगे। जब कभी कर्फ्यू या प्राकृतिक  स्थिति देश के किसी हिस्से में आती है तो पूरा देश वहाँ रह रहे अपने परिवार वालों ,मित्रो व परिजनों के लिए ब्याकुल हो उठता है परन्तु जब कश्मीर में ऐसा कुछ होता है तो वह ब्याकुलता केवल उन्ही परिवारों में होती है जिनके लाडले वहाँ जनजीवन और देश की सीमा सुरक्षा में लगे हैं या केवल उन्ही परिवारों को होती है जिनके परिजन वहाँ धार्मिक या पर्यटन यात्रा में फँस गए हों क्योंकि अन्य स्तिथियाँ घाटी केलिए लागू ही नहीं हैं।दूसरी ओर जब सुरक्षा जांबाजों को, वहाँ शेष भारत की आम नागरिक अनुपस्थिति, कश्मीरियत से अलग हिंदुस्तानी होने की अनुभूति देती है तो उन्हें अजीब लगता है कि देश अपना और लोग पराये। हम सभी जानते हैं कि कश्मीर की यह स्थिति थी नहीं ,बनाई गई है। इसके लिए लाखों पण्डित ,हिन्दू तथा सिक्ख परिवारों को पलायन के लिए विवश किया गया और भारतीयता को उखाड़ फेंका गया।
*************** आज की बची परिस्तिथि में भी इस राज्य के अधिकांश नागरिक  शुद्ध भारतीयता से ओतप्रोत हैं और भारत के लिए कृतसमर्पित हैं ,परन्तु जब उनकी भावनाएँ बेलगाम बन्धक बनाई जा रही हों और सरकारें उन्हें संकट से उबारने में असहाय हों ,तब प्रतिबद्धता और निष्ठा दूसरे छोर की तरफ लुढके गी ही। एक राज्य यदि अपने नागरिकों को समानता एवं सुरक्षा की गारण्टी नहीं दे सकता तो उसके अलाप -प्रलाप की कोई विश्वसनीयता नहीं होती। क्या विडम्बना है कि कठोर कार्यवाही के अभाव में कश्मीर प्रताड़ित है और उसका लाभ उठाते हुए अलगाववादी दुस्साहस बढ़ाते जा रहे हैं। जम्मू ,लद्दाख या कश्मीर क्षेत्र के वे भारतीय जो अपने राज्य को पूर्णतया भारत के अन्य राज्यों जैसा  देखना चाहते हैं,सांस्कृतिक एवं धार्मिक विविधता अपनी धरती पर उतारना चाहते हैं और चाहते हैं कि मेलजोल वाली हिंदुस्तानी  झलक उनकी पहचान बने। परन्तु ऐसी अनुकूलता के अभाव में उनके साथ अन्याय हो रहा है।
***************सामान्यतया जब कश्मीर समस्या की चर्चा होती है ,तो सारी बातें परिकल्पना आधारित होती हैं  कि यदि इस राज्य का विलय तात्कालिक अन्य राज्यों की भाँति भारत के गण राज्य में हुई होती तो ऐसा न होता ,यदि यह काम सरदार पटेल पर छोड़ा गया होता तो भारत कि पाकिस्तान वाला विकल्प या विवाद ही मिटा दिया गया होता ,यदि विभिन्न युद्धों में विजय के बाद हम पाकिस्तान की जीती हुई भूमि नहीं लौटाते और पाक अधिकृत कश्मीर को अपने कश्मीर में मिला लेते तो कश्मीर इधर -कश्मीर उधर का प्रकरण समाप्त हो गया होता या कि अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर हम अपने पाकिस्तान द्वारा हड़प लिए गए कश्मीर की बात पाकिस्तान की अपेक्षा ज्यादा आक्रामकता से उठाते तो पडोसी के हौसले पस्त होते। सब ठीक है ,परन्तु खोये जा चुके अवसर वर्तमान को समाधान नहीं दे सकते।
***************इसमें संशय नहीं कि वर्तमान आंदोलन को संभाल लिया जाय गा। अलगाववादी ,आतंकी और पाकिस्तान  सभी परास्त होंगे। तात्कालिक तौर पर हमें सुरक्षाबलों के मनोबल और लाजिस्टक्स को हर तरह से बढ़ाये रखना चाहिए और प्रचार तंत्र सक्रिय कर नागरिकों को भरोसा देना चाहिए कि उनका अभियान आतंकवादियों व अलगाववादियों से है न कि देशवासियों से। घाटीवासियों से अपील कर उनकी सहायता ली जाय और यदि कोई गलती हो जाय तो उनसे क्षमा भी माँगी जाय क्योंकि वे अपने ही बंधु -बंधाव हैं। इस काम में सभी राजनीतिक दल बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। घाटी में जितने भी ग्रामीण ,कस्बाई या शहरी इकाइयाँ हैं ,उन्हें विभिन्न दलों से मिल कर पाँच -पॉँच प्रतिनिधियों का दल गोंद लें ,उनसे नियमित बैठक कर उनसे मेल -जोल करें और उनके विकास व हित को आगे बढ़ायें।साथ ही जम्मू व लद्दाख क्षेत्र का सर्वाङ्गीण विकास द्रुततम गति से किया जाय ताकि ये क्षेत्र उनके लिए अनुकरणीय बन सकें। जैसे ही कुंठा जाएगी ,समस्या भी तिरोहित हो जाय गी। 
***************दीर्घकालिक समाधान उपायों में संविधान की धारा तीन सौ सत्तर का समापन है। बहुत कठिन कदम है परन्तु राष्ट्र हित में इस राज्य को अन्य राज्यों सा समरस बनाना ही होगा। पाकिस्तान प्रायोजित आतंक को उसे नष्ट करने की क्षमता से अधिक आक्रामकता से तहस=नहस करना होगा। इन आतंकियों से ज्यादा खतरा देशी छिप कर वार कर रहे देशद्रोहियों और लगाववादियों से है जो विभीषण भूमिका में हैं।उन्हें चिन्हित कर कठोरतम प्रतिक्रिया से गुजारना होगा।लक्ष्य बना कर शिक्षा ,रोजगार व् विकास को घाटी की धरती पर उतारना होगा। तभी कश्मीर की वादियों में भारतीयता मुस्कराएगी। इतिहास को ऐसे दिन की प्रतीक्षा रहे गी जब कश्मीरी मुस्लिम समुदाय के लोग पलायन कराये गए हिदू और सिक्ख परिवारों से मिलें गे और गले लग उन्हें अपने घरों में पुनर्स्थापित करें गे।---------------------------------------  मंगलवीणा
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वाराणसी ;दिनाँक 12 अगस्त 2016 ---------------mangal-veena.blogspot.com
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अंततः
सभी सुधी पाठकों ,देशवासियों ,मित्रों  व टिप्पणीकारों को स्वतंत्रता दिवस की ढेर सारी शुभ कामनाएं। भारतीय सीमा एवं अशांत कश्मीर में तैनात बीर जवानों को मिठाइयाँ व राखी पहुँचे तथा हर कश्मीरी भाई बहन को सौहार्द और शान्ति का सन्देश।हर भारतीय की अभिलाषा है कि हमारा मुकुट मणि हमारी आभा को चार चाँद लगाए। ----- मंगलवीणा
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शुक्रवार, 29 अप्रैल 2016

न्यायाधीश जी ,बातें कुछ और भी

***************हाल ही में न्यायाधीशों के सम्मलेन में भारत के मुख्य न्यायाधीश श्री टीएस ठाकुर, प्रधान मन्त्री की उपस्थिति में, यह उल्लेख करते भाउक हो उठे कि वादों की तुलना में न्याय देने वालों की संख्या मानकों से बहुत कम है। स्पष्टतः उनकी वाणी से न्याय के प्रति हो रहे अन्याय की पीड़ा झलक उठी थी। केंद्र और राज्य सरकारों की, जनहित में,  यही संवेदनशीलता होगी कि तत्काल न्यायाधीशों की रिक्त पदों पर नियुक्तियाँ सुनिश्चित करते हुए न्याय आयोग की संस्तुतियाँ लागू करने की कार्यवाही करें। लाख बुराइयों के होते हुए भी इस देश की न्याय व्यवस्था आम आदमी के लिए लाठी का सहारा है। यह बात दीगर है कि यह लाठी अब बोझ बनती जा रही है और धन तथा संसाधन के अभाव में या तो उल्टे उसी के पीठ पर पड़ने लगी है या उसकी अगली पीढ़ी को उत्तरदायित्व रूप में दी जा रही है।दूसरे देशों की आबादी एवँ  जजों के अनुपात का तर्क न देकर बेहतर होगा कि अपनी देशी परस्थितियों यथा वादों को बढ़ाने में पुलिस व वकीलों की भूमिका ,न्यायालयों में  पैठ बना चुकी दलाली ,प्रति वकील वादों की  संख्या ,नियुक्तियों में वंशवादी अधिपत्य तथा  न्याय  पर पैसे का प्रभुत्व इत्यादि की समग्र समीक्षा होनी चाहिए।क्या न्यायाधीश महोदय यह भरोसा देने की स्थिति में हैं कि यदि न्यायाधीशों की अपेक्षित संख्याबल पूरी हो जाती है तो न्याय व्यवस्था में व्याप्त खामियाँ दूर हो जायगीं ,शायद बिल्कुल नहीं।
भारतीय लोकतंत्र तो राजनीति में सशक्त घुसपैठ बना चुके वंशवाद से बुरी तरह पीड़ित है ही ;न्याय तंत्र भी इससे अछूता नहीं है। जज के वंशज का जज होना हमारी न्यायपालिका में आम बात है। वैसे तो ये माननीय गैर राजनीतिक होते हैं परन्तु इनमें कुछ लोग ऐसे रहे हैं जिनका परिवार या वह स्वयं, किसी दल या नेता विशेष से उपकृत होकर, माननीय बना होता है।अतः जब भी प्रति उपकार का समय आता है ,ऐसे माननीय इंसाफ के तराजू को किनारे करने से नहीं चूकते।अपवादों को छोड़ दिया जाय तो मध्य व आधार स्तर के माननीयों से लेकर अधीनस्थों तक ,ब्रांडेड वकीलों से दलालीरत वकीलों तक सभी दिनोदिन मालामाल  होते जा रहे हैं। यहाँ तक कि लाखों वकील व पुलिस वाले भी खूब फल फूल रहे हैं। बदले में भिखारी सा दिखते लाखों वादी वकीलों से कुटिल वादा व न्यायालयों से तारीख पर तारीख पा रहे हैं।भारतीय न्यायलय ही वे स्थान हैं जहाँ  शोषक एवं शोषित के बीच का अंतर हर कदम पर साफ दिखता है।
***************चूँकि भारतीय न्यायिक व्यवस्था में लाखों लोगों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रोजगार मिला हुआ है और सभी किसी न किसी रूप में न्याय नामक उत्पाद बेच रहे हैं ,अतः वे हर संभव प्रयास से उपभोक्ताओं की संख्या व उन तक पकड़ बढ़ायें गे ही।अद्यतन स्थिति यही है कि जब कोई स्नातक किसी भी क्षेत्र में सफल नहीं हो पाता है तो कानून की पढाई कर वकील बन जाता है। वकालत में संख्या का कोई परिसीमन ही नहीं है।वकील नहीं हुए तो भी कोई बात नहीं ,न्याय की दलाली में लग जाइये।निःसन्देह देश में वादों की संख्या बहुत तीव्रता से बढ़ रही है परन्तु तथ्य यह है कि संख्या बढ़ाई जा रही है। जब भी किसी परिवार में या दो या दो से अधिक लोगों में विवाद पनपता  है ,न्याय रूपी उत्पाद बेचने वाले सक्रिय हो उठते हैं और जब वादी प्रतिवादी न्याय केलिए निकलते हैं ,कतिपय न्याय देने वाले चाहे ग्रामप्रधान हों या सरपंच ,स्थानीय पुलिस वाले हों या प्रशासन के लोग,आर्थिक दोहन के लिए विवाद को हवा पानी देकर चाँड़ने लगते हैं और आर्थिक सेवा करने वाले पक्ष के हित साधन में संलग्न हो जाते हैं। फिर मरता क्या न करता। पीड़ित न्यायलय पहुँचता है। वहाँ न्याय दिलाने के नाम पर किसी वकील के चंगुल में फँसता है और शुरू हो जाता है तारीख पर तारीख का अंत हीन क्रम। लम्बी लड़ाई तथा धन सम्मान सब कुछ गँवाने के बाद या तो कालातीत जय मिलता है या पैसा प्रेरित पराजय। पराजय की स्थिति में आगे तक लड़ाने वाले एक से बढ़ कर एक वकील सामने उपस्थित हो जाते हैं।यही है भारत में आम नागरिक के लिए अनन्त न्यायिक व्यवस्था।
***************हमारे देश में उपभोक्ता संरक्षण कानून है ,मंत्रालय है ,विवाद सुलझाने वाले पीठ हैं परन्तु न्याय नामक उत्पाद के उपभोक्ताओं ,जिन्हे उनकी शब्दावली में वादी या प्रतिवादी कहते हैं ,के हित संरक्षण की कोई नहीं सोचता। न सरकार न उच्चतम न्यायलय में यह सुनिश्चित करने करने का साहस है कि किसी भी वाद का निस्तारण अधिकतम कितने समय में किसी अदालत  में होना अनिवार्य होगा ,एक वाद में अधिकतम कितनी तारीखें पड़ सकें गी या बीमारी आदि कारणों से अनुपस्थिति का लाभ कितनी बार दिया जाय गा। वादियों व प्रतिवादियों का वर्षोंवर्ष तक कोई केस लड़ने में जो मानसिक ,शारीरिक एवँ आर्थिक शोषण होता है उसके लिए देश में कोई क्षतिपूर्ति व्यवस्था नहीं है। इस देश में ऐसे भी लम्बित वाद हैं जो एक पीढ़ी के बाद दूसरी या तीसरी पीढ़ी के लोग लड़ रहे हैं। इससे बड़ी न्याय की निष्ठुरता और क्या हो सकती है। कुछ राहत होगी यदि वाद पंजीकरण के समय ही वाद संपत्ति मूल्यांकन के आधार पर वादियों ,प्रतिवादियों का न्यायिक बीमा कर दिया जाय और एक निश्चित अवधि में फैसला न मिलने या वाद के बीच मृत्यु होने पर बीमित राशि का भुगतान उनके उत्तरधिकारिओं को कर दिया जाय ताकि उन्हें अंतहीन प्रताणना से कुछ राहत मिल सके और वे वाद को आगे लड़ सकें।
***************हमारे प्रधान मंत्री जी प्रायः उल्लेख करते हैं कि जब भी कोई आपदा या चुनौती सामने हो हमें उसे खुशहाली और बेहतरी के अवसर में बदलने का प्रयास करना चाहिए। अतः संख्या संकट के बीच यदि न्याय पालिका अपने उपभोक्ताओं के शोषण को कम करने वाले कुछ कदम उठा कदम पाए ,वाद निस्तारण की कोई समय सीमा तय कर सके या वादियों, प्रति वादियों को कोई न्यायिक बीमा योजना दे पाए तो न्याय के प्रति आस्था पुनर्स्थापित हो सके गी। यह भी सोचना होगा कि जब न्यायाधीशों की कमी दूर हो जाय गी तो यह संस्था कैसे सुनिश्चित करेगी कि शोषण की गति कम और निस्तारण की गति तेज होगी।भगीरथ प्रयास की आवश्यकता है क्योकि भारतीय लोकतंत्र  आशाभरी चक्षुओं से अहर्निश न्याय व्यवस्था की ओर देख रहा है। सबकी अपेक्षा  यही है कि न्याय के तराजू की गरिमा बढे। ------------------------------------- मंगलवीणा

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अंततः
उफ़ गर्मी। इस बार अप्रैल में ही दुसह गर्मी से सर्वत्र हाहाकार मच गया है। नदी ,बाँध ,तालाब ,कुँए सभी पानी के लिए तरस रहे हैं ,फिर आदमी ,जीव -जन्तु व पंछियों की प्यास कैसे बूझे ?समाचार पत्रों और  इलेक्ट्रानिक मिडिया के माध्यम से मौसम विज्ञानी ग्रीष्म की निष्ठुरता व उसके कारणों की नित्य जानकारी दे रहे हैं। आइए कुछ हिंदी कवियों की दृष्टि से इस ताप को देखा जाय। यथा -
जाने क्या हुआ कि सूरज इतना लाल हुआ
प्यासी हवा हाँफती फिर -फिर पानी खोज रही
सूखे कण्ठ कोकिला ,मीठी बानी खोज रही
नीम द्वार का छाया खोजे, पीपल गाछ तलाशें
नदी खोजती धार, कूल कब से बैठे हैं प्यासे
पानी पानी रटे रात -दिन, ऐसा ताल हुआ। जाने क्या हुआ ----डा.जगदीश ब्योम
ग्रीष्म की लय में बढ़ते हुए अब बदलाव की प्रतीक्षा करनी चाहिए। अश्विन गाँधी के शब्दों में -यह सब कुछ याद रहे
मौसम का साथ रहे
ग्रीष्म ऋतु भी जाएगी
फिर रहे गी प्रतीक्षा /अगले मौसम की /बहार की।
***************तब तक  हम सबका सर्वोच्च कर्तव्य है कि पानी बचाएँ और प्यासों को पानी उपलब्ध कराएँ।एक प्यासी पँछी को भी यदि हम पानी पिला पाए तो यह सृष्टि की बड़ी सेवा होगी।------------------------------------------- मंगलवीणा
वाराणसी ;दिनाँक 29 . अप्रैल 2016                 mangal-veena.blogspot.com
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रविवार, 10 अप्रैल 2016

पथभ्रष्ट शिक्षा -दुर्भाग्य देश का

****************देखते ही देखते हमारे कतिपय लब्धप्रतिष्ठित संस्थानों में शिक्षा प्राप्त कर रहे कुछ युवक  कुशिक्षित होने का प्रमाण देने लगे।कोई अफजल की शहादत मनाने लगा ,कोई महिषासुर दिवस मनाने लगा तो कोई श्रीनगर स्थित भारतीय प्रद्यौकिकी संस्थान में भारत  माता की जय बोलने वाले क्षात्रों की पिटाई करने लगा ।शिक्षा केन्दों में घट रही ये घटनाएँ सन्त कबीर की उलट बानी "बरसे कम्बल भींगे पानी " की याद दिला रही हैं।  नेताओं की तो माँगी मुरादें पूरी होने की बारी आई। कोई छात्र मरे तो क्या ,जनता के पैसों से शिक्षित हो रहे युवक राष्ट्र विरोधी बनें तो क्या ,मुट्ठी भर राष्ट्र विरोधी कश्मीरी देश को परेशान कर के रख दें तो क्या ,इन नेताओं को तो मुद्दे चाहिए जिसपर प्रलाप कर सत्ता पक्ष  के विरुद्ध भोली -भाली जनता को बहका कर अपने पक्ष में वोट बढ़ा सकें और फिर वोट से लूट और सत्ता सुख।परन्तु यह गहरी चिंता का विषय है कि ये बच्चे दुःसोच के हद तक कैसे पहुँचे।साथ ही भारतीय समाज एवँ सरकार को तत्काल सक्रिय होने का समय  है ताकि ऐसे संस्थानों, शिक्षकों , गैरशिक्षकों ,शिक्षण सामग्रियों ,विचारकों ,लेखकों ,प्रचारकों ,छद्म नायकों ,नेताओं , सफेदपोशों इत्यादि की पहचान हो सके जिसने ऐसी अपसंस्कृति एवँ राष्ट्द्रोही विद्यार्थी तैयार किये। फिर  दृढ इच्छाशक्ति से कारकों को समूल नष्ट करना होगा वरन ये लोग हमारे देश व संस्कृति को किसी गम्भीर अनहोनी में झोंक सकते हैं।विद्यार्थी तो पौध हैं,दोष तो जमीन और माली में है जिन्होंने ऐसे  कुपौधों को पनपाने की भूमिका निभाई।
***************चूँकि कारण की पूर्ण विवेचना बिना निवारण संभव नहीं है ,हमें भारत की स्वतंत्रता से अब तक नव निर्माण व प्रगति के लिए हुए सामाजिक और शैक्षिक परिवर्तनों को स्मरण करना होगा। महात्मा गाँधी की  कौशलोन्मुखी ,संस्कार स्निग्ध एवँ सर्वसुलभ शिक्षा ,जो भारत के नव निर्माण की आकांछा थी , स्वतंत्रता प्राप्ति तक आँधी की भाँति बहती रही परन्तु आजादी एवँ बँटवारे के बाद धीमी पड़ने लगी क्योंकि समकालीन अन्य शासकीय विचार धाराएँ जैसे राजशाही , प्रजातंत्र ,समाजवाद,मार्क्सवाद (कम्युनिज्म  ), व्यक्तिवाद ,धर्मसापेक्षवाद ,धर्मनिरपेक्षवाद ,उदारवाद ,कट्टरवाद ,अलगाववाद  इत्यादि  गाँधी के रामराज्य की परिकल्पना पर प्रतिघात करने लगीं।जिनके हाथ सत्ता आई वे गाँधीवादी कहलाना चाहते थे  परन्तु अपने लिए महारानी विक्टोरिया और लार्ड माउन्ट बेटन जैसी प्रभुता चाहते थे। फिर क्या था ?चतुर कांग्रेसी गाँधी के स्वयम्भू उत्तराधिकारी एवँ अपने हित केलिए देशी अंग्रेज बन गए। मैकाले की शिक्षा प्रणाली  परवान चढ़ने लगी। धीरे -धीरे व्यवस्थाविहीन व्यवस्थित भारत में  शिक्षा संस्कार विहीन होती गई।इस उदेश्य के लिए देश की अहित चाहने वाली विचारधाराओं को भी सरकारी प्रश्रय दिए गए ताकि राष्ट्रवादियों को उनके साथ उलझाया जा सके।देश के इतिहास को गौरवहीन बनाने का कुत्सित प्रयास हुआ ताकि तुलनात्मक दृष्टि से नेहरु परिवार को भारत के नव जागरण प्रतीक रूप में स्थापित किया जा सके और उनकी छाया में लाखों स्वार्थी काँग्रेसी वर्षोंवर्ष तक  इस विशाल देश का सत्ता सुःख भोगते रहें।इनकी सुविधा केलिए बनाए गए तंत्र के कारण ही इतिहास के साथ भूगोल भी बदला जिनको याद करते ही हर भारतीय का क्रोध आसमान पर चढ़ जाता है। अनुकूलता मिलती गई और विघटन केलिए लालायित  अति उग्रवादी संगठन  भी अपनी जड़ें ज़माते गए।कश्मीर एवँ पूर्वोत्तर राज्यों में विभीषिका फैलाने वाला आतँकवाद या पश्चिमी बँगाल से आँध्रप्रदेश तक फैला नक्सलवाद आँख मूंदने से ही आज ऐसे भष्मासुरी पैमाने पर पहुँचा है कि शिक्षण संस्थानों में भी इनके समर्थक अध्ययन -अद्ध्यापन कर रहे हैं और उनके हित को आगे बढ़ा रहे हैं।
***************शिक्षा को पथ भ्रष्ट होने का सबसे बड़ा कारण बना पैसा। पूरे विश्व में औद्योगीकरण के बाद संस्कृति, सदाचार ,संस्कार इत्यादि पर पैसा हावी होने लगा।सुख ,सुविधा ,शिक्षा ,सम्मान ,सत्ता ,यहाँ तक की धर्म भी पैसे के अनुचर बन गए। पैसा , सदाचार से अर्जित हो या कदाचार से , केवल पैसा माना जाने लगा और यह पैसा सर्वोपरि पैसा बन गया।जब भ्रष्ट कार्यों से पैसा बहुत कम समय में बहुत ज्यादा अर्जित होने लगा तो भ्रष्ट होने में लोगों की झिझक जाती  रही। गाँधी  काल की आम जन की वह पीढ़ी जो संस्कारों में जीती थी अगली पीढ़ी  को भी भरसक संस्कारित बनाए रखी  परन्तु तीसरी नई पीढ़ी  के सामने अनुत्तरित हो गई। युवक जब अभिभावकों के समक्ष आज के नायकों जैसे नेता ,माफिया ,अभिनेता ,सरकारी बाबू ,अभियन्ता ,वकील ,ठेकेदार ,शिक्षक इत्यादि का उदहारण रख देते हैं तो देश प्रेम  ,सदाचार एवँ संस्कार की बातें अप्रासंगिक लगने लगती हैं। धनोपार्जन की अनुगामी बन चुकी शिक्षण संस्थाएं भी इस नवाचार से अछूती नहीं रहीं ।  चाहे सत्ता पक्ष में रहें या विपक्ष में ,चाहे देश प्रेम की राजनीति करें या देश द्रोह की ;  नेता बनना तो धनोपार्जन का इतना सटीक ब्रह्मास्त्र बन गया है कि इससे अल्पकाल में सर्वाधिक संपत्ति और सम्मान की गारन्टी हो गई है।जवाहर लाल नेहरु  या जाधव पुर विश्वविद्यालय में कन्हैया जैसे छात्रनेताओं के प्रादुर्भाव की  यही तो प्रमुख पृष्ठभूमि है।
***************पिछले सात दशकों में हमारे देश में सामाजिक समरसता एवँ पुनर्निर्माण के लिए जो मील के पत्थर  सरीखे कार्य हुए वे भी पार्श्व प्रभाव के रूप में शिक्षा को संस्कार विहीन किये। रियासतों के विलय ,जमींदारी उन्मूलन ,अधिवासी कानून ,अथवा भूदान यज्ञ से जहाँ लोकतंत्र  की अच्छाइयाँ सामने आईं वहीं लाभान्वित वर्ग को लगा कि मनुवादी संस्कृति के बूते सदियों तक उन्हें उनके अधिकार से वंचित रखा गया। हद तो तब हुई जब  सामाजिक समरसता के नाम  पर जाति विशेषके लोगों को हर क्षेत्र में सरकारी आरक्षण दिया गया और आरक्षण पाने वाली जातियों की सूची उत्तरोत्तर बड़ी होती गई। भारतीय संस्कृति तथा इसके ताने बाने को आरक्षण ने इतनी छति पहुंचाई कि सामाजिक समरसता चूर -चूर होने लगी। मेधाओं के अवसर छीने और अयोग्य हाथों में जिम्मेदारियाँ आईं।सुअवसर कौन छोड़ता है ;अब जाट ,गूजर ,पटेल ,ब्राह्मण ,ठाकुर सभी  आरक्षण माँग रहे हैं और शिक्षण संस्थायें इन सारी विषमताओं के दर्पण बनते जा रहे हैं।उसी दर्पण में दुर्गा के आराधकों के सामने महिषासुर को महिमा मण्डित करने वाले भी दिखने लगे हैं।अतीत के गलत निर्णयों व् गन्दी नेतागिरी ने सामाजिक विषमता को चरम पर  पहुँचा दिया है जहाँ से इसे सही स्थान पर न लाने से देश को भयावह परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।
***************विश्वपटल पर आर्थिक शक्ति के रूप में उभरते भारत को ऐसे गतिरोधकों से तत्काल छुटकारा  पाने का समय आ गया है। समय की पुकार से प्रेरित जनता ने एक देश प्रेमी सरकार को बहुमत के साथ सत्ता सौंपी है। अपना दायित्व निभाते हुए जनता सरकार को याद दिला रही है कि ढुलमुल रवैया एवँ तुष्टिकरण से शासन को स्वतन्त्र किया जाय। संविधान देश के लिए है न कि देश संविधान के लिए। यदि अस्पष्टता के बहाने कोई गैरभारतीय सा व्यवहार करता है तो बोलने की स्वतंत्रता की तत्काल लिखित व्याख्या होनी चाहिए। देशप्रेम अभिव्यक्ति के जितने भी ढँग हों ,उनको संवैधानिक रूप से इस निर्देश के साथ सम्मान मिलना चाहिए कि जिस भी अभिव्यक्ति से भारत का जयकारा हो ,सभी वर्ग व धर्म के लोग समवेत स्वर से उसमें सहभागी बनें।भारत में रह कर पाकिस्तान जिंदाबाद कहने वालों को न पाकिस्तान मिले न विशेष दर्जा परन्तु उनके लिए सख्त  क़ानूनी परिणाम अवश्य सुनिश्चित हो ।यदि वर्तमान के साथ इतिहास  ठीक कर लिया जाय और संस्कार को समाज में पुनर्स्थापित कर दिया जाय तो कल हमारा है।देश को इन चुनौतियों पर विजय पाना ही होगा क्योंकि पूरी दुनियाँ की आशा भरी दृष्टि भारत पर है। ------मंगलवीणा
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वाराणसी ;दिनाँक 10 . 04 . 2016
------------चैत्र शुक्ल ३ सम्वत २०७३                           mangal-veena .bloger.com
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अंततः
चैत्र माह की नवरात्रि व् श्री रामनवमी के पावन पर्व पर यह स्मरण करना प्रासंगिक
होगा  कि गाँधीकल्पित रामराज्य के अतुल्य नायक मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम अपनी जन्मभूमि  को कैसी श्रद्धा अर्पित करते थे।''लंका विजयोपरांत वनवास की अवधि पूर्ण होते ही प्रभु श्रीराम अपनी अर्धांगिनी जानकी ,भ्राता लक्ष्मण ,लंकापति विभीषण ,वानर राज सुग्रीव तथा अंगद आदि के साथ पुष्पक विमान से अयोध्या वापस आ रहे थे। ज्यों ही विमान अयोध्या के आकाश पर पहुँचा ,मातृभूमि के दर्शन पाते ही प्रभु विह्वल हो उठे और सहयात्रिओं से बोल उठे कि -
*****जद्यपि सब बैकुंठ बखाना। बेद पुरान बिदित जगु जाना।।
*****अवधपुरी सम प्रिय नहिं सोऊ। यह प्रसंग जानइ कोउ कोऊ।।
*****जन्मभूमि मम पुरी सुहावनि। उत्तरदिसि बह सरजू पावनि।।
*****अति प्रिय मोहि इहाँ के बासी। मम धामदा पुरी सुख रासी।।श्रीरामचरितमानस।'
अस्तु ,बैकुण्ठ से भी अधिक प्रिय भारत के देशप्रेमियों को नवरात्रि एवँ श्री रामनवमी की
शुभ कामनाएँ।-------------------------------------------------------- मंगलवीणा   

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2016

दवा का दर्द

***************भारत जैसे देश में शिक्षा ,स्वास्थ्य व सामाजिक सुरक्षा को सकारात्मक और जनहितसाधी बनाए रखना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए परन्तु दुर्भाग्य से ये तीनों क्षेत्र भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं हो पा रहे हैं। ऐसे में सरकार को कम से कम ऐसे निर्णयों से बचना चाहिए जो इन क्षेत्रों में नकारात्मकता बढ़ाएँ।हाल ही में भारत सरकार ने गम्भीर रोगों में दी जाने वाली , विदेशों से आयातित, चौहत्तर दवाओं से आयत शुल्क छूट वापस लेकर एक ऐसा ही विपरीत कदम उठाया है जिसका औचित्य समझ से परे है। आयातित दवाएँ अपनी उत्तमता के कारण बाजार में हैं। अतः आर्थिक दबाव बढ़ा कर उन्हें बाजार से बाहर करना उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य के साथ अन्याय है।
***************प्रदूषित जलवायु ,आधुनिक जीवन शैली एवँ बढ़ते प्राकृतिक असंतुलन ने अनेकानेक गम्भीर बीमारियों का सौगात भी आज के समाज को सौंपा है। इन  फैलती  बीमारियों व बढ़ती चिकित्सकीय सुविधाओं के कारण  हर  घर -परिवार में आय का एक बड़ा हिस्सा दवा पर ब्यय हो रहा है। उन परिवारों की तो आर्थिक रीढ़ ही टूट जाती है जिनका  कोई सदस्य किसी गम्भीर एवँ लम्बी बीमारी की चपेट में आ जाता है ।ऐसे में किसी भी तर्क से  दवाओं की कीमते बढ़ा कर रोगियों के लिए दवा का दर्द बढ़ाना किसी भी दवा निर्माता या सरकार के लिए सराहनीय नहीं हो सकता है।हाल ही में कुछ गम्भीर बीमारिओं में प्रयोज्य आयातित दवाओं के दाम बढ़ने से वे रोगी तो कराह ही उठे हैं जो इन दवाओं से स्वास्थ्यलाभ पा रहे हैं। यह सभी जानते ,मानते और समझते हैं कि दक्षता के साथ-साथ चिकित्सक ,चित्कित्सालय व्,चिकित्सा  रोगी के विश्वास के विषय हैं। फिर विश्वास को आर्थिक दबाव से प्रभावित करना सरकार की संवेदनशीलता पर प्रश्नचिन्ह जड़ता है। अतः जिस सरकार के सर पर जनता के उम्मीदों की भारी गठरी है उसे देशी दवाओं के प्रोत्साहन के लिए, शुल्क छूट वापस लेकर आयतित दवाओं की कीमतें बढ़ा कर उनकी उम्मीदों पर पानी नहीं फेरना चाहिए।
*************** दवाओं के विषय में कोई निर्णय रोगियों के हित में होना चाहिए जिसे हमारे देश के अधिकार प्राप्त लोग समझने को तैयार नहीं हैं। वे अधिकांशतः अपने कर्तब्यों के प्रति असंवेदनशील हैं और ऐसा निर्णय ले रहे हैं कि लगता ही नहीं कि वे जनता  के लिए अधिकार संपन्न बनाये गए हैं। गाँधी के देश में नियन्ताओं को इतना भी यथेष्ठ क्यों नहीं लगता कि थोड़े समय केलिए स्वयं आम जन बन कर अनुभव करें कि उनका निर्णय उन्हें कैसा लग रहा है? स्वास्थ्य व्यवस्था को चुस्त -दुरुस्त, पारदर्शी एवँ आम आदमी केलिए सुलभ बनाने वाला प्रयास छोड़  उसे और दुसह बनाना सम्वेदना की किस कसौटी पर उचित माना जा रहा है?क्या किसी एच आई वी ,किडनी ,कैंसर ,दिल ,यकृत ,मधुमेह जैसी गम्भीर बीमारी से पीड़ित ब्यक्ति ,जो इन दवाओं के सहारे जिंदगी की जंग लड़ रहा है ,के प्रति सरकार का यही कर्तव्य बोध है? शायद ही ऐसे निर्णयों से भारत स्वस्थ भारत बने।
***************आयत शुल्क की छूट वापसी केलिए सरकार ने देशी दवा की कम्पनियों को बढ़ावा देने का तर्क दिया है जिससे प्रमाणित होता है कि देशी दवा उत्पादकों का सरकार पर दबाव है। परन्तु इससे यह प्रमाणित नहीं होता कि क्या सरकार का भी इन देशी  निर्माताओं पर कोई नियंत्रण है ?देश में निर्मित  दवाओं की गुणवत्ता से मूल्य तक ,जाँचशुल्क से डाक्टरों की फ़ीस तक सब कुछ अपारदर्शिता से आच्छादित हैं जिससे उपभोक्ता ,सरकारें व् अखिल भारतीय मेडिकल एसोसिएशन सभी विज्ञ हैं। फिर भी कुछ अदृश्य कारण हैं जिससे उबरने की इच्छाशक्ति न सरकार बना पा रही है न संगठन।
***************विसंगतियों को समाप्त करने के नाम  पर लोग अपनी लोक प्रियता बटोर लेते हैं और अपना हित भी साध लेते हैं पर उपभोक्ता ठगे से जहाँ के तहाँ रह जाते हैं। आज भी आमिर खान साहब की सत्यमेव जयते वाली धारावाहिक याद है जिसमें दवा क्षेत्र वाली कड़ी ने खूब वाहवाही बटोरी थी।सस्ती जेनरिक दवाओं की भी खूब ढोल पीटी गई। आस पास के किसी मेडिकल स्टोर पर जाइए,नहीं मिलती हैं। स्वच्छ भारत -स्वस्थ भारत वाले देश में यदि कहीं सबसे अस्वच्छ भारत दिखता है तो सरकारी अस्पतालों में जिनके कन्धों पर स्वस्थ भारत का दायित्व है।हो हल्ला सुनते रहिए परन्तु परिणाम- ढाक के तीन पात।सजग सरकार से अपेक्षा है कि उपभोक्ता हित में इस क्षेत्र के सभी खिलाडियों को समान सतह पर स्वस्थ एवँ पारदर्शी प्रतिद्वंदिता का अवसर प्रदान करे ताकि भारत स्वस्थ एवँ स्वच्छ रहे। तभी तो देवगण भी भारत भूमि में जन्म लेकर अपने को धन्यभागी मानें गे।---------------------------------------------------------------------------------मंगलवीणा
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वाराणसी ,दिनाँक 14.02 .2016                                 mangal-veena.blogspot.com
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अन्ततः
आज के त्योहार पर संत वेलेंटाइन यदि इस धरा पर होते तो ख़ुशी से झूम उठते कि उनको मानने वाले पूरी दुनियाँ में फ़ैल चुके हैं;यहाँ तक कि भारतीय सुसंस्कृति का भी चीर हरण करने लगे हैं।वेलेन्टाइन महोदय को शायद पता था कि लगभग इसी समय भारत में बसंत आगमन के साथ मदन महीप जी  का स्वागत होता है। अतः यहाँ भी हैप्पी  वेलेंटाइन डे लोगों के सर चढ़ कर बोले गा।भारतीय संस्कृति के हितैषी इस युवा भारत को क्या समझाएँ।अच्छा है कि लहरों को अपनी मस्ती में लहराने दिया जाय। संत वेलेंटाइन की जय हो। सभी सुधी पाठकों को  हैप्पी  वेलेंटाइन डे।------मंगलवीणा
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गुरुवार, 24 दिसंबर 2015

इति श्री असहिष्णुता कथा

***************वर्ष दो हजार पंद्रह अवसान की ओर अग्रसर है। साथ ही भारत में असहिष्णुता पर चर्चा- परिचर्चा भी समाप्त हो रही है। टीवी पटल से इस विषय का गायब होना और दूसरे विषयों का अवतरित होना इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। इसके कई उदाहरणों में प्रथम भारत द्वारा पाकिस्तान की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाना या दूसरा सोनिया जी व राहुल का दल -बल के साथ न्यायलय में उपस्थित होना है। किसी न किसी रूप में  यह असहिष्णुता सदियों से समाज के ताने -बाने में विद्यमान रही है। इतिहास साक्षी है कि पूर्व मध्य काल से आज तक,विदेशी आक्रान्ताओं और देशी दमनकारी शासकों  के लिए सहिष्णु भारत एवँ सहिष्णु भारतीय प्रशंसनीय रहे हैं क्योंकि हमारी सहिष्णुता पर ही उनकी असहिष्णुता फूलती - फलती रही है। बारहवीं सदी वाले उस काल -खण्ड को लोग आज भी याद करते हैं जिसमें सहिष्णु पृथ्वीराज चौहान बार - बार विजयी होने पर असहिष्णु एवँ आक्रान्ता मुहम्मद गोरी को छोड़ते गए और सन  ग्यारह सौ बानवे में आक्रमण कर जब उसने चौहान को पराजित किया तो उन्हें बन्दी बना कर अफगानिस्तान ले गया और यातनापूर्ण मृत्युदण्ड दिया।भारतीय इतिहास के हर नए पृष्ठ पर कुछ ऐसे ही घटनाक्रम झाँकते हैं। देशी राज्यों में आपसी असहयोग एवँ स्वभावगत सहिष्णुता के कारण लगातार बाहरी आक्रमण होते रहे और हमारे देश का इतिहास, भूगोल एवँ समाज  बदलता रहा। वर्तमान भारत में उसी समाज की नई         पीढ़ियाँ  बसती हैं जिसमें ढेर सारे अयोग्य एवँ असहिष्णु लोग भी छद्म धर्मनिरपेक्षता के सहारे समाज में स्थान बना लिए हैं। आज की भारतीय जलवायु में जब शुद्ध धर्मनिरपेक्षता,प्रखर राष्ट्रवाद एवँ सबके विकास की बात होने लगी है तो ऐसे लोगों में घबराहट हुई है और अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए वे सरकार और उनके समर्थन वाली जनता को असहिष्णु बनाने लगे हैं।यदि इस दबाव को निष्प्रभावी नहीं किया गया तो सरकार अपने मुद्दों से भटके गी और कुचक्र चलनेवाले अपने मंतव्य में सफल हो जाँयगे।
***************कोई घटनाक्रम नहीं अपितु दो घटनाएँ थीं जिनकी पृष्ठभूमि में वर्तमान असहिष्णुता का वितान रचा गया। ये थीं -कन्नड़ भाषा के साहित्यकार श्री कुल्बर्गी की हत्या एवँ दादरी में बीफ खाने की अफवाह पर अखलाक नामक एक व्यक्ति की पिटाई से मौत।दोनों ही घटनाएँ कानून व्यवस्था से जुड़ीं हैं और राज्य सरकारों का प्रथम दायित्व है कि हर नागरिक के जान -माल उसके संवैधानिक अधिकारों को चुस्त दुरुस्त सुरक्षा प्रदान करें।यदि ऐसा करने में राज्य सरकारें विफल होती  हैं तो उन्हें सत्ता में रहने का कोई औचित्य नहीं है। अतः अतीत के पुरस्कार विजेताओं में यदि कुछ लोगों को विरोध जताने की बात सूझी तो उन्हें कर्नाटक की काँग्रेस एवँ उत्तर प्रदेश की समाजवादी सरकारों के विरुद्ध खड़ा होना चाहिए था न कि केंद्र की गठबन्धन सरकार के बिरुद्ध। पूरे देश ने देखा कि दोषी कौन और कठघरे में खड़ा किसको किया गया।उद्देश्य एक ही था कि मारो कहीं लगे वहीँ।
***************यह सर्व विदित है कि किसी व्यक्ति को पुरस्कृत होने के लिए उत्कृष्टता के साथ एक अहं मापदण्ड पुरस्कार देने वाली सरकार या संस्था का ,विचारधारा आधारित, पसन्द भी होता है। पुरस्कृत होने पर  प्राप्त कर्ता को अल्पकालिक एवँ दीर्घकालिक दो प्रकार के लाभ होते हैं यथा एकाएक व्यक्ति को ख्याति मिलती है ,अपने क्षेत्र में उसकी पूछ बढ़ती है और भविष्य में सरकारी एवँ गैर सरकारी सुविधाओँ के लिए उसकी पात्रता बढ़ती है।यही कारण है कि गैर राष्ट्रवादी सरकारों के दौर में वामपंथी ,काँग्रेसी ,क्षद्म धर्मनिरपेक्षी और गैर हिंदूवादी विचारों वाले साहित्यकार ,समाजसेवी  वैज्ञानिक ,सिनेधर्मी ,संगीतज्ञ इत्यादि खूब पुरस्कृत होते रहे और दीर्घकालिक लाभ उठाते रहे।इन आदरणीयों में कुछ लोग  ऐसे भी हैं जो राष्ट्रवाद , वहुसंख्यकवाद एवँ मूल धर्मनिरपेक्षता को अपने एवँ देश के लिए अस्पृश्य मानते हैं। फलतः बेमेल विचार की व्यवस्था में ऐसे लोगों के सर्वकालिक लाभ भी बाधित  हुए । फिर क्या कुल्बर्गी या दादरी के बहाने , घटती आदरणीयता वाले  ये लोग सरकार के ऊपर असहिष्णु होने का आरोप लगा दिए। साहित्य अकादमी के सदस्य ,पैंतीस पुरस्कार वापस करने वाले साहित्यकार ,समाजसेवी,रंगकर्मी ,नेता. पुरस्कारों से जुडी संस्थायें इत्यादि मैदान में कूद पड़े। मीडिया के मैदान में भयंकर वाकयुद्ध हुआ कि सरकार असहिष्णु हो गई या नहीं।  अंततः मिथ्या बादल छँटने लगे और देशवासी समझ पाये कि असहिष्णु कौन हैं। वस्तुतः एक बहुमत से चुनी सरकार को सहन न कर पाना सबसे बड़ी असहिष्णुता है।
***************************** पूरी दुनियाँ में अपनी श्रेष्ठता एवँ स्वार्थपूर्ति के लिए विभिन्न समुदाय  के लोगों में दूसरों के प्रति  असहिष्णुता रही है और पीढ़ी दर पीढ़ी यह बढ़ती ही जा रही है। संभवतः यही असहिष्णुता भविष्य में  विनाश का कारण बने क्योंकि हम एक दूसरे के लिए ही नहीं बल्कि अपनी धरती पहाड़  ,पर्यावरण  ,जल ,वायु ,जीव -जन्तु सबके प्रति असहिष्णु होते जा रहे हैं।असहिष्णुता के एक से बढ़ कर एक गम्भीर विषय दुनियाँ के सामने हैं। अतः असहिष्णुता -असहिष्णुता का खेल खेलने वालों को सोचना होगा कि कौन सी असहिष्णुता की बात कर रहे हैं। दादरी एवँ बंगलुरू वाली लकीरों के सापेक्ष तो जम्मू कश्मीर में हिन्दुओं का नरसंहार व लाखों हिन्दुओं का घाटी से पलायन या सन चौरासी में  श्रीमती  इन्दिरा ग़ांधी की हत्या के बाद सिक्खों के नरसंहार की लकीरें बहुत बड़ी थीं। लगता है कि उस समय उन्हें असहिष्णुता की याद नहीं आई।बांग्ला देश की लेखिका तस्लीमा नसरीन  ने ऐसा कुछ कह कर,  कि भारत में जो मुसलमानों की बात करे वह धर्मनिरपेक्ष (सहिष्णु ) और जो हिन्दुओं की बात करे वह हिंदूवादी ( असहिष्णु ) ,ऐसा आईना दिखाया है कि तथाकथित आदरणीयों को अपनी कुरूपता के लिए पूरे राष्ट्र से क्षमा माँगनी चाहिए।
***************परन्तु केंद्र सरकार को भी विरोधिओं के मिथ्या आचरण व उनके उद्देश्य से सतर्क हो जाना चाहिए। असहिष्णुता ठण्डी पड़ेगी तो भ्रष्टाचार को गरमा जाय गा ,एक मंत्री का कोई वक्तव्य ठण्डा पड़ेगा तो किसी दूसरे मंत्री या भाजपाई का वक्तव्य उछाल दिया जाय गा। अर्थ व्यवस्था को गति देने के लिए जीएसटी जैसे कानून चाहिए तो राज्य सभा में बहुमत के बल पर वे ऐसा होने नहीं देंगे ,मुद्दों की कमी होगी तो प्रधान मंत्री को प्रवासी भारतीय बनायेंगे अथवा उनके पहनावे पर कटाक्ष करें गे और देश विदेश में ऐसा वातावरण बनायें गे कि मेक इन इंडिया की ऐसी तैसी हो जाय। संसद तो इस लिए चलने नहीं देंगे क्योंकि उनके शासनकाल में भाजपा वाले भी गतिरोध पैदा किये थे। ये लोग  सौहार्द ,आर्थिक विकास एवँ रोजगार के अवसरों को बाधित करने का पुरजोर प्रयास करेंगे।इनके षड्यन्त्रों  को निष्फल करने ,अपने चुनावी वादों को पूरा करने एवँ जनता से सक्रिय संवाद बनाये रखने में ही वर्तमान सरकार एवँ देश की प्रगति का मंगलकारी भविष्य छिपा है।
***************सारी दुनियाँ सहमत है कि गाँधी की अहिँसा सहिष्णुता की आदर्श अवस्था है और समाज में इसी की स्थापना के लिए असहिष्णुता के विरुद्ध हिंसात्मक संघर्ष होते हैं। यह प्रवृत्ति बहुदा दबती हुई तो पाई गई है परन्तु किसी भी संस्कृति में कभी भी समूल नष्ट होते नहीं पाई गई है। इसका कारण शायद  इसी तथ्य में छिपा है कि सामाजिक होने के साथ ही मनुष्य एक जानवर है। फिर भी सामाजिकता के नाते मनुष्य यदि मनुष्य से मनुष्यता का व्यवहार करे तो असहिष्णुता न्यूनतर होती जायगी और मानवता गाँधी के सपनो वाले राम राज्य को प्राप्त कर लेगी।मानव जाति में भी जिन्हें समाज आदरणीय कहता है उन्हें आदरणीयता के मापदण्ड पर सदैव खरा उतरना होगा वरन रँगा सियार की कहानी सत्यार्थ होगी।इति श्री असहिष्णुता कथा।----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- मंगलवीणा
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वाराणसी ,तिथि :२४ दिसम्बर 2015                    mangal-veena.blogspot.com
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शनिवार, 24 अक्टूबर 2015

क्या होगा बिहार का

***************बिहार में नई सरकार बनाने हेतु चुनाव प्रक्रिया जारी है।परिणाम बतायें गे कि वहाँ के मतदाता अपने पूर्वाग्रह पर  पूर्ववत  डटे हुए हैं या रूढ़ियों को तोड़कर विकास व प्रगति की धारा में अन्य राज्यों से प्रतिस्पर्धा का विचार बनाते हैं। यह चुनाव सरकार के बदलाव के साथ वहाँ के मतदाता की अपेक्षाओं को नए ढंग से परिभाषित करने एवँ पाने का सुअवसर भी है।हम सभी जानते हैं कि स्वतन्त्र भारत में समान अवसर की उपलब्धता व बिहार वासियों की बेहतर बौद्धिक सम्पन्नता के बाद भी बिहार से राजनीतिक गांभीर्य गायब हो गया ,शिक्षा अशिक्षित शिक्षा हो गई और सामाजिक पिछडापन वहाँ का ट्रेड मार्क बन गया। न बिहारियों का दूसरे राज्यों में तीब्रतम पलायन बन्द हुआ ,न दूसरे राज्य के लोगों का बिहारियों के प्रति दृष्टिकोण बदला। सामाजिक पिछड़ापन दूर करने केलिए जो आरक्षण की व्यवस्था हुई उससे कुछ वर्गों के पिछड़ेपन को दूर होने की क्या बात हो ,उल्टे पूरा बिहार ही पिछड़ गया। फिर क्या इसके साथ  हीनभावना पैदा करने वाला बीमारू राज्य जैसा नाम नत्थी कर दिया गया। अब बीमारू राज्य को स्वास्थ्यलाभ के लिए विशेष पैकेज की माँग हो रही है और यह इस चुनाव का केंद्रीय मुद्दा है।
***************वैसे तो बिहार में किसी भी जाति का प्रतिशत घनत्व इतना नहीं है कि अकेले अपने दम पर किसी प्रत्याशी को विधायक या सांसद का चुनाव जिता दे परन्तु जातिवादी नेताओं के गठजोड़ के कारण जब दो या दो से अधिक जातियों के ध्रुवीकरण का मायाजाल फैलता है तो अयोग्य एवँ जातिवादी लोग विधान सभा और संसद में पहुँचने में सफल हो जाते हैं और प्रदेश एवँ देश की बर्बादी के कर्ता और कारण बनते हैं। शिक्षा को पटरी से उतार देने से बिहार की आम जनता में जाति ,धर्म ,आम जनोपयोगी कानून  व विकास का घाल मेल हो गया। यदि इस प्रदेश में समृद्ध शिक्षा का समुचित विकास हुआ होता तो मतदाताओं में यह जागृति अवश्य होती कि जाति और धर्म का अलग क्षेत्र है जिसमें हमें जीना चाहिए , गर्व करना चाहिए ;साथ ही दूसरे की जाति व धर्म का समादर करते हुए अपने जाति व धर्म की उन्नति के लिए प्रयास करना चाहिए।ऐसा होने पर यह भी जागृति  होती कि विधायिका एवँ संसद का क्षेत्र विकासोन्मुखी एवँ व्यवस्थादायी क़ानून बनाना तथा विकास  एवँ कानून की व्यवस्था का सुनिश्चितीकरण है। फिर तो जनता यही क्षीर -नीर विवेक वाला सूत्र अपना लेती और विश्व में सबसे पहले जनतंत्र का प्रयोग करने वाला बिहार आज अपना खोया वैभव पुनः प्राप्त कर, अन्य राज्यों के लिए ,मार्गदर्शक की भूमिका में आ सकता है। देखना होगा कि जाति ,धर्म से अलग हट कर विकास एवँ विकासोन्मुखी विधायिका के लिए चुनाव लड़ रहे दलों व प्रत्याशियों का क्या हश्र होता है।
***************एक विधायक कैसा हो ,इसका सीधा -साधा मानक हर मतदाता को पता है। फिर भी स्वार्थी दल व प्रत्याशी मिथ्या प्रचार से ऐसी मृग मरीचिका तैयार कर रहे हैं कि मानक या कसौटी के मापदंड ही दृश्यपटल से ओझल हो जाँय और मरीचिका में हिरन का शिकार हो जाय। जातिवाद ,धर्मवाद ,आरक्षण ,गो रक्षा या गो हत्या ,दलित उत्पीड़न ,बलात्कार ,पड़ोसी पाकिस्तान से संबंध और कालिख का पोता -पोती ,राष्ट्रीय स्वयम सेवक संघ पर तंजकसी और पूँजीवाद जैसे मुद्दे इस चुनाव के लिए गढ़े और उछाले जा रहे हैं जिनका उद्देश्य चुनाव को मूल उद्देश्य से भटकाना है।इसी कड़ी में तथाकथित साहित्यकारों ने अपना साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटा कर चुनावी संग्राम को एक नया मुद्दा दिया है।सैक्युलरिज्म के भ्रामक प्रचार से वैसे ही स्वार्थी नेता  इस राष्ट्र के विकास को बाधित किए हुए हैं।इन भूलभुलैयों से बाहर निकलना बिहार के मतदाताओं के लिए एक कठिन परीक्षा है।
***************चुनाव परिणाम के बाद बिहार का राजनीतिक स्वरुप देश की भावी दिशा एवँ गति को अपरिहार्य रूप से प्रभावित करे गा।यदि भ्रामक मुद्दों की पराजय होती है तो विजय का मुकुट बिहार के नव युवतिओं और युवकों के सर पर होगा तथा प्रगति एवँ विकास वादी बिहार का उदय होगा। यदि ऐसा नहीं होता है तो मानना ही होगा कि चक्रव्यूह में अभिमन्यु अभी भी फँसा हुआ है। सत्ता ही नहीं विपक्ष में भी जो विधायक चुन कर आएं गे उनकी पृष्ठभूमि ,सोच व रुझान से लोकतान्त्रिक प्रणाली में त्रुटि ,संतुलन और सुधार की धनात्मक या ऋणात्मक लालसा का संकेत होगा। कोई भारत वासी नहीं चाहता कि कमाई ,दवाई और पढाई के लिए बिहार के लोग परप्रांतों पर निर्भर रहें। सराहनीय स्थिति वह होगी कि उलटी गंगा बहे। नई सोच के लोग यह भी देखने को उत्सुक हैं कि बिहार के नेताओं को मतदाता हमेशा केलिए उनके यथोचित स्थान पर पहुँचायें गे अथवा नौटंकी जारी रहे गी और थाप पर दर्शक जुटते रहें गे।---------------- मंगलवीणा
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वाराणसी ,दिनाँक 24 अक्टूबर 2015
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शुक्रवार, 18 सितंबर 2015

हिंदी के साथ पखवारे का छल

 ***************हमारे देश में चौदह सितंबर से हिंदी के लिए एक पखवारे की उत्सव बेला आती है। लोग एकाएक हिंदी को विश्व की सर्वाधिक समर्थ भाषा बताने लगते हैं और हिंदी का गुणगान कर तद्गत लाभ साधने लगते हैं।पूरे देश के कार्यालयों,विभागों व् अनेकानेक संस्थानों के अँग्रेजियत से ओतप्रोत प्रमुख, हिंदी महिमा महोत्सव के लिए, मंचों पर सजने लगते हैं। तीन सौ पैंसठ दिन हिंदी की अनवरत सेवा करनेवालों को तो इस भुलावे से कोई अंतर नहीं पड़ता परन्तु प्रति वर्ष  चौदह सितम्बर से एक पखवारा तक हिंदी के नाम उत्सव मनाने वालों के उत्साह का पारावार नहीं होता। यह उत्सव भारत में सरकार द्वारा आयोजित अनेक उत्सवों में एक है।  इस पर्व को पन्द्रह दिनों तक मनाने के लिए सरकार प्रचुर धनराशि खर्च करती है।अतः पैसे की स्वीकृति पूर्व में ही करा ली जाती है। फिर क्या हर कार्यालय के प्रमुख ,हिंदी अधिकारी व कर्मचारी नेमी कार्यों से विरत हो नित एक नया कार्यक्रम आयोजित करते हैं और स्मृतिचिन्ह ,पुरस्कार व जलपान में पैसे समायोजित करते हुए हिंदी को भरपूर उपकृत करते हैं।
***************इस पखवारे में ऐसे निठल्ले कहे जाने वाले कर्मचारियों की ,जिन्हें केवल हिंदी लिखना ,बोलना आता है, उनकी वैसे ही पूछ बढ़ जाती है जैसे शरद ऋतु में खञ्जन पक्ष की। गैर हिंदी भाषी  कर्मचारी जिन्हे थोड़ी बहुत हिंदी आती है, वे तो इस पखवारे में साइबेरिया से आये प्रवासी पक्षियों की भाँति गोष्ठियों में दर्शनीय व शोभनीय हो जाते हैं।जहाँ चाह है वहाँ राह है। दो चार लोग वाद -विवाद ,टिप्पण , टंकन,लेखन ,आलेखन इत्यादि में भाग लेने केलिए जुटा लिए जाते हैं। निर्णायक की भूमिका के लिए हिंदी के लाभार्थी तथा व्याख्यान के लिए धनार्थी हर कार्यालय को बड़ी सुगमता से मिल जाते हैं। चूँकि पखवारे का आयोजन पैसे से जुड़ा है अतः प्रिंट एवँ इलेक्ट्रानिक माध्यमों की भी सहभागिता हो जाती है। बड़े ही आनन्दमय वातावरण में"अगले बरस फिर अइयो साथ में ज्यादा बजट ले अइयो' की कामना के साथ विभागाध्यक्षों द्वारा पखवारे का समापन कर दिया जाता है। फिर वही यक्ष प्रश्न कि हिंदी भारत की राष्ट्र भाषा क्यों नहीं और पखवारे का छल क्यों। 
***************स्वाधीन भारत में हिंदी के प्रगामी प्रयोग को बढ़ाने एवँ,इसके प्रचार प्रसार हेतु दशकों से हर वर्ष यह सरकारी पर्व मनाया जा रहा है परन्तु हिंदी देश की राजनीतिक देहरी पर, अपने हक़ के लिए, सात दशकों से अनवरत खड़ी है।हमारे नेता इसे राष्ट्र संघ की भाषा बनाने की बात करते हैं परन्तु राष्ट्र भाषा बनाने की चर्चा से कन्नी काट जाते हैं। प्रारंभिक दिनों में बाबुओं द्वारा सरकार के ज्ञाप ,परिपत्र  या पत्र अंग्रेजी में जारी हो जाते थे और नीचे लिख दिया जाता था -हिंदी वर्जन फालोज। आश्चर्य है आज भी वैसा ही हो रहा है। इस प्रक्रिया को हिंदी की नियमित मासिक प्रगति रिपोर्ट बनानेवाले बाबू इतने वर्षों में उलट तक नहीं सके कि कोई अभिलेख हिंदी में पहले जारी हो और उस पर लिखा हो कि अंग्रेजी पाठान्तर अनुगमित।हमारे लोकतंत्र में विश्वसनीयता  के पैमाने पर सर्वोच्च न्यायालय शीर्ष पर है परन्तु आज तक उसे भी चिन्ता नहीं हुई कि वह जो फैसले अंग्रेजी में देती है उसका सीधा सम्वन्ध जनता से है जिसकी मातृ भाषा हिंदी है या हिंदी की सहोदरी भाषाएँ। ऐसे में फैसले भी वकील या उन जैसे दुभाषिये पढ़ कर याची या प्रति याची  को बताते हैं।ये न्याय देने वाले भारतीयता का कौन सा आदर्श उच्च या निचले न्यायालयों के समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं। जन की हित सोचने वाले जनहित का मरम जानने में विफल हैं।अब वे तर्क बेमानी लगते हैं कि हिंदी में तकनीकी शब्दावली क़ी कमी है या विज्ञानं,अभियांत्रिकी ,अंतरिक्ष ,कानून जैसे विषय हिंदी में ब्यक्त नहीं हो पाते। भाषाओँ की दूरियाँ मिट रही हैं। अंग्रेजी का ऑक्सफ़ोर्ड शब्दकोष प्रति संस्करण अनेकों हिंदी के शब्द आत्मसात कर रहा है। वैसे ही हिंदी में अन्य भाषाओँ के अनेकानेक शब्द घुल मिल रहे हैं।जिन शब्दों के अन्य भाषाओँ में समानार्थी नहीं होते वे शब्द हर भाषा के लिए सर्वमान्य रूप में लिए जाते हैं। जब महात्मा गाँधी  हिंदुस्तानी भाषा पर बल देते थे,उनके राष्ट्र भाषा पर यही विचार थे। अतः इस बहकाने वाले कुतर्क से हट कर उस मन्तब्य को सामने लाना चाहिए जो हिंदी से भेद भाव का मूल कारण है।
***************इस भेद भाव की नींव भारत की पराधीनता के दिनों में पड़ी जब अंग्रेज शासन करते थे। उनकी अपनी शासन शैली थी जिसमें वे अपनी अँग्रेजी भाषा ,अपनी सभ्यता ,अपनी जाति एवँ अपनी शिक्षा को पूरी दुनियाँ में सर्व श्रेष्ठ मानते थे।वे लोग लम्बे शासन काल में देशी साधन संपन्न लोगों को अपने साँचे में ढाल कर कर देशी अंग्रेज बनाते गए। स्वतंत्रता मिलने तक इस देश में अंग्रेजी शिक्षा पद्धति की जड़ें बहुत सुद्दृढ की जा चुकी थीं और देशी अंग्रेज़ या इंडियन, अंग्रेजियत के साथ, सत्ता सँभालने के लिए तैयार हो चुके थे। फिर क्या था ये देशी इंडियन सत्ता सँभाल लिए और देशी भाषाओँ को भारतीयों की भाषा तक सीमित कर आज तक भारत पर नियंत्रण किये हुए हैं।ये इंडियन ही भारती एवँ भारतीयता के अहित साधक है जो हिन्दी पखवारा का आयोजन कर करा कर हिन्दी भाषियों को तुष्ट करने का उपक्रम करते हैं।परन्तु साठ करोड़ से भी अधिक देशी हिंदी भाषी एवँ दुनियाँ में फैले भारतीय मूल के लोग अपनी भाषा के साथ हो रहे दुर्भाव को सहन करते हुए आज भी उसकी सेवा तथा प्रचार -प्रसार में अनवरत लगे हुए हैं।ये असंख्य हिंदीभाषी अपनी इस मातृ भाषा को विश्व की सम्पन्नतम व सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओँ में पहचान दिला चुके हैं और उसे वह हर प्रतिष्ठा भी दिलायें गे जो साहित्य ,कला ,लालित्य से ओतप्रोत एक जीवंत लोकप्रिय भाषा को मिलनी चाहिए।हिंदी का गंतब्य राजभाषा ,संपर्कभाषा से आगे राष्ट्र भाषा के रास्ते विश्व भाषा बन कर अन्तरिक्ष के अनंत रहस्यों तक है।
***************हिंदी पखवारा जैसे आयोजनों के औचित्य पर भी हिंदी साधकों के दो परस्पर विरोधी धड़े हैं।एक निःस्वार्थ साधकों का वर्ग है जो पूर्व ऐतिहासिक काल से अर्थात संस्कृत वांग्मय से उद्गमित होने से अब तक इस भारती की सेवा में तल्लीन है। दूसरे वर्ग में  हिन्दी के लाभार्थी साधक हैं जिनकी परम्परा बीर गाथा काल के चारण अथवा भाटों से आरम्भ हो भक्ति एवँ रीति काल के दरबारी साहित्यकारों से होते हुए आधुनिक काल के सरकारी सजावटी साहित्यकारों तक है।निःसंदेह दोनों वर्ग के साधक आज की आधुनिक हिन्दी के लिए सराहनीय कार्य कर रहे हैं परन्तु हिंदी को श्रेष्ठता की धार देने वाले निःस्वार्थ साधक रहे हैं जिन्होनें हिंदी की सेवा स्वान्तःसुखाय की है या कर रहे हैं। यह वही परम्परा है जिसका उद्घोष गोस्वामी तुलसी ने यह लिख कर किया कि भाषाबद्ध करब हम सोई ,मोरे मन भरोस जेहि होई।कारण बताया कि कीरति ,भनति ,भूति भल सोई,सुरसरि सम सबकर हित होई।अतः हिंदी के निःस्वार्थ सेवक,हिन्दी के कामिल बुल्के सरीखे विदेशी विद्वान व विदेशी शैक्षिक संस्थान सभी भूरि -भूरि प्रशस्ति के पात्र हैं।
***************इन वर्गद्वय के आलावा हिन्दी को बुलन्दियों पर पहुँचाने वालों में हिन्दी के चलचित्रों,हिंदी टीवी के समाचार व मनोरंजन के कार्यक्रमों ,हिन्दी के समाचार पत्रों तथा विदेशों में बसे प्रवासी भारतीयों का भी प्रथम पंक्ति में गणनीय योगदान रहा है। हिंदी में जीने वाले राजनेताओं ने भी कभी -कभी विश्व मंच से हिन्दी के लिए भारत देश को गौरवान्वित किया है। हिंदी फ़िल्मी गानों ,चलचित्रों ,भारतीय संगीत ,योग ,जय हो ,नमस्ते या सबका साथ सबका विकास का तो कहना क्या?ये पूरी दुनियाँ में हिन्दी की दुंदुभी बजा रहे हैं।देश के शिक्षा संस्थानों के लिए भी, संकोच  से  बाहर  होकर, नेतृत्व  करते  हुए  हिंदी  के प्रति  अपने दायित्व निर्वहन का यह स्वर्णिम समय है। मंच कोई भी हो, पखवारा हो या न हो , यदि हम भारतीय हिन्दी भाषी होने पर अहर्निश गर्व करने और आत्मविश्वास से हिन्दीमय ब्यवहार करने लगें तो सबसे आगे हिंदुस्तानी (हिंदी )दिखे गी।----------------------------------- -------------------------------- मंगलवीणा
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वाराणसी ;दिनाँक 18 . 09. 2015 -------------------mangal-veena.blogspot.com
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