रविवार, 5 अगस्त 2018

सोशल मिडिया पर प्रवचन -प्रलय

***************बात चौंकने की नहीं ,रंच समय देने व विचार करने की है। वर्षा ऋतु अपनी चढान पर है।पूरे भारत में जल या पानी -प्रलय से हाहाकार मचा हुआ है।समूचे पहाड़ी ,समुद्र तटीय और मैदानी राज्यों में सामान्य जन जीवन अस्त -व्यस्त है। सैकड़ों जनधन,हजारों पशुधन और अरबों की संपत्ति बीते बर्षों की भाँति इस पानी प्रलय को भेंट चढ़ रही हैं।इस प्रलय प्रहार से भारत ही नहीं चीन ,जापान इत्यादि देश भयावह रूप से प्रकोपित हैं।परन्तु यदि थोड़े दिन पहले ही बीते ग्रीष्म की बात करें तो सर्वत्र जल संकट ,गिरते भू जलस्तर और जल संचयन की चर्चा थी।दोनों स्थितियों का मिलान करें तो यही परिणाम मिलता है कि जलवायु और ऋतुएँ हमारे अनुकूल नहीं संचलित हो रही हैं या कि मानव जलवायु या ऋतुओं के विपरीत आचरण कर रहा है जिससे हम प्राकृतिक आपदाओं से आए दिन दो चार हो रहे हैं।आजकल लोग जल प्रलय जैसा ही एक और  प्रलय, जिसे प्रवचन प्रलय कह सकते हैं , व्हाट्सप्प ,फेसबुक ,मेसेंजर ,ट्वीटर, टीवी इत्यादि पर, झेल रहे हैं। प्रत्यक्ष तथा परोक्ष मित्रों की मुफ्त वाली शुभेच्छाओं एवँ अन्यार्थी संदेशों ने नाकों दम कर रक्खा है।जो इस प्रवचन प्रलय से मानसिक तौर पर सकुशल बचा रहे ,सच मानिए उसपर ईश्वर की असीम अनुकम्पा है।
***************साधारणतया लोग अपने मित्रों एवँ सम्बन्धियों को आत्मीयता या शुभेच्छा जताने अथवा  तत्काल सूचना पहुँच हेतु कविता, प्रवचन ,उद्धरण ,नीति वाक्य ,बधाई,श्रव्य और दृश्य सन्देश  इन नए द्रुतगामी माध्यमों से भेजते और प्राप्त करते हैं और आशा भी की जाती है कि विज्ञान प्रदत्त इन माध्यमों से समाज ,संस्कृति ,सभ्यता  और जन जीवन की आर्थिक एवँ चारित्रिक जीवन स्तर की बेहतरी होगी। परन्तु व्यवहार में ऐसा नहीं हो रहा है। मनुष्य दोहरा चरित्र जीने की ओर अग्रसर है ;एक तरफ वह सभ्य दिखने के सारे उपक्रम कर रहा है तो दूसरी तरफ उस सभ्यता के तले उसकी असभ्यता हिलोरें मार रही हैं जिससे हमारी स्वच्छ परम्पराओं के टीले एक एक कर ढहते जा रहे हैं। उदहारण के लिए व्हाट्सप्प जैसे सन्देश वाहक मंच पर गौर किया जा सकता है।इस मंच पर रात दिन प्रेषित हो रहे अधिकांश सन्देश मिथ्याचरण की पराकाष्ठा हैं।भ्रामक ,घृणास्पद ,द्वेषकारी ,स्वार्थप्रेरित या अंधविश्वास को बढ़ाने वाले सन्देश; शुभेच्छा के आवरण में इतर उद्देश्यों के साथ; व्हाट्सप्प पर इधर से उधर भेजे जा रहे हैं जो तत्काल वायरल हो कर समाज में दिग्भ्रम की स्थिति उत्पन्न कर रहे हैं। अब तो बात साईबर क्राइम की चल रही है क्योंकि ए माध्यम अपराध के कारण भी बन रहे हैं। तात्पर्यतः मित्रों ,सम्बन्धियों और किसी न किसी के माध्यम से परचित लोगों द्वारा आपसी संपर्क हेतु बनाए गए व्हाट्सएप्प - संजाल में आज अधिकांशतःपर उपदेश कुशल बहुतेरे वाले प्रवचन,धर्मभीरू बनाने वाले उपदेश,अधकचरी शुभेक्षाएँ, अनावश्यक सलाह और  भ्रमात्मक सूचनाएँ नदियों की बाढ़ की भाँति आपसी संवाद ,सूचना तथा कुशल क्षेम को रौंद रही हैं।
***************अब आमतौर पर लोगों द्वारा बनाए गए ग्रुप या समूह में कोई भी व्यक्ति श्रृंखलात्मक पहुँच द्वारा समूह के बाहर से ,कहीं से, किसी भी प्रकार का प्रवचन समूह अंदर तक अग्रसारित कर देता है और ए सन्देश बहुत ही ब्यापक स्तर पर जन -जन तक पहुँच जाते हैं। यहाँ तक कि एक ही सन्देश एक व्यक्ति को कई कई बार कई लोगों द्वारा अग्रसारित हो कर मिलता है और हर क्लिक पर वही बात देख या पढ़ कर अजीब सी खीझ होती है। हद तो तब हो जाती  है जब धार्मिक प्रताड़न भरे संदेशों की बाढ़ आती है यथा यदि यह संदेश अपने इतने मित्रों को अग्रसारित करें गे तो इनकी क़ृपा होगी अन्यथा यह अनिष्ट हो जाय गा।इसी प्रकार घोर संसारी एवँ गृहस्थ लोग भी प्रवचन भेजने में बड़े बड़े योगी ,ऋषियों ,मुनियों ,दार्शनिकों व सरस्वती साधकों को मात दे रहे हैं। जिन्हे स्वयँ सुधरने की आवश्यकता है वे सोशल मीडिया पर प्रवचन की झड़ी लगा दूसरे को सुधार रहे हैं। नेताओं व अन्य गुरु घण्टालों के लोग उन्हें चमकाने व आगे बढ़ाने के लिए रात दिन अपने प्रवचन धकेल रहे हैं। रही सही कमी व्यवसाय व विज्ञापन वाले पूरा कर दे रहे हैं। अब स्मार्ट फोन ,टीवी और इन्टरनेट पर सकून तलाशने वाला ब्यक्ति इस प्रवचन वाले महा प्रलय से बचे तो बचे कैसे ?
*****************जब लोग इस प्रवचन प्रलय को झेलने को विवश ही हैं तो प्रवचनों के मन्तव्य,पूर्ण सत्य ,अर्ध सत्य और मिथ्य को तर्क की कसौटी पर भी कसना अपरिहार्य हो जाता है क्योंकि दुःख के प्रति समझ का बढ़ना ही दुःख का निवारण है।जहाँ तक मन्तब्य की बात है तो अधिकांश का जुड़ाव स्वार्थ या बाह्याडम्बर ,कुछ का परार्थ एवं नगण्य का परमार्थ(सत्य ) हेतु होता है।अतः अपने सीमित स्वार्थ या आवश्यकता से अधिक हमें सोशल मीडिया पर सक्रिय रहना ही नहीं चाहिए।पुनः आशा तो नहीं है कि प्रवचन प्रेषित करने वाले समझेंगे परन्तु क्षीर नीर भेद तो प्रवाचक बनने से पहले जान लेना चाहिए ही।वह यह है कि हम आप जो भी प्रवचनों की हेरा फेरी करते हैं वे अर्ध सत्य और मिथ्या के बीच के हमारे विचार हैं जो प्रथम दृष्ट्या प्रेषकों को प्रबुद्ध होने एवँ प्राप्तकर्ता को अनुगृहीत होने वाले छल हैं परन्तु तर्क पर वे वहम से ज्यादा कुछ नहीं होते हैं।अतः सोशल मीडिया पर सक्रिय लोगों से अपेक्षा है कि वे न ऐसे  भ्रम पालें ,न ऐसे भ्रम भेजें और न ऐसे भ्रम पाएँ।इसी प्रकार सोशल मीडिया पर चहक चहक कर बलात्कार व बलात्कारियों की चर्चा न हो ( यह अच्छा नहीं लगता है।) बल्कि यह बताया जाय कि कितने बलात्कारियों को फाँसी हुई ,कितने को आजीवन कारावास और कितनी जल्दी और कैसे। पुलिस और न्यायपालिका की सफलता की कहानी बताई जाय  । बलात्कार पर अपने आप लगाम लग जाएगी।जैसे ही इन माध्यमों का सार्थक उपयोग बढे गा ,प्रवचन प्रलय तिरोहित हो जाय गा और सोशल मीडिया हमारे लिए अमूल्य वरदान सिद्ध होने लगेगी। किसी के उस पल की प्रसन्नता की कल्पना करें जब फेस बुक या व्हाट्सएप्प उसे उसके किसी पुराने बिछड़े मित्र या संबंधी से संपर्क करा देता है। ----------------------------------------------------------------------------------मंगलवीणा
वाराणसी ,दिनाँक :5 अगस्त 2018
mangal-veena.blogspot.com
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अन्ततः
***************बात उन्नीस फरवरी वर्ष २०११ के सांध्य बेला की है जब मैं जीप द्वारा गोरखपुर से वाराणसी आ रहा था। सड़क थोड़ी खाली थी ,सो स्वभाववश चालक ने रफ़्तार भी बढ़ा दिया था। एक व एक हेड लाईट की रोशनी आगे चल रही ट्रक के पश्च भाग पर पड़ी। उस पर लिखे एक उद्धरण ने हमें चौका दिया। काफी देर तक ट्रक के पीछे चलते हुए मैं उस उद्धरण को बार बार पढ़ता रहा। उस दिन की वह घटना मेरे स्मृतिपटल पर अंकित हो गई ।तब ऐसा झटका लगा था कि मेरी दिन भर की थकान ही मिट गई थी। आज भी कभी कभी सोचता हूँ कि यह सत्य है या असत्य या कि अर्ध सत्य।आप भी सोचिये कि क्या ,"विश्वास केवल वहम है और सच्चाई मात्र झूठ। "? क्या कभी ऐसा नहीं लगता की जिस बात की स्थापना विजेता करे वह सत्य और जिसकी स्थापना पराजित करे वह झूठ वरन यह सच कैसे हो सकता है कि नेकी कर जूता खा।अधिक क्या,इन ट्रक वालों की महिमा भी अनन्त है।-------------------------------------------------------------------------------------------------------------- मंगलवीणा
वाराणसी ;श्रावण कृष्ण अष्टमी संवत २०७५
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शनिवार, 23 जून 2018

भ्रष्टाचारियों से पिटती नासमझ भाजपा

***************जो भारतीय जनता पार्टी चार वर्ष पूर्व जनाकांछा बन पूरे देश पर छा गई और अगले तीन वर्ष या उत्तर प्रदेश के विगत विधान सभा चुनाव तक अपने उत्कर्ष पर रही ,वह अब  बुरी तरह जनाक्रोश का शिकार होने लगी है। जनाक्रोश भी ऐसा की जनता उसे महा भ्रष्टाचारी नेताओं और उनके दलों से पिटवा रही है।किसी संस्कारी ,ईमानदार और राष्ट्रवादी पार्टी से यदि भाजपा पिटती तो ठीक ही होता परन्तु दुर्भाग्य कि यह पार्टी अब बेईमान , भ्रष्टाचारी और राष्ट्रद्रोही दलों से पिट रही है। यदि मारीच को मरना है तो रावण के हाथ मरना तो बद से बदतर होगा।अच्छा होता कि इस काम के लिए भारतीय राजनैतिक क्षितिज पर किसी बेहतर दल का अभ्युदय होता। परन्तु ऐसा हुआ नहीं और जनता प्रबल संकेत देने लगी है कि बस बहुत देख लिया ;अहितकर ईमानदारों से हितकर बेईमान भले।
***************आजकल पत्रकारिता ,सोशल मीडिया ,टीवी एवँ सामान्य जन में यत्र तत्र ,सर्वत्र बीजेपी के विरुद्ध जनमत एवँ विपक्षियों के ध्रुवीकरण की चर्चा है।उपचुनाओं में  जहाँ भी ऐसे प्रयोग प्रस्तुत हो रहे हैं ,अधिकांश स्थानों पर भाजपा पिट रही है।शनैः शनैः परिस्थितियाँ कुछ ऐसी बनने लगी हैं कि जनता के लिए किसी गैर भाजपाई को चुनने में गुण दोष नामक पैमाना भी अनावश्यक होता दिख रहा है।बिलकुल साधारण गणित काम कर रही है कि यदि सारे विपक्षी ध्रुवीकृत होकर जनता के सामने आएंगे तो जनता भी भाजपा के विरुद्ध उन्हें विजय श्री का हार पहनाए गी क्योंकि भाजपा से कोई उम्मीद नहीं बची है।सच ही कहा है कि कलियुगे शक्ति संघे। विपक्षियों के लिए यह सूत्र वाक्य निश्चित सफलता की कुँजी सिद्ध हो सकती है। संघ चाहे कुसंघ हो या सुसंघ ;इससे जातियों और उपजातियों में बँटी जनता में कोई अन्तर नहीं पड़ता।भुक्तभोगी जनता ने अनुभव किया है कि कुसंघियों (विपक्षी दलों ) के सत्ता में रहते जो कठिनाइयाँ थीं वे सुसंघियों (भाजपा)के शासन में भी यथावत या उससे बदतर बनी हुई हैं।
***************जब सरकार की लोकप्रियता इतनी तीब्रता से गिर रही हो तब लोकसभा चुनाव पूर्व भाजपा द्वारा जनता से किये गए वादों और उनके पूरा न होने के कारणों पर परिचर्चा  सामयिक हो जाती है और इसके लिए कुछ ज्वलंत उदहारण पर्याप्त हो सकते हैं जैसे यदि भ्रष्टाचार की बात करें तो भाजपा ने देश को भ्रष्टाचार मुक्त सरकार देने की बात की थी।लगता है कि उनके लिए इसका तात्पर्य मात्र भ्रष्टाचार मुक्त मंत्री व प्रधान मंत्री देना था। भुक्तभोगी जनता ने तो व्यवहार में यही पाया कि सरकारी तंत्र और बाबू तो जम कर उन्हें अब भी लूट रहे हैं और बिना भय के लूट रहे हैं। फिर मंत्री जी भ्रष्टाचरी नहीं हैं ;से जनता  को क्या राहत ?कोई चौराहा ,तिराहा , नुक्कड़ या कार्यालय नहीं जहाँ सरकार के निम्नतम पादन  के कर्मचारी ,सिपाही या होमगार्ड जनता को खुलेआम न लूट रहे हों।उनसे ऊपर मध्यम और उच्च पादन पर बैठे बाबुओं की रौबदार लूट का तो कहना ही क्या। ठेकेदारी व्यवस्था से मूलभूत संरचना का त्वरित विस्तार भी बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रहा है। इस लूट के प्रतिफल में कानून के राज की धज्जियाँ उड़ रही हैं।
***************विगत लोकसभा चुनाव पूर्व भाजपा ने यह भी खूब उछाला था कि सत्ता में आने पर वर्षों से जनता व देश को लूट रहे नेता और बाबू सलाखों के पीछे होंगे ;परन्तु ऐसा हुआ नहीं। अब वे ही भाजपा वाले कहते हैं कि यह भ्रष्टाचार निरोधी एजेंसियों एवँ न्यायपालिका का काम है। काले धन पर चर्चा में अब वे विभिन्न देशों के साथ संयुक्त प्रयास की बात करते हैं जो बालू से तेल निकालने जैसा है।जब भी राम मन्दिर या कश्मीर की धारा तीन सौ सत्तर की बात होती है ये कछुए सी रणनीति अपनाते हैं ;कभी गर्दन बाहर तो कभी गर्दन भीतर।  यहाँ तक कि मध्यम वर्ग, जिसने इन्हें सत्ता पर बैठाया, उसके लिए कुछ करना तो दूर उलटे उन्हें प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों से वर्ष दर वर्ष निराश करते गए।अरुण जेटली जैसे गैरजमिनी ,अप्रायोगिक और प्रत्याकर्षक नेताओं ने आम जन का  ध्यान रखे बिना  साल के बाद साल ऐसे ऐसे बजट प्रस्तुत किए कि जनता सोचती कि सोचती रह गई।
 ***************मँहगाई के मोर्चे पर पर भी पेट्रोल एवँ डीज़ल की बढ़ती कीमतों ने कोढ़ में खाज का काम किया है और घरेलू बाजार में महँगाई का पलीता लगने लगा है।पेट्रोलियम पदार्थों की महँगाई पर सरकार ऐसे मौन है मानो उनका इस गम्भीर समस्या से कोई सरोकार नहीं। शायद भाजपा अपनी यूएसपी ही भूल बैठी है।वर्तमान परिदृश्य जनता को ऐसे कुठाँव मारती जा रही है कि मोह भंग का रंग और पक्का बनता जा रहा है।यह वास्तविकता जन जन तक पहुँच गई है कि भाजपा के प्रधान मंत्री,मुख्य मंत्री तथा उनके मंत्रिमंडल के मंत्री ईमानदार होते हुए भी एक ईमानदार और सक्षम सरकार नहीं दे सकते हैं।पिछले सारे प्रयोग यही इंगित करते हैं कि इन्हें शासन करना आता ही नहीं।
 ***************ठीक है कि मोदी जी के नेतृत्व में अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में भारत की साख और भूमिका बढ़ी है ;साथ ही एक उभरती अर्थव्यवस्था के रूप में अंतर्राष्ट्रीय साझेदारी भी। विदेशों में बसे भारतीयों को भारतीय होने या कहने में अब गर्व का अनुभव होता है और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में उन्हें बड़े सम्मान से देखा जाने लगा है।बेहतर विदेशी निवेश के लिए वर्तमान सरकार सराहनीय कार्य कर रही है। परन्तु इनसे पूर्ववर्ती सरकारों की भाँति  पाकिस्तान रूपी महाव्याधि की कोई प्रभावी दवा इनके पास भी नहीं दिख रही है। दुर्भाग्य है कि पश्चिमी सीमा पर हमारे जवान जान गँवा रहे हैं परन्तु राजनैतिक अनिर्णय के कारण हम बांग्ला देश जैसा इतिहास नहीं रच पा रहे हैं।सरकार पड़ोसी पाकिस्तान से सठ के साथ सठ जैसा तत्कालिक व्यवहार कर रही है परन्तु स्थाई समाधान का  कोई अता पता नहीं।कश्मीर मुद्दे पर जनता को भाजपा से बहुत उम्मीद थी जिसपर यह सरकार पाकिस्तान परस्त श्रीमती महबूबा की पीडीपी के साथ मिल वहाँ राज्य सरकार बना कर पानी फेरती दीख रही थी।एक सर्जिकल स्ट्राइक को छोड़ ऐसा कोई चमत्कारी कार्य नहीं हुआ जिसके लिए भाजपा जानी जाती है और वह इतिहास की स्वर्णिम घटनाओं में सम्मिलित हो सके।(देर सही परन्तु दुरुस्त कि भाजपा ने पीडीपी से अपने को अलग कर लिया और कश्मीर में राज्यपाल शासन लागू हो गया। भाजपा के पास अब भी इस क्षति नियंत्रण के लिए पर्याप्त समय है।)
***************इन विपरीत परिस्थितिओं के होते हुए भी पूरी संभावना है कि आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा पुनः विपक्षिओं पर भारी पड़े गी और विपक्षियों को बुरी तरह पीटेगी। इसका सबसे बड़ा कारण प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी का राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उभरा सक्रिय,समर्पित, निष्कलंक एवँ जादुई व्यक्तित्व है जिसकी तुलना में विपक्ष का कोई नेता कहीं ठहरता ही नहीं।उतना ही या सबसे अहं कारण राष्ट्रवाद है जिस पर जनता  अन्य दलों की अपेक्षा भाजपा पर सर्वाधिक भरोसा करती है। अन्य कारणों में राममंदिर, धारा तीन सौ सत्तर,समान नागरिक संहिता भी ऐसे मुद्दे हैं जिनपर भाजपा के अतिरिक्त किसी भी  विपक्षी दल से देश को कोई उम्मीद नहीं है।आज भारत वर्ष में वास्तविक धर्मनिरपेक्षता की ध्वजावाहक भी मात्र भाजपा ही है जब कि शेष विपक्षी दल धर्मनिरपेक्षता के नाम पर कुछ धर्म और जातियों की तुष्टिकरण पर्याय हैं। जनता विपक्षियों द्वारा सत्ता के बन्दरबाँट से भी सचेत है जिसके चलते भाजपा एक स्वाभाविक चयन है।जाति ,धर्म ,भाषा,परिवारवाद ,भ्रष्टाचार और क्षेत्रियता पर खड़ी पार्टियां सत्ता के लिए एक गठबंधन बना कर चुनाव लड़ पाएं गी ;यह तो गधे को सींग जैसी घटना लगती है।
***************अतएव भाजपा आगामी चुनाव में भी विपक्षी गठबंधन से पिटे गी; यह उन द्वारा देखा जाने वाला दिवा स्वप्न है।इस बीच यदि एक भी ऊपर उल्लिखित मुद्दा भाजपा के पक्ष में क्लिक (खड़क )कर गया तो जनता फिर भाजपा को भारी बहुमत से सर आँखों पर बैठाए गी और परिवारवादी विपक्षी भ्रष्टाचारी पार्टियाँ हमेशा के लिए धराशाई हो जायँगी।ऐसा होने पर संभावना है कि चुनाव बाद भाजपा के सामने एक नए शिष्ट एवँ ईमानदार राष्ट्रीय दल का उदय हो।अन्यथा दूसरी स्थिति में भाजपा कठिनाई से केंद्र में  सरकार बना पाए गी।तीसरी स्थिति में भाजपा की  लगातार लोक प्रियता घटने पर सत्ता का विपक्षियों में बन्दर बाँट होगा जिससे केंद्र सरकार कमजोर होगी और विभिन्न प्रांतों में क्षेत्रीय क्षत्रप निरंकुशता के साथ केंद्र का हाथ मरोड़े गे। यह स्थिति देश की उभरती अर्थ व्यवस्था एवं अखण्डता के लिए अहितकर होगी। आदर्श और सर्वाधिक संभाव्य स्थिति यही है और होगी कि भाजपा को आगामी  लोक सभा चुनाव में जनता बहुमत दे ताकि वह अपने अच्छे वादों को पूरा कर पाए।तब तक कई राज्यों में होने वाले विधान सभा चुनाव इसे शीर्ष चर्चा का विषय बनाये रखें गे।----- मंगलवीणा
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 दिनाँक :२४ जून २०१८ ,वाराणसी------------------------- mangal-veena.blogspot.com
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रविवार, 13 मई 2018

श्रवणकुमारों ,तुम्हें नमन

***************बीते मदर्स डे के समापन पर करोड़ों भाइयों ,बहनों और बच्चों , जिनके पास माँ हैं ,को यह सौभाग्य बने रहने की शुभ कामनाएँ तथा हजारों भाई बहनों को कोटिशः नमन जो अपने माँ और बाप के लिए तीन सौ पैंसठ दिन श्रवणकुमार की भूमिका में हैं। हमने मात्र हजारों का अंकन इस लिए किया क्योंकि ऐसे देव एवँ देवी तुल्य लोग इस धरा पर दुर्लभ होते जा रहे हैं।
*******************पिछले दिनों व्हाट्सअप तथा फेसबुक पर मदर्स डे के उपलक्ष्य पर सैकड़ों सन्देश मिले।टीवी और समाचार पत्रों ने भी अपनी पहुँच तक सबको व्यापारिक मातृभावना से ओतप्रोत कर दिया। ऐसा लगा कि सतयुग ने भारत भूमि पर दस्तक दे दिया है। पर जब भ्रम से उबरे तथा इनमें से कुछ लोगों के पारिवारिक पटल पर विहंगम दृष्टि डाला तो बड़ी निराशा हाथ आई।काहे के माँ -बाप ;काहे का उत्सव। अपने परिवार के लिए अहर्निश जूझती अधिकांश माताअों को तो इस उत्सव की भनक तक नहीं।यदि भनक है भी इसका उनसे कोई सम्बन्ध नहीं। उनकी पीड़ा तो उनके अंतर्मन में यथावत ही दबी हैं।ऐसे में मदर्स डे पर युग द्रष्टा गोस्वामी जी को भी श्रद्धा सुमन अर्पित करना ही चाहिए जिन्होंने हमारे आचरण का पूर्वानुमान यूँ किया -
-----सुत मानहि मातु पिता तब लौं। अबलानन दीख नहीं जब लौं ।
-----ससुरारि पिआरि लगी जब तें । रिपु रूप कुटुम्ब भए तब तें । रामचरितमानस
****************अंततः विदेश की वह संस्कृति भी वधाई की अधिकारिणी है जिसने माँ के लिए तीन सौ पैंसठ दिनों में कम से कम एक दिन आरक्षित तो किया।अच्छा होता कि मदर्स डे के स्थान पर हर दिन कुछ घण्टों के लिए मदर्स आवर होता।थोड़ी देर केलिए नित्य इनके मुखारविंद पर मृदुल मुस्कान होती और हमारे लिए आशीष वर्षा। मानवता साक्षात् दर्शन पाती कि इस धरती पर कहीं स्वर्ग है तो वह माँ के आँचल तले।
***************काश ऐसा होता। फिर भी जो है उस बीच, हमारी  सबसे  विनम्र विनती है कि शेष तीन सौ चौंसठ दिनों के लिए माताओं को उनके  नियति , सामाजिक परिस्थियों एवँ जिह्वा सेवादारों पर न छोड़ें क्योंकि हमारे अस्तित्व की कर्ता और कारण वहीँ हैं।माँ तुम्हें नमन। इस अवसर पर अपनी स्वर्गीय माता श्री को भी श्रद्धानत  निर्मल स्मृति गुच्छ अर्पित करता हूँ।------------------मंगलवीणा
वाराणसी।;दिनाँक 14 मई 2018---------------------- mangal-veena.blogspot.com
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सोमवार, 16 अप्रैल 2018

बजट ,तूँ मारेसि मोहि कुठाँव

***************हमारे देश में निम्न मध्यम आय वाले नौकरी पेशेवर बेहद तन्मयता से बजट की प्रतीक्षा करते हैं , उनकी वैसी तन्मयता शायद ही किसी अन्य वस्तु की चाहत में दिखती है। देश में एक और महत्वपूर्ण वर्ग है जो कुछ ऐसे ही या यूँ कहें कि प्यासे चकोर की भाँति केंद्रीय बजट की बाट जोहता है और वह है मध्यम आय वाली महिलाओं का वर्ग।केंद्रीय सत्ता में बैठा कोई भी योजनाकार यदि इन दोनों वर्ग की पीड़ा को नहीं जानता या जानते हुए उनकी उपेक्षा करता है तो मानिए कि वह हिंदुस्तान को नहीं जानता या  उसे प्रफुल्लित नहीं देखना चाहता।आशा तो नहीं थी कि मोदी युग में ऐसा होगा परन्तु दुर्भाग्य कि ऐसा ही हो रहा है।इस वर्ष के केंद्रीय बजट द्वारा वित्त मंत्री ने फिर परिलक्षित कर दिया है कि इनके शोषण पर ही हमारा लोकतंत्र खड़ा है।रोटी ,कपड़ा, मकान , महँगाई ,शिक्षा ,स्वास्थ्य,सुरक्षा,भ्रष्टाचार,राजस्व व राजतन्त्र सभी इनका बेहिचक शोषण कर रहे हैं।आर्थिक तथा सामाजिक लाभ मे अहर्निश हमारे देश में अनुसूचितों और पिछड़ों की बात होती है ,लुटेरे अमीरों की बात होती है,देश को वर्वाद करने वाले निरंकुश नेताओं के विशेषाधिकार व आय बढ़ोत्तरी की बात होती है परन्तु दो पाटन के बीच पिसती इन खालिस वासिंदों की कहीं गिनती नहीं।इन्हें मात्र श्रोत और साधन माना जाता है।
 ***************आज करोड़ों कर्मचारी परिवारों के साथ साथ मध्यम आय वर्ग की  महिलाएँ भी ठगी सी निहार रही हैं कि उनके सपनों की सरकार को किसकी बुरी नजर लग गई।उन्हें तो बताया गया था कि जीएसटी के बाद रोजमर्रा उपयोग की जींस सस्ती हो जाँय गी परन्तु हुआ ठीक उसका उलट।बताया गया था कि बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य तक सबकी सहनीय पहुँच सुनिश्चित की जाय गी परन्तु ये दोनों ही आवश्यकताएँ दुष्प्राप्य एवँ दिवालिया बनाने वाली सिद्ध हो रही हैं।इस  वर्ग पर तीसरी सर्वाधिक प्रभाव डालने वाली वस्तु पेट्रोलियम एवँ पेट्रोलियम उत्पाद की तो पूछिए मत जिनकी कीमतें सरकारें मनमाने ढंग से बढ़ा रही हैं और अब वे आसमान से बातें कर रही हैं।आमदनी की बात हो तो सातवें वेतन आयोग की सस्तुतियाँ न तो समय सापेक्ष उनकी चाहत के अनुरूप आईं  न कर्मचारी संगठनों की माँग पर सरकार गम्भीर हुई। इस निराशा और बढ़ती बेरोजगारी का परोक्ष प्रभाव निजी क्षेत्र में काम करने वाले पेशेवरों पर भी पड़ा जिससे उनकी वेतन बढ़ोत्तरी पर बुरा प्रभाव पड़ा है;ऊपर से आयकर की क्रूर कैंची साल दर साल उनकी आय को कतरती जा रही है।भ्रष्टाचार मिटाने की पुरजोर शंखध्वनि हुई थी परन्तु आकण्ठ भ्रष्टाचार में डूबी संस्थाएँ व व्यवस्था पहले से ज्यादा पल्लवित ,पुष्पित हो रही हैं और इस बड़े उपभोक्ता वर्ग को अपनी आय का कुछ अंश यदा कदा रिश्वत मद में  भी  ब्यय करने केलिए विवश कर रही हैं।इस प्रकार मध्यम वर्ग की घटती क्षमता और उनपर बढ़ते बोझ का सरकार द्वारा आकलन और समायोजन न कर पाना भविष्य में गम्भीर सामाजिक समस्याओं को जन्म दे सकता है।
*************** सरकारों के राजस्व में सर्वाधिक योगदान इसी वर्ग का है। फिर सरकार के ध्यान पर भी इसी वर्ग का सर्वाधिक हक़ बनता है। परन्तु सरकारों का कृतित्व अक्षरशः इसके विपरीत है।प्रत्यक्ष प्रमाण के रूप में चालू वित्त वर्ष के लिए केन्द्र सरकार के  आय व्यय विवरण का अनुशीलन पर्याप्त है।उदहारण चाहिए तो सरकार की राष्ट्रीय स्वास्थ्य संरक्षण योजना पर ध्यान दिया जा सकता है।सरकार पचास करोड़ गरीब लोगों को पाँच लाख प्रति परिवार स्वास्थ्य बीमा देने जा रही है।अब इनसे कौन पूछे कि मध्यम वर्ग को क्यों नहीं ?क्या वित्त मन्त्री इतना अनभिज्ञ हो सकते हैं कि उन्हें ज्ञात न हो कि एक मध्यम वर्ग का परिवार किसी बीमारी पर पाँच लाख रुपये खर्च करने के बाद निम्न आय वर्ग में फिसल सकता है।अतः उन्हें भी ऐसी सुविधाएं मिलती रहें जो कम से कम उन्हें मध्यम वर्ग में बनाए रखें।बजट व योजना वही बने जिससे सबका लाभ और विकास हो परन्तु राम राज्य की बातें करने वाले उसे धरातल पर उतारने के लिए कुछ भी करते हुए नहीं दीख रहे हैं।रामराज्य का निदेश है ---
_______________मुखिया मुख सो चाहिए खान पान कहुँ एक ।
______________पालइ पोषइ सकल अँग तुलसी सहित बिबेक ।
____राजधरम सरबसु एतनोई। जिमि मन माहँ मनोरथ गोई।(रामचरितमानस )
फिर क्यों न ऐसी धारणा बने कि सरकार सकल अंग का तात्पर्य सांसद ,विधायक ,गरीब ,निम्न वर्ग ,आरक्षित वर्ग ही समझती है और इसके लिए ये लोग ही साध्य हैं ;शेष  मध्यम वर्ग के लोग साधन।
***************कमियों को उजागर करना यदि लेखन दायित्व है तो उन कमियों को दूर करने के लिए व्यक्तिगत सुझाव देना भी वांछनीय लेखन धर्म।उदाहरण पर उतरें तो चुनाव के समय जिन भ्रष्टाचारी नेताओं को नित्य याद किया जाता था ,उन्हें कारागारों में पहुँच जाना चाहिए था।विदेशों में छिपाया धन देश वापस लाना चाहिए था और उसकी त्रैमासिक प्रगति दरबार -ए -आम में नियमित पढ़ी जानी चाहिए थी। प्रचारित किया गया था कि जी एस टी से रोजमर्रा उपयोग की चीजें सस्ती होंगी तो बजट में परिलक्षित होना चाहिए था और धरातल पर ऐसा ही दिखना चाहिए था।पेट्रोलियम पदार्थों को जी एस टी से बाहर रखने से तो  सरकार की नीयत ही कठघरे में खड़ी हो गई है क्योंकि यही एक वस्तु है जो सस्ती होने पर सस्ताई और महँगी  होने पर पूरे अर्थ व्यवस्था में महँगाई लाती है।इसकी कीमतें नियंत्रित कर रसोई घरों की रौनक बढ़ाई जा सकती थी। देश और अपनी पार्टी की  भलाई चाहने वाली सरकार को अब भी चाहिए कि वचनवद्धता एवँ पारदर्शिता को अविलम्ब पुनः  गले का हार बना ले।दिशा निर्देशों के बल पर सांसद और विधायक चाहे माननीय कहला लें या संवैधानिक शक्तियों से अपना वेतन भत्ता कल्पना की हद से परे तक बढ़ा लें , आम लोग इन्हें अनुज्ञाप्राप्त लुटेरा , अति निंदनीय प्राणी और योग्यता की कसौटी पर सरकारी ढांचे के न्यूनतम वेतन के लिए भी अयोग्य मानते हैं। अतः आम आदमी से जुटाए राजस्व को इनके ऊपर इस हद तक लुटाना जनता को बहुत चुभने लगा है। इस विषय पर युवा भारत की सोच को सांसद वरुण गाँधी ने आवाज देने का प्रयास किया परन्तु इन सर्व शक्तिमान लोगों को लूट पर मुहर लगवाने से वे नहीं रोक पाए।भारतीय संविधान आम आदमी के सब्र को ऐसे कब तक बाँध रखे गा; यह भारत भाग्य विधाता ही जानें।हमें भी पता है ,सरकार को भी पता है कि आज पाँच लाख रुपये वार्षिक आय से एक  परिवार का पालन पोषण कितना दुष्कर है फिर भी ऐसे लोगों को आयकर में घसीटा जा रहा है। आवश्यकता थी कि उन्हें इस बन्धन से मुक्त किया जाता और दस लाख की सीमा तक कर देयता दस प्रतिशत कर दी गई होती।सबके साथ सामान व्यवहार के आधार पर कृषि क्षेत्र को कर के दायरे में लाना चाहिए था।सर्वोपरि बात है कि हम सभी भारतीय कर देते हैं। अतः सभी का सरकारी  सुविधाओं पर  यथेष्ठ अधिकार है और वह हमें मिलना ही चाहिए।बहुत हो चुका असमान वितरण। अब नहीं चले गा।
***************वर्ष दो हजार चौदह में हुए लोकसभा चुनाव की पूरी दुनियाँ साक्षी बनी जब हमारे देश में  शासन की राष्ट्रपति प्रणाली न होने पर भी यह चुनाव हूबहू वैसे ही श्री नरेंद्र मोदी के लिए लड़ा गया और भाजपा अच्छी खासी बहुमत के साथ श्री मोदी जी नेतृत्व में सत्तारूढ़ हुई। जन जन ने उनके 'सबका साथ ,सबका विकास 'पर विश्वास किया। परन्तु जैसे जैसे समय बीतता गया, सरकार अपने वादों से दूरतर होती पाई गई।सरकार नित्य नए विचार व क्रियान्वयन के साथ जनता के बीच आती रही और चुनावी वादे व उनके क्रियान्वयन पीछे छूटते रहे। मोदी जी उत्तम किस्म के राजनीतिज्ञ होते हुए भी उसी प्रकार आधारहीन चाटुकार नेताओं से घिर गए जैसे कभी कांग्रेस का नेतृत्व घिरा रहता था। यदि मोदी जी जन धन की चौकीदारी ही सुनिश्चित कर दिए होते तो उन्हें आमजन को कुठाँव न मारना पड़ता।निःसंदेह जनता में अब भी मोदी जी की लोकप्रियता किसी भी अन्य नेता से अधिक बनी हुई है और सरकारी गाड़ियों से अति विशिष्ठता दर्शाने वाली लाल- नीली बत्ती  पर प्रतिबंध या स्वच्छता अभियान की भूरि भूरि प्रसंशा भी हुई है परन्तु यह तय है कि जनता आगामी चुनाव के समय उनसे सबके विकास ,चौकीदारी ,काले धन ,भ्रष्टाचार ,पारदर्शिता ,खुशहाली सूचकांक , स्वच्छ प्रशासन ,धारा तीन सौ सत्तर ,राम मन्दिर ,रोजगार इत्यादि पर प्रगति आख्या  माँगे गी।यह और रोचक होगा जब माननीयों की आर्थिक दीनता की चर्चा होगी क्योंकि सरकार की दृष्टि में वे ही गाँधी जी द्वारा रेखांकित पंक्ति में सबसे पीछे खड़े नजर आए हैं।सरकार के लिए गंभीर सोच का विषय है कि जिनसे देश बनता है ,समाज बनता है ,संस्कृति बनती है और सरकारें बनती हैं उनके साथ कैसा व्यवहार होना चाहिए। आज  मध्यम वर्ग आर्थिक चोट से घायल है और मोदी जी से निराश।------------------------------------------------------------------------------------------------------------मंगलवीणा
वाराणसी ;दिनाँक 16 अप्रैल 2018.                              mangal-veena.blogspot.com
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अंततःऋतु चर्चा
बसन्त को परास्त कर ग्रीष्म ऋतु ने अपने आगमन की भेरी बजवा दी है। भूमि जलस्तर, जलसंरक्षण,वृक्ष लगाओ ,वृक्ष बचाओ ,पर्यावरण इत्यादि पर कागजी और मीडिया वाली मौखिक परिचर्चाएँ भी प्रारम्भ हो चुकी हैं। इस बीच संयुक्त राज्य अमेरिका में कार्यरत मेरे जेष्ठ बेटे ने चार अप्रैल को व्हाट्सएप्प पर एक बड़ा ही मर्मभेदी सन्देश भेजा जिसे मैं प्रासंगिकतावश आप सभी के अनुशीलन हेतु प्रस्तुत कर रहा हूँ। कृपया देखें ," आम ,नीम ,पीपल और बरगद के पेड़ काटकर घर में मनी प्लांट लगाने वाले बुद्धिजीवियों को  भीषण गर्मी की शुभ कामना। "और फिर भारतेन्दु जी की इन पंक्तियों को गुनगुनायें ,"हम क्या थे ,क्या हो गए और क्या होंगे अभी ?
ग्रीष्म सबके लिए मंगलमय हो। इस शुभेच्छा के साथ ---------------------------------मंगलवीणा
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बुधवार, 7 मार्च 2018

महिला दिवस

महिला दिवस ,आठ मार्च 2018
***************महिला का प्रथम नाम शक्ति ,दूसरा महिला नारी वुमन ,तीसरा अबला इत्यादि व चौथा आधुनिक अनेक नाम हैं जो आज के चलचित्रों व टीवी के कार्यक्रमों में दिखाई दे रहे हैं।यह भी निर्विवाद है कि हमारे सामाजिक ताने -बाने में शक्ति का सन्तुलन सदैव महिलाओं के पक्ष में रहा है परन्तु इस शक्ति का महिला समाज में समान वितरण नहीं रहा है।इसी कारण महिला के अनेक उचित, अनुचित पर्याय बनते गए। क्या यह सच नहीं है कि महिलाओं के कुछ रूप, शक्ति सम्पन्नता के कारण, स्वामिनी जैसे हो जाते हैं तो कुछ ,शक्ति विपन्नता के कारण, दासी जैसे। गौर करने के लिए सास -बहू ,सधवा -विधवा ,मालकिन -धाय ,कुल बधू -नगर बधू  के उदहारण पर्याप्त होंगे।आप हमेशा भाई चारा की बात सुनते होंगे परन्तु महिलाओं में  बहिनत्व या बहिन चारे की बात कभी नहीं। कभी सपने में सुन भी लिए होंगे तो देखना तो गधे की सींग जैसी घटना होगी।
***************महिला दिवस पर महिलाओं को एक दूसरे को शक्ति के समतल पर लाने का प्रण करना चाहिए और बहिनत्व का नारा बुलन्द करना चाहिए। सच ही कहा गया है कि हम बदलें गे --युग बदले गा।जहाँ तक पुरुष की बात है ,वह महिला की संस्कारशाला से ही निकला उन्ही के साथ उन्हीं के लिए व्यवस्थाधीन जीने वाला प्राणी है और यदि कभी कोई पुरुष महिलाओं के साथ अभद्र होता है तो फिर ध्यान संस्कार की ओर ही जाता है।हाँ , पुरुषों का  परम कर्तव्य है कि वह महिलाओं में श्रद्धा भाव सदैव व प्रति पल रखे। छायावादी महा रचनाकार स्व जय शंकर प्रसाद जी ने भी कामायनी में यही कहा है कि ----
नारी तुम केवल श्रद्धा हो ही,
विश्वास रजत नग  पद तल में।
पियूष श्रोत सी बहा करो,
जीवन के सुन्दर समतल में।
***************आज महिलाओं को ध्यान देना होगा कि वे न तो अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी बनें और न ही तू चीज बड़ी है -- बनें।उन्हें अपनी प्रगति के वर्तमान दौर में उपभोक्तावाद संस्कृति से सावधान रहते हुए अपनी गरिमा बनाए रखना होगा।श्रद्धा के लिए आचरण की योग्यता रखना महिलाओं का सर्वोपरि दायित्व है। यदि महिलाओं में यह योग्यता नहीं होगी तो वे आज की अपसंस्कृति की शिकार होती रहें गी। अतः आदरणीया या श्रद्ध्येया  को सत्यशः आदरणीया या श्रद्ध्येया ही बने रहना चाहिए।
***************यद्यपि आज महिलाएं जीवन के हर क्षेत्र जैसे विज्ञान ,अंतरिक्ष ,कला ,साहित्य ,शिक्षा ,खेलकूद ,राजनीति ,नौकरी ,उद्यमिता इत्यादि में आसमान छूने छूने लगी हैं ;फिर भी उनकी सहभागिता सँख्या ऊँट के मुँह में जीरा जैसी ही है। समाज अपवाद की उन्नति से नहीं बनता है, समाज सामान्य की उन्नति से बनता है और यह तभी सम्भव होगा जब महिलाएं स्वयँ बढे गी और बहिनत्व भाव से अन्य महिलाओं को आगे बढ़ाएं गी।नारी शक्ति के प्रति श्रद्धा भाव जताते हुए आज हम उन्हें उनकी शक्ति का सादर स्मरण कराते हैं।  ----- मंगलवीणा
वाराणसी ;दिनाँक 08 . 03 . 2018
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अपनी बात भी -
***************वर्षों से आज का दिन मेरे लिए तो  अविस्मरणीय रहा है क्योंकि तैंतालीस वर्ष पूर्व  सन 1975 में आज के दिन ही मैं अपनी पत्नी वीणा सिंह के साथ परिणय सूत्र में बँधा था। जीवन में इस संयोग के लिए मैं अपने को बहुत ही भाग्यशाली मानता हूँ।मेरी धर्म पत्नी जी एक सशक्त महिला हैं और हमारे परिवार संचालन में अपनी सशक्त भूमिका निभा रही हैं।सहमति- असहमति, प्रेम- तकरार,उतार -चढ़ाव के बीच हम दोनों  अच्छे सहयात्री हैं और अपनी नई पीढ़ी को सँवारने में ब्यस्त हैं। यह मंगलवीणा ब्लॉग जो वर्षों से आप स्नेही पाठकों एवँ मित्रों के समक्ष प्रस्तुत हो रहा है , हम दोनों के नाम युग्म का ही पुष्प गुच्छा है।अंततः महिला दिवस पर दुनियाँ की समस्त महिलाओं का सादर अभिनन्दन एवँ इस सुखद संयोग का आभार।-----------------------------------मंगला सिंह
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मंगलवार, 19 दिसंबर 2017

चक्रव्यूह में फँसता भारतीय इतिहास

***************मध्यकाल से अब तक भारतीय इतिहास के तोड़ मरोड़ का क्रम जारी है। पद्मावती नाम के चलचित्र पर इस समय चल रहा विवाद इसका ज्वलन्त उदहारण है।इतिहास में रूचि रखने वाले हैरान हैं कि हजारों क्षत्राणियों के साथ जौहर करने वाली महारानी पद्मावती  के चरित्र में फिल्म बनाने वालों ने मनोरंजन का कौन सा विषय गढ़ लिया कि फिल्माँकन कर दौलत बटोरने की सोच ली। भारतीय इतिहास में हाथ डालने से पहले इन फिल्मकारों को भारतीय सिनेमा के इतिहास को याद कर स्वयँ झेंप लेना चाहिए कि ये लोग मनोरंजन को राजा हरिश्चन्द्र से पद्मावती तक की यात्रा में कहाँ से कहाँ पहुँचा दिए।शायद निर्माता और उसके कलाकारों को अनुभूति नहीं कि पद्मावती किन उच्च भारतीय आदर्शों का प्रतिनिधित्व करती हैं।यदि किसी फिल्म निर्माता को ऐतिहासिक पद्मावती पर फिल्म बनानी है तो वह बनाने को तो स्वतन्त्र है परन्तु उसे शत प्रतिशत यह सुनिश्चित तो करना ही होगा कि उसकी अभिनेत्री हूबहू पद्मावती का चरित्र अभिनीत करे। उसे रंचमात्र भी  चरित्रान्तर या स्वयँ नायिका बनने का अवसर नहीं दिया जा सकता है। उन्हें बहुत स्पष्ट होना होगा कि वह पद्मावती का अभिनय कर रही हैं न कि वे स्वयँ किसी फिक्सन ,गल्प या दंतकहानी की नायिका हैं।
*************** फिल्मों में अभिनय करने वाले लोग  हमारे समाज या इतिहास के नायक -नायिका या हीरो- हीरोइन  नहीं हैं। ये मात्र अभिनेता और अभिनेत्री हैं।जिस पद्मावती फिल्म पर आज पूरे देश में विवाद व विरोध है वह पद्मावती भारत की ऐतिहासिक एवँ सांस्कृतिक गौरव की अद्वितीय नायिका हैं। उन्हें फिल्म निर्माता भन्साली ने अपनी कल्पना से नहीं उपजाया है कि व्यावसायिक हित में उसे जैसा चाहें वैसा गढ़ दें।अतः उन्हें यह छूट बिल्कुल नहीं मिलती कि हमारे ऐसी बेजोड़ नायिका के व्यक्तित्व को कहीं से भी हल्का करें। पद्मावती मनोरंजन नहीं गौरव गाथा की प्रकाश पुञ्ज हैं। पद्मावती वह गौरव गाथा है जिसे चित्तौड़ में अनुभव किया जा सकता है , राजपूताने में आज भी भाटों -चारणों से सुना जा सकता है,कर्नल टाड ,ओझा या इतिहासकारों को पढ़ा जा सकता है या मालिक मुहम्मद जायसी के पद्मावत को गाया जा सकता है।
***************किसी भी देश की जनता एवँ उनकी सरकारों का प्रथम कर्तव्य होता है कि वे अपने इतिहास को किसी दशा में विकृत या निज संस्कृति आक्षेपी न होने दें ताकि पीढ़ियाँ उस पर गर्व कर सकें ,उससे प्रेरित हो सकें और उनकी संस्कृति अबाध आगे बढ़ती रहे। यह ठीक है कि अतीत में भारतीय प्रायद्वीप की परिस्थितियाँ बहुत विषम थीं और इतिहास भी छोटे छोटे भूखण्डों में विभक्त होता रहा और इसका लाभ उठाते हुए विदेशी हमलावरों,मुग़लों  तथा बाद में अंग्रेजों ने भी भारत के इतिहास को ऐसे अंकित करने का प्रयास किया कि हम भारतीयों को हमारा अतीत लज्जाजनक लगे और बहुसंख्यकों में हीन भावना पनपती रहे। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद बामपन्थी ,काँग्रेसी ,मुस्लिमपंथी एवँ तुष्टिपंथी -  इतिहासकार भी एक निर्दिष्ट उद्देश्य पूर्ति के लिए हमारे इतिहास को पूर्ववर्तियों की दिशा में घसीटते रहे। ऐसे लोगों का सुनियोजित प्रयास रहा है कि  मध्यकालीन  आक्रमणकारियों और  नेहरू एवँ उनके परिवार जैसे लोगों की नायक वाली विरासत स्थापित हो सके तथा  राणा प्रताप ,सुभाष चन्द्र  बोस और बल्लभ भाई पटेल जैसे लोग इतिहास पटल पर मद्धिम होते जाँय । यहाँ तक कि इतिहास और हिन्दुत्व के खलनायकों को नायक और नायकों  को खलनायक के रूप में प्रस्तुत करने का क्रम जारी है।लोग भूले नहीं हैं कि  हाल में सत्ताधारी काँग्रेस द्वारा  बैंगलुरु में टीपू सुल्तान की जयन्ती मनाई गई। ये वही टीपू सुल्तान थे जो धुर हिन्दू विरोधी थे और तलवार के बल पर लाखों हिन्दुओं का धर्म परिवर्तन कराया था।
*************** इस तरह की मानसिकता से प्रमाणित होता है कि भारतीय इतिहास ,समृद्ध सांस्कृतिक विरासत व प्राचीनतम सभ्यता को लगातार चोट पहुँचाने का प्रयास जारी है और फिल्म निर्माता संजय लीला भन्साली इसकी अद्यतन कड़ी हैं।बहुसंख्यकों की सहनशीलता का लाभ उठाते हुए ये लोग स्वार्थी इरादों के साथ इतिहास के गर्भगृह में घुसकर उसे नष्ट भ्रष्ट करने का दुस्साहस दिखाने लगे हैं।रानी पद्मावती ; बाजीराव की मस्तानी , वैशाली की नगर बधु,आम्रपाली  या चित्रलेखा ; नहीं हैं अतः उनका फिल्मांकन भी वैसे नहीं हो सकता कि  भंसाली  अलाउद्दीन खिलजी के रूप में स्वप्न लोक पहुँचे और अप्रतिम सुंदरी पद्मावती को नृत्य करते देंखें। भारतीय सिनेमा ने हमारे नैतिक मूल्यों को बहुत हानि पहुँचाया है।  चलचित्र जगत के लोग बहुधा कहते हैं कि वे दर्शकों को वही दिखाते हैं जो दर्शक देखना चाहते हैं। फिर सिनेमा वालों को मालूम हो जाना चाहिए कि वे भन्साली द्वारा बनाई गई पद्मावती बिलकुल नहीं देखना चाहते हैं और ऐसे सिनेमा न बनाये जाँय।वर्तमान रोष तो एक चेत वाणी है कि आने वाले समय में हमारे पौराणिक ,धार्मिक ,सांस्कृतिक एवँ ऐतिहासिक नायक ,नायिकाओं एवं अन्य चरित्रों  के चित्रण में छेड़ छाड़ का विरोध और प्रचण्ड होता जाय गा।
***************परिस्थितियाँ करवट ले चुकी हैं। आज पूरी दुनियाँ में हमारी उत्कृष्ट मानवतावादी सोच , संस्कृति ,दर्शन ,विरासत और प्रतिभा का डंका बजने लगा है और हम भारतवासी भारतीय कहलाने पर गर्व कर रहे हैं। देशवासियों और नई पीढ़ी को राष्ट्र के आतंरिक घातियों की समझ हो चुकी है और वे समय समय पर विरोध व प्रदर्शन कर ऐसे लोगों को सँभल जाने का सन्देश दे रहे हैं। सरकारें भी ऐसे षड्यंत्रकारियों पर नियंत्रण की दिशा में काम कर रही हैं।अतः समय की माँग है कि मनोरंजन अपने को मनोरंजन की सीमा में समेटे हुए चले तथा हमारे किसी भी अतीत और वर्तमान के नायक या नायिका के चरित्रान्तर का प्रयास न करे। लोकतंत्र तभी परिपक्व माना जाता है जब उसके नागरिक स्वतः अनुसाशन का आचरण करें और विरोध की स्थिति ही न बने। तब तक यदि हमारे इतिहास को चक्रव्यूह में फँसाया जायगा तो व्यूह रचने वाले नई पीढ़ी द्वारा बुरी तरह पराजित होंगे।
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वाराणसी :दिनाँक 19 दिसम्बर 2017 ---------------------mangal-veena.blogspot.com
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अन्ततः
**हेमन्त बीतने जा रहा है  और जाड़े की दुंदुभी बज उठी है।  जो वातावरण शादियों के रेलम रेल व गुजरात के चुनाव से ही गरम था वह क्रमशः खरमास (15 दिसम्बर से प्रारम्भ ) व 18 दिसम्बरागमन के साथ ठंढा पड़ चुका है और बढ़ती ठंढ में अब ऊनी पहनावे के साथ कम्बल रजाई से ही गर्मी की आस है।
**भला हो गुजरात के उन मतदाताओं का जिन्होंने गुजरात मॉडल को बचा लिया और हमारे विश्वख्यात नेता नरेंद्र मोदी के साख को गृहराज्य में आँच नहीं लगने दिया।आशा है भाजपानीत सरकार गहन विश्लेषण करे गी और लोकहित की ओर तेजी से अग्रसर होगी। कुछ ऐसी शक्तियां भाजपा के अन्दर अवश्य हैं जो उससे जनाकांछा की शनैः शनैः अनदेखी करा रहीं हैं। यदि भाजपा नहीं संभलती है तो सोच ले कि प्रधान मंत्री जी के लिए जनता कब तक अपने अहित को सहन कर पाए गी।
**आगे इस ब्लॉग के माध्यम से सभी सुधी पाठकों को क्रिस्मस पर्व की शुभ कामनायेँ एवँ हार्दिक बधाई। हो सके तो जिन गर्म कपड़ों को अब  हम न पहनते हों , जरुरतमन्दों को ढूंढ़ कर उन्हें सादर हस्तगत करें। इस  छोटे प्रयास से मानवता की बड़ी सेवा होगी।प्रणाम।-----------------मंगलवीणा
वाराणसी ;दिनाँक 19 दिसम्बर 2017 -----------------------mangal-veena.blogspot.com
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बुधवार, 15 नवंबर 2017

गुजरात से शँखनाद या साइरन ?

***************आज की तिथि में गुजरात हमारे देश के कतिपय सर्वाधिक विकसित राज्यों में एक है और हमारी प्रगति का पर्याय है ।सकल घरेलू उत्पाद या प्रति व्यक्ति सालाना आय अथवा खुशहाल जिंदगी के मानक आँकड़ों की बात न कर केवल विभिन्न राज्यों से गुजरात जाकर वहाँ अपनी जीविका चलाने वालों की संख्या तथा उस राज्य के विकास पर उनकी राय ले कर गुजरात विकास की चकाचौंध करने वाली सच्चाई समझी जा सकती है।न्यूनाधिक सभी राज्यों , विशेषतया पिछड़े राज्यों, के लोग गुजरात के विभिन्न शहरों या कस्बों में काम करते मिल जाँयगे जबकि व्यवसाय से इतर जीविका के लिए अन्य राज्यों में गुजराती न के समतुल्य मिलें गे। यही है गुजरात का विकास मॉडल जो आम लोगों को दिखता है।
***************परन्तु हमारे देश के तथाकथित यायावर नेता जो पीढ़ियों से गरीब देश के अमीर लुटेरे हैं और जिनके लिए यूरोपीय व अमेरिकन देश सुगम व सुरम्य सैर- गाह हैं ,उन्हें गुजरात में कहीं विकास दिखता ही नहीं। ये वही लुटेरे हैं जिनकी मान्यता है कि जहाँ लूट के अवसर नहीं वहाँ विकास कैसा। सन दो हजार चौदह तक देश की गद्दी जुगाड़े इन लुटेरों का कृत्य जन जन को पता है फिर भी निर्लज्ज बगुला भगत सा विश्वास पाले गुजरात के मैदान में धर्म ,जाति ,सवर्ण , पिछडों और दलितों का जहर घोल कर ये विजय की आशा पाल रहे हैं।इन हारे हुए काँग्रेसी खिलाडियों के पास हारने को कुछ नहीं है पर खेल बिगाड़ने को बहुत कुछ है। वहीँ गुजरात की जनता एक बड़ी कसौटी पर चढ़ी हुई है। वह या तो भारतीय जनता पार्टी को विजय देगी या पराजय ।
***************देश के हर राष्ट्रप्रेमी नागरिक की आकांछा है कि गुजरात के लोग भाजपा को विजयश्री पहना कर श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार द्वारा चलाये जा रहे आर्थिक , सामाजिक तथा सामरिक सुधारों पर मुहर लगायें ताकि देश विदेश को एक संदेश मिल सके कि जिस  मोदी ने वर्षों तक गुजरातियों की बेहतरी के लिए साधना किया और जिस जनता ने उन्हें आज प्रधान मन्त्री के पद तक पहुँचाया वे आज भी थोड़ी दुश्वारियों के बावजूद  एक दूसरे के लिए चट्टान की भाँति खड़े हैं। याद रहे कि आर्थिक उतार- चढ़ाव तथा मत भिन्नता के बाद भी मोदी जी राष्ट्रवाद ,राष्ट्रभक्ति ,राष्ट्रगौरव व सर्वोपरि -राष्ट्र वाली अवधारणा के बेजोड़ नायक व आशा के किरण पुञ्ज हैं। इस तथ्य को हमें किसी भी पल दृष्टि से ओझल नहीं कर सकते क्योंकि सावधानी हटी कि देश लुटा।
***************दूसरी अर्थात पराजय की स्थिति में स्थिति के कारण महत्वपूर्ण हो जाँयगे और सारे विपक्षी नेता एक होकर देश को सन चौदह से पूर्व की स्थिति में घसीट ले जाने व सत्ता सुख के बंदरबाँट का पुरजोर प्रयास करेंगे।फलतः बचे डेढ़ वर्षों में केंद्र सरकार को उग्र विपक्षी विरोध का सामना करना होगा जिससे सरकार की दृढ इच्छाशक्ति डगमगा सकती है।हार भाजपा की होगी परन्तु खुशियाँ विघटनकारी नेता व पार्टियाँ मनाएँ गी। जो  कारण मतदाताओं को भाजपा के विरोध में जाने को प्रेरित कर सकते हैं वे क्रमशः पाटीदारों का आरक्षण के नाम पर प्रबल विरोध ,दलितों में उकसाया गया छद्म असंतोष ,व्यवसाय पर जीएसटी का कुप्रभाव ,पेट्रोलियम पदार्थों की घटी कीमतों का लाभ जनता को न देना ,स्थानीय भाजपा नेताओं के प्रति विकर्षण तथा सबसे ऊपर राज्य स्तर पर मोदी जी जैसे चमत्कारी नेता की अनुपलब्धता हैं।
*************** निश्चय ही राष्ट्रवाद की छाँव में भाजपा  यह भूल रही है की सरकार अपनी जनता के लिए एक चुनी हुई कल्याणकारी संस्था होती है और बिना कोई संकट की स्थिति आए वह जनता को आर्थिक बेहतरी के बदले आर्थिक बदहाली नहीं दे सकती।आम जन की जेब पर दबाव पड़ेगा तो समर्थन भी घटे गा।फिर भी दबाव ने कोई लक्ष्मण रेखा नहीं पार किया है कि जिस दल के सरकार ने गुजरात में वर्षों तक बेहतरीन परफॉर्मन्स दिया ,गुजरात को आधुनिक गुजरात बनाया व देश को मोदी जी जैसा अद्वितीय नायक दिया ;उसे राज्य से सत्ताच्युत कर दिया जाय।
***************सरकारी सेवा में रहते हुए उन्नीस सौ नवासी से वानवे तक मुझे गुजरात के विभिन्न स्थानों पर भ्रमण करने व वहाँ के विभिन्न वर्ग व समुदाय के  लोगों के साथ जब संपर्क का अवसर मिला तो समझ आई  कि प्रभु श्रीकृष्ण को द्वारकापुरी  रास क्यों आई याकि गाँधी जैसे सत्य एवँ अहिँसावादी और पटेल जैसे  लौहपुरुष वहीँ क्यों उपजे। वहीँ समझ सका कि पानी की कमी से जूझते प्रदेश में  अमूल जैसी श्वेत क्रान्ति ,खूबसूरत दस्तकारी ,वस्त्रोत्पादन ,हीरा उद्योग या अन्य भारी उद्योग क्यों परवान चढ़ पाए।वास्तव में शुद्ध भारतीय परिवेश व मीठासमयी संस्कृति को सँजोए हुए गुजरातियों में गजब की उद्यमिता एवँ संघर्ष क्षमता है। उन्हें सरकार  से मात्र  सरकार जैसी व्यवहार की अपेक्षा रहती है। उन्हें सरकार से सार्वजानिक सुविधा ,संरचना ,सुरक्षा और व्यवसाय परक वातावरण चाहिए न कि व्यक्तिगत सुविधाएँ। इस राज्य में मोदी जी के सफलता का मन्त्र भी यही रहा है। आज के संशय का कारण भी स्थानीय भाजपा नेताओं द्वारा इस मंत्र का थोड़ा बहुत विकृत किया जाना लगता है।
***************सभी धन ऋण  विचारों के समायोजनोपरान्त कहा जा सकता है कि मोदी जी के बाद की प्रदेश सरकार यदि पूर्ववत जनता के प्रति संकल्पित रही है और स्थानीय भाजपा के नेता जनता से मित्रवत संवाद में रहे हैं तो राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानते हुए गुजरात के मतदाता भाजपा को विजय श्री देंगे। उभरते भारत में हो रहे बदलाव के दौर में जीएसटी से उत्पन्न अस्थाई व्यावसायिक कठिनाइयोँ  के कारण भी वे भाजपा को नहीं नकारें गे। हिमाँचल प्रदेश की भाँति वहाँ एन्टी इनकम्बेंसी जैसा कोई गुणक भी काम नहीं करेगा। ऐसे में भाजपा के हार की सम्भावना बहुत दूर तक नहीं है। हारे गी तभी यदि सत्तारूढ़ सरकार ने सरकार के लिए निर्धारित लक्ष्मण रेखा का अतिक्रमण किया होगा। जीत से भाजपा नीत केंद्र सरकार के आर्थिक सुधारों व विकास कार्यक्रमों  को और तीब्र आवेग (मोमेंटम )मिले गा अन्यथा  हार, आवेग में अस्थाई ठहराव का,गुजरात से एक साइरन होगा। फिर सिंहावलोकन की स्थिति बने गी और पुनः नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में  इन्हीं सुधारों व विकास को प्रचंड समर्थन मिलेगा  क्योंकि भारत को दुनियाँ मेँ अपना मुकाम पाना है और हम आम भारतीयों के लिए सबसे पहले भारत है।
वाराणसी ;दिनाँक 14 नवम्बर 2017         ------------------------------------ मंगलवीणा
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अंततः
 **********समूचे उत्तरभारत में दीपावली से आरम्भ हुए नव वर्ष का स्वागत धुन्ध ,धुँए ,गुबार व कुहरे से हुआ है। स्वागत भी ऐसा कि लोगों का श्वाँस लेना दुश्वार। सभ्य भाषा में स्मॉग  कहर बरपा रहा है और हम लोग जैसी करनी वैसी भरनी पा रहे हैं।
**********आश्चर्य होता है कि नए वर्ष का शुभारम्भ हुआ है और अगहन या मार्गशीर्ष का वह मनोहारी महीना चल रहा है जिसकी महत्ता में  प्रभु कृष्ण ने अर्जुन से कहा था कि ऋतुओं में बसन्त ऋतु और महीनों में मार्गशीर्ष का महीना मैं ही हूँ।यथा -
*****बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहं।
*****मासानां मार्गशीर्षः अहम् ऋतुनां कुसुमाकरः। 35 /10 श्रीमद्भगवद्गीता
**********ऐसे महीने में पर्यावरण को स्वयं प्रदूषित कर मानवता कराह रही है। धन्य हैं विज्ञान के उत्कर्ष युग या इस कल युग में जीने वाले हम विद्वान् लोग कि धरती को स्वर्ग न बना नरक बना डाले।क्यों न हम अपनी तुलना मूर्ख कालिदास से करें और कवि कालिदास की ओर अग्रसर हों।
वाराणसी                                                                              -------- मंगलवीणा
दिनाँक:14 नवम्बर 2017                                     mangal-veena.blogspot.com
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बुधवार, 11 अक्टूबर 2017

आपदाओं के भँवर में फँसती मानवता

***************मानवता के हत्यारों में एक और नाम स्टीफन पैडक जुड़ गया।अमेरिका के लॉस वेगास शहर में संगीत कॉन्सर्ट देख रहे आम जन समूह पर इस क्रूर हैवान ने पास के एक होटल के बत्तीसवें तल पर स्थित कमरे से चंद मिनटों में इतनी गोलियाँ बरसाई कि पचास के आस पास लोगों की जानें गई और कई सौ लोग गंभीर रूप से घायल हुए।इस भयावह मास शूटिंग की घटना को सदियों तक भूला नहीं जा सके गा।घटना के बाद रस्मी तौर पर हम तथाकथित सभ्य लोग मृतकों की आत्मा की शान्ति के लिए पूर्व की भाँति प्रभु से प्रार्थना कर रहे हैं परन्तु भविष्य में ऐसी कृतिम आपदाएँ कहर न ढायें,इसके लिए न तो हम मतैक्य से सुदृढ़ व्यवस्था बनायेँ गे,न अपराध बोध के लिए प्रभु से क्षमा माँगेगे और न ही मानवता को सन्मति देने के लिए महात्मा गाँधी की भाँति  नियमित समूह प्रार्थना करेंगे ।
***************यह दुखद किन्तु सत्य है कि तकनीक के वर्तमान दौर में कृतिम या मानव निर्मित आपदाएँ धरती के हर हिस्से में प्राकृतिक आपदाओं की तुलना में ज्यादा भयावह और दिल  दहलाने  वाली कहर ढा रही  हैं । मजबूर एवँ असहाय मानवता जब और जहाँ कृतिम आपदाओं से हत हो रही है,पीड़ित लोग अश्रु भरे आँखों से एक ही प्रश्न पूछते हैं कि उनकी गलती क्या थी ?उत्तर सभी को पता है परन्तु निदान के नाम पर सारे राष्ट्र व सारी संस्थाएँ अंधकार में लाठी पीटने जैसा स्वाँग कर रही हैं।अधिक क्या कहा जाय ; अमेरिका जैसा संपन्न एवं शक्तिशाली राष्ट्र भी ऐसी कृतिम आपदाओं को रोकने में दृढ़ इच्छाशक्ति नहीं दिखा पा रहा है। इस धरती पर बसने वाली सम्पूर्ण मानवता न जाने किस दिन की प्रतीक्षा कर रही है।
***************वैसे तो प्राकृतिक आपदाओं जैसे अतिवृष्टि,जलप्रलय , बादलों का फटना ,भूकंप ,ज्वालामुखी ,समुद्री या चक्रवाती तूफान इत्यादि को मनुष्य अपने उद्भव काल से आज तक अनवरत झेलता आ रहा है और ये आपदाएँ वैसी ही भयावह और विनाशकारी बनी हुई हैं।फिर भी इन्हे हम इस लिए झेल जाते हैं क्योंकि ये प्रकृति प्रदत्त हैं जिन पर मनुष्य का दैव -दैव कहने के सिवा कोई वश नहीं है। दूजे इन आपदाओं से निपटने में सारी मानवता सामंजस्य बिठा कर एक साथ खड़ी हो जाती है। और तीजे सभ्यता एवं वैज्ञानिक प्रगति के साथ मनुष्य ने इनके प्रभाव को कमतर करने में दक्षता  भी प्राप्त कर लिया है। परन्तु इनसे भी विनाशकारी आपदाओं का कहर आदमी ,आदमी पर, बार -बार और लगातार ढा रहा है जिसके लिए न हम दैव -दैव कर सकते हैं न प्रकृति को कोस सकते हैं।सुरक्षा या संहार के नाम पर मानव निर्मित एटमी हथियार आज   दुनियाँ में किसी भी प्राकृतिक आपदा से ज्यादा प्रलयंकरी आपदा हैं।सबसे बड़ा डर है कि कहीं मानव निर्मित नाभिकीय आपदाएँ कभी इस प्यारी धरती को पूर्णरूपेण मानव विहीन न कर दें।वस्तुतः इतिहास प्रमाण है कि जहाँ  कहीं कृतिम आपदाओं से नरसंहार हुए हैं या हो रहे हैं ,उनके पीछे विचार धारा  या सत्तात्मक  वर्चस्व ,धार्मिक या नश्ली द्वेष किंवा लापरवाही या संवेदन शून्यता जैसे मूल कारण ही पाए गए हैं।
***************वर्तमान समय में इस विश्व व्यापिनी आपदा ने पूरी एशिया और विशेषतया भारत को अपने ताण्डव की रंगभूमि बना डाली है। प्राकृतिक आपदाएँ जैसे बाढ़ ,सूखा ,शहरों में जल प्रलय ,समुद्री तूफान इत्यादि से तो हम दो चार तो होते ही रहते हैं परन्तु कृतिम आपदाएं तो पूरे देश को निरन्तर रुला रही हैं।राजनीति से निर्मित आपदा का ज्वलंत उदहारण सन उन्नीस सौ सैतालिस में हुआ भारत का विभाजन है जिसने लाखों लोगों की जाने ले ली और करोड़ों लोगों को जन्मभूमि छोड़ने व बेघर होने को विवश किया। पीढ़ियाँ उस आपदा के दंश से अब भी पीड़ित हैं। उसी आपदा के पार्श्व प्रभाव में  आए दिन पश्चिमी सीमा पर आज भी गोली बारी से वहाँ के निवासियों व सीमा प्रहरियों की जानें जा रही  है।धार्मिक कट्टरवाद व देश विघटन के लिए प्रायोजित आतंकवाद या नक्सलवाद जैसी जघन्य और अमानवीय आपदाएँ मानव निर्मित ही तो हैं। धार्मिक आपदाओं का तो कहना क्या। स्नान ,दर्शन और प्रवचन श्रवण के लिए भीड़ ,अव्यवस्था फिर भगदड़  और अनगिनत मौतें इस देश में प्रायः सुनाई देती हैं।मानवीय लापरवाही के चलते अस्पताल , रेल ,बस कार व अन्य सड़क दुर्घटनाओं द्वारा प्रति वर्ष कई हजार लोग काल कवलित हो रहे हैं। जाँच होती रहती है,सीख़ लेने और भविष्य में इनकी पुनरावृत्ति न होने देने की बात भी होती है परन्तु ये आपदाएँ हैं कि मानती नहीं और यत्र तत्र सर्वत्र कहर बरपाती ही रहती हैं।इस समाज में कहीं भी किसी बेटी या बहन का किसी दरिन्दे द्वारा बलात्कार हो जाना उस पीड़ित परिवार के लिए सबसे दुसह आपदा है।और तो और जिस देश में गौतम और महात्मा जैसे महामानवों ने अहिंसा का सीख दिया हो उस देश में हिंसक प्रवृत्ति का बढ़ना किस आपदा से कमतर है।
***************इन सारी आपदाओं के बीच मानव सभ्यता के पास कुछ ऐसी संजीवनी विशेष तो है कि परिस्थितियों से जूझते और उनपर विजय पाते हुए वह सभ्यतर होती रही है।यह संजीवनी ही परिणामी रूप में व्यवस्था है जिसे सदैव हर रचनात्मक या विध्वंसक उपलब्धि से ज्यादा  सक्षम और चुस्त - दुरुस्त बनाना होगा ताकि बिपरीत परिस्थितियों में मानव निर्मित आपदाओं को घटने की स्थिति ही न आने दे।इस समूची धरती पर मनुष्य के लिए मनुष्य के प्रति प्रेम,सहकार तथा सहयोग से ऐसी व्यवस्था साकार हो सकती है।यह ठीक है कि ऐसी व्यवस्था की स्थापना में अभी हम वाँछित सफलता नहीं पाए हैं। फिर भी प्रयास जारी रहना चाहिए क्योंकि प्रयासी कभी असफल नहीं होते।ऐसे ही राह पर आई कैन नामक संस्था, धरती को नाभिकीय आयुधों से मुक्त करने के लिए,अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर  प्रयासरत है।वर्ष दो  हजार सत्रह के लिए शांति का नोबेल पुरस्कार इंटरनेशनल कम्पेन फॉर अबॉलिशन ऑफ़ न्यूक्लियर वेपन (ICAN)  को देकर नोबेल समिति ने इस प्रयास पथ पर मुहर लगा दिया है। अतः उसे साधुवाद और सराहना मिलनी ही चाहिए। ऐसे ही समन्वित प्रयास  से उपजी व्यवस्था हमें आपदाओं के भँवर से  सदैव बाहर निकालती रहे गी और बेहतरी की यात्रा आगे बढ़े गी ।अनादि काल से न जिंदगी कभी थमी है न कभी थमे गी क्योंकि यह धरती परमेश्वर और प्रकृति की अनूठी कृति है।--------------------------------------------------------------------------------------------मंगलवीणा
वाराणसी ;दिनाँक 12 अक्टूबर 2017 .                          mangal-veena.blogspot.com
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रविवार, 6 अगस्त 2017

मित्रता दिवस

स्वार्थ की तीन स्थितियाँ होती हैं -जुड़ाव, टकराव और न जुड़ाव न टकराव ।
पहली से मित्र व सम्बन्धी बनते हैं,दूसरी से शत्रु तथा तीसरी से तटस्थ अर्थात न मित्र न शत्रु जैसे सड़क, रास्ते या अन्यत्र कहीं किसी का मिल जाना ।
मित्रता दिवस पर हमें संकल्प लेना चाहिए कि हम अपने स्वार्थ को कभी भी अपने सम्बन्धी या मित्र के स्वार्थ से टकराने नहीं देंगे ताकि वे हमारे अपने सदैव बने रहें ।शुभम्अस्तु ।-------मंगलवीणा
वाराणसी ,दिनाँक 0 6 अगस्त 2017 -------------------------------------------mangal-veena.blogspot.com
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मंगलवार, 4 जुलाई 2017

किसान भी बदल गए

***************निश्चय ही भारत बदल रहा है। वोटतन्त्र के कारण हमारे देश में  आरक्षण ,सुविधा  एवं छूट माँगने तथा उन्हें पाने वालों की संख्या दिन दूनी रात चौगुनी  बढ़ती जा रही है।जनता के लिए सुविधाओं का बढ़ना जहाँ अर्थ ब्यवस्था के बढ़ते सामर्थ्य  की परिचायक है वहीँ आरक्षण और छूट देश की प्रगति में सबसे बड़े वाधक हैं।इन्हीं बाधाओं के परिपेक्ष्य में कृषि ऋण माफ़ी के लिए किसानों का,अपने मूल स्वभाव की लक्ष्मण रेखा लाँघ कर, आन्दोलित होना  इस वर्ष की सर्वाधिक अचंभित करने करने वाली घटना है।इसे अन्य आंदोलनों की दृष्टि से देखना बहुत बड़ी भूल होगी क्योंकि इतिहास के क्रम  में आज भारत जहाँ पहुँचा है; उसका प्रथम श्रेय भारत के कृषक एवं कृषि को जाता है और कल भारत विश्वपटल पर कहाँ होगा ;यह भी कृषि के विकास एवं कृषक की खुशहाली पर निर्भर होगा।  अतः तमिल- नाडु  ,महाराष्ट्र ,मध्यप्रदेश ,पंजाब ,राजस्थान ,कर्नाटक व अन्य राज्यों में उठे किसान आंदोलन ,उनकी पृष्ठभूमि ,कारण और निवारण पर गहन विमर्श की आवश्यकता है। जिसे समाज अन्नदाता और जीवन दाता कहता रहा वह उचित मूल्य पर  साधन ,सुविधा की अपेक्षा से हट कर सरकारों से ऋण माफ़ी ,मुफ्त की बिजली ,छूट की खाद ,छूट के अन्य सारे संसाधन व फसल की ऊँचे दाम पर सुविधापूर्ण विक्री माँग रहा है।बहुत अटपटी बात है कि सास्वत दाता आदाता की भूमिका में सामने है।
***************विगत कुछ वर्षों से किसानों में आत्महत्या की घटनाएँ बढ़ी हैं परन्तु आत्महत्या करने वालों की सूची में केवल  किसान ही हैं ;ऐसा नहीं है। नौकरी या सेवा क्षेत्र के लोग ,उद्योग करने वाले ,व्यवसायी ,छात्र ,व अन्य सभी वर्ग के लोग भी आत्महत्या करते रहे हैं और उनकी आत्महत्या के लिए उत्तरदायी आर्थिक ,वैयक्तिक  व मनोवैज्ञानिक कारणों की चर्चा भी सामने आती रही हैं।सारी दशाएँ समान होते हुए मात्र कृषक होना कोई ऐसा कारण नहीं है जो सहानुभूति विशेष की पृष्ठभूमि बनाती हो। हाँ ,चूँकि हमारा देश कृषि प्रधान देश है और आधा से ज्यादा आबादी कृषि से जुड़ी है,अतः इसकी बेहतरी के लिए सरकार एवं समाज के अन्य वर्गों द्वारा सर्वाधिक ध्यान  देने एवं सुविधाएँ बढ़ाने की अपेक्षा है।यदि तकनीक ,ऋण ,बिजली ,सिंचाई ,कृषि बीमा ,खाद ,बीज ,उत्पाद विपणन व  भण्डारण के साथ किसानों को नियमित विशेषज्ञ परामर्श की सुविधा मिलती रहे तो पारिवारिक ,सामाजिक एवं राष्ट्रीय दायित्व निर्वाह के लिए उसे अग्रिम पंक्ति में खड़ा दीखना चाहिए। उपभोक्तावाद के चलते विलासिता की वस्तुयें भले ही आज किसानों के लिए भी अपरिहार्य हो गई हैं परन्तु एक किसान को ऐसी इच्छा पूर्ति के लिए कभी भी फसली ऋण नहीं लेना चाहिए और हर हाल में अपनी रफ एवं टफ की छवि बनाये रखना चाहिए। स्व लाल बहादुर शास्त्री जी द्वारा दिया गया 'जय जवान -जय किसान 'का नारा किसानों को भी बहुत गहरा सन्देश देता है।एक किसान की जो छवि लोगों की दिलों में है ;उससे विरत होने पर आज उनकी गरिमा खण्डित हो रही है।
*************** किसान और किसानी को वर्तमान पड़ाव तक पहुँचाने वाले निमित्तों की जानकारी हेतु  उनसे जुड़ी मूल बातों पर ध्यान देना सन्दर्भ सहायक होगा।यथा साधरणतया खाद्यान्न, तेल ,मसाले, दूध  ,फल -सब्जी,गन्ना ,कपास इत्यादि  के उत्पादन ,पशुपालन ,बागवानी व उनसे जुड़े अन्य विविध क्रियाकलापों को खेती या किसानी तथा इन कामों में लगे लोगों को खेतिहर या किसान कहते हैं और खेती का सीधा सम्बन्ध खेत या जमीन से होता  है।फिर बात जब खेत और किसान की की जाय तो जहाँ हमारे देश में खेती योग्य जमीन घट कर आधी से भी कम बची हैं ,वहीँ सारे विकास और औद्योगीकरण के बाद भी कृषि पर निर्भर कुल जन संख्या देश की पूरी जनसँख्या की आधा से अधिक है।आज की स्थिति यह है कि आबादी के बढ़ते और परिवारों के बँटते तीन चौथाई से अधिक किसानों के पास चार बीघे या उससे कम कृषि योग्य जमीन बची हैं। इतना ही नहीं ,गाँवों में देश के सर्वाधिक बेरोजगार बसते हैं और वे भी अपने परिवारिक कृषि से जुड़ जाते हैं। ऐसे में लघु और सीमांत स्तर की खेती व इससे जुड़े अन्य उद्यमों में इतनी उत्पादकता शेष नहीं है कि इतनी बड़ी जनसँख्या को समाहित कर उपभोक्तावादी खुशियाँ सुनिश्चित कर सके।यह भी तथ्य कान खड़ा करने वाला है कि इतनी बड़ी मात्रा में मानव संसाधन एवं कृषि भूमि खपने के बाद भी भारत की कुल सकल घरेलू उत्पाद में कृषि क्षेत्र का योगदान सप्तमांश के आस पास ही है। संकेत स्पष्ट है कि कृषि क्षेत्र में सराहनीय प्रगति के बावजूद विगत वर्षों में योजनाकारों ने इस क्षेत्र की सारी समस्याओं एवं भावी परिदृश्य पर ध्यान नहीं दिया।उल्टे वोट की राजनीति ने इन समस्याओं और अनुचित प्रलोभनों को सत्ता पाने का हथियार बना डाला।परिणाम सामने है। राजनीति से सुचिता गई और कृषि की मर्यादा डगमगाई ।
***************यदि राजनीति एवं अनुचित लोभ को अलग रख कर देखा जाय तो देश की प्रगति  में अद्वितीय योगदान के लिए  हर देशवासी को  किसानों पर सदैव गर्व  रहा है।ये किसान ही हैं जिन्होंने खाद्यन्न के लिए देश को आत्मनिर्भर ही नहीं निर्यातक भी बनाया। उनके ही पसीने से जहाँ उत्पादन में कई  गुणा बढ़ोत्तरी हुई वहीँ कृषि में नए -नए अवसर व विविधताएँ जुड़ी। भविष्य में इनके और बढ़ने की अपार  संभावनाएं हैं।एक समय था  जब खाद्यान्न की कमी के कारण देशवासियों से सप्ताह में एक दिन अन्न न खाने की अपील हुआ करती थी तथा पी एल चार सौ अस्सी के अंतर्गत आयातित गेहूँ ,मक्के के आटा पाने को भागम -भाग मचती थी ,आज उसी भारत के गोदामों मेँ पड़े अधिशेषों  का निष्तारण कठिन हो रहा है। इसका सम्पूर्ण श्रेय दीर्घावधि की हरित व श्वेत क्रांति जैसी सफल योजनाओं एवं हमारे कृषकों को ही जाती है। आज उन्नत कृषि का वह दौर है जब हमारे राज्यों में  कृषि उत्पादन बढ़ाने व किसानों की कमाई बढ़ाने की होड़ मची है और मध्यप्रदेश जैसे राज्य अधिक उत्पादन से उपजी समस्या झेल रहे हैं क्योंकि कृषकों के उत्पाद खरीदने वाले नहीं मिल रहे हैं। आपूर्ति बढ़ रही है परन्तु माँग परंपरागत एवं पूर्ववत है।फसल न बिकने ,उचित मूल्य न मिलने या फसल वर्बाद होनेसे ऋण लेने वाले किसान बैंकों को ऋण की अदायगी नहीं कर पा रहे हैं ,जिस कारण तनावग्रस्त हो रहे हैं।यही समस्यायें किसानों को आत्महत्या या आंदोलनों के लिए प्रेरित कर रही हैं।परन्तु स्वभावतः कठिनाइयों से जूझने वाले किसान, जिनसे संयम ,साहस और सहनशीलता भी परिभाषित होते रहे हों ,उनका उद्वेलित होना , हिंसात्मक आंदोलन पर उतरना,ऋण माफ़ी जैसा प्रगति विरोधी माँग करना या अवसादग्रस्त हो आत्महत्या करना सबको चौंका रहा है। कहाँ हैं स्व मैथिली शरण गुप्त की कविता में वर्णित किसान --
---------------------------------घनघोर वर्षा हो रही है ,गगन गर्जन कर रहा 
----------------------------------घर से निकलने को गरज कर ,वज्र वर्जन कर रहा 
----------------------------------तो भी कृषक मैदान में करते निरंतर काम हैं 
----------------------------------किस लोभ में वे आज भी,लेते नहीं विश्राम हैं  
 ***************  समय का निर्देश है कि आमदनी  के लिए किसानों द्वारा उपजाई पैदावार की शत प्रतिशत एवं उचित मूल्य पर त्वरित विक्री सुनिश्चित हो साथ ही उनके फसल ,पशुधन व बाग -बगीचों की व्यावहारिक एवं प्रचुर बीमा हो।शत प्रतिशत खरीद या खपत तभी सम्भव हो सकती है जब बहुत बड़े स्तर पर भण्डारण ,संरक्षण ,प्रसंस्करण और उत्पाद विविधीकरण हेतु उद्योगों की श्रृंखला स्थापित हों।कृषि उत्पादों को देश के एक कोने से दूसरे कोने तक त्वरित पहुँच के लिए एक अलग विशेष यातायात संजाल  की स्थापना भी समस्या समाधन की अनेक उपायों में एक है। इन नई आवश्यकताों से उपजी कृषि क्रान्ति को धरातल पर उतारने का समय है और सरकारें भी इसके लिए गंभीरता से आगे बढ़ रही हैं।देश की कृषि पर आधारित आबादी कितनी भी बढ़ जाय ,हमारी जोत जमीन की उर्वरा शक्ति एवं जलवायु की विविधता सबको समायोजित करने एवं खुशहाल रखने की सामर्थ्य रखती हैं। आवश्यकता है तो मात्र कुशल प्रबन्धन ,संयम एवं सही दिशा की।समस्याओं से अवसर पैदा होते है।अतः धैर्य पूर्वक समस्याओं से जूझना चाहिए। आत्महत्या कर अपने परिवार को बिपत्तिओं में झोंक जाना या हिंसा कर किसी और का घर उजाड़ देना,अथवा देश की सम्पत्तिओं को छति पहुँचाना, हमारे अन्नदाता किसान का चरित्र नहीं हो सकता है। ऐसे में विचारणीय है कि कहीं छद्म किसानों ने तो किसान आंदोलन नहीं खड़ा किया है या कृषक बन कर इतर लोग तो बैंकों से इतर उद्देश्यों के लिए ऋण ले- लिवा रहे हैं; फिर माफ़ी के लिए आन्दोलन चला रहे हैं।एक बार ऋण माफ़ी हो भी जाय तो क्या इसकी पुनरावृत्ति हो सके गी ? नीर क्षीर विलगाव न होने से यह बात आम हो रही है कि किसान भी बदल गए।---------------------------------------------------------मंगल वीणा
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वाराणसी ,दिनाँक 4 जुलाई 2017                                              mangal-veena.blogspot.com
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शुक्रवार, 2 जून 2017

एक अशिष्ठता का अवसान

***************सच है भारत बदल रहा है।आदत के विपरीत सडकों पर बदला -बदला सा माहौल व यातायात की थोड़ी बढ़ी सुगमता अच्छी लगने के साथ अजीब लग रही है। ऐसा लगता है कि साहबों और सरकारों का रेला कहीं बाहर गया है।फिर याद आता है कि कर्मयोगी एवं योगी के सरकारों ने लाल ,नीली बत्ती और हूटरबाजी बन्द करा दिया है ;यह उसी का परिणाम है ! भला हो भारतीय जनता पार्टी के  सरकारों की , कि वे जनता द्वारा सत्ता सौंपे जाने पर जनता सी व्यवहार करते दीख रही हैं।सरकारें व उनके लोग लाल- नीली बत्ती व हूटर का त्याग कर जनता के सीने पर कोदो दरना बन्द कर दिए हैं ,यह मोदी सरकार के तीन वर्ष की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि है। इसके लिए वह शत प्रतिशत अंक पाने की हक़दार है।सिवा निर्णय के सरकार को कुछ खर्च करना नहीं पड़ा ,परन्तु इस निर्णय ने जनता के दिल को छू लिया। इसे कहते हैं हर्रे लगी न फिटकिरी ,रंग चोखा।
 *************** जिस लाल बत्ती को  नेता ,नौकरशाह या ओहदेदार अपनी हनक मानते रहे हैं और आम भारतवासी उनकी अशिष्ठता ;अंततः उनके अवसान की पटकथा लिख दी गई।हमारे देश में स्वार्थ सिध्यार्थी नेता और नौकरशाह जो हर अच्छे - बुरे हथकंडे अपना कर विशिष्ठ  होने का परम सुख पाते रहे हैं,वे जल के अभाव में मछली वाली तड़प की पास आती आहट सुनने लगे हैं। ये लोग आम आदमी सा होने की कल्पना मात्र से घबरा रहे हैं। इन्हें कौन समझाए कि इनकी  जीविका एवँ प्रत्यक्ष और परोक्ष  सुविधाएँ जनता से प्राप्त विभिन्न राजस्व से प्राप्त  होती हैं।अतः जनता उनसे सेवक सी भूमिका की अपेक्षा करती है न कि स्वामी सी।इससे बड़ी राष्ट्रीय विडम्बना क्या हो सकती है कि  स्वतंत्रता प्राप्ति से  आज तक ये अंग्रेजों के देशी संस्करण वाले लोग स्वामित्व का सिकंजा कसते हुए वीआईपी वाली रौब तले देश को लूटते गए जब कि आम जनता इनसे बेहद घृणा करते हुए भी इनकी चरणपादुका ढोने को मजबूर होती रही। इस उलट आचरण और मानसिकता वाले मिथक को तोड़ने में सात दसाब्दी बीत गए ,तब  कहीं जा कर यह अति  विशिष्ठ या स्वामी भाव वाली अहंकारी दीवाल दरकी है।याद रखना होगा कि यह मात्र शुभारंभ है न कि शुभांत।  इसे पूर्ण रूप से ध्वस्त होने में सुधार वाले ढेर सारे हथौड़ों की आवश्यकता होगी जब कि वीआईपी होने का सुख लूटने वाले इसे आसानी से ढहने नहीं देंगे।
***************यह सर्व विदित है कि भारत में दुनियाँ के किसी भी देश से अधिक वीआईपी हैं जिनकी सुरक्षा एवँ सुविधाएँ राजाओं जैसी हैं। देश से राजशाही तो सरदार पटेल के सौजन्य से चली गई परन्तु अनुवादित अति विशिष्ठवाद  ने अपनी जड़ें और जमा लीं। संसाधन, सुरक्षा , सुविधाओं एवँ विकास पर पहला हक़ इनका बन गया और जो शेष बच गया वह जनता का।इस नवोदित राजशाही के चलते ही लोकतंत्र में लोक उपहास का भारत अप्रतिम उदहारण बना और इसके चलते ही देश का अपेक्षित विकास सदैव वाधित रहा।परन्तु हर आम भारतीय के लिए आदर्श सत्य यह है कि लोकमत से इतर यह संस्कृति हर रूप में अशिष्ठ एवँ भ्रष्ट है। एक उदहारण से इसे समझा जा सकता है कि जब आम आदमी के साथ कोई घटना घट जाती है तो पुलिस को मात्र  घटना स्थल तक  पहुँचने  में घंटों लग जाते हैं जब कि दर्जनों की संख्या में ये पुलिस वाले हर वीआईपी को सुरक्षा देने के लिए उन्हें चौबीस घण्टे घेरे रहते हैं।यह मान्यताप्राप्त भ्रष्टाचार और अशिष्ठता नहीं तो और क्या है। ऐसी ही अनगिनत सुविधाएँ हैं जो सरकारों ने इनके कदमों में बिछा रखी हैं और हर नई सरकार इनके लिए कुछ न कुछ नई सुविधा बढ़ा जाती है।
***************ज्यादा दिन बीते नहीं हैं ;नई सरकार के केंद्र में सत्तारूढ़ होने के बाद डीजीसीए ने प्राइवेट एयरलाइन्स द्वारा वीआईपी को विशेष आतिथ्य एवँ सुविधा देने का एक निर्देश निर्गत किया था। चूँकि निजी एयरलाइन्स सभी टिकट धारकों को सामान शिष्टाचार व सामान व्यवहार देती रही,इसलिए उन्हें अति विशिष्ठों के सामने एयर इंडिया के महाराजा की भाँति झुकना आवश्यक था।अतएव निर्देशित किया गया कि जब कोई सांसद यात्री रूप में आयें उन्हें द्रुत गति से सुरक्षा जाँच ,लाउन्ज पहुँच ,फ्रिल नहीं ,चाय -कॉफी और प्रोटोकॉल के अनुसार सौहार्द सुलभ कराया जाय ताकि वहाँ भी इन आधुनिक सामंतों के शान -शौकत एवँ रुतबे का प्रदर्शन शेष यात्रियों एवँ उपस्थित कर्मियों के बीच हो सके।वरन जब सभी यात्रियों के पास  यात्रा टिकट है ,निर्धारित  सीट संख्या है और सबको यात्रा में दी जाने वाली सुविधाएँ निर्धारित हैं फिर विशिष्ठता क्यों।बात नेताओं तक ही नहीं है। नौकरशाहों के लिए तो ये एयर लाइनें या अन्य जन सम्पत्तियाँ  उनकी निजी संपत्ति सी हैं। कभी किसी सम्बन्धित कर्मी से बात कर ये आतंरिक बातें जानी जा सकती हैं।
***************तीसरा उदहारण लें। गरमी का दिन और पानी की कमी है। लोग विधायक ,सांसद के पास उनके कोटे से एक  हैण्डपम्प पाने के लिए दौड़ रहे हैं। यह भिखारी बनाने वाली  बात ही तो है।ये नेता, नेता निधि और फरियाद क्यों ?केवल अति विशिष्ठवाद। इच्छा शक्ति हो तो  इन कार्यों के लिए एक विशिष्ठता और चाटुकारिता विहीन सुन्दर माँग व्यवस्था बनाई जा सकती है।कमाल है पैसा जनता का और निधि सांसदों एवँ विधायकों की।वस्तुतः यह विशिष्ठवाद से उपजी आम जन की व्यथा कहानी अन्तहीन है।राम चरित मानस में सीताहरण के बाद अशोक वाटिका में निरुद्ध जानकी की  मनोदशा का वर्णन ,सीता माता का पता लगा कर लौटे। हनुमान ने प्रभु राम से यह कह कर किया था "सीता कै अति बिपति विसाला। बिनहि कहे भलि दीनदयाला। "आज भी स्थिति हूबहू वैसी ही है।  हम जिसे आम जन कहते हैं उनके अंतहीन कष्ट का तथा जिन्हे हम वीआईपी कहते हैं उनकी अशिष्टता , भ्रष्टाचारिता  एवँ  विलासिता का वर्णन कठिन है।यही कारण है कि मोदी सरकार द्वारा वीआईपी संस्कृति के विरुद्ध उठाये पहले कदम की जनता भूरि -भूरि प्रसंशा कर रही है और इस संस्कृति के समूल नाश की आशा बाँध रही है।
***************आशाएं नहीं मरीं। हमारी न्यायपालिका को इसका सर्वाधिक श्रेय जाता है।समय समय पर वह सरकारों व अति विशिष्ठ जनों को लोकतंत्र का आईना दिखाती रही है और अन्यायपूर्ण कृत्यों के विरुद्ध निर्णय तथा लताड़ देती रही है।इसके विपरीत दूसरी ओर सरकारों व विशिष्ठ जनों के घालमेल से अति विशिष्ठता के नए नए आयाम और रास्ते भी बनते रहे हैं।समय अनुकूलता का शुभ संकेत दे रहा है कि जनता और सरकारों का घालमेल बढ़ रहा है। जो जनता है वही सरकार है। फिर अति विशिष्ठ कौन ,क्यों और किस लिए ?एक झटके में अति विशिष्ठता रूपी सामाजिक अशिष्ठता एवं भ्रष्टाचारिता का अवसान करना होगा। चाहे राष्ट्रपति हों या प्रधान मंत्री ,सांसद हों या विधायक ,भारतीय प्रशासनिक सेवा के हों या राज्य सेवा के ,इतर कर्मी हों या चतुर्थश्रेणी के ,सबको जनता और देश सेवा में उनके योगदान के सापेक्ष सुवधाएँ ,सुरक्षा व सम्मान मिलना चाहिए।  जब कर्तव्यनिष्ठ सेवकों द्वारा  देश और जन की हो रही सेवा का पारदर्शी समानुपातिक संबन्ध उन्हें दी जाने वाली सुविधाओं से बना दिया जाय गा,तब एक भारत एवं विश्वश्रेष्ठ भारत दुनियाँ के सामने होगा। जनता मालिक होगी और उसे अपने सेवकों पर गर्व होगा।अपसंस्कृति से मोहभंग करते हुए जनहितकारी कठोर निर्णय का समय है ताकि एक सभ्य समाज का उदय हो। सही समय पर सही निर्णय न लेने पर संदर्भित समय त्रुटियों वाले  काल खण्ड की सूची में चला जाता है।इतिहास का यही चक्र है। -------------------------------------------------------------------------------------------मंगलवीणा
वाराणसी ,दिनाँक 7 जून 2017------------------------mangal-veena.blogspot.com
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अंततः
उफ़ गर्मी।
 इस ग्रीष्म ऋतु में प्रलयंकरी गर्मी ने सर्वत्र हाहाकार मचा दिया है। नदी ,बाँध ,तालाब ,कुँए सभी पानी के लिए तरस रहे हैं ,फिर आदमी ,जीव -जन्तु व पंछियों की प्यास  कैसे बुझे ?बिन पानी सब सून। समाचार पत्रों और इलेक्ट्रानिक मिडिया के माध्यम से मौसम विज्ञानी ग्रीष्म की निष्ठुरता व उसके कारणों की नित्य जानकारी दे रहे हैं।अब आइए कुछ हिंदी कवियों की दृष्टि से इस ताप को देखा जाय। यथा -
जाने क्या हुआ कि सूरज इतना लाल हुआ
प्यासी हवा हाँफती फिर -फिर पानी खोज रही
सूखे कण्ठ कोकिला ,मीठी बानी खोज रही
नीम द्वार का छाया खोजे, पीपल गाछ तलाशें
नदी खोजती धार, कूल कब से बैठे हैं प्यासे
पानी पानी रटे रात -दिन, ऐसा ताल हुआ। जाने क्या हुआ ----डा.जगदीश ब्योम
ग्रीष्म की लय में बढ़ते हुए अब बदलाव की प्रतीक्षा करनी चाहिए। अश्विन गाँधी के शब्दों में -

यह सब कुछ याद रहे
मौसम का साथ रहे
ग्रीष्म ऋतु भी जाएगी
फिर रहे गी प्रतीक्षा 

अगले मौसम की----- 
बहार की-------
***************तब तक हम सबका सर्वोच्च कर्तव्य है कि पानी बचाएँ और प्यासों को पानी उपलब्ध कराएँ।एक प्यासे पँछी को भी यदि हम पानी पिला पाए तो यह सृष्टि की बड़ी सेवा होगी।---------------------------------------------------------------------------------------------------- मंगलवीणा
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सोमवार, 8 मई 2017

शादी समारोह


 *************** हाल मे दो एक संबंधियो के यहाँ आयोजित विवाहोत्सव मे निमंत्रण के कारण सम्मिलित होना पड़ा । समझ मे नही आया कि अब लोग निमंत्रण देते क्यों हैं?यदि किसी आयोजन मे  परंपरा,व्यवस्था ,संचालन एवं समयबद्धता संभव न हो तो ऐसे आयोजन मे  इन मान्यताओं के पथिकों  को आमंत्रित करना क्या उन्हे पीड़ा पहुंचाना नहीं है ?शुभ कामनाएं  एवं आशीर्वाद बटोरने के तो अब बहुत सारे सस्ते माध्यम सुलभ हैं और वे प्रयोग में लाये जा सकते हैं।
***************अपनी परंपरा जब विक्रित हो रही हो , अन्य  समाजों की कुछ अच्छी बाते लोग क्यो नही आचरित करते ? ध्यान देना चाहिए कि हर कृत्य किसी को आकर्षित तो किसी को विकर्षित करता है ।अतः खुशियो केलिए आकर्षण को ही चुनना चाहिए ।विकर्षण की अनुपस्थिति अप्रिय टिपण्णी की संभावना से बचाती भी है।बीते दिनों की मान्यता थी -अतिथि देवो भव।लगता है कि  आज की मान्यता है अतिथि दासो भव,तदकर्मं कुरु ।  ----------------------मंगलवीणा
वाराणसी ;दिनांक 09 . 05 . 2017 

मंगलवार, 4 अप्रैल 2017

कर्मयोगी से योगी तक

***************युवा भारत की नई सोच की बलिहारी कि देश को पहले प्रधान मंत्री के रूप में एक कर्मयोगी मिला फिर विश्व को योग दिवस मिला और अब राम कृष्ण की धरती को एक योगी। निःसंदेह ये सारी उपलब्धियाँ देश के नव जागृति क्रम में हो रही हैं। सन दो हजार चौदह में भारत में संपन्न हुए लोकसभा से अभी तक संपन्न हुए विधान सभा के चुनावों का  यदि सूक्ष्म विश्लेषण किया जाय तो ये युगान्तक घटनायें ही स्थापित नहीं होती हैं ,वरन आर्यावर्त में आगामी संभाव्य दृश्यावली भी लगती हैं। सोच बदलाव का ऐसा दौर चला है कि धर्मनिरपेक्षता ,अल्पसंख्यक ,पिछड़ा ,मुस्लिम आदि जैसे नारे, जो सत्ता पाने के लिए ब्रह्मास्त्र माने जाते थे,सब भोथरे हो गए। तुष्टीकरण रसातल में मिल गया।सच है, भारत नए युग में प्रवेश को मचल रहा है वरन मुस्लिम मतदाता जो भारतीय जनता पार्टी एवं इसके विचारधारा का पारंपरिक धुर विरोधी रहा है ,इसे विजय के लिए मतदान न करता।जनमत ने सीधा संकेत दिया है कि प्रगति और विकास के लिए आतुर भारतवासी को सरकार के रूप में उसे पोषक शासन चाहिये न कि शोषक।ऐसा लगने लगा है कि जो शोषक तथा विकास के बाधक बनें गे उन्हें नाकारा ही नहीं जाय गा बल्कि जनता के पैसे के दुरुपयोग के लिए कठघरे में भी खड़ा होते देखा जाय गा।भारत की बढ़ती आर्थिकशक्ति,राजनीतिक दक्षता व जनता को प्रदत्त बेहतरी से पडोसी देश भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकेंगे।ऐसे में आगे चल कर आर्यावर्त या वृहद् भारत विश्व पटल पर उभर सकता है।
***************आज के पड़ाव पर पहुंचने से पहले भारतीय लोक तंत्र की यात्रा कुछ यूँ हुई। आजाद भारत के तत्कालीन स्वप्न द्रष्टा नेताओं ने अपने सपने के भारत अभ्युदय के लिए उस समय गाँधी विचार तले दो सर्वोच्च संवैधानिक व्यवस्था समाज को दिया। उनमें पहली थी धर्मनिरपेक्ष लोकतान्त्रिक व्यवस्था व् दूसरी थी सामाजिक रूप से दलितों एवं पिछड़ों को आरक्षण की व्यवस्था।समय के साथ जैसे -जैसे हमारा लोकतंत्र आगे बढ़ा ,नेताओं ने इन ब्यवस्था की बहुमत के लिए ऐसी कुब्यवस्था कर डाली कि पूरा देश वर्गवाद ,धर्मवाद ,संख्यावाद,क्षेत्रवाद  व् जातिवाद में बँटता गया और इन गोलबन्दी के बाहर बचे देशप्रेमी हिन्दू उपेक्षा के शिकार होने लगे। अल्पसंख्यकों एवं अनुसूचित जातियों की बात कर कुलीन कांग्रेसी लंबे समय तक नेहरू परिवार को सत्ता पर बैठाये रहे। इस बीच हर उभरते वाद में नए स्वयं स्थापित नेतृत्व पैदा हुए और बंदरबाँट की सरकारें बनने लगीं। नेताओं का परम धर्म सरकार बनाना  और अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए सरकार बनाये रखना हो गया।वंशवाद ,भ्रष्टाचार और सामाजिक विघटन विशाल बट बृक्ष होते गए। यह गौण हो गया कि सरकारें बनाई क्यों जाती हैं। साधन को साध्य बनते देख आम लोग भौंचक थे। सब कुछ ऐसा था जैसे आदमी अपनी आवश्यकता एवं इच्छा पूर्ति के लिए पैसे न कमा कर मात्र पैसा संचय के लिए पैसा कमाये । थक हार कर जनता  ने मन बना लिया कि मृग मरीचिका का छलावा देने वालों को बता दिया जाय कि यह जनता है जो सब जानती है।
***************बढ़ती शिक्षा ,वैश्वीकरण ,सोशल व् इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़ाव तथा विदेशों के साथ बढ़ते आवागमन से देश में नव जागरण की हवा प्रबल हुई। लोग जान पाए कि क्षमता के बावजूद  देश विकसित क्यों नहीं हो पा रहा है।लोग जान पाए कि देश से बाहर एक भारतीय; चाहे हिन्दू हो ,चाहे मुसलमान हो या कोई अन्य  धर्मावलंबी; की पहचान कैसे होती है और उसी भारतीय की  देश के अन्दर कैसी पहचान बताई जाती है।इन प्रश्नों के मंथन से ही सारे जन मन विरोधी दल नकारे जा रहे हैं और कभी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद तथा  हिन्दू गौरव के लिए हाशिये पर रखी गई पार्टी आज नव जागरण की जन वाणी बन गई।भारत के हर नागरिक की बिना लाग लपेट यह अपेक्षा है कि उसे बेहतर से बेहतर शिक्षा ,स्वास्थ्य सेवा ,सड़क ,सुरक्षा ,शिष्टाचार तथा साथियाना अवसर मिले।साथ ही साथ सरकारें विश्व पटल  पर भारतवासियों को  भारतीयता और भारतीय संस्कृति अर्थात हिन्दू संस्कृति पर गौरवान्वित कराने वाली हों जैसे कि पूरे विश्व में प्रति वर्ष योगदिवस आयोजन से हमारी भारतीय संस्कृति गरिमामयी हुई है।हमारी हिन्दू संस्कृति ही हमारी विशिष्ठता  है जो वसुधैव कुटुम्बकं की बात करती है। अतः सबका साथ लेते हुए सबका आर्थिक ,सामाजिक और सांस्कृतिक विकास सुनिश्चित करना होगा।आज की सरकारों को यह हर पल याद रखना होगा कि जनता ने उन्हें जनता की सेवा करने के लिए सत्ता सौंपी है न कि जनता से सेवा कराने और अति विशिष्ठ बनने के लिए।वादों पर मुहर लग चुकी हैं ,अब परिणाम देने की बारी है।
***************नए नेतृत्व के सामने दो काम हैं। पहला है दिए गए दायित्व या मिशन को अक्षरशः बिना किसी किन्तु - परन्तु के पूरा करना तथा दूसरा है जनता की स्नायु को पकड़ना कि आगे वह सरकारों के लिए क्या लक्ष्य देने वाली है।मिशन और विज़न में कोई भी लोच हुआ नहीं कि  आगे का अवसर छिना। इतना इशारा काफी है कि अति विशिष्ठ संस्कृति ,काले धन  ,भ्रष्ट नौकरशाही ,नेताओं के अपार धन स्वामित्व ,माफियागिरी तथा कानून के गिरगिटिया रूप से जनता की घृणा अहर्निश बढ़ती जा रही है।शुभ संकेत यह है कि नव  जागरण का नेतृत्व योगियों के हाथ है जिनकी  कर्मयोग निष्ठा निर्विवाद है। नेतृत्व की अनुकूलता एवं प्रतिबद्धता से जनता की उम्मीदें अँगड़ाइयाँ लेने लगी हैं। अपेक्षा रहे गी कि उम्मीदें फलीभूत हों । ------------------------------------------------------------------मंगलवीणा
वाराणसी ;दिनाँक 4.4 . 2017
चैत्र शुक्ल अष्टमी मंगलवार संवत २०७४
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अंततः
सभी स्नेही पाठकों ,साथियों ,आलोचकों व् देशवासियों को मर्यादा पुरुषोत्तम राम के जन्मोत्सव राम नवमी की मधुमासी शुभ कामनाएं।
चूँकि मधुमास में ही लोग गर्मी से झुलसने लगे हैं ;आइये , त्रेता युग में रामजन्म के समय  अवध के जलवायु का तनिक सानिद्ध्य लिया जाय -
*****नौमी तिथि  मधुमास  पुनीता।सुकल पच्छ अभिजित हरिप्रीता।
*****मध्य  दिवस अति  सीत न घामा। पावन  काल  लोक  विश्रामा।
*****सीतल  मन्द  सुरभि  बह  बाऊ । हरषित  सुर संतन  मन चाऊ।
***** बन कुसुमित गिरिगन मनियारा।स्रवहिं सकल सरितामृतधारा।-------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------गोस्वामीतुलसीदास
अब मिल बैठ सब सोंचे कि वैसा मधुमास और वैसी परिस्थितियाँ कैसे अवतरित हों ?जलवायु और पर्यावरण को हमने ही तो वर्वाद किया।----------------------------------------------------------मंगलवीणा
वाराणसी ;दिनाँक 4.4 . 2017
चैत्र शुक्ल अष्टमी मंगलवार संवत २०७४ ------------mangal-veena.blogspot.com
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रविवार, 19 मार्च 2017

योगी को उत्तर प्रदेश की सत्ता

योगी आदित्य नाथ ने आज तक सार्वजनिक जीवन में जितना कार्य किया उसका फल उन्हे उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री के रूप मे मिला ।इसके लिए उन्हे हार्दिक बधाई ।अब उन्हे प्रदेश वासियों की अपेक्षा पर खरा उतरना होगा ।प्रदेश के अमन चैन, विकास और भाजपा के लिए जनाधार बढ़ाने की अब उनकी सीधी जिम्मेदारी होगी ।योगी पर योगेश्वर की कृपा हो।पूर्वाग्रह से टिप्पणी करना उचित नहीं है ।
सदियों से गुलामी के कारण हिन्दू बहुत दब्बू हो गये थे ।उन्हे उस मानसिकता से उबारने के लिए नव जागरण की नितांत आवश्यकता थी ।नई पीढ़ी के आते आते यह मिशन पूरा हुआ ।अब विकास की दरिया बहानी है और मोदी जी के नेतृत्व मे भारत को बहुत आगे बढाना है ।योगी जी के मूल्यांकन का समय शुरू होता है अब ।शुभ कामनायें ।----मंगलवीणा

शनिवार, 11 मार्च 2017

विनयी भव

प्रधान मंत्री जी एवं अग्रणी कार्यकर्ताओं के साथ - साथ भारतीय जनता पार्टी की अन्तिम पंक्ति में खड़े हम जैसे कार्यकर्ताओं के गिलहरी प्रयास ,भावना एवं शुभ कामनाओं को भी उत्तर प्रदेश के विधान सभा चुनाव में मनोबल बढ़ाने वाला सहकार मिला जिसके लिए हम सभी राष्टवादी विचार धारा वाले ईस्ट मित्रों को हार्दिक बधाई एवं शुभ होली सन्देश प्रेषित करते हैं। सबको गुझिया रूपी ख़ुशी की स्निग्ध मिठास मिले।--मंगला सिंह 


रविवार, 18 दिसंबर 2016

विकास कि बकवास

  ***********[नोटबंदी एवं संसद गतिरोध पर एक प्रतिक्रियात्मक लेख ]**********
*************** निश्चय ही हमारे देश का हर क्षेत्र में त्वरित विकास हो रहा है परन्तु  बकवास भी  बहुत अधिक एवं सर्वत्र हो रहा है। कहीं बकवास की विषयवस्तु के लिए राई जैसे विकास का पहाड़ सरीखा हो-हल्ला हो रहा है तो कहीं सराहनीय विकास पर भी बकवास हो रहा है। जहाँ हमारा सराहनीय विकास युवा संसाधन आधारित है वहीं इस युवा पीढ़ी को  यह भी अनुभूति होने लगी है कि अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए अधिकांश नेताओं  के बकवास  भी विकास में गतिरोधक बने हुए हैं।आज के भारतीय लोकतंत्र में बकवास के कोहरे से दूसरों द्वारा किये गए विकास की दृश्यता को धुंधला करना सरकारों व विरोधियों का परम ध्येय बन गया है। नेता तो मान कर चलते हैं कि जनता उनके स्वार्थीपन व छुद्रता को उतना नहीं जानती जितना वे हैं ,वही जनता है कि वह उनके रवा  -रत्ती जानने लगी है और उनसे उतनी ही घृणा करने लगी है।आम जन को यह पच नहीं रहा है कि देखते ही देखते बिना योग्यता एवं जिम्मेदारी के दौलत एवं दाम बटोरू इस नेतागीरी विभाग में इतने पद सृजित हो गये हैं कि जहाँ देखो वहाँ नेता।आज देश में कृषि के बाद नेतागीरी सबसे बड़ा क्षेत्र है जिसमें रोजगार की मनचाही संभावनायें हैं। चूँकि कमाई के बदले बकवास का उत्पादन इनका मुख्य काम है ,अतः बकवास का उत्पादन भी बुलंदियों पर है।
***************स्वतंत्र भारत के अभिलेखों में प्रमुखता से उद्धरणीय एक निर्णय,वर्तमान सरकार द्वारा लिया गया , नोटबन्दी का निर्णय है जिसके फल प्रतिफल पर गहन विमर्श की आवश्यकता है। ऐसे दूरगामी परिणाम देने वाले निर्णय ,जिनका व्यापक प्रभाव राजा से रंक तक सब पर पड़ता है,  किसी राष्ट्र में कभी -कभार होते हैं ।एक ईमानदार प्रधान मंत्री पर विश्वास कर राष्ट्र बेहतरी के लिए जनता मुद्रा संकट से जूझ रही है परन्तु इसके इतर स्वार्थी तत्व एवं विरोधी नेता इस पहल को निष्प्रभावी ही नहीं दुष्प्रभावी करने के लिए बकवास पर बकवास की झड़ी लगाए हुए हैं। ऐसा भी नहीं है कि जनता नोटबन्दी के आसन्न परिणाम पर सशंकित नहीं है या वह जानना नहीं चाहती है कि वस्तुतः इस अग्नि परीक्षा के परिणाम क्या मिलें गे। सबकी  अपेक्षा थी कि देश की शीर्ष सभा" भारतीय संसद" के अभी बीते सत्र में माननीय बन चुके नेतागण इस विषय पर व्यापक बहस करेंगे और जनता के शंकाओं का समाधान हो जाय गा। परंतु हुआ क्या -जनता के करोड़ों रुपये की छति के बदले मिला सिर्फ बकवास ,बकवास और बकवास। संसद में विरोधी दल के सांसदों ने जो गैर जिम्मेदार आचरण किया उससे प्रधान मंत्री में जनता का विश्वास और दृढ हो गया ।यदि ये माननीय लोग निर्लज्ज न होते तो जितने दिन सदननहीं चला उतने दिन का वे वेतन ,भत्ता नहीं लेते  और शेष बचे क्षति की भरपाई  आपसी अंशदान से कर देते। परन्तु ऐसा होगा नहीं क्योंकि आज के अधिकांश नेता निर्लज्ज हैं और उनका नैतिकता से कोई मतलब नहीं।
***************इतना ही नहीं इस बकवास की माया यहाँ वहाँ सर्वत्र है। व्यवस्था ,जिसके कन्धे पर नोटों के बदलने की जिम्मेदारी थी ,ने भी इस क्रियान्वयन को चोट पहुँचाया।पिछले दरवाजे से  काले धन वालों के पास नए नोटों के खेप पहुंचने लगे और उनके पुराने नोट बैंकों में भरने लगे। जनता बैंक के द्वारों पर भिखारी की तरह खड़ी रही और बैंकरों की ओर देखती रही।  काले धन के पोषक नेता लोग उनके धैर्य पर नमक छिडकने और उन्हें भड़काने का प्रयास करते रहे।जब बैंकों की सत्यनिष्ठा के बिपरीत आचरण की गतिविधियाँ सरकार के संज्ञान में आईं और मीडिया तथा समाचारपत्रों ने उजागर करना शुरू किया तो फिर सिद्ध हुआ कि हमारी ब्यवस्था भी बकवास हो चुकी है।इतना ही नहीं विभिन्न चैनलों पर माँगी मुराद पाए अनेक स्वयं भ्रमित विशेषज्ञ तो बकवास की ताताथैया करने लगे हैं।जनता मीडिया को बहुत पसन्द करती है ,अतः उन्हें बकवास परोसने वालों से दूर रहना चाहिए।परिवर्तन के वर्तमान दौर में तंत्र के इस चौथे स्तम्भ मीडिया से जनता को बहुत अपेक्षा है। आशा कि जानी चाहिए कि जनता के धैर्य और मीडिया के आईना से व्यवस्था को सन्देश मिले गा और वे जनाकांछा के अनुरूप व्यवहार करें गे ताकि भविष्य में उनके विरोध में उठनेवाली हर चर्चा को बकवास कहा जा सके।
***************रही बात विकास की। तो विकास वही जो जनता के द्वार तक पहुंचे न कि वह जिसे जनता के मन ,मस्तिष्क में विज्ञापनों व शोरगुल द्वारा बैठाया जाय। यदि कोई विकास का कार्य होता है तो वह दिखता है, जनता को उसे मिलने की सुखद अनुभूति होती है ,उसके जीवन में बेहतरी आती है और देश प्रगति पथ पर आगे बढ़ता है।अतः प्रचार -प्रसार के बल पर जनता को विकास जताना भी बकवास है।अभी उत्तर प्रदेश ,पंजाब आदि राज्यों में चुनाव निकट हैं। जो दल सत्ता में हैं वे अपने द्वारा किये गए झूठ -सच विकास कार्यों की ढफली बजाने लगे हैं और उनके विरोधी दल उसे  झूठ तथा धोखा बताने लगे हैं।  सरकारें ऐसे भी विकास कार्यों की गिनती करा रही हैं जिनको ढूंढना होगा कि कहाँ हुआ ,कितना हुआ ,कब हुआ और किसका लाभ हुआ। मेनिफेस्टो की तो बात करना भी बकवास है।फिर भी विभिन्न नेता संगठनों का प्रयास होगा कि किसी तरह उनका सम्मोहन जनता पर चल जाय और सरकार बन जाय। फिर तो पाँच वर्ष के लिए वे ही माननीय ,उन्ही की दौलत उन्ही की सोहरत और वोट देने वाली जनता उनके लिए बकवास।उलझन तो यह रही है कि बकवासी जनता के बीच से उपजते हैं और वे विधायिका ,कार्यपालिका ,न्यायपालिका को भी अपने लायक बनाने का प्रयास करते रहते हैं इसीलिए उन्हें घेरने के सामान्य फंदे कमजोर पड़ते हैं और देश का विकास वाधित होता है।जो हुआ सो हुआ ;उलझन सुलझाने का समय आ गया है कि विकास विरोधी नेताओं एवं दलों को नैपथ्य में भेजा जाय। मोदी सरकार को जनता ने इसी लिए सत्ता सौंपी है कि तीनों तंत्रों में जितने भी छिद्र हैं उन्हें सख्ती से बंद कर दिया जाय ताकि लुटेरे कहीं से भाग न सकें।
***************हमारा देश बदल रहा है ।अब न तो जनता बकवास कहलाने को ,न सुनने को और न ही देश द्रोहियोँ को केवल बकवास कह कर छोड़ने को तैयार  है।इक्कीसवीं सदी भारत की है।सुयोग से प्रधान मंत्री श्री मोदी के सारथीत्व में  देश के करोड़ों युवाओं की  ऊर्जा  विकास रथ को आगे बढ़ाने में लग गई है।बकवास रूपी प्रतिरोध से गति धीमी करने का प्रयास हो रहा है और होगा परंतु इस चुनौती का अवसर में बदल जाना तय है।बैंकों और एटीएम के बाहर पंक्तियों में खड़े लोगों ने मोदी -मोदी का उद्घोष कर  विरोधी  नेताओं ,भ्रष्टाचारियों ,काले धन स्वामियों तथा देशद्रोहियों को स्पष्ट संदेश  दे दिया है कि वे राष्ट्र हित के लिए मोदी जी के साथ हैं और इससे भी बड़ी चुनौतियाँ लेने को तैयार हैं।उन्होंने बकवासियों को यह भी पूर्वाभास कराया है कि वे या तो विकास के साथ होलें या मिटने का मन बना लें।मोदी जी भारतीय जनाकांछा  की उपज हैं। मोदी मिशन में ही जन -जन की खुशहाली ,एवं देश के सर्वांग  विकास  की प्रबल संभावनाएँ हैं। सभी को स्वच्छ मन ,वाणी और कर्म से इस हवन में आहुति देना होगा।परिणाम में विकास और खुशहाली की ऐसी घटाटोप वर्षा होगी कि देशवासियों का मनमयूर नाच उठेगा और सबसे आगे होंगे भारतवासी। आइए हम भारत वासी मोदी जी के सारथीत्व में देश को विश्व के  पाँचवीं आर्थिक शक्ति से प्रथम आर्थिक शक्ति बनाने का तथैव संकल्प लें।
वाराणसी ;दिनाँक 20 दिसम्बर 2016                                                         मंगलवीणा
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गुरुवार, 1 दिसंबर 2016

सर्जिकल स्ट्राइक कि बोरोप्लस

***************इतिहास का यही क्रम है कि वर्ष के बाद वर्ष अपने विशिष्ठ पहचान के साथ इसके पृष्ठों  में जुड़ते जाते हैं और उसी विशिष्ठिता से वे याद किये जाते हैं। कुछ ऐसे ही,भारत के इतिहास में वर्ष दो हजार सोलह ईयर ऑव सर्जिकल स्ट्राइक के नाम से जाना जाय गा। इस अस्त्र का पहला प्रत्यक्ष प्रयोग भारतीय सेना के रणबाँकुरों ने, पिछले वर्ष दस मई को,सीमा से सटे म्यांमार में किया जब वे मणिपुर में सक्रिय रहे डेढ़ सौ से अधिक आतंकियों को रात के चंद घण्टों में मौत की नींद देकर सकुशल वापस आ गए। इस सर्जिकल स्ट्राइक की देश में बड़ी वाहवाही भी हुई परंतु वर्तमान वर्ष में तो हमारे देश में सर्जिकल स्ट्राइक ने धूम मचा दिया ।पूरे विश्व का ध्यान उभरते भारत की ओर तब खिंचा जब उन्तीस सितम्बर को  वर्तमान दृढ़निश्चयी सरकार क़ी अपेक्षा के अनुरूप उच्च मनोबल वाली पेशेवर भारतीय सेना ने पाकिस्तान के अंदर घुस कर आतंकियों एवं पाकिस्तानी सैनिकों पर आशातीत सर्जिकल स्ट्राइक कर दिया। भारतवासियों ने झूम कर दीपावली सा उत्सव मनाया।पाकिस्तान की हेकड़ी चूर हुई तो भारत के नेतृत्व व सैन्य दक्षता को पूरे विश्व में सराहा गया। विपक्षी दलों को सरकार के लिए जनता द्वारा की गई सराहना रास नहीं आई। काँग्रेसियों ने तो यहाँ तक कह डाला कि उनके शासन काल में सेना ने ऐसे बहुत सारे सर्जिकल स्ट्राइक किये थे लेकिन उन्होंने कभी इन्हें सार्वजानिक नहीं किया।पुनः दीपावली बीतते ही आठ अक्टूबर की सांझ को भारत में आर्थिक मोर्चे  पर  एक  दूसरी ऐसी सर्जिकल  स्ट्राइक  हुई  कि  काले   धन  वाले, नेता,ठेकेदार, अभियंता,अधिवक्ता, चिकित्सक , व्यापारी ,नौकर शाह ,नक्सली ,आतंकी ,रियल इस्टेट,इत्यादि के कारोबारी एक साथ धराशायी हो गए। दूसरे दिन प्रातः देशवासियों ने क्षितिज से नए भारत को उगते देखा।
***************तब से जनता बैंकों व एटीएम मशीनों के सामने पैसे के लिए घण्टों कतार में खड़ी हो रही है।परन्तु इस स्ट्राइक से जनता इतनी प्रसन्न है कि कतार में लगने से कोई थकान ही नहीं। कतार में खड़े -खड़े वे कभी मोदी जी की सराहना करते हैं तो कभी मोदी -मोदी के नारे लगाते हैं। कभी कोई नेता दिखने पर घृणापूरित व्यंग करते हैं तो कभी रियल इस्टेट व लाकर वालों पर भी सर्जिकल स्ट्राइक के लिए मोदी जी से अपील करते हैं।देश के हर कोने तथा हर वर्ग से यही आवाज उठ रही है कि ये भारत माँगे मोर।जनता कोई भी कठिनाई झेलने को तैयार है परंतु काले धन वालों को अब समूल नष्ट होते देखना चाहती है। यहाँ तक कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के लोग भी मोदी जी के इस साहसिक प्रयोग की सराहना कर रहे हैं ओर अच्छे परिणाम की अपेक्षा कर रहे हैं।
*************** दूसरी ओर आतंरिक मोर्चे पर काले धन का केंद्र बने हुए विभिन्न विरोधी दलों के नेताओं में खलबली मची हुई है। उन्हें नोटबन्दी के विरोध का कोई नैतिक कारण नहीं मिल रहा है तो जनता के कतार में घण्टों खड़ा होने की दुहाई दे रहे हैं या बिना तैयारी के क्रियान्वयन की बात कर रहे हैं।निःसंदेह ये नेता ही हैं जो काले धन का नेतृत्व कर रहे हैं ,संसद की कार्यवाही ठप कर रहे हैं तथा भारतबन्द करने का प्रयास कर रहे हैं।उनकी इस मुद्दे पर दंगा फसाद कराने की हर कोशिश बेकार जा रही है क्योंकि यह जो भारत की पब्लिक है ; सब जानती है।नोटबन्दी तो टूटने वाली नहीं है परन्तु सत्ता पक्ष व बिहार के देशप्रेमी मुख्यमंत्री को छोड़ अन्य सभी नेताओं ने यह अवश्य सिद्ध कर दिया कि वे काले धन के समान पक्षधर हैं।सराहनीय हैं प्रधान मंत्री जी एवं धन्य है सर्जिकल स्ट्राइक कि जनाकांछा को  परवान चढ़ने का अवसर मिला।
***************अब तो आम लोगों की समझ में मोदी जी ,सुचिता,राष्ट्रभक्ति और सर्जिकल स्ट्राइक एकरूप हो चुके हैं।मोदी विरोध का सीधा अर्थ है कालाधनी,बेईमान व राष्ट्रद्रोही होना।इस धारणा को पुष्ट करने में अनैतिक एवम लुटेरे विपक्षियों का बहुत बड़ा योगदान है।  नए सपनों के भारत का हर नागरिक चाहता है कि मोदी जी अपने उद्देश्य में सफल हों तथा  भविष्य में उनके द्वारा की जाने वाली हर सर्जिकल स्ट्राइक सफल हो।साधारण सोच है कि पश्चिमी सीमा ,रियल इस्टेट और बेनामी संपत्ति पर और सर्जिकल  स्ट्राइक की आवश्यकता है। भारत के सुनहरे भविष्य का पदार्पण इन स्ट्राइक की सफलता पर ही निर्भर है और जनता के मूड को मोदी जी से बेहतर समझने वाला कोई दूसरा नेता नहीं है। इतना ही नहीं जब तक भारत में वीआईपी संस्कृति पर सर्जिकल स्ट्राइक नहीं होती,यह क्रम जारी रहना चाहिए। जिस दिन ऐसा होगा ,इन नेताओं को पता लगे गा एक ईमानदार साधारण नागरिक क्या होता है और उसकी अपेक्षा क्या होती है।
***************फिर हाल सर्जिकल स्ट्राइक्स का स्वागत है और निकट भविष्य में ऐसी ढेर सारी स्ट्राइक्स के लिए शुभ कामनाएं।इस एक ब्रह्मास्त्र में बहुत कुछ साधने एवं भारत को महाशक्ति बनाने की क्षमता है।यद्यपि काला होने के आधार पर हाथी के साथ काली हांड़ी की तुलना नहीं हो सकती फिर भी यह कहने को दिल करता है कि यह सर्जिकल स्ट्राइक है कि बोरोप्लस।इस प्रसंग में गोस्वामी तुलसी दास कि निम्न लिखित पंक्तियाँ भी विचार योग्य हैं -
---------------ग्रह भेषज जल पवन पट ,पाइ कुजोग सुजोग।
---------------होइँ कुवस्तु सुवस्तु जग ,लखइ बिलच्छन लोग।
अस्तु सुयोग बना रहे ;सब ठीक ही होगा।बस कर्मयोगी की कर्मसाधना अनवरत चलनी चाहिए। ----------------------------------------------------------------------- मंगलवीणा
वाराणसी ,दिनाँक:01 दिसम्बर 2016                  mangal-veena.blogspot.com
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शुक्रवार, 12 अगस्त 2016

कश्मीर पर ऊहापोह

***************कश्मीर की अशान्ति से पूरा देश बेचैन है। वहाँ की शान्ति के लिए हमारे सपूत सुरक्षा प्रहरी अपने जान की बाजी खेल रहे हैं तो दूसरी ओर आन्दोलनकारियों के साथ उनके बहकावे में आकर शान्ति भंग करने वाले भोले -भाले लोग भी हताहत हो रहे हैं। अवसर है, तो राजनेता ,विचारक ,विश्लेषक ,विशेषज्ञ और मीडिया के लोग भी मन माँगी मुराद पूरी कर रहे हैं। अधिकांश को समस्या समाधान की चिन्ता है तो कुछ को अपने प्रतिद्वंदियों को पटकने की। अभी राज्यसभा में कश्मीर पर पूरे दिन चर्चा हुई। माननीय सांसदों  में किसी ने कश्मीरियों से दिली संबंध जोड़ने ,तो किसी ने ऐतिहासिक गलतियों की बात की। किसी ने पडोसी देश को कोसा तो किसी ने पाकिस्तान पोषित आतंकी संगठनों को। किसी ने जम्मू और लद्दाख के परिपेक्ष्य में कश्मीर समस्या की यात्रा कराया तो किसी ने सरकार को विफल बताया। माननीय गृह मंत्री का निचोड़ वक्तव्य आया कि अब पाकिस्तान से बात होगी तो सिर्फ पाक अधिकृत कश्मीर पर होगी। यह तो भविष्य बताएगा कि भविष्य क्या होगा। परन्तु यह कौन बताए गा कि कश्मीर अन्य राज्यों के विपरीत ,सविधान प्रदत्त अलगाव से या एक राज्य दो कानून से कब मुक्त होगा ? बहु आयामी अलगाववाद कश्मीर की नीयति बन गई है।धार्मिक अलगाववाद ,सामाजिक अलगाववाद ,राजनितिक अलगाववाद ,संवैधानिक अलगाववाद यहाँ तक कि सांस्कृतिक अलगाववाद ,सब के सब  इस देश की मुकुटमणि से चिपक गए हैं।
***************यथास्थिति की बात की जाय तो भारत के हर राज्य व् जनपद में भारत के हर कोने के कम या ज्यादा परिवार मिल जाँयगे। कश्मीरी भी सर्वत्र मिल जाँयगे। जब कभी कर्फ्यू या प्राकृतिक  स्थिति देश के किसी हिस्से में आती है तो पूरा देश वहाँ रह रहे अपने परिवार वालों ,मित्रो व परिजनों के लिए ब्याकुल हो उठता है परन्तु जब कश्मीर में ऐसा कुछ होता है तो वह ब्याकुलता केवल उन्ही परिवारों में होती है जिनके लाडले वहाँ जनजीवन और देश की सीमा सुरक्षा में लगे हैं या केवल उन्ही परिवारों को होती है जिनके परिजन वहाँ धार्मिक या पर्यटन यात्रा में फँस गए हों क्योंकि अन्य स्तिथियाँ घाटी केलिए लागू ही नहीं हैं।दूसरी ओर जब सुरक्षा जांबाजों को, वहाँ शेष भारत की आम नागरिक अनुपस्थिति, कश्मीरियत से अलग हिंदुस्तानी होने की अनुभूति देती है तो उन्हें अजीब लगता है कि देश अपना और लोग पराये। हम सभी जानते हैं कि कश्मीर की यह स्थिति थी नहीं ,बनाई गई है। इसके लिए लाखों पण्डित ,हिन्दू तथा सिक्ख परिवारों को पलायन के लिए विवश किया गया और भारतीयता को उखाड़ फेंका गया।
*************** आज की बची परिस्तिथि में भी इस राज्य के अधिकांश नागरिक  शुद्ध भारतीयता से ओतप्रोत हैं और भारत के लिए कृतसमर्पित हैं ,परन्तु जब उनकी भावनाएँ बेलगाम बन्धक बनाई जा रही हों और सरकारें उन्हें संकट से उबारने में असहाय हों ,तब प्रतिबद्धता और निष्ठा दूसरे छोर की तरफ लुढके गी ही। एक राज्य यदि अपने नागरिकों को समानता एवं सुरक्षा की गारण्टी नहीं दे सकता तो उसके अलाप -प्रलाप की कोई विश्वसनीयता नहीं होती। क्या विडम्बना है कि कठोर कार्यवाही के अभाव में कश्मीर प्रताड़ित है और उसका लाभ उठाते हुए अलगाववादी दुस्साहस बढ़ाते जा रहे हैं। जम्मू ,लद्दाख या कश्मीर क्षेत्र के वे भारतीय जो अपने राज्य को पूर्णतया भारत के अन्य राज्यों जैसा  देखना चाहते हैं,सांस्कृतिक एवं धार्मिक विविधता अपनी धरती पर उतारना चाहते हैं और चाहते हैं कि मेलजोल वाली हिंदुस्तानी  झलक उनकी पहचान बने। परन्तु ऐसी अनुकूलता के अभाव में उनके साथ अन्याय हो रहा है।
***************सामान्यतया जब कश्मीर समस्या की चर्चा होती है ,तो सारी बातें परिकल्पना आधारित होती हैं  कि यदि इस राज्य का विलय तात्कालिक अन्य राज्यों की भाँति भारत के गण राज्य में हुई होती तो ऐसा न होता ,यदि यह काम सरदार पटेल पर छोड़ा गया होता तो भारत कि पाकिस्तान वाला विकल्प या विवाद ही मिटा दिया गया होता ,यदि विभिन्न युद्धों में विजय के बाद हम पाकिस्तान की जीती हुई भूमि नहीं लौटाते और पाक अधिकृत कश्मीर को अपने कश्मीर में मिला लेते तो कश्मीर इधर -कश्मीर उधर का प्रकरण समाप्त हो गया होता या कि अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर हम अपने पाकिस्तान द्वारा हड़प लिए गए कश्मीर की बात पाकिस्तान की अपेक्षा ज्यादा आक्रामकता से उठाते तो पडोसी के हौसले पस्त होते। सब ठीक है ,परन्तु खोये जा चुके अवसर वर्तमान को समाधान नहीं दे सकते।
***************इसमें संशय नहीं कि वर्तमान आंदोलन को संभाल लिया जाय गा। अलगाववादी ,आतंकी और पाकिस्तान  सभी परास्त होंगे। तात्कालिक तौर पर हमें सुरक्षाबलों के मनोबल और लाजिस्टक्स को हर तरह से बढ़ाये रखना चाहिए और प्रचार तंत्र सक्रिय कर नागरिकों को भरोसा देना चाहिए कि उनका अभियान आतंकवादियों व अलगाववादियों से है न कि देशवासियों से। घाटीवासियों से अपील कर उनकी सहायता ली जाय और यदि कोई गलती हो जाय तो उनसे क्षमा भी माँगी जाय क्योंकि वे अपने ही बंधु -बंधाव हैं। इस काम में सभी राजनीतिक दल बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। घाटी में जितने भी ग्रामीण ,कस्बाई या शहरी इकाइयाँ हैं ,उन्हें विभिन्न दलों से मिल कर पाँच -पॉँच प्रतिनिधियों का दल गोंद लें ,उनसे नियमित बैठक कर उनसे मेल -जोल करें और उनके विकास व हित को आगे बढ़ायें।साथ ही जम्मू व लद्दाख क्षेत्र का सर्वाङ्गीण विकास द्रुततम गति से किया जाय ताकि ये क्षेत्र उनके लिए अनुकरणीय बन सकें। जैसे ही कुंठा जाएगी ,समस्या भी तिरोहित हो जाय गी। 
***************दीर्घकालिक समाधान उपायों में संविधान की धारा तीन सौ सत्तर का समापन है। बहुत कठिन कदम है परन्तु राष्ट्र हित में इस राज्य को अन्य राज्यों सा समरस बनाना ही होगा। पाकिस्तान प्रायोजित आतंक को उसे नष्ट करने की क्षमता से अधिक आक्रामकता से तहस=नहस करना होगा। इन आतंकियों से ज्यादा खतरा देशी छिप कर वार कर रहे देशद्रोहियों और लगाववादियों से है जो विभीषण भूमिका में हैं।उन्हें चिन्हित कर कठोरतम प्रतिक्रिया से गुजारना होगा।लक्ष्य बना कर शिक्षा ,रोजगार व् विकास को घाटी की धरती पर उतारना होगा। तभी कश्मीर की वादियों में भारतीयता मुस्कराएगी। इतिहास को ऐसे दिन की प्रतीक्षा रहे गी जब कश्मीरी मुस्लिम समुदाय के लोग पलायन कराये गए हिदू और सिक्ख परिवारों से मिलें गे और गले लग उन्हें अपने घरों में पुनर्स्थापित करें गे।---------------------------------------  मंगलवीणा
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वाराणसी ;दिनाँक 12 अगस्त 2016 ---------------mangal-veena.blogspot.com
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अंततः
सभी सुधी पाठकों ,देशवासियों ,मित्रों  व टिप्पणीकारों को स्वतंत्रता दिवस की ढेर सारी शुभ कामनाएं। भारतीय सीमा एवं अशांत कश्मीर में तैनात बीर जवानों को मिठाइयाँ व राखी पहुँचे तथा हर कश्मीरी भाई बहन को सौहार्द और शान्ति का सन्देश।हर भारतीय की अभिलाषा है कि हमारा मुकुट मणि हमारी आभा को चार चाँद लगाए। ----- मंगलवीणा
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