सोमवार, 25 मई 2026

उफ् गर्मी

   **********एक तो झुलसाने वाली ग्रीष्म ऋतु , फिर उसमें  सर्वाधिक तपने वाला जेठ का महीना ; दूजे अधिक(पुरुषोत्तम)मास पड़ने के कारण इस महीने की अवधि तीस नहीं साठ दिन का होना ;तीजे सूर्य की किरणों का सीधे धरती के इस भूभाग पर पड़ना और चौथे हमारे मौसम विज्ञानी व उनके  अल नीनो की इस चौकड़ी ने, ताप -लहरों को हाथ ले, जो धमाचौकड़ी मचाया हैं कि सभी ओर त्राहि माम,त्राहि माम ही गूँज रहा है ।लोग पुरुषोत्तम भगवान विष्णु को स्मरण कर रहे हैं कि उन्हीं की सृष्टि है तो उनकी हम जीवों पर अवश्य कृपा होगी और इस अंगारे सी दहकती गर्मी से हमारी रक्षा होगी ।परंतु तत्काल हो नहीं रही है ;अपनी माया वे ही जानें ।यदि कोई खास कारण है तो कम से कम यह पुरुषोत्तम महीना तो जेठ की जगह अगहन या फाल्गुन के महीनें में डाल देते जिससे जेठ का गरूर टूटता ।

**********प्रातः वन्दनीय भगवान भुवन भास्कर की क्या कहें,प्राची में प्रगट होते ही आग बरसने लग रहे हैं और हमें पेड़ तले,दरिया किनारे या घरों के छाये में भगा रहे हैं ।जब मन में विचार उभरता है कि ए छाये ,ए किनारे अब हैं कहाँ ।फिर आकाश से मौन वाणी होती है "  तुम लोगों को तो सारे श्रोत से भरी पूरी धरती मिली थी परन्तु तुम मनुष्य निरंतर उसे बर्वाद करते जा रहे हो तो तुम्हें ही भुगतना होगा। हे मानव !हम तो कभी भी प्रकृति व्यवस्था न तोड़ने के लिए वचनबद्ध हैं ।"अब समझ में आया कि भुवन भास्कर का साफ संकेत है कि हम मानव अब से सुधर जाँय और प्रकृति से छेड़ -छाड़ न करें वरन् ऐसे ही या इससे बदतर मजा चखेंगे । भाई चलिए!कर्मफल तो मिलना ही है सो इस असह्य गर्मी को हम लोगों को रो या धो कर सहना है ।

**********अब यदि गर्मी से राहत देने वाले तीसरे देव इन्द्रदेव की ओर कातर चक्षु से देखें तो लगता है कि इस धरा निवासी प्राणियों  से उनका कोई संबंध ही नहीं ।उनका विभाग , तप्त तवे पर बूँदों की भाँति , यत्र -तत्र बरस रहा है और जीना बदतर कर रहा है ।ऐसा नहीं हो रहा कि वे उमड़ -घुमण कर बादल और बरसात उतार दें जिससे धरा तृप्त हो जाय तथा इस भीषण गर्मी से जीव जन्तु और वनस्पतियों को छुटकारा मिले ।इस बादल और बरसात वाले विभाग की हालत भी भारत के सरकारी विभागों सा हो गया है ।वैसे भी सर्वविदित है कि इन्द्र भगवान देवगणों के साथ अमरावती में सानन्द निवास करते हैं और यदि उन लोंगों का कोई काम बिगड़ता है तो लाख छल -छद्म कर के प्रभु से अपने अनुसार बनवा ही लेते हैं फिर औरों या इस धरती के जीवों की कुशल छेम क्यों सोंचे ।

**********वैसे तो धरातल पर हम लोग इस भयावह ताप लहरी को झेलने हेतु विवश हैं ही; ऊपर से ए आधुनिक मौसम विज्ञानी आए दिन तापलहर,आँधी,तूफान इत्यादि का  बार- बार चलभाष पर पूर्वानुमान जारी कर दाद में खाज का काम कर रहे हैं ।इनके सचेतक संदेश हमारी गर्मी झेलने की शक्ति को मनोवैज्ञानिक रूप से क्षीण कर रहे हैं । फलत: इस विकट गर्मी में सभी जीवों की क्रियाशीलता /सक्रियता शिथिल हो रही है और अधिकांश उर्जा केवल तापलहरी से बचने में खर्च हो रही है ।भला सोचिए!हम इस अल नीनो का क्या करें ।

**********हार थक जब  किसी उपक्रम, उपाय या साधन से इस प्रचंड ताप लहरी से राहत नहीं मिल रही है तब एक ही छाँव या ठाँव बचता है और वह है :श्रीकृष्णस्य शरणं गच्छ । याद करें !श्रीमद्भगवद्गीता में श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि महीनों में अगहन का महीना और ऋतुओं में बसन्त ऋतु मैं  ही हूँ (मासानाम् मार्गशीर्षाणाम् ऋतुनाम् कुसुमाकर:) ।यदि कुछ सुन्दर और सुखदायी गुण इस ग्रीष्म व जेठ महीना मे होता तो वे अवश्य घोषणा करते  कि 'मासानाम् ज्येष्ठ मासम् ऋतुनाम् ग्रीष्म भीषण:' ।इतना ही नहीं अतिवाद  से बचने का सर्वोत्तम  कवच श्रीकृष्ण की जीवन पद्धति है जिसका अनुसरण कर हम हर कठिन परिस्थिति यहाँ तक किअति गर्मी ,अनावृष्टि ,  अतिवृष्टि,अतिशीत,जलप्लावन,बाढ़,और सूखे का जयी सामना कर सकते हैं। सो हम भी वही राह पकड़ें।यह गरमी भी बीत जायगी।

**********पता करें तो  लोग गर्मी से छुटकारा और वर्षा आगमन केलिए अपनी मान्यतानुसार अनेक उपाय कर रहे हैं । जैसे गाँवों मे लड़के कीचड़ में लोट-पोट रहे हैं और आकाश से आह्वान कर रहे हैं कि मेघा पानी दे- जिन्दगानी दे ।कहीं लोग मेंढक -मेढकी या गधे - गधी की शादी कराने का उतायोग करा रहे हैं । जप -जग्य भी हो रहे हैं।सभी उपाय अच्छे हैं क्यों कि सच मे गर्मी तो बीत ही रही है ।

**********यदि बीत रही इस गर्मी का सिंहावलोकन करें तो पाते हैं कि इस बार अप्रैल से ही दुसह गर्मी के कारण सर्वत्र हाहाकार मचा हुआ है। जब भूगर्भ ,नदी , बाँध ,तालाब ,कुँए एवं अन्य सभी जलश्रोत ही पानी के लिए तरस रहे हैं ,फिर आदमी ,जीव -जन्तु ,पेंड़-पौधे ,जलचरों ,पशुओं व पंछियों की प्यास कैसे बुझे ?समाचार पत्रों और  इलेक्ट्रानिक मिडिया  के माध्यम से मौसम विज्ञानी ग्रीष्म की निष्ठुरता व उसके कारणों की नित्य जानकारी दे रहे हैं। आइए कुछ हिंदी कवियों की दृष्टि से भी इस ताप को देखा जाय। यथा -

जाने क्या हुआ कि सूरज इतना लाल हुआ

प्यासी हवा हाँफती फिर -फिर पानी खोज रही

सूखे कण्ठ कोकिला ,मीठी बानी खोज रही

नीम द्वार का छाया खोजे, पीपल गाछ तलाशें

नदी खोजती धार, कूल कब से बैठे हैं प्यासे

पानी पानी रटे रात -दिन, ऐसा ताल हुआ। 

जाने क्या हुआ कि सूरज इतना लाल हुआ------------------------------------------------------------------------------------डा.जगदीश ब्योम

ग्रीष्म की लय में बढ़ते हुए अब बदलाव की प्रतीक्षा करनी चाहिए। अश्विन गाँधी के शब्दों में -

यह सब कुछ याद रहे

मौसम का साथ रहे

ग्रीष्म ऋतु भी जाएगी

फिर रहे गी प्रतीक्षा /अगले मौसम की /बहार की।

***************तब तक  हम सबका सर्वोच्च कर्तव्य है कि पानी बचाएँ और प्यासों को पानी उपलब्ध कराएँ।एक भी प्यासी पँछी को यदि हम पानी पिला पाए तो यह सृष्टि की बड़ी सेवा होगी।

**********अन्तत:----

**********आज वर्ष का सबसे बड़ादिन (13धंटा 43मिनट :सूर्योदय 5.08,सूर्यास्त6.51)और अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस है साथ ही वाराणसी में पछुआ हवा के साथ शुष्क ताप लहरें(42'C उच्चतम ) चल रही हैं ।फिर भी सबमें योग दिवस का उल्लास है।अत: सभी कर्मयोग साधकों और सुधी पाठकों को योगदिवस की सादर बधाई।---------------------------------------------------- ------------------------------------------------------------------मंगला सिंह -----------------कृते मंगलवीणा,/mangal-veena.blogspot .com@gmail.com

वाराणसी ;रविवार ,दिनाँक 21 जून 2026

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बुधवार, 14 जनवरी 2026

मकर संक्रांति पर बच्चों के नाम

 प्यारे बच्चों !

तुम सबको मकर संक्रांति अर्थात स्नान युध्द विजय पर्व पर ढेर सारा स्नेह ।जो जो स्नान के द्वारा  इस प्रबल ठंड व बर्फीले पानी को आज मात दे चुके हैं ,उन्हें हार्दिक बधाई ; जो जो इस विकट युद्ध में उतरने की तैयारी कर रहे हैं उन्हें शुभ कामना और जो ठंड के डर से उत्साह रुपी हथियार डाल दिए हैं उन्हें हनुमान जी की तरह याद दिलाया जाता है कि वे स्नान युद्ध में विजय पाने हेतु ही बनें हैं ।फिर भी ऐसे ऐसे बीर हमारे बीच हैं जो वर्ष में केवल एक बार आज के दिन नहा लेते हैं ,उन्हें आज सौ बार प्रणाम और उन भीष्म प्रतिज्ञा वालों को जो आज भी नहीं नहाते उन्हें हजार बार  क्योंकि गोस्वामी तुलसी दास जी भी रामचारित मानस (रामायण )की रचना के आरंभ में ही कुछ ऐसे ही कारण हेतु माननीय दुष्ट जनों की वंदना किए थे । 

ऐसे वैसे या कैसे भी जो विजयी हो गए हैं,उन्हें सूर्यदेव को नमन करने ,सूखी या पकी खिचड़ी दान करने के बाद  खिचड़ी-  पापड़-चोखा,तिलवा, ढुंडा ,मुग्दल ,दही-चिउड़ा इत्यादि का पूरा पूरा आनंद उठाने का आमंत्रण है । यदि बंधु- बांधव और इष्ट मित्रों के साथ इन ब्यंजनों का आनंद उठा पाएँ तो यही इस युध्द विजय का प्रथम पारितोषिक है ।

फिर क्या ; अब खुली धूप में पतंग उड़ाने  या दूसरों को उड़ाते हुए देखने का यतन करिए और मौज मस्ती भरिए । इतने बढ़िया त्योहार पर यह अवश्य याद रखिए कि पतंगबाजी एक अच्छा शौक है परंतु चीनी मंझा का प्रयोग एक घृणित अपराध है ।ए मंझे प्रति वर्ष अनगिनत पशु-पक्षियों व इंसानों की जान ले रहे हैं ।अत: आज यह भी प्रण करें कि हम पतंग उड़ाने में केवल देशी मंझा ही प्रयोग करेंगे ।

मजे की बात यह है कि सूर्यदेव हम सबको ठंढ से छुट्टी दिलाने के लिए ही प्रति वर्ष 14/15 जनवरी को मकर रेखा पार कर उत्तरायण होते हैं जिससे दिन के बाद दिन क्रमशः बड़ा होने लगता है और ठंड भागने लगती है ।अत:है न यह बढ़िया ,मीठा और प्यारा -प्यारा हमारा सनातनी  त्यौहार। हँसो, हँसाओ और खुश रहो ।शुभाशिष। जय श्रीराधाकृष्ण। -----मंगलवीणा

मकर संक्रांति ;15 जनवरी 2026,

वाराणसी ।


रविवार, 26 अक्टूबर 2025

जनता है उदास ,उनकी नियति यही

                              भारतेन्दु हरिश्चंद्र जी ने ,अपने भारत-दुर्दशा नामक काव्य में ,अंग्रेजी राज के दौर में देश की दुर्दशा पर अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कुछ ऐसा लिखा था -अंग्रेज राज सुख साज सजे सब भारी । पै धन विदेश चलि जात इहै अति ख्वारी । । आज मोदी राज में यही पंक्तियाँ हमें कुछ यूँ लगती हैं -मोदी राज सुख साज सजे सब भारी ।पै रुपया होत कमजोर इहै अति ख्वारी ।जी एस टी का कम होना सरकार की ओर से एक तरफा प्रयास हो सकता है परंतु डालर के विरुद्ध रुपये का कमजोर होना सारे प्रयास पर पानी फेरने जैसा है । जब महँगाई की बात होती है तो तत्काल अतीत की ओर तुलनात्मक ध्यान जाता है और कारण के मूल में रुपये की घटती क्रय शक्ति ही दिखती है ।एक शताब्दी पहले हमारा रुपया डालर के टकाटक बराबर चला करता था और आज ?इस क्रमशः कमजोरी के अनेक कारण हैं जिनसे देश जूझ रहा है । फिर विचार में निम्नलिखित पंक्तियाँ गूँजती हैं --

सरकारी राहत का कोई लाभ नहीं ।

जब तक प्रदाता उसे देवे  ही नहीं ।।

गाड़ी मोटर एसी की बात छोड़िये ।

रोजमर्रा  सामानों की बात कीजिये।।जनता है उदास,उनकी नियति यही ?

                                                     भाग्यविधाता कुछ तो करो न सही ।।

नोटबंदी का लाभ  बैंकवाले ले गये ।

 जीएसटी का लाभ अब व्यापारी लेगये । ।

हो रहा विकास, ठेकेदार मस्त हैं । 

 ठगे हुए लोग बंगले झाँक रहे हैं ।।जनता है उदास,इनकी नियति यही ?

                                                 भाग्यविधाता कुछ तो करो न सही ।।

नेतागीरी से बड़ी कमाई न कोई।

इनके सफेदी सी सफेदी न कोई।। 

सारी भ्रष्ट नदियाँ,यहीं हैं समाई ।

ऐसा महासागर,महासागर न कोई।।जनता है उदास,इनकी नियति यही ?

                                                    भाग्यविधाता कुछ तो करो न सही ।

 पैसा कमाना है,तो स्कूल खोलिये ।

सारा श्रोत जनता का चूस लीजिये ।।

शिक्षा के खातिर बाप तार-तार है । 

बच्चे के फीस का जुगाड़ नहीं है ।।जनता है उदास,इनकी नियति यही ?

                                                 भाग्यविधाता कुछ तो करो न  सही ।।

योगी,मोदी जैसों को मालूम सब है ।

पर जादू की छड़ी, इनके पास नहीं है।। 

करें तो क्या करें,सब उपाय फेल हैं ।

 भ्रष्टाचारी रावण के तो दस माथ हैं ।।जनता है उदास ,इनकी नियति यही?

                                                    भाग्यविधाता कुछ तो करो न सही ।।

इनके हनन का, कोई  जतन नहीं ।

जब तक विभीषण कई मिलते नहीं ।। 

याकि कोई जेनजी का बादल न फटे।

भ्रष्टाचार का क्लेश, नहीं जड़ से मिटे।।जनता है उदास, इनकी नियति यही ??

                                                       भाग्यविधाता कुछ तो करो न  सही   ।।

जनता की बात कोई सुनता नहीं ।

इन्हें  चुनने का ढंग बदलता  नहीं ।। 

जज,बाबू,नेता बिपदा के बड़े जड़ ।

लोग कहें ,चक्कर में  इनके न पड़।। जनता है उदास,इनकी नियति यही?

                                                      भाग्यविधाता कुछ तो करो न सही ।

नहीं तो विपति बन ए टूट पड़ें गे ।

और आप जड़ से उखड़ जाएँ गे ।। 

आप के चाहे न चाहे ए न बदलें गे ।

कोई कल्कि ही सबको ठीक करेंगे।। जनता है उदास ,इनकी नियति यही ?

                                                      भाग्य विधाता कुछ तो करो न सही ।

सारांशतः कुछ भी समझने या समझाने का प्रयास करें परंतु "सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे संतु निरामया । सर्वे भद्राणि पश्यन्तु ,मा कश्चित् दुख भाग्  भवेत।"जैसी भारत की महान सोच गंभीर प्रश्नचिन्ह के घेरे में है ।    

                                                          ---------मंगला सिंह / मंगलवीणा 

                                                           mangal-veena.blogspot.com

कार्तिक ,शुक्ल पक्ष, पंचमी ,संवत् २०८२    

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दिनाँक :26.10 .2025 ;वाराणसी 


 

शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2025

ऐसी अपनी काशी(1960--2025)

                   आज मैं अपने  जिस शहर पर स्वतः की अनुभूति अंकन का प्रयास कर रहा हूँ वह हमारे जनपद का मुख्यालय वाराणसी है जिसे कभी काशी ,कभी आनंदवन और सामान्यतः बनारस या वाराणसी नाम से जाना जाता है ।यह कथ्य नहीं अपितु अन्वेषित तथा स्थापित तथ्य है कि बनारस इस धरती  का प्राचीनतम जीवंत नगर है जो अनादि काल से  अपनी ज्ञानाभा से सम्पूर्ण जगत को आलोकित करता रहा है और इसी कारण आगे बढ़ती सभ्यता में सदैव यह नगर अनुकरणीय और आदरणीय रहा है । हमारे सनातन धर्म , संस्कृति तथा संस्कार का यह नगर अविरल श्रोत रहा है जिससे हम समस्त संसार में फैले सनातनी अनुप्राणित होते रहे हैं । हर काल खण्ड में, अनगिनत  मत ,मतांतर ,संप्रदाय  आग्रह या दुराग्रह यहाँ आते रहे और अंततः यहीं से मान्य होकर  इस धरा पर या तो फले- फूले या  अमान्य हो कर सिमट गए ।अतीत में अनेकानेक सभ्यताओं के साथ अनवरत संघात के बाद भी इस नगर ने अपना बनारसीपन और अक्खड़ स्वभाव सदैव बनाए रखा और यही इस काशी की अद्वितीय पूँजी रही है जो इसे सबसे अजब और गजब  बनाती है ।तभी तो लोकोक्ति  है कि चना ,चबैना ,गंग जल जो पुरवै करतार ;काशी कबहु न छाड़िए विश्वनाथ दरबार ।यहाँ के अक्खड़ियों ने और न जाने क्या क्या कह रखा है यथा काशी कबहु न छोड़िए ,काशी अद्भुत धाम ,मरने पर मुक्ति मिले ,जीते लंगड़ा आम या जहाँ की मिट्टी पारस है ,उस शहर का नाम बनारस है  या खाइ के पान बनारस वाला खुल जाय बंद अकल का ताला या कि गंगा जल अस जल नहीं ,नहिं काशी अस धाम आदि ,आदि ।    

*****हमारा भारत स्वाधीन हो चुका था जब इसी जनपद के एक गाँव के मध्य वर्गीय परिवार में मेरा जन्म हुआ ।लड़कपन में सांझ को रोशनी के लिए लालटेन और ढिबरी को जलते देखा । रास्ते के नाम पर कच्ची पगडंडी और धूलधूसरित सड़कें तथा यातायात के नाम पर बैलगाड़ी,ऊंट, खच्चर या इक्का-दुक्का साइकिलें देखा।घोड़ागाड़ी,बग्गी,तांगे व इक्के भी आवागमन के सुलभ साधन थे ।दस -ग्यारह वर्ष की वय मे एक कार्तिक पूर्णिमा के दिन अपनी चाची जी के सौजन्य से बनारस शहर देखा तो रोमांच की सीमा न रही ।  इस शहर में रात को सड़कों और घरों में बिजली की चकाचौंध रोशनी देख कर मै चौंक गया था और मेरे अन्तर्मन में स्वर्ग की एक आभाषी छबि बनी थी ।तदन्तर आने जाने और रुकने का सिलसिला यहाँ अंततः बस जाने तक जारी रहा। जिसने कभी कार्तिक पूर्णिमा की भोर में इंद्रधनुषी जगमग घाटों से लिपटती हुई कलकल बहती देवपगा की छबि से स्मृतियों पर अमिट छाप छोड़ा ,वह अमरावती को पीछे छोड़ने वाला जीवंत शहर आज कहीं खोता जा रहा है । उम्र बढ़ती गई ,न जाने कितनी  बार उन गलियों ,सड़कों, सीढ़ियों, घाटों तथा गली -मुहल्लों एवं बाजारों की परिपरिक्रमा किया और कभी दिन ,कभी चाँदनी रात के समय गंगधार मे नौका विहार किया । यहाँ तक कि देव दीपावली जैसे पर्वों पर अपार भीड़ की धक्कामुक्की भी झेला परंतु अपने उस पुराने शहर के शहरीपन तथा बाँकपन को क्रमशः क्षरित होते पाया । तब की मानसपटल पर बनी मनोहर  दृश्यावली को पुनः पुनः देखने की जिज्ञाशा होती रही  परंतु उस शहर और उस अनुभूति को कभी वापस नहीं पाया ।

*****जब भी कभी बनारस से पूछा कि तुम कहाँ खोते जा रहे हो तो प्रतिध्वनि हुई "कहाँ ठहर गए हो? अपनी आज की गंगा में तुम भारतेन्दु कालीन गंगा ढूँढ़ रहे हो कि "नव उज्ज्वल जल धार हार हीरक सी सोहति ,बीच बीच छहरति बूंद मध्य मुक्तमनि पोहति।सुभग स्वर्ग सोपान सरिस सबके मन भावत ,दर्शन मज्जन पान त्रिविध भय दूर मिटावत।" वे दिन भूल जाओ जब जान्हवी किनारे पहुँचते ही चुल्लू पर चुल्लू जल पीने ,नहाने और लोटे में जल भर कर महादेव को चढ़ाने के लिए लोग मचल जाया करते थे ।अब तो उसी गंगा का जल न पीने योग्य है न नहाने ।जाकर गंगा की सहायिका वरुणा की दुर्दशा और दुर्गंध युक्त मलजल प्रवाह तो देखो । यह वही वरुणा है जिसको प्रसाद जी यूं पुकारते थे --अरी ! वरुना की शांत कछार ,तपस्वी के विराग की प्यार । इन देव नदियों के असंख्य जलचरों का, मानव जनित दोहन व गंदगी से,अस्तित्व मिट गया ।अस्सी नदी का तो कहना क्या -इस नाम का एक नाला अपने अतीत पर रो रहा है । क्यों का उत्तर तो तुम सब जानते हो ।"उलहना भरी यह बनारस वाणी हमें जब तब ब्यथित और नि:शब्द कर जाया करती है । फिर भी परंपरा को तो आगे बढ़ते जाना है । अब वरुणा और अस्सी नदियों के बीच बसी इस वाराणसी में जो बची है ,वह इस कलियुग के विषय में बाबा तुलसी दास द्वारा वर्णित "जॅह वस सम्भु भवानि,सो कासी सेइअ न कस ।या " महा मंत्र जोइ जपत महेसू ।कासी मुकुति हेतु उपदेसू।" वाली हिन्दुओं की सनातनी आस्था है जिस कारण देश- विदेश से भारी संख्या में तीर्थयात्री अब भी मज्जन, दर्शन,पान के पुण्यलाभ हेतु आते रहते हैं, आते रहेंगे और  आज की आधुनिकता के दौर में भी यहाँ के अध्यात्मिक, धार्मिक,सांस्कृतिक वैभव की चकाचौंध से चमत्कृत होते रहेंगे ।

*****कभी मन में आया कि उषा बेला में बनारस के घाटों पर घूमें और सुबह ए बनारस से गलबहियां करें तब नि:संदेह इसे यथावत जीवन्त पाया । तब देखा,सुना कि मंदिरों में घंटा ,घड़ियालों की कानों में गूँजती ध्वनि -प्रतिध्वनि ,भजन गाते घाटों की सीढ़ियाँ पर उतरते-चढ़ते स्नानार्थी ,बड़ी बड़ी छतरियों तले बैठे पंडित-पंडों से श्रद्धा के साथ तिलक लगवाते ,मंत्रोच्चारण करते फिर गंगाजल लेकर देवालयों के लिए सीढ़ी चढ़ते ध्यानमग्न भक्त, प्राचीन परंपरा को यथावत आगे बढ़ाते हुए, ऐसी नैसर्गिक समा बांधते हैं कि मानो तीनों लोक से न्यारी काशी महादेव के नृत्य व डमरू निनाद से गुंजित हो रही है ।सूर्योदय की ओर बढ़ती उषाकाल में जब आकाश के तारे शांत जलधारा में डूबने लगते हैं और पूर्वी क्षितिज पर उभरती लालिमा सूर्योदय की सूचना देती है तब इंद्रधनुषी घाटों की सीढीपर पूर्वोन्मुखी खड़े हो गंगधार के साथ बाल रवि की सुनहरी किरणों के साथ चंचल अठखेलियाँ आज भी निहारते ही बनती हैं। फिर क्षितिज पर ऊपर उठते दिनकर के साथ शनैः-शनैः घाटों का शहर बनारस सुबहे बनारस से आगे यहाँ की गलियों ,मुहल्लों की ओर बढ़ जाता है ।यहाँ के शहरियों में प्रातरास व दिनचर्या की विविधता भी बड़ी प्यारी और न्यारी रही है जिसमें खाटी बनारसी भोज्य वस्तुओं के साथ हर राज्य की विशेष खान पान की सुलभता रहती है।आस्था के चलते सुबह ए बनारस में आज भी यह विशिष्ठ  निरंतरता बनी हुई है जब कि घोर प्रदूषण,आधुनिकता और आर्थिकी अपना असर डालने लगी हैं ।    

 *****मोक्षदायिनी काशी पुराधिपति बाबा विश्वेश्वर की शीर्षतम पीठ होने के कारण सनतानियों की यह सर्वोपरि तीर्थस्थली है और अनादि काल से हर अमीर-गरीब हिन्दू की कामना होती है कि जीवन में ज्यादा नहीं तो कम से कम एक बार काशी यात्रा कर लें और मोक्षदायिनी गंगा में स्नान और जग तारनहार बाबा विश्वेश्वर के दर्शन हो जाँय ।यही प्रेरणा शक्ति थी कि यहाँ इद्रधनुषी गंगा के पश्चिमी खड़े छोर पर आदि केशव से संत रविदास घाट तक इतिहास के क्रमिक काल खण्डों में भारत के बहुत से राजा-महाराजाओं ने पक्के घाट ,धर्मशाला ,किलेनुमा महल,मंदिर और बेधशाला बनवाए । सदियों पूर्व लगभग हर राज्य से काशीवास के इच्छुक संभ्रांत लोगों ने अलग अलग मुहल्ले बसा डाले और कालांतर में यह शहर एक सम्पूर्ण लघु भारत बन गया ।ऐसी न्यारी काशी में आर्यावर्त के कोने -कोने से बड़े बुजुर्ग , बृद्ध,,विधवा ,आश्रित ,निराश्रित ,संत ,सन्यासी आदि काल से मोक्ष की लालसा में काशीवास करते रहे हैं।कुछ लोग तो मोक्ष भवनों में वास ,या करवट काशी लेते हैं ताकि नश्वर शरीरत्याग के साथ वे कबीर के राम निहोरा व भोले नाथ की कृपा से जीवन -मरण के बंधन से मुक्त हो जाँय । बौद्ध धर्म प्रवर्तक भगवान बुद्ध की प्रथम उपदेशस्थली सारनाथ व उनके अनुयाई सम्राट अशोक द्वारा वहाँ स्थापित अशोक स्तंभ जो हमारे भारत का राजचिन्ह भी है ,बनारस के अनन्य वैभव हैं ।जैन धर्मावलंबियों के कई तीर्थंकर यथा पार्श्वनाथ, चन्द्रदेव इसी भूमि पर अवतरित  हुए ।रामनगर के काशी नरेश का स्वागत यहाँ हर हर महादेव के उद्घोष से होता है और यहाँ मंचित विश्वप्रसिद्ध रामलीला देखे बिना वर्णनातीत है। इस सर्वविद्या की राजधानी में संस्कृत से संस्कार तक,सगुण से निर्गुण तक ,रीति से नीति तक ,शिक्षा से साहित्य तक,राजशाही से लोकशाही तक स्वनाम धन्य विशाल बटबृक्ष सी विभूतियाँ अवतरित होती रही हैं और अपनी साधना तथा योगदान से दुनियाँ में इस शहर को मुकुटमणि की भाँति दमकाती रही हैं ।कुछ स्वनामधन्य विभूति यथा संत कबीर,संत रविदास ,गोस्वामी तुलसीदास, भारतेन्दु हरिश्चंद्र,आचार्य रामचंद्र शुक्ल ,मुंशी प्रेमचन्द,  जयशंकर प्रसाद, शिव प्रसाद गुप्त,पंडित मदन मोहन मालवीय, लाल बहादुर शास्त्री,डा. संपूर्णा नन्द तो बनारस के पर्याय सा पहचान रखते हैं ।पिछले ग्यारह वर्षों से हमारे सांसद व भारत के यशस्वी प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी बनारस के ग्रोथ इंजन बने हुए हैं । यह शहर नित्य विकास की नई नई ऊंचाइयां छू रहा है और बदलाव की द्वितियो नास्ति कहानी बन रही है । दूसरी ओर इस बदलाव में बरसों पूर्व के बनारस की निजता का धीमे-धीमे क्षरण भी होता जा रहा है ।

*****इस शहर को सिरमौर बनाने में बनारसी पान ,बनारसी साड़ी ,बनारसी लंगड़ा आम ,बनारसी हस्तशिल्प और हाथकरघा उत्पाद के साथ ,बनारस की गलियों और बनारसी अणियों का भी बड़ा योगदान रहा है ।और तो और यह शहर  संस्कृत ,वेद ,वेदान्त,ज्योतिष के अध्ययन, अध्यापन और देशी कुश्ती ,पहलवानी ही नहीं संगीत व नृत्य को भी आज तक जीवंत रखने में गुरुकुल एवं घराना परंपरा का ध्वजवाहक बना हुआ है ।                                                    ******अच्छाई के साथ बुराई न हो ,यह तो संभव ही नहीं है।ऐसे में काशी के इन बहुआयामी श्लाघनीय आयामों के साथ अनेक बुराइयाँ भी पनपती रहीं हैं जैसे यहाँ प्रवासी तीर्थयात्रियों और साधु -संतों को लोग काशीप्रवास में सँकरी गलिओं ,बहुतायत साँड़ों(नंदी )और सीढ़िओं से सावधान रहने की परामर्शी जारी करते रहते हैं ।एक बहुत प्रचलित कहावत भी है "राँड़ ,साँड़ ,सीढ़ी ,सन्यासी ;इनसे बचे तो वास करे काशी"।इनसे भी बड़ी आफत तो  बनारसी ठग और बनारसी जेब कतरे हैं जो अनेकों भोले भाले यात्रियों को अपना शिकार बनाते रहे हैं और इस धर्म नगरी को बदनाम करते रहे हैं । भारतेंदु जी का बनारस निरूपण कुछ यूँ रहा है ----"आधी कासी भाट ,भडेरिया,बाम्हन और सन्यासी ।आधी कासी रंडी,मुंडी,रांड,खानगी,खासी ।लोग निकम्मे,भंगी,गंजड़ ,लुच्चे,बेविस्वासी ।देखी तुम्हरी कासी ।"आज यह एक व्यवस्थाविहीन शहर बन चुका है ।काशी में आगन्तुक भ्रमणार्थियों को हर कदम पर;चाहे रिक्शा ,ऑटो या टैक्सी चालक हों ;चाहे होटलवाले या गाइड हों ;चाहे पंडे या पुजारी हों ;अथवा बनारसी साड़ी या अन्य विशिष्ठ उपहार व्यवसायी हों; ए अधिकांश लोग ,सारी नैतिकता ताख पर रख  ठगने और आर्थिक दोहन का प्रयास करते हैं।उचित या वाजिब दर के शायद यहाँ कोई मायने नहीं हैं।यहाँ ऐसे हुनरबाज भी हैं जो नकली चीजों को असली से बेहतर असली सिद्ध करते हुए क्रेता को उल्लू बना देने में माहिर होते हैं ।किसी को बुलाने या बातचीत में प्रायः यहां  गुरू नामक संबोधन बहुत प्रयोग होता है।दर्शनार्थी को इस गूढ रहस्य वाले गुरु शब्द से भी सावधान  रहना होता है । एक गुरु ने दूसरे गुरु से क्या कहा और तीसरे गुरु ने अपना काम कर लिया ,यह भी बनारस की एक अबूझ पहेली बनी रहती है ।  

 *****कालक्रम में जैसे जैसे सन् उन्नीस सौ साठ के बाद चलचित्र का प्रभाव बढ़ता गया, शिक्षा की ओर समाज का रूझान बढा ,संपर्क के संचार माध्यम बढे और गतिशीलता बहुत तीब्र होने लगी दुनियां एक छोर से दूसरे छोर तक सिमटने लगी।और संगणक फिर मोबाइल के हाथ में आते-आते आज शहरों तथा देशों की पहुंच ,जानकारी व संपर्क सबके हाथ मे सुशोभित मोबाइल के परदे पर आ गई है।परिणामरूप लोग ब्यवसाय नौकरी,शिक्षा,और सुविधापूर्ण जीवन की आशा मे गांव से शहर ,एक शहर से दूसरे शहर या एक देश से दूसरे देश मे प्रवास करने लगे हैं। हर आधुनिक शहर की भाँति अधिकाधिक प्रवासन  के कारण  बनारस की आबादी मिश्रित ही नहीं दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ रही है साथ ही इसकी निज भाषा भी गौड़ हो रही है। शहर चौतरफा फैलता जा रहा है ,सड़कें चौड़ी की जा रही हैं ,उपरिगामी सड़कों का जाल बन रहा है ,शहर के चारों तरफ रिंग रोड बनाया जा रहा है और गगनचुम्बी बड़े बड़े भवन तन रहे हैं । हजारों की संख्या में निजी क्षेत्र के चिकित्सालय, शैक्षिक संस्थान, होटल, माल,फूड चेन चल पड़े हैं ।फलत: बनारस की डेमोग्राफी व जीवन शैली तीब्रतर गति से बदलती जा रही है और जल्द ही बनारस में ही बनारसीपन ढूंढना कठिन हो सकता है।

*****सच सभी स्वीकार करते हैं परंतु कड़वे सच को बहस में उलझा दिया जाता है ।ऐसा ही एक कड़वा सच है बनारसियों की अनुशासन- हीनता जिसका शिकार आप यत्र तत्र सर्वत्र होते हैं ।सडकों पर बाइकर्स,कार चालकों द्वारा यातायात नियमों को धता बताना,यातायात वाली मुख्य सडकों पर गाडियों का रेलम-रेला व पूरे दिन सडकों का जाम रहना ,बाहरी यात्रियों व वरिष्ठ शहरियों के लिए अभिशाप बन गये है ।कहीं भी कतार तोड़कर अपना काम कराना या टिकट लेना यहाँ भोकाल माना जाता है और छोटी मोटी बातों पर गाली गलौज को रुतबा ।कहीं कानफोड़ू  बैण्ड के साथ सड़क को घेरे मस्ती में झूमते बाराती पूरी सड़क को बंधक बना लेते हैं और यातायात घंटों तक  पूर्णत: जाम ।सरकारी हो या गैर सरकारी ,भवन हों या खाली स्थान, पान के पीक तो अवश्य ही दिखेंगे,यह है मेरी आज की काशी ।आज यदि बनारस के पास ढेर सारी आधुनिक उपलब्धियाँ  हैं तो सदियों से प्रचलित  अपनी परंपरा के क्षरण का दर्द भी ।थोड़े विलुप्त हो चुके हैं और  थोड़े कगार पर ।लोगों !कुछ ऐसी ही है आज की अपनी काशी । अस्तु ।।************

************************मंगलवीणा

दिनाँक:14.फरवरी 2025

गुरुग्राम,हरियाणा------'----------------

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शुक्रवार, 5 मई 2023

बाइक टैक्सी की सवारी

 *बात  दिनांक 23 मार्च 23 की है ।। प्रातः जल्दी ही मैने अपनी एक्सयूवी ड्राइवर  के साथ पिरियाडिक सर्विस के लिए वाराणसी बाबतपुर मार्ग पर स्थित महिन्द्रा डीलर के यहाँ  भेज दिया था ताकि तीन चार बजे तक गाड़ी घर आ जाय ।यह तो पता ही था कि  सर्विस के बाद ज्योंही भुगतान की बात होगी,ड्राइवर परेशान होगा ।अतः दो बजे तक तैयार  होकर महीन्द्रा पहुँचने के लिए किसी वाहन के जुगाड़ मे लग गया ।एक बार तो सोचा अपनी बाइक से चलता हूँ;पूरी जिन्दगी तो इसी साधन से चलता रहा हूँ ।परंतु अन्दर से तुरंत प्रतिवाद हुआ,"बार बार भूलो मत  कि सत्तर पार कर चुके हो और इक्कीसवीं सदी है ,ऊपर से मोदी जी द्वारा विकसित आज का  बनारस  -चौडी सडकें,कही गाडियों का रेलम-पेल जाम तो कहीं आँधी सी भागती ट्रैफिक।कब कौन उड़नबाज गाड़ीचालक किनारा  पकड़े पैदल राही, साइकिल या बाइक सवार  का छक्का लगा दे या भीम दुर्योधन  के गदा की टकराहट वाली गर्जना के साथ गाड़ियों के परखचे उड़ जाँय;ईश्वर ही मालिक हैं ।सड़क पर अब पहले की न स्थितियाँ रहीं ,न डर ,न सब्र,  न अनुशासन और न ही दूसरे की फिक्र ।सब तरफ भागती दुनियाँ ।अब तो जल्दी पर जल्दी  ,सुरक्षा की ऐसी तैसी । अतः बाइक से जाने की तो सोचो ही मत ।"

*तब मन बनाया कि गूगल की शरण लेता हूँ और ओला एप से टैक्सी या औटोरिक्शा मँगा लेता हूँ । यह जानते हुए भी कि बनारस में यात्रियों के साथ टैक्सी और ऑटो चालकों का बकरी व कसाई सा निश्चित संबंध है सो  किराये में तो बेवकूफ बनना तय था,फिर भी जल्दी निकलने का दबाव था । अंगुलियाँ मोबाईल पर चल ही रहीं थीं कि मुझे अकस्मात एक बाइक सवारी का विकल्प दिखा और वह विकल्प दब गया । किराया जाँचा तो पहुँचबिंदु तक मात्र एक सौ अट्ठारह रुपये दिखा और मेरे घर तक पहुँच समय सात मिनट । ओके करते ही बाइक  चालक  का मोबाईल नंबर और बाइक का विवरण संदेश मोबाईल पर चमक उठा ।श्रीमती जी को आवाज लगाया ,'बाइक टैक्सी आ रही है । मैं निकलता हूँ । काफी सस्ती भी है । "

*पीछे -पीछे श्रीमती जी भी यथा आदत बाहरी दरवाजे तक आ गईं । हमारी नजरें बाइक आगमन वाली सड़क पर एकाग्र हुईं ।पूरी जिंदगी में कभी बाइक टैक्सी से यात्रा करने का संयोग नहीं मिला था । अतः मन में अजीब सा कौतूहल होने लगा । श्रीमती जी को भी बहुत अटपटा सा लगा ।इंतजार ने उस कौतूहल को और बढ़ाया ।तभी हमें बाहर खड़ा देख पड़ोस वाले मेडिकल कम्पाउंडर जी भी पास आ गए और प्रणाम करते हुए  पूछे कि अंकल ,ऑन्टी आप दोनों किसको देख रहे हैं ?बताना ही था - बेटा मैं बाइक टैक्सी की प्रतीक्षा कर रहा हूँ । बस क्या था ;सवालों की झड़ी लग गई ,कभी पहले बाइक टैक्सी की सवारी किए हैं ?आप का ड्राइवर कहाँ गया ?टैक्सी या ऑटो क्यों नहीं बुक कर लिया ?कहीं गिरा- पड़ा दे तो बिन बुलाए समस्या सर पर ।"

*अच्छी गेंद मिली । श्रीमती जी ने भी तगड़ा थ्रो फेंका ,"उम्र के आठवें दशक में प्रवेश कर गए हैं ,फिर भी आप हरकतें बचकानी करते हैं । कहीं चोट चपेट लगे तो यह मत कहिए गा कि चेताया नहीं ।"चुप होने के अलावा मेरे पास कोई बचाव युक्ति नहीं थी । 

 *पुनर्विचार का दौर चलने ही वाला था कि एक हेलमेट लगाया बाइक सवार हमारे सामने ही अपनी बाइक पर ब्रेकलेकर मोबाईल से किसी को फोन मिलाया।अरे ,यह तो मेरे मोबाईल की घंटी बज उठी और यह सुनिश्चित हो गया कि बुलाई गई बाइक टैक्सी यही थी । जो पहचान संदेश में भेजे गए थे ,मिलान में वे ठीक वही निकले ।विमर्श का केंद्र बदल चुका था।तब  हममे से किसी ने उससे सुरक्षा की बात पूछी तो किसी ने इस रोजगार से आमदनी की बात की ।प्रजापति उपनामधारी उस युवक ने हल्की सी मुस्कान लिए जवाब दिया था ,"महँगाई का जमाना है ।अपने से धंध-फंध होता नहीं ।खाली समय मे इसी बाइक से तीन -चार सौ रुपए कमा लेता हूँ जो मेरी मुख्य आमदनी में जुड़ जाता है और गृहस्थी की नाइया ठीक ठाक चल जाती है -अंकल जी । रही बात सुरक्षा की ;तो हम भी परिवार वाले हैं और हमारा भी घरवाले  इंतजार करते हैं ।"हम सभी निरुत्तर थे ।सुरक्षा की इससे बड़ी गारंटी क्या हो सकती थी ।

 *चलो; मैं होकर आता हूँ; बोलते हुए पीछे बाइक पर उछल कर बैठ गया । बाइक गली से मुख्य सड़क पर ,कभी भीड़ में कभी भीड़ से आगे ,कभी बीच सड़क तो कभी बायें किनारे दौड़ती जा रही थी । आदतन मैं "देखो बेटा !सँभाल के या ब्रेक पर ध्यान रखना "दोहराता जा रहा था । इत्मीनान से प्रजापति दायें- बायें ,चौराहे ,तिराहे का पूरा ध्यान रखते हुए सड़क को पीछे छोड़ रहा था और मैं गिरने- पड़ने वाले भय से सशंकित बाइक पर अपनी पकड़ मजबूत बनाने में लगा हुआ था । जाने कब गाड़ी के लयबद्ध चालन व तेज हवा के मनभावन स्पर्श मुझे अच्छा लगने लगे और मैं आनंद के लहरों पर तैराने लगा।फिर इस लघु यात्रा के आनंद में इतना विस्मृत हुआ  कि ब्रेक का झटका लगने पर ही तंद्रा टूटी। लगा  कि टैक्सी रुक गई है और सुन रहा हूँ" अंकल, वर्कशॉप आ गया ।तंद्रा टूटी ।मन में विचार उठा कि काश !वर्कशॉप थोड़ा और दूर होता । 

 नीचे उतर कर मैंने उसे धन्यवाद दिया और किराया पूछा 

अंकल ,वही एक सौ अट्ठारह रुपये ।

बटुए से एक सौ तथा एक बीस का नोट निकाल कर उसकी ओर बढ़ाया । 

*दो रुपये का सिक्का मुझे पकड़ाते हुए वह आगे बढ़ गया और मैं रोमांच की सवारी से उतर कर वर्कशॉप के गेट पर खड़ा था ।इस छोटी सी यात्रा ने मुझे स्फूर्ति और ताजगी से ऐसा भर दिया कि कई घंटों तक वय संबंधी थकान का कहीं अता पता नहीं । । प्रसन्नमन वर्कशॉप में दाखिल हुआ । ड्राइवर से सर्विस की जानकारी लिया और भुगतान के बाद  गाड़ी लेकर ड्राइवर से बातचीत करते घर आ गया । अभी भी याद आने पर वह उन्नीस बीस मिनट की यात्रा कमोवेश रोमांचित कर देती है ।

 सच है कि झुर्रियाँ चेहरे पर पड़ती हैं ,दिल पर नहीं । लड़कपन ,जवानी तथा बुढ़ापा मुख्य रूप से दिल /सोच से जुड़ी मनः स्थितियां हैं न कि उम्र से ; और जीवन में रोमांच,एडवेंचर तथा आनंद देने वाली ऐसी घटनाएँ , यात्राएँ व तदन्तर उनके वृतांत के अनुगमन मन को तरोताजा किंवा जवान कर देते हैं--------------मंगलवीणा  

वाराणसी ,बुद्ध पूर्णिमा ;दिनाँक 5 मई 2023

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मंगलवार, 8 सितंबर 2020

सेंगर राजपूतों का रोमाँचक इतिहास

 सेंगर राजपूतों की एक बसाहट-भदिवाँ  भी -------------------------

***************बालपन से 'आप कौन से राजपूत हैं 'का जवाब 'मैं सेंगर राजपूत हूँ 'कहते सात दशक बीत गए। मन में जिज्ञासा हुई कि ए सेंगर,ए राजपूत कौन हैं  जिनके हम वंशज हैं। फिर मैंने राजपूतों विशेषकर सेंगर राजपूतों के उद्भव ,विस्तार और वर्तमान को उपलब्ध साक्ष्यों ,परम्पराओं ,कुलधर्मिता ,श्रुतियों ,पौराणिक कथाओं और राजपूतों के उपलब्ध इतिहास को देखा ,सुना ,पढ़ा, गुना और धुना। फलतः मैंने इस राजवंश को त्रेतायुगीन श्रृंगी ऋषि से प्रारम्भ होकर आज सम्पूर्ण अविभाजित भारत व श्रीलंका तक विस्तारित पाया।चूँकि कोई क्रमबद्ध इतिहास सुलभ नहीं है अतः टूटी कड़ियों को जोड़ कर 'निश्चित रूप से ऐसा ही था 'वाला इतिहास नहीं बनाया जा सकता। लेकिन मुझे अपने प्रयास से बहुत ही आत्मसंतुष्टि मिली कि हमारी वंश परम्परा कुछ ऐसे ही यहाँ तक पहुँची है।आइए चलते हैं  इस वंश यात्रा पर विहंगम दृष्टि डालने।     

क्षत्रिय कौन,फिर सेंगर क्षत्रिय कौन -----------------------

********हमारे सनातन धर्म या जीवन पद्धति में स्वभावज गुणों से प्रेरित कर्मों के आधार पर  मानव समाज को  चार वर्णों; अर्थात ब्राह्मण ,क्षत्रिय ,वैश्य और शूद्र; में विभाजित  किया गया है। श्री मद्भगवद्गीता के अट्ठारहवें अध्याय  में अर्जुन के वर्ण विषयक शंका का समाधान करते हुए भगवान  श्री कृष्ण ने स्पष्ट किया कि क्षत्रिय कौन है।यथा -

***************शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनं। 

***************दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजं। (१८/४३ )

जिनका बहादुरी ,तेज ,धैर्य ,दक्षता ,युद्ध से अपलायन ,दान तथा ईश्वरभाव से सबका पालन करना स्वाभाविक कर्म है , वे क्षत्रिय हैं। ए ही क्षत्रिय आगे विस्तार पाते हुए छत्तीस उपजातियों में विभाजित हुए। यथा -

***************[+दस रवि से दस चंद्र से ,बारह ऋषिज प्रमान।**

*************** चार  हुतासन सों भयो ,कुल छत्तीस वंश प्रमाण। ]

इन्ही बारह ऋषि वंशजों में सेंगर राजपूत प्रथम वरीयता क्रम में आते हैं। सेंगर अपनी आध्यात्मिक रूझान , संघर्षशक्ति एवँ बहादुरी के अतिरिक्त अपने संस्कार और सभ्यता के लिए सम्पूर्ण राजपूतों में आदरणीय रहे हैं। क्षत्रिओं के श्रृंगार कुल होने के कारण भी इन्हें सेंगर कहते हैं।इन ऋषिवंशी राजपूतों का गोत्र गौतम ,वेद यजुर्वेद ,गुरु विश्वामित्र व कुलदेवी विंध्यवासिनी हैं।इनका पहचान ध्वज लाल होता है तथा पूज्य नदी सेंगर है। बलिया संभाग के राजपूतों के कुलदेवता श्रीनाथ जी रसरा बलिया हैं। ए राजपूत दशहरे के दिन कटार की पूजा करते हैं।  

**************************सेंगरों की वंश परम्परा ****************************************

रामायणकालीन साक्ष्य एवँ वर्तमान तीर्थस्थल :------------------------

***************श्री राम की बड़ी बहन  शान्ता थीं जिनकों ग्रहीय प्रतिकूलता के कारण श्री दसरथ जी एवँ माता कौशल्या ने अंगदेश के राजा रोमपद व रानी वर्षिणी को पालन हेतु गोंद दे दिया। रानी वर्षिणी और कौशल्या जी सगी बहनें थी। इस प्रकार शान्ता की परवरिश उनकी मौसी और मौसा ने किया। एक समय जब अंगदेश में बहुत  भीषण अकाल पड़ा तब  राजा ने महर्षि विभाण्डक के युवा तपश्वी पुत्र श्रृंगी ऋषि को बुला कर इन्द्र पूजन का अनुष्ठान करवाया जिससे अंगदेश में खूब वर्षा हुई और सर्वत्र खुशहाली की लहर दौड़ पड़ी। राजा और रानी अति प्रसन्न होकर  शान्ता का हाथ श्रृंगी ऋषि को सौंप दिए।इस दम्पति को दो संतानें हुई ;1. अर्गल से गौतम वंश और 2. पदम से सेंगर वंश चला।चूँकि पौराणिक काल से अंग देश बिहार के पूर्वी भाग व बंग के पड़ोस में स्थित रहा है अतः  सेंगरों की वंश परंपरा वर्तमान में बिहार के लखीसराय  (अंग देश )से ही प्रारम्भ होती प्रतीत होती है।  यहाँ आज भी श्रृंगी ऋषि धाम नामक एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है। मान्यता है कि यहीं पर श्रृंगी ऋषि और शान्ता की जीवन यात्रा से ऋषि वंश सेंगरों की उत्पत्ति हुई थी और यहीं आश्रम में श्री राम तथा उनके भाइयों का मुंडन संस्कार भी संपन्न हुआ था।परन्तु यह भी सत्य है कि रामायण काल में  आगरा क्षेत्र में रुनकता के पास यमुना किनारे सिंगला गांव में  श्रृंगी ऋषि की एक  तपोस्थली थी जहाँ पर पूर्व वर्णित  इनकी दोनों पुत्र संतानें पैदा हुई थीं। यह आज भी एक दर्शनीय स्थल है।वर्तमान में सेंगरों की सर्वाधिक बसाहट का आगरा से चल कर मैनपुरी ,इटावा ,जालौन ,कन्नौज ,कानपुर और रीवाँ के आसपास होना आगरे से आरम्भ इस वंश यात्रा की पुरजोर पुष्टि करता है।

ब्रह्मपुराण :------------------------- 

***************एक दूसरे मत डा ईश्वर सिंह मडाड रचित राजपूत वंशावली के अनुसार  ब्रह्मपुराण में वर्णन आया है कि  चंद्रवंशीय राजा महामना के पुत्र तितिक्षु ने भारत के पूर्वी भाग में एक राज्य स्थापित किया। इनके पुत्र बलि के पाँच पुत्र हुए जिन्हे बालेय कहा गया। इनके नाम थे अंग ,बंग ,सहय ,कलिंग और पुण्ड्रक। अंग की बींसवीं पीढ़ी में विकर्ण के सौ पुत्र हुए। सौ पुत्रों के पिता होने के कारण उन्हें शतकर्णि नाम से प्रसिद्धि मिली। इन्हीं के वंशज एक बड़े राज्य की स्थापना करते हुए पूर्वोत्तर एवँ  बंग होते हुए आंध्र पहुँचे।फिर  राज्य का विस्तार मालवा ,विदर्भ से नर्मदा तक किया।कालान्तर में इन्हीं के वंशज सिंहबाहु के पुत्र विजय ने सन 543 में  समुद्र मार्ग से जाकर लंका विजय किया और  पिता के नाम पर सिंघल राजवंश स्थापित किया। इसी कारण लंका को पूर्व में सिंघल द्धीप के नाम से जाना जाता था। शातकर्णी से ही सेंगर ,सिंगर ,सेंगरी इत्यादि नामों से जाने जाने लगे।

 कनार से जगमन पुर की यात्रा:-------------------------    

  *************** ग्यारहवीं शताब्दी तक  सेंगर चेदि,डाहर ,  मालवा ,कर्णावती (रीवाँ ) व आस पास कई प्रांतों तक फैलाव ले चुके थे।जब अन्य प्रांतों में ए पराभव की ओर बढे ,रीवाँ के मऊगंज को अपने राज्य का केंद्र बनाया।उनके द्वारा निर्मित गढ़ी जैसे नईगढ़ी ,मऊगंज ,मनगवां,इत्यादि आज भी उनकी उत्कर्ष गाथा हैं।कालांतर में मुगलों से हाथ मिला बघेलों ने इन्हें चुनौती दिया और ए रीवाँ रियासत के अधीन हो गए।  कर्णावती उदय से पहले ही सेंगरों ने जालौन ,कन्नौज ,इटावा ,मैनपुरी में अपना दबदबा स्थापित कर लिया था।जालौन के राजा विसुख देव ने कनार को अपनी राजधानी बनाया। इनकी शादी कन्नौज के गहरवार राजा जयचन्द की बेटी देवकाली से हुई। अपनी रानी के नाम पर उन्होंने देवकली नाम का नगर बसाया और बसीन्द(बसेढ़ ) नदी,,का नाम बदलकर सेंगर नदी कर दिया।सेंगर नदी आज भी मैनपुरी ,इटावा , कानपुर हो कर बहती है।विसुखदेव के वंशज जगमन शाह को जब बाबर ने पराजित कर कनार को तहसनहस कर दिया तब जगमन शाह के नेतृत्व में सेंगरों ने जालौन के दूसरे भूभाग पर जगमनपुर नाम की राजधानी की नींव डाली और पुनः एक शक्तिशाली राज्य स्थापित किया ।जगमनपुर के राजा आज भी सेंगरों के प्रमुख माने जाते हैं। और इस क्षेत्र के पचासों गांव में सेंगर बसते हैं जो अपने को कनारधनी कहते हैं। इन्हीं के वंशज रेलिचंददेव ने भरेह में अपनी राजधानी बनाई। इनके दसवें वंशज भगवंतदेव ने नीलकण्ठ भट्ट से भगवंत भाष्कर ग्रन्थ की रचना कराई थी। इसके बारह मयूख (अध्याय )हैं और यह आज भी हिन्दू लॉ का प्रमुख सन्दर्भ ग्रंथ है। वर्तमान में सेंगर राजपूतों की प्रमुख शाखाएँ चुरू ,कदम्ब ,बराही (बिहार,बंगाल,असम ),डहलिया आदि हैं। वर्तमान में सेंगर मध्य प्रदेश के रीवाँ और पड़ोस के उत्तर प्रदेश से जुड़े क्षेत्र ,उत्तर प्रदेश के जालौन ,अलीगढ ,फतेहपुर ,कानपुर,औरैया ,इटावा के भरेह, फफूंद  ,मैनपुरी ,वाराणसी ,बलिया तथा विहार के छपरा ,पूर्णिया आदि ज़िलों में पाए जाते हैं।

भरेह ,फफूँद (इटावा )से रसरा बलिया:----------------------- 

***************कनार काल के दौरान ही तेरहवीँ शताब्दी  मे भरेह , फफूंद (इटावा ) के कुछ सेंगर राजपूतों का साहसिक दल हरी(सूर) शाह और बीर शाह नाम के दो भाइयों के नेतृत्व में पूर्वांचल की ओर बढ़ा और गंगा घाघरा के बीच अपना राज्य स्थापित करने का उपक्रम किया। घने जंगल और एकान्त  की स्थिति के कारण इन्हें सामरिक लाभ मिला।परिणामस्वरूप सेंगरों ने न केवल इस बड़े भूभाग को राजभरों के अधिपत्य से मुक्त कर  सम्पूर्ण लखनेसर परगना पर अधिकार किया बल्कि इसके बैभव को पुनर्स्थापित किया। लखनेसर को शिव आराधना का महत्वपूर्ण केंद्र बनाया।इसके विशाल प्रांगण में लक्ष्मी नारायण और राधा कृष्ण मंदिर भी पूजित थे।हरी(सूर ) शाह के भाई बीर शाह के वंशज पास के सिकंदरपुर और जहानाबाद परगना तक फ़ैल गए जिन्हे आज बिरहिया राजपूत कहते हैं।रसड़ा बलिया इनके सत्ता का केंद्र रहा और यहीँ इनके पूज्य कुल देवता श्री नाथ जी की समाधि बनाई गई जो एक तीर्थ के रूप में पूजित है। यह राज्य अट्ठारहवीं शताब्दी तक एक सुगठित लोकतंत्रात्मक शासन के रूप में अनेकानेक आक्रमणों के बावजूद अविजित रहा ।सेंगरों में कोई राजा नहीं ,बल्कि संगठन व सामूहिक फैसले सत्ता सँभालती थी।ब्रिटिश काल में इन्होंने बनारस राज्य के राजा बलवंत सिंह व अंग्रेजों को जबरदस्त टक्कर दिया।

***************इन्हीं बसाहटों में रसड़ा से पंद्रह किलोमीटर दूर तमसा नदी के तट पर नगपुरा  और टीका देऊरी गाँव हैं।नगपुरा गाँव से बाहर  तमसा तट पर श्रीनाथ जी( पर्याय बाबा अमरदेव ,बाबा सत्य प्रकाश राव) की पाँच में से दूसरी समाधि स्थित है।श्रीनाथ जी दैवी शक्ति संपन्न सेंगर वंशीय बिभूति थे जो वहाँ सेंगरों के पथ प्रदर्शक एवं पूज्य होने के कारण उनके कुल देवता के रूप में पूजित हुए।श्रीनाथ जी शिव की आराधना करते थे और शैव मतावलम्बी थे। जिनको सेंगरों की परम्परा से परिचय पाना हो उन्हें रसरा के श्रीनाथ की समाधि पर होने वाले चक्रमणीय पञ्च वर्षीय मेले को देखना चाहिए जब बाबा को 151 क्विंटल गेहूँ का रोट चढ़ता है और देश विदेश से सेंगरों का जन शैलाब उमड़ पड़ता है।रसड़ा का श्री नाथ धाम एवं उसके चहुँ ओर फैले तालाब ,भींटे,भवन, मैदान व  ,जनश्रुतियाँ हर आगंतुक को सेंगरों की गणतांत्रिक समृद्ध शासन व्यवस्था से परिचित कराते हैं।   

अंततः टिका देउरी(नगपुरा ) से भदिवाँ :-------------------------------------  

***************अब हम बढ़ते हैं भदिवाँ की यात्रा पर जब अट्ठारहवीं उन्नीसवीं सदी के सन्धि काल में बनारस के बरथरा (चौबेपुर )निवासी एक रघुवंशी राजपूत ने अपनी पुत्री का विवाह टिकदेउरी के सेंगर परिवार में किया और अपने गाँव के निकट अमौली गाँव की अस्सी बीघा जमीन अपनी पुत्री और दामाद को उपहार में भेंट किया। बाद में यह दम्पति इसी जमीन पर आ बसी जहाँ भदिवाँ नाम की एक बसाहट आकर ले रही थी। धीरे धीरे इस बस्ती में ब्राह्मण , अन्य राजपूत ,अहीर ,सुनार,तेली , लुहार ,गड़ेरी ,पासी ,राजभर ,हेला (मुस्लिम )इत्यादि आ बसे और यह एक पूर्ण गाँव का आकर ले लिया।आज भी यह गाँव अमौली राजस्व गाँव का उपगाँव  है तथा वाराणसी के पहड़िया -बलुआ मार्ग पर दायीं ओर शहर से बारह किलोमीटर दूरी पर स्थित है।जाल्हूपुर ,विशुनपुरा ,उकथी ,सिरिस्ती ,भगतुआ,अमौली और अम्बा इसके पड़ोसी गाँव हैं। वर्तमान वर्ष 2021 की स्थिति यह है कि अन्य गाँवों की भाँति इस गाँव की चहल पहल भी कहीं खो गई है और रोजगार ,नौकरी के कारण परिवारों का पलायन जारी है। यहाँ से आगे भदिवाँ में सेंगरों की यात्रा व यथासंभव वंशावली विवरण अंकित करने का प्रयास होगा। क्रमशः---- 

अशोकविहार ,वाराणसी --------------------------------------------------- मंगला सिंह /मंगलवीणा  

दिनाँक 25 मार्च 2021----------------- -------    mangal -veena .blogspot @ gmail.com 

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बुधवार, 2 सितंबर 2020

Mangal-Veena: सिच्छक हौं सिगरे जग को तिय....

Mangal-Veओफena: सिच्छक हौं सिगरे जग को तिय....: *****************शिक्षक दिवस पर शिक्षकों को समर्पित एक अनुरोधपत्र **** ***************शिक्षा रुपी अँगुली का संबल दे मानव सभ्यता को समय साप...

मंगलवार, 11 अगस्त 2020

Mangal-Veena: आम आदमी सदमे में

Mangal-Veena: आम आदमी सदमे में:                      जन्माष्टमी के पावन पर्व पर श्री कृष्ण महाराज के चरणों में समर्पित एक कविता महँगाई क़े  नए दौर में ,रूपया  लुढ़का  ग...

रविवार, 10 मई 2020

Mangal-Veena: श्रवणकुमारों ,तुम्हें नमन

Mangal-Veena: श्रवणकुमारों ,तुम्हें नमन: ***************बीते मदर्स डे के समापन पर करोड़ों भाइयों ,बहनों और बच्चों , जिनके पास माँ हैं ,को यह सौभाग्य बने रहने की शुभ कामनाएँ तथा हजार...

शनिवार, 18 अप्रैल 2020

ग्राम नागरिक (भाग एक )

  ***********पुण्य सलिला गंगा  तीर्थराज  प्रयाग में यमुना और सरस्वती को समाहित करती है और यही इनका मोक्षदायी संगम बनता है जहाँ कभी अमृत कुम्भ से कुछ बूँदें गिरीं और इस स्थान को सनातन धर्मियों केलिए अनादि काल से  तीर्थराज प्रयाग बना दिया । यही पावन गंगा संगमस्थल से आगे बढ़ कर विन्ध्याचली के गले लगती है और देखते ही देखते शिव प्रिया काशी के गले का चंद्रहार बनती है।समय इस मनोहारी दृश्य का अतीत से साक्षी रहा है और जाने कितने युगों तक भविष्य में साक्षी रहेगा।इस पुरातन काशी की धार्मिक,ऐतिहासिक,सांस्कृतिक,साहित्यिक एवं शैक्षिक महत्ता किसी से छिपी नहीं है ।सदियों से यह नगरी एक जाज्वल्यमान प्रकाश स्तम्भ की तरह मानव सभ्यता की प्रभा अनवरत बिखेरती रही है । ऐसे केंद्र बिन्दु वाले इस वाराणसी जनपद के निवासियों की जीवन शैली भी विविधातापूर्ण एवं अप्रतिम है।
***********इस जनपद में पुण्यसलिला के दोआबे से दो -ढाई किलोमीटर दूर है-- एक गाँव शिवपुरवा जिसकी आबादी ऊँचे -नीचे एक हजार है । लगभग हर जाति और वर्ग के लोग यहाँ रहते हैं । गाँव के बड़े -बूढ़े कहते हैं कि चार सौ साल पहले बलिया से एक राजपूत ,पास के किसी गाँव से एक ब्राह्मण ,एक हेला मुस्लिम ,एक बनिया ,दो हरिजन एवं एक गड़ेरिया (भेड़ बकरी पालने वाला )परिवार आ बसा था ;जो आज एक गाँव का रूप ले चुका है ।  बाद के वर्षों में  कुछ और जाति के लोग भी  आ बसे हैं। गाँव में दो -ढाई सौ साल पहले पूर्वजों द्वारा स्थापित शिव मंदिर है जिसके मंडप ,प्रांगण और आँगनबाड़ी का बंध मात्र वह संकुल है ;जिसे गाँव का सार्वजनिक स्थल कहा जा सकता है । तीज -त्यौहार हो ,किसी के घर शादी हो ,सभा -पंचायत हो ,गाँव में किसी साधु -फकीर या अफसर का आगमन हो ;यह शिव मंदिर गतिविधियों का केंद्र बना रहता है । यह वह मंदिर है जहाँ हेला और पंडित दोनों की समान भागीदारी एवं माँग है ।अहाते में एक कुआँ है जिससे श्रमदान केरूप में बाल्टी एवं गागरे से पानी निकाल कर मंदिर की बगिया को गाँव वालों ने क्या हरा भरा कर रखा है कि हठात थोड़ी देर यहाँ बैठ जाने का जी करता है ।
***********गाँव की बढ़ती आबादी के दबाव में बुद्धू गड़ेरिया सपरिवार इसी गाँव के बाहर बाप -दादों से मिली एक बीघे जमीन में अपना नया घर बना कर रहने लगा है । वह अपने वय के छठे दशक की संधि पर है फिर भी हट्टा -कट्ठा गठीला शरीर है और आज भी दस -बारह घंटे काम करने की उसमें मनसा ,वाचा ,कर्मणा क्षमता है । अपने जमाने में दो जमात पास यह बुद्धू गड़ेरिया अपनी सोच ,सादगी ,कला प्रेम ,विचारधारा एवं समाजिकता के लिए शिव पुरवा में ही नहीं आस पास के गाँवों में भी आदर से संबोधित किया जाता है । सब मिलाकर वह शिव पुरवा का कर्मठ ,विचारवान एवं अनुकरणीय नागरिक है । मात्र निवासी नहीं ।
***********मुझे इस नागरिक के जीवन दर्शन में बहुत दिलचस्पी रही है । कभी तथागत की कर्मभूमि ,वेदव्यास एवं उद्दालक ऋषि की तपस्थली व अश्वमेध की उद्घोष करने वाली धरती पर एक गाँव की सीमा तक कार्यशील साधारण व्यक्ति में दूसरों के लिए मार्ग दर्शक व प्रेरणा देने वाले तत्व क्या हो सकते हैं ?यह प्रश्न हैरतअंगेज हो सकता है । परंतु क्या यह इतिहास  का जांचा परखा या देखा गया सच नहीं है कि साधारण गुणों को अपने जीवन में सटीक क्रियान्वयन से जोड़नेवाले लोग ही महान मानव साबित हुए हैं ,चाहे उनका नाम गौतम बुद्ध ,कबीर ,गाँधी या कुछ और रहा हो । कम या अधिक इसी साधरणपन के प्रति उसकी प्रतिबद्धता इस गड़ेरिया के जीवन के दो पहलू हैं  ,जो उसे आम से खास बनाते हैं और लोग उसे पसंद करते रहे हैं ।बात कला की हो या गाँव के दो कुनबों के बीच कलह की ;समस्या व्यक्तिगत हो या सामूहिक ;बातें गँवई अर्थव्यवस्था की हो या राजनीति की ;इस बुद्धू की टिप्पणी बहुत ही सहज और दो टूक होती है । अतः जब कभी फुरसत होती ,मैं भी कुछ न कुछ जानने की अभिलाषा लिए अपने समय के सदुपयोग के लिए बुद्धू गड़ेरिया के पास पहुँच जाता । सम्बोधन में मैं उन्हे चाचा कहता । उम्र में बहुत छोटा होने के कारण वे मुझे मेरे नाम सुनील से बुलाया करते । 
***********बुद्धू गड़ेरिया का कुनबा इस प्रकार है -पत्नी सुदामा ,दो बेटियाँ प्रभा व प्रतिभा ,एक बेटा प्रयास ,बहू मीरा व उसके दो बेटे राहुल एवं वरुण । बड़ी बेटी का विवाह हो चुका है । पिता ने उसे स्नातक तक की शिक्षा दिलवाई है । प्रयास की उम्र करीब पैंतीस वर्ष है और नौवीं कक्षा तक पढ़ाई के बाद गृहस्थी में लग गया है । वह शहर से गाँव तक ,दवा से आश्रितों के शिक्षा तक ,खान -पान से बाजार तक पारिवारिक रिश्तों से गँवई संबंधों  तक सारी जिम्मेदारियाँ बखूबी निभाने लगा है ।बेटी प्रतिभा व दोनों पौत्र क्रमशः ग्यारहवीं ,आठवी एवं छठी कक्षा में पढ़ रहे हैं ।पूरा परिवार वैचारिक ताल मेल के ऐसे सूत्र में पिरोया है जिसमें कहीं किसी गाँठ की आशंका नहीं । सब कुछ सीधा -साधा परंतु कर्मठता की नींव पर आत्मनिर्भरता की बुलंदी पर है ,यह कुनबा । यही आत्म निर्भरता इस परिवार की पूँजी है और यही वह मानक है जो पूरी अर्थ तंत्र व्यवस्था को परिभाषित करने का दम भरता है । अतः इस इकाई से समाज की वर्तमान जटिलताओं को समझने की जिज्ञासा मेरे अंदर सदैव बनी रही है ।
***********इस परिवार का पेशा है -तीन चौथाई बीघे जमीन पर सघन खेती ;छोटे स्तर पर पशुपालन ;भेड़ -बकरिओं के ऊन से देशी कंबल बुनना ;खाली समय में गाँधी चरखे पर सूत कातना ;रस्से बटना ;रहट्टे से खाचिए और झउए बनाना ,खटिए और मचिए बुनना वहीं  पत्नी और बहू द्वारा ,जाड़े की मीठी धूप में बैठकर, कास और सरपत से टेकुरी के सहारे रंग -बिरंगी कुरई झपिया ,डलिया जैसी सजावटी समान बनाना तथा शेष महीनों में माँग के अनुसार कुरसिए से सजीली व कलात्मक वस्तुएं बनाना । गाँव की जरुरतमन्द महिलाओं को भी इनके यहाँ काम मिल जाता है ।साधारण गँवई कच्चे माल को यह परिवार अपनी कड़ी मेहनत ,कला और सामयिकता का वह पुट देता है कि इनके उत्पाद का स्थानीय बाजार और गाँव के लोगों में सम्मोहन चलता है । इन सबके पीछे है इनकी कला ,समय की समझ और हाथ में लिए काम के प्रति पूर्ण समर्पण । 
***********जिज्ञासा बस एक बार की बात है मैं ग्राम नागरिक से मिलने उसके घर जा पहुँचा ।वैशाख का महीना ।  दोपहरी ढल चुकी थी । संयोगवश ग्राम नागरिक थोड़ी देर पहले ही अपनी भेड़ -बकरियों के झुंड को, गाँव के  बाहर पगडंडी पर ,अपने बेटे के हवाले कर घर आया था ।तेज धूप जनित थकान से आराम के लिए वह अपने घर से सटे नीम के पेड़ की छाया तले बिछी चारपाई पर निढाल पड़ा था । बगल में उसकी पत्नी एक बाल्टी पानी जमीन पर रखी थी और हाथ में एक लोटा- गिलास लिए खड़ी -खड़ी उससे बातें कर रही थी । उसका पौत्र राहुल गेहूं के नरकुल से बने पंखे से हवा कर रहा था । खटिया पर ही एक किनारे कुरई में गुड़ के कई टुकड़े पड़े थे । पहुँचते ही मैंने उन्हें प्रणाम किया । आवाज पहचानते हुए दोनों चाचा और चाची ने खुश रहो  के स्निग्ध प्रत्युत्तर साथ स्वागत किया । 
***********गड़ेरिया उठता है ,मेरी पीठ थपथपाता है और पास में दूसरी खटिया बिछाते हुए उस बैठने का आग्रह करता है । राहुल को मुझे प्रणाम करने और गुड़ के साथ पानी का गिलास मेरे पास  रखने का संकेत देता है । गुड़ खा कर पानी पीता हूँ और फिर कुशल क्षेम ।हल्के से पछुआ हवा का झोंका चलता है । नीम के पेड़ से निबौरियाँ गिरती हैं साथ ही हवा नीम के पत्तों से ढुलक कर बदन को जो शीतलता दे जाती है ;वह अनुभव करे सो जाने । सामने मुझे खेत में दिखता है -कहीं पपीता ,कहीं भिंडी, कहीं तोरई ,,कहीं कोंहड़ा तो कहीं लौकी ;सब हरा -भरा ।कतारबद्ध क्यारियाँ एवं बीच में एक गली सा रास्ता आगे उनके अलग से बने तीन कमरे बैठक तक पहुँचाता है । एक में पशुशाला ,दूसरे में चार,हुनर और खेती संबंधी ब्यवस्था और तीसरे में उनकी कार्यशाला है जहाँ वे जीविका की साधना करते हैं । एकाएक मैं  देखता हूँ कि बाहर  तार पर एक कम्बल लटक रहा है जो बुनाई और ढुलाई के बाद शायद सूखने हेतु टाँगा गया है । 
उस कम्बल पर सूर्यास्त के समय क्षितिज ओर से माल सी आकृति में अपने घर लौटती पंछी ,नीले आकाश में थके सूर्य की किरणों का बिखराव ,रबी फसल कटने के बाद धरती का बड़ा आवरणहीन भूखंड और इस भूखंड पर दूर कहीं अपने गंतव्य की ओर डग भरते पथिक का बड़ा मनोहारी दृश्य उकेरा गया है । रंगों के साथ दृश्यावली का ऐसा जीवंत समायोजन ऐसा लगता है मानो प्रकृति की एक विशेष घटना इस कम्बल रूपी कैनवस में बंद हो गई हो ।यह मूक भाषा में बोलती उनकी कला है ,साथ ही मनोरम छन -छन बदलती प्रकृति का संकेत भी । लेकिन किसी क्षण विशेष को अपने मन मस्तिष्क में बैठा लेना व हाथों से कम्बल के ताने -बाने में पिरोकर हूबहू मूर्त रूप दे देना क्या किसी सामान्य आदमी से संभव है ;बिल्कुल नहीं । निश्चय ही यह संभावना उन्हीं में पलती होगी ,जिनके पास प्रभु प्रदत्त प्रतिभा विशेष होगी । यही विधा तो कला है और इसी साधना के साधक को कलाकार कहते हैं । विषय की तन्मयता में डूबता जा रहा था की ग्राम नागरिक मुझे टोक देता है ,"क्या सोच रहे हो सुनील "
-मैं सामने टँगे कम्बल पर प्रकृति के पल विशेष का दृश्यांकन देख रहा हूँ । कितना वास्तविक और मनोरम है यह दृश्य । 
-हाँ ,इसकी बुनाई में भाव ,मन ,हाथ और कला का अच्छा सामंजस्य बैठ गया है ।तुम्हारी एकाग्रता से लग रहा है कि हमारा छायांकन ठीक ठाक उतर गया ।रुको !तुम्हें ऐसा ही एक प्रकृति चित्रण दिखाता हूँ । 
वह राहुल को इशारा कर थोड़ी दूर पड़ी एक थालीनुमा कुरई मंगाता है और उसकी तलहटी सामने करते हुए बताता है कि यह छायांकन (सीलूएट )इनकी दादी ने सरपत के के रेड़ को विभिन्न रंगों में रंग कर टेकुरी से उकेरा है । दृश्य की आइडिया में में मैंने जरूर मदद किया था । 
मैं इस कुरई को देखता हूँ तो देखता ही रह जाता हूँ । दोआबे की धारा के पास बोरियों में बालू भर कर अपने ऊँटों की पीठ पर लादे दो तीन ऊँटहारे अपने अपने ऊँटों के रस्से पकड़े हुए कतारबद्ध चले जा रहे हैं । पृष्ठभूमि में यहाँ -वहाँ पेड़ दीख रहे हैं । ऊपर दर्शित आकाश का रंग गोधूलि बेला का समय इंगित कर रहा है । रंगों का सामंजश्य बड़ा ही स्वाभाविक है । मेरे मन में विचार उठता है कि सच है ;जब भावुकता या संवेदना किसी कलाकार के मस्तिष्क में कहीं घनीभूत हो जाती है तो उचित अवसर पर वह कला के किसी न किसी विधा के रूप में हमारे सामने अवतरित हो जाती हैं । यदि कविता रूप में उतरी तो कवि ,शिल्प रूप में उतरी तो शिल्पी और चित्र रूप में उतरी तो चित्रकार । ऐसे ही अनेक रूप हैं कला और कलाकार के ।
***********मुझे लगा कि इस गड़ेरिया की आँखों और मस्तिष्क में किसी घटना या दृश्य को पकड़ने (कैच )करने की एवं अपनी किसी कृति में उकेर देने की विलक्षण दक्षता है जिसे हम मानवेतर या दैवी कह सकते हैं । अब मेरा मन परिस्थितिजन्य सोच से उबरने का उपक्रम करने लगा । हवा के मंथर झोंकों का ,मैं चारपाई पर लेट कर ,थोड़ी देर आनन्द लेना चाहता था । दिमाग को झटका दिया और ग्राम नागरिक से बोल पड़ा कि आज कल हमारी गर्मी की छुट्टियाँ हैं और ऐसी ही कुछ इधर उधर की बातों पर आप के अनुभव और सोच को जानने मैं आप के पास आ गया था । कला की गूढ़ता तो मुझे नहीं मालूम परंतु कलाकृतियाँ मुझे अच्छी लगती हैं । मैं कला की इस विधा पर फिर कभी कुछ और जानने की अपेक्षा करूँ गा ।
गँवई प्रसंग में भी आप अपनी बेबाक बातों के लिए जाने जाते हैं । क्या आप बतायें गे कि हमारे शिव पुरवा के लिए स्वराज या आजादी के क्या मायने ,नुकसान या फायदे हुए हैं ?
अच्छा तो सुनो । मैं इस विषय में कुछ स्वतः की अनुभूति बताता हूँ । मेरे गाँव में स्वराज का पहला संदेश चुनाव के रूप में आया था । तब से समय समय पर दस्तक देकर वापस दिल्ली ,लखनऊ चला जाता है और छोड़ जाता है गाँव में गुटबन्दी ,मनमुटाव ,रिश्तों में दरार व सबके सपनों पर पत्थर पानी । पिछले पचास वर्षों में यह स्वराज सड़क के रास्ते दो किलोमीटर दूर ,बिजली के तारों के रास्ते एक किलोमीटर दूर एवं नहर के पानी वाले रास्ते पाँच किलोमीटर दूर पहुँच कर आगे बढ़ गया है । दो वर्ष पहले दौड़ धूप करके प्रधान ने गाँव तक बिजली के तार खिचवा लाया और टेस्टिंग कर शिव पुरवा की पूरी आबादी को बिजली के लट्टुओं से रात में जगमग दिया । उस दिन गाँव में क्या उत्साह था । सबका मन बागबाग हो गया । लोग दौड़ पड़े कि स्वराज आ गया । परंतु कुछ दिनों बाद ए तार बेजान हो गए । सरकारी लश्कर आया और गया परंतु ए बेजान तार यत्र तत्र आज भी बेकार पड़े हैं । उधर खेतों का नहर के पानी से भेंट भी नहीं हुआ कि टैक्स वसूली का दबाव गाँव के काश्तकारों पर पड़ने लगा ।घुरहू ने कभी सहकारिता सोसाइटी से खाद लिया ही नहीं ,परंतु उसके नाम सोसाइटी का कर्ज सुरसा की तरह ब्याज दर ब्याज बढ़ता जा रहा है । उसने मंदिर में शीश झुकाया ,मस्जिद में सजदा किया ,प्रधान ,साहूकार के यहाँ गुहार लगाया । परंतु सोसाइटी के भ्रष्ट सचिव को द्रवित नहीं कर सका । घुरहू आज भी वह दिन याद करता है जब सोसाइटी के सचिव ने गवाही के नाम पर किसी दूसरे कागज पर अंगूठा का निसान लगवा लिया था । क्या यह सचिव किसी क्रूर जमींदार से कम अतताई और भ्रष्ट है ?रामू अहीर ने सचिव के यहाँ पहुँच लगा कर एक भैंस खरीदने के लिए आठ हजार मंजूर कराया । किन्तु बिचौली तिकड़म के उपरांत उसे छः हजार ही मिले । जैसे तैसे जुगाड़ कर एक दूधारु 
भैंस खरीदा । गरीब पर गरीबी कुछ ज्यादा ही मेहरबान होती है । कुछ महीने बाद उसकी भैंस बीमार पड़ गई । रामू दौड़ा दौड़ा पास के बाजार में पशु डाक्टर के यहाँ पहुँचा । पता चला कि डाक्टर बाबू तो शहर गए हैं । निराश लौट कर वह अनेक देशी दवाई दिया परंतु अपनी भैंस को बचा न सका । अब ब्लॉक वाले भैंस के मरने का प्रमाण माँग रहे हैं । उत्पीड़न और वसूली वाले दुःस्वप्न का उसके घर साक्षात आगमन हो चुका है । स्वाधीनता से अभी तो कुछ नहीं बदला है । लोगों के जेहन में अंग्रेजीयत यथावत बनी हुई है ।हमें इस चारित्रिक संकट से उबरना ही होगा । जब तक नहीं उबरें गे अपेक्षित स्वराज हम तक नहीं पहुँचे गा । 
बुद्धू गड़ेरिया इतना कहते कहते बहुत गंभीर हो जाता है । चाची आवाज देती हैं "देखिए शायद चरवाहे लौट रहे हैं । दूर ऊपर आकाश में धूल उड़ने लगी है । "
मेरा ध्यान घड़ी पर जाता है । साढ़े चार बज रहे हैं । 
ग्रामनागरिक यह कहते हुए चल देता है कि सुनील तब तक तुम चाची से बात करो । शाम को खाना खा कर जाना ।
चाचा जी फिर कभी कहते हुए उठ पड़ा और उन्हें प्रणाम करते हुए घर की राह लिया ।
(आप ने इस अंक में बुद्धू गड़ेरिया के जीवन के दो आयाम देखा -एक कलाकार का ,दूसरा नागरिक का । एक कलाकार हृदय भी देश में व्याप्त चरित्र संकट से बेचैन है परंतु निराश नहीं । अगले अंकों में इस ग्राम नागरिक के अनेकानेक जीवन आयामों से एवं अंचलिकता का सार्वभौमिकता से मिलन कराने का प्रयास जारी रहेगा । रचना पूर्णरूपेण साहित्यिक एवं काल्पनिक है । ) क्रमशः -----
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second edition 
4 th june 2025 ;Varanasi 
                                       

रविवार, 22 मार्च 2020

जनता कर्फ्यू 22 मार्च 2020

***************माननीय प्रधान मन्त्री जी के अपील का अनुसरण करते हुए पूरा देश आज जनता कर्फ्यू पर है।संकट के इस दौर में यह अच्छा लग रहा है कि हम भारतीय प्रधान मंत्री जी के आह्वान पर इस कर्फ्यू को शत प्रतिशत सफल बनाने जा रहे हैं। इष्ट मित्र व्हाट्सएप्प ,फेसबुक ,ट्विटर ,इत्यादि पर सन्देश के माध्यम से, करोना विभीषिका और उससे निपटने के लिए जनता कर्फ्यू सफल बनाने के लिए सन्देश पर सन्देश की झड़ी लगाए हुए हैं।प्रिंट और टीवी मिडिया का तो कहना ही क्या ;लगता है देश दुनियाँ की अन्य खबरों को करोना ने  पहले ही पूर्णरूपेण निगल लिया।पूरे विश्व में मानव जाति के लिए बड़ा कठिन समय है।
***************जब हम घरों बंद हैं हमारे समाज का एक वर्ग पूरी तन्मयता से हमारी सेवा में संलग्न है। उदाहरण के लिए सीमाओं पर सैनिक ;स्वास्थ्य सीमा पर डाक्टर और स्वाथ्य कर्मी ;सफाई मोर्चे पर सफाई कर्मी ; राशन ,सब्जी ,दवा के मोर्चे पर व्यापारी /आपूर्तिकर्ता और सभी के साथ समन्वय तथा व्यवस्था मोर्चे पर प्रशासन और पुलिसकर्मी इस महामारी से जूझने में अहर्निश डटे हुए हैं। अतः हमारा दायित्व बनता है कि हम लोग उनके प्रति कृतज्ञता ब्यक्त करें।ऐसा सन्देश देने के लिए, प्रधान मन्त्री के सुझाव अनुसार, हम सभी लोग घरों से बाहर निकल अपने दरवाजों या बरामदों में आकर आज सायं पॉँच बजे करतल व तुमुल घण्टा घड़ियाल ध्वनि से इन कर्मवीरों के प्रति अपनी कृतज्ञता ब्यक्त करें और इनका हौसला बढ़ाएँ।ये आवश्यक सेवा करने वाले लोग इस विपदा में हमारी लाइफ लाइन हैं।
***************अंततः आशा है कि जनता कर्फ्यू ,लॉक डाउन,क्वारंटीन और सोशल डिस्टैन्सिंग के बहुत अच्छे परिणाम आएँ गे और इस महा संकट से उबरने में भारत कामयाब होगा। इस बीच अपेक्षा है कि हम धैर्य के साथ सोशल डिस्टैन्सिंग और एकान्त वास  बढ़ाए रखें।साथ ही हम सब अंतर्मन से प्रार्थना करें कि प्रभु की प्रेरणा हो और कोई विज्ञानी पवन पुत्र बन यथाशीघ्र ऐसी संजीवनी सी दवा ढूंढ़ लाए जो इस करोना का शर्तिया तोड़ सिद्ध हो।आज 'जा पर जा कर सत्य सनेहू। सो तेहि मिलहि न कछु संदेहू।' की भी अग्निपरिच्छा है।विश्व का कल्याण हो और मानवता विजयी।-------------------------------------------------------------------------------------------------मंगला सिंह /मंगलवीणा
वाराणसी ;दिनाँक 22 मार्च 2020 --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------mangal-veena.blogspot.com@gmail.com
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सोमवार, 30 दिसंबर 2019

वाह फेविकोल वाह

*************************अपने आचरण के विपरीत कोई कोई वाणिज्यिक विज्ञापन भी हमें गुदगुदा जाते हैं।ऐसे विज्ञापन अपने उत्पाद का प्रचार प्रसार तथा विपणन विस्तार तो करते ही हैं;साथ में अपने संवाद संप्रेषण एवँ मिठास के कारण अति लोकप्रिय हो जाते हैं। इस वर्ष एक ऐसा ही विज्ञापन टीवी पर फेविकोल के लिए आया जिसका शीर्ष बोल है "सोफा बनाए तो दिल से बनाए "।अन्य विज्ञापनों से हट कर इस विज्ञापन ने, प्रचार प्रसार का काम करने के साथ साथ , कर्णप्रिय संगीत और प्रेरक सन्देश दिया है। सबसे बड़ी विशेषता यह कि शर्माईन के यहाँ से चल कर बंगालन तक पहुँचने वाली सोफे की साठ साल की यात्रा वयान करते करते पीडिलाइट इंडिया ने ,तेजी से, भारत के बदलते परिदृश्य का बड़ा ही सजीव  प्रस्तुतीकरण किया है।सफलता का राज भी तो यही है कि प्रयास दिल से किया जाय।मुझे ऐसा लगता है कि इस विज्ञापन ने आप का भी ध्यान अवश्य आकृष्ट किया होगा। अस्तु फिर कभी इसे जरा ध्यान से सुनिए गा और इसके सन्देश को महसूसिए गा।अच्छा लगे तो फिर सुनिए गा। प्रणाम।  ------------------------------------------------------मंगलवीणा
 वाराणसी :सोमवार दिनाँक 30 दिसम्बर 2019     

गुरुवार, 19 दिसंबर 2019

Mangal-Veena: इतिहास बनाए तो ऐसे बनाए

Mangal-Veena: इतिहास बनाए तो ऐसे बनाए: ***************किसी भी देश या समाज का इतिहास उसके अतीत में घटित घटनाओं और उनके प्रभावी आयामों का यथार्थ अभिलेखन होता है।कालक्रम में बिना कि...

बुधवार, 18 दिसंबर 2019

इतिहास बनाए तो ऐसे बनाए

***************किसी भी देश या समाज का इतिहास उसके अतीत में घटित घटनाओं और उनके प्रभावी आयामों का यथार्थ अभिलेखन होता है।कालक्रम में बिना किसी दूसरे समाज या संस्कृति से दबे या चोट खाए जो समाज अपनी संस्कृति और सभ्यता का विकास जारी रखते हुए उसे सही रूप में अभिलेखित कर पाता है वह अपने लिए गौरवान्वित करने वाले इतिहास का सृजन करता है अन्यथा  संघर्ष में पराजित होने या पिछड़ने पर उसे झेंपाने और ग्लानि देने वाले छद्म इतिहास का उत्तराधिकारी बनाया जाता है।यही कारण है कि सम्पूर्ण भारत के परिपेक्ष्य में पृथ्वीराज चौहान के बाद सन उन्नीस सौ सैंतालीस में देश को स्वतंत्र होने तक हमारा इतिहास, कुछ अपवाद खंडों को छोड़ कर, झेंपने- झेंपाने वाला बनाया और बताया गया। जो देश सांस्कृतिक सभ्यता एवं मानवता विकास का आदि काल से विश्व में सबसे अग्रणी भूभाग रहा उसके मध्य कालीन एवँ आधुनिक इतिहास को शासकों के इशारे पर वदनियत इतिहासकारों ने विद्रूप कर दिया।गणतंत्र बनने के बाद भी सत्ता में बैठे विदेशी संस्कृति वाले देशी लोग हमारे देश को औपनिवेशिक शासकों के ढर्रे पर चलाते रहे।  उनके संरक्षण में हमें हीन बताने वाला छद्म इतिहास पढ़ाया जाता रहा और हिन्दू बहुल समाज अपने अतीत के प्रति हो रहे दुराग्रह से छटपटाता और छला महसूस करता रहा।इस बीच भारत और भारतीयता पर गर्व करने वाले महापुरुषों एवँ संगठनों के नेतृत्व में सामाजिक एवँ सांस्कृतिक पुनरुत्थान के पुरजोर प्रयास भी जारी रहे । परिस्थितियाँ बनती गईं और सन दो हजार चौदह आते आते  हिंदू (भारतीय ) संस्कृति और राष्ट्रवाद का पूरे देश में ऐसा प्रचण्ड ज्वार उठा कि राष्ट्रवाद सह हिन्दू संस्कृति की उपेक्षा करने वाली विचार धाराएँ तहस नहस होने लगीं और भारतीय जनमानस ने मन ही नहीं बनाया बल्कि अपने राष्ट्र और संस्कृति को विश्वपटल  पर स्थापित करने के लिए मोदी नीत भाजपा को बहुमत से केंद्रीय सत्ता में बैठा दिया।
*************** फिर क्या  पिछले छः वर्षों के बेहतरीन घटनाक्रमों से सजा भारतीय इतिहास स्वर्णाक्षरों से अंकित हो रहा है। साथ ही पूर्व के इतिहास को भी सत्य एवँ यथार्थ के कसौटी पर कसा जा रहा है।सन दो हजार चौदह से वर्तमान वर्ष के पूर्वार्द्ध वाले पाँच वर्षीय कालखण्ड में नए धरातल पर खड़ी भाजपा सरकार  ने ,जनता से प्राप्त विश्वास के अनुरूप एक से बढ़ कर एक निर्णय एवँ क्रियान्वयन से, देश तथा दुनियाँ को चकाचौंध किया। जनता एवँ सरकार से इस कालखण्ड को स्वर्णिम कालखण्ड बनानेवाली अनेकानेक महत्वपूर्ण घटनाएँ उपजीं जो पूरी दुनियाँ में नई दृष्टि से देखी ,चर्चित और प्रशंसित हुई हैं। उल्लेख के लिए भारत के संसदीय चुनाव प्रणाली में पहली बार अमेरिका की भाँति पूरे देश में चुनाव केवल एक मुद्दे पर लड़ा गया कि श्री नरेंद्र मोदी देश के प्रधान मंत्री हों या न हों। कौन सांसद पद प्रत्याशी बनाया गया ,गौण हो गया। भाजपा को बहुमत देकर जनता द्वारा स्पष्ट सन्देश दिया गया कि शासन उसे सौपा जायगा जो भारत ,भारतीयता और भारतीय संस्कृति को पुनर्स्थापित करते हुए देश को पूरे विश्व में सम्मान और गौरव दिलाए गा।तथास्तु ,मोदी जी ने जनता के प्रबल जनसमर्थन को देश ही नहीं पूरी दुनियाँ में आत्मविश्वास के साथ प्रतिध्वनित किया। वे दुनियाँ में जहाँ भी गए ,वहाँ बसे प्रवासी भारतीयों ने उन्हें हाथोहाथ लिया और वे पूरे विश्व में सबसे बड़े लोकतंत्र के सर्वाधिक जनप्रिय नेता के रूप में प्रतिष्ठित हुए।नए भारत के इस नए नेता ने देश का ऐसा गौरव बढ़ाया कि दुनियाँ वालों का भारतीयों को देखने व उनसे व्यवहार का दृष्टिकोण ही बदल गया।लोग गर्व से कहने लगे कि हम भारतीय हैं।दूसरी ओर पश्चिमी सीमा पर प्रतिद्वंदी पाकिस्तान को उनके दुस्साहस का उत्तर सर्जिकल स्ट्राइक एवँ एयर स्ट्राइक से देकर कड़ा सन्देश दिया गया कि नया भारत किसी भी प्रकार का आतंकवाद या भृकुटि विक्षेप सहन नहीं करे गा । ऐसा ही सन्देश चीन जैसी महा शक्ति को ढ़ोकलाम में दिया गया। नया भारत अब एक उदार देश वाली छवि से बाहर निकल एक दृढ़ इच्छाशक्ति वाला देश हो गया ।
***************अंतरिक्ष और रक्षा क्षेत्र में सराहनीय कार्यों के साथ साथ देश के अंदर वीआईपी संस्कृति और भ्रष्टाचार पर प्रहार ,स्वच्छ भारत अभियान ,उज्ज्वला एवँ  पीएम आवास जैसी योजनायें या गरीब सवर्णों को दस प्रतिशत आरक्षण देना कुछ ऐसे कार्य थे जो समाज के हर वर्ग को सुखद स्पर्श दिए। परिणामस्वरूप  विरोधिओं द्वारा वोट के लिए खड़ी जातिवाद और धर्म की छद्म दीवार तेजी से ढहीं।समाज से तुमुल ध्वनि हुई कि धर्मनिर्पेक्षता के मायने केवल अल्पसंख्यकों के हित की बात करना ही नहीं बल्कि भारत में बहुसंख्यकों की उससे पहले बात करना भी है।मोदी जी का  "सबका साथ- सबका विकास परन्तु तुष्टिकरण किसी का नहीं "नारा समाज में विश्वसनीयता के धरातल पर उतर गया।सच तो यह है की देशव्यापी समर्थन के बाद भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचार क्रियान्वित होने लगे और हमारी संस्कृति पुरानी जड़ों की ओर वापस लौट पड़ी परन्तु भारतीय संसद के ऊपरी सदन में राजग का बहुमत न होने और विरोधियों के असहयोग के कारण देश की कुछ अति महत्वपूर्ण समस्याएँ हल नहीं हो पा रही थीं। अतः इस वर्ष के पूर्वार्द्ध में संपन्न हुए लोकसभा चुनाव के लिए एजेंडा में उन मुद्दों को पुनः समाहित करते हुए भाजपा ने राष्ट्रवाद से आगे प्रखर राष्ट्रवाद का नारा दे दिया। फल आशातीत रहा और भाजपा नीत राजग दो तिहाई बहुमत का  आँकड़ा पार कर गया।समय और प्रवंधन के बल पर अब भाजपा राज्यसभा में भी बहुमत सिद्ध करने की स्थिति में थी और वह समय आ गया कि युगान्तकारी निर्णय लिए जाँय।
***************हमारे इतिहास में अल्पावधि में उल्लेखनीय कार्यों के लिए शेरशाह सूरी का रिकार्ड था परन्तु यह क्या छः महीने में वे दीर्घकालिक समस्याएँ हल कर दी गईं जिनको माना जा रहा था कि इनको छेड़ने से देश के अस्तित्व को संकट है।स्वतन्त्रता के बाद से मोदी सरकार की दूसरी पारी शुरू होने तक कश्मीर समस्या देश के लिए नासूर सी कष्ट दे रही थी। कई हजार सैनिक ,नागरिक और कश्मीरी पण्डित जान गँवा चुके थे। पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद ने पूरी घाटी को रक्तरंजित कर रखा था। लाखों कश्मीरी पण्डितों को  घाटी से पलायन कर देश के अन्य भागों में शरण लेना पड़ा परन्तु विगत काँग्रेस सरकार हाथ पर हाथ धरे सत्ता सुख लेती रही। घाटी के अलगाववादी नेता कश्मीर के अलग होने का भय दिखाकर केंद्र से बेतहाशा धन लूटते रहे और धमकाते रहे कि यदि कश्मीर से धारा 370 या 35 ए हटाया गया तो घाटी में भारतीय ध्वज को कोई कन्धा देने वाला नहीं होगा। कमाल देखिए दृढ़ निश्चयी मोदी जी एवं उनकी सरकार का कि पहले मानसून सत्र के पाँच अगस्त को संसद में प्रस्ताव पास करा कर कश्मीर से धारा 370 एवँ 35 ए को समाप्त कर दिया और राज्य को जम्मू और कश्मीर तथा लद्दाख नाम से दो केंद्र शासित प्रदेशों में पुनर्गठित कर दिया। इस निर्णय पर   कतिपय देशद्रोहियों को छोड़कर समूचा देश झूम पड़ा। सरकार ने संसद के इसी सत्र में जम्मू और कश्मीर  विधेयक से पहले तीस जुलाई को मुसलमानों में प्रचलित तीन तलाक कानून को अवैध  करने वाला विधेयक पास कर करोड़ों मुस्लिम महिलाओं के आँसू पोछा और समाज में सम्मानजनक जीवन का अधिकार दिया।यह सामान्य नागरिक संहिता की दिशा में बढ़ता एक कदम भी था।
 **************पूरा देश उल्लसित था कि अयोध्या विवाद पर उच्चतम न्यायलय के पाँच जजों वाले बेंच ने नौ नवम्बर को सुप्रीम फैसला दे दिया कि विवादित भूमि राम लला विराजमान की है और उस पर बाबरी मस्जिद का निर्माण अवैध था।पूरी दुनियाँ साक्षी है कि राम मंदिर बाबरी मस्जिद विवाद हिन्दुओं और मुस्लिमों के बीच चार सौ वर्षों से चल रहा सर्वाधिक त्रासद विवाद रहा है।आजादी के बाद भी तुष्टिकरण के चलते पूर्व सत्ताधारी और आज के विपक्षी सदैव मुस्लिमों के पक्ष में बात एवं आचरण करते रहे जब कि भाजपा, राष्ट्रीय स्वयँ सेवक तथा विश्व हिन्दू परिषद् ,अनेक हिन्दू एवँ संत संघटनों के साथ, लगातार राम मंदिर के पक्ष में संघर्षरत थे।इस प्रसंशनीय निर्णय को देश के हिन्दू और मुसलमानों ने अत्यंत सहजता और शान्ति से सर माथे लेकर भाई चारे का वह प्रकाश स्तम्भ बनाया जो भविष्य के इतिहास को भी प्रकाशित करता रहे गा।संसद का शीतकालीन सत्र समाप्त होते होते सरकार ने नागरिकता संशोधन विधेयक भी दोनों सदनों से पास करा कर राष्ट्रपति से स्वीकृति ले ली जिससे पड़ोसी मुस्लिम देशों से उत्पीड़ित होकर सन चौदह से पहले भारत आए हिन्दू ,सिख ,ईसाई ,बौद्ध ,पारसी या जैन शरणार्थियों को भारत की नागरिकता मिलने का रास्ता खुल गया। अब ऐसे लोग देश के एक आम नागरिक की भाँति जीवन यापन कर सकें गे।
***************निःसंदेह उपर्युक्त उपलब्धियाँ इतिहास में स्वर्णाक्षरीय हैं परन्तु कुछ विधेयकों का क्रियान्वयन उन्हें संसद से पारित कराने की अपेक्षा ज्यादा कठिन होगा क्योंकि अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे विपक्षी, सरकार को असफल करने में, कोई कोर कसर नहीं छोड़ें गे वरन उनके वंशवाद ,तुष्टिकरण और तथाकथित धर्मनिरपेक्षता का भविष्य क्या होगा।आने वाला समय संदर्भित निर्णयों के क्रियान्वयन की सफलता तथा देश की प्रगति में इनके योगदान का आकलन करे गा और इस अल्प काल खण्ड के इतिहास में परिणामी आयाम जोड़े गा परन्तु आज तक की अद्यतन स्थिति यह है कि देखते ही देखते तीन तलाक ,कश्मीर की धारा 370 और 35 ए ,अयोध्या का राम जन्मस्थान विवाद और शरणार्थियों के लिए नागरिकता जैसी विकराल राष्ट्रीय समस्याओं का चंद महीनों में निराकारण हो गया है ।सारांशतः देश के प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी की नेतृत्व वाली भाजपा सरकार और आज के भारत के लिए यह कहना समय संगत होगा कि इतिहास बनाए तो ऐसे बनाए।अब मोदी जी का पूरे विश्व में चर्चित नारा है ,"सबका साथ -सबका विकास और सबका विश्वास।साथ ही पूरे देश में एक धारणा बन गई है कि कोई भी असंभव या दुष्कर कार्य हो; वह मोदी जी के लिए संभव है अर्थात मोदी हैं तो मुमकिन है। यह है मोदी जी का करिश्माई व्यक्तित्व।अच्छा है कि देश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है और मोदी जी हमारे प्रधान मंत्री।अस्तु।----------------------------------------------मंगलवीणा
वाराणसी ;दिनाँक 17 दिसम्बर 2019                               mangal-veena.blogspot.com
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अंततः
***************प्रिय पाठकों ! वर्ष दो हजार उन्नीस हम भारतीयों को श्री रामजन्मभूमि जैसा हर्षद उपहार देते हुए अपनी विदाई के अन्तिम पादन पर है। निजी जीवन में हम सभी के लिए वर्ष मिश्रित फल देने वाला रहा। महँगाई और बच्चों की असहनीय मँहगी शिक्षा ने तो त्राहि माम् की गुहार लगाने को विवश कर रखा है।न जाने कब हमारे देश में प्रारम्भिक एवँ माध्यमिक शिक्षा माफियाओं के चंगुल से मुक्त हो पाए गी। भरोसे की डोर पकड़ प्रतीक्षा करें कि देश हित में एक से बढ़ कर चमत्कारी निर्णय लेने वाली सरकार शायद आने वाले वर्षों में आम जन की समस्याओं पर ज्यादा संवेदनशील होगी। प्रार्थना है कि हम भारतवासियों पर अयोध्या नरेश प्रभु श्री राम की अपार कृपा बनी रहे।इसी के साथ आँग्ल नव वर्ष की मंगलमयी कामनाएँ और प्रणाम  -----------------------------------------------------मंगलवीणा
वाराणसी ;दिनाँक 17 दिसम्बर 2019
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सोमवार, 22 अप्रैल 2019

Mangal-Veena: नवभारत का राष्ट्रवाद

Mangal-Veena: नवभारत का राष्ट्रवाद: ***************भारत में सत्रहवीं लोकसभा के सात चरणों में होने वाले चुनाव की प्रक्रिया चल रही है। राजनीतिक दलों द्वारा अपने अनुकूल मुद्दों क...

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2019

नवभारत का राष्ट्रवाद

***************भारत में सत्रहवीं लोकसभा के सात चरणों में होने वाले चुनाव की प्रक्रिया चल रही है। राजनीतिक दलों द्वारा अपने अनुकूल मुद्दों को उछालने एवँ प्रतिकूल मुद्दों को विरोधियों का षड्यंत्र बताने का बेहया प्रयास जारी है।इस बीच देश के जनमानस में एक बहुत बड़ा मुद्दा राष्ट्रवाद के रूप में उभरा है। केंद्र की भाजपानीत मोदी सरकार के  विगत पाँच वर्षीय शासन काल में राष्ट्रवाद, सबका साथ सबका विकास के साथ, चल रहा था परन्तु  चौदह फरवरी को फुलवामा (कश्मीर) में केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल के ऊपर पाकिस्तान प्रायोजित  जैश आतंकी हमला होते ही सरकार व जनता में पाकिस्तान को पाठ पढ़ाने की ज्वाला फूट पड़ी।प्रधान मंत्री मोदी जी का बयान आया कि पाकिस्तान एवँ उसके आतंकियों ने बड़ी गलती कर दी और उन्हें इसकी बड़ी कीमत चुकानी होगी। हुआ भी ऐसा ही,भारतीय वायुसेना ने 25 /26 फरवरी की रात में पाक अधिकृत कश्मीर में चल रहे आतंकी शिविरों पर सफल एयर स्ट्राइक किया।विश्व के अधिकाँश राष्ट्र जैसे अमेरिका ,इंग्लॅण्ड ,फ्राँस ,सोवियत रूस,जापान इत्यादि देश भारत के साथ खड़े हो गए।अमेरिका ने तो यहाँ तक कह दिया कि भारत को प्रतिकार का पूरा हक़ है।जब पाकिस्तानी वायु सेना ने 27 फरवरी को भारत पर जवाबी हमला किया ,विंग कमाण्डर अभिनन्दन ने मिग से उड़ान भर कर एक पाकिस्तानी ऍफ़ -16 जंगी जहाज को मार गिराया और खुद पैराशूट से छलाँग लगा लिया परन्तु दैववश पाकिस्तानी सीमा में जा गिरा। भारतीय और अंतर्राष्ट्रीय दबाव के आगे झुकते हुए लाचार पाकिस्तान को दो दिनों के अंदर(एक मार्च 2019 )ही  अभिनन्दन वर्तमान को वापस सौंपना पड़ा।मोदी जी के नेतृत्व में भारत के बढ़ते दबदबा और सामरिक शक्ति से पूरा देश झूम उठा।साथ ही इन सोलह -सत्रह दिनों में भारत ने एक बदलाव का तीव्र आवेग देखा।यह बदलाव था प्रखर राष्ट्रवाद ,जिसकी अगुवाई प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में करोड़ों राष्ट्रवादी भारतीय करने लगे थे। सदिओं से एक नरम राज्य के रूप में पहचाने जाने वाला भारत एक कठिन राज्य बन गया अर्थात एक थप्पड़ मारने वाले को दस थप्पड़ मारने वाला भारत बन गया। फिर क्या ; सत्रहवीं लोकसभा चुनाव की घोषणा होते ही राष्ट्रवाद  सारे मुद्दों व प्राथमिकताओं को पीछे छोड़ते हुए चुनाव का सबसे बड़ा मुद्दा बन गया।
*************** वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत इस चुनाव में ऐसा पहली बार हुआ है कि भुखमरी,पेट्रोल ,मँहगाई ,बिजली ,सड़क ,स्वास्थ्य ,शिक्षा जैसी समस्याएँ चुनावी नैपथ्य के पीछे चली गईं हैं और देशभक्ति ,देशद्रोह, घुसपैठ ,कश्मीर संवंधित धारा 370 एवं 35 A ,सेना को अशान्त क्षेत्रों में अधिकाधिक  सुरक्षा कवच ,आतंक को कुचलने की रणनीति और भारत की सामरिक एवँ आर्थिक शक्ति बढ़ाने वाली या इनको क्षीण करने वाली या कुछ एक को समाप्त करने वाली घोषणाएँ रंगमंच पर परवान चढ़ रही हैं। ए सारे मुद्दे राष्ट्रवाद के ही अलग अलग धनात्मक या ऋणात्मक आयाम हैं। जहाँ मोदी जी के नेतृत्व में भाजपा इन राष्ट्रवादी मुद्दों को पूरे जोश से उठा रही है वहीं भारतीय जन मानस भी इन मुद्दों पर भाजपा को भरपूर समर्थन दे रहा है।विपक्ष इन्हीं मुद्दों के ऋणात्मक आयाम को अपने घोषणापत्र में डाल कर जोर शोर से अपनी ढफली बजा रहा है।सारे विपक्षी दल का एक जुट होकर राष्ट्रवाद पर प्रश्नचिन्ह लगाना जनता में उनके प्रति गलत सन्देश दे रहा है कि ए मात्र अपने निजी एवँ दलगत स्वार्थ सिद्धि के लिए मोदी जी को सत्ता से हटाना चाहते हैं।वहीं राष्ट्रवाद पर खरा उतर रहे मोदी जी एवं भाजपा में जनता का विश्वास बढ़ता ही जा रहा है। देश विदेश के सारे सर्वेक्षणों में  मोदी जी के सामने पसंदगी में किसी नेता का न टिक पाना ;इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है।चुनाव जैसे जैसे आगे बढ़ रहा है भाजपा का राष्ट्रवाद प्रखर राष्ट्रवाद का रूप लेता जा रहा है और मतदाताओं को भी इसमें भारत की बुलंद तसवीर दिख रही है। इसके विपरीत विपक्षी अनेक प्रकार के गठजोड़ ,झूठे वादे व जातीय समीकरण के बल पर सत्ता पाने का हर हथकंडा अपना रहे हैं।
***************वर्तमान चुनाव में विपक्षी मात्र मोदी विरोध और मोदी हटाओ अभियान पर केंद्रित हैं तथा इसके लिए इन लोगों ने अभूतपूर्व ढंग से पूरे देश में असमतल ध्रुवीकरण किया है।सारा खेल जनता समझ रही है। सभी दलों के कथनी ,करनी और विश्वसनीयता पर भी मन्थन हो रहा है और सभी चैतन्य मतदाता इस बात से चिन्तित हैं कि ए विपक्षी राष्ट्रवाद और विकास के मुद्दे पर ढुलमुल क्यों हैं। यदि विश्व समुदाय में भारत की प्रतिष्ठा एवँ क्षमता मोदी जी के नेतृत्व में बढी है तो विरोधियों द्वारा मुक्त कण्ठ से उसकी प्रशंसा क्यों नहीं होती है। प्रशंसा करते हुए भी तो विपक्षी इस मुद्दे को राष्ट्रहित के सन्दर्भ में और आगे बढ़ाने की बात कर सकते हैं।ऐसा भी नहीं कि ए विपक्षी यह नहीं जानते कि राष्ट्रवाद क्या है और इसके विरुद्ध आचरण करने वाले को क्या कहा जाता है। फिर भी  सारे विपक्षी राष्ट्र द्रोहियों का समर्थन करते हैं क्योंकि उन्हें जातिवाद और मुस्लिमवाद पर भरोसा रहा है और अब भी है। हिन्दुओं के मत को जाति के नाम पर तितर वितर करना ,मुस्लिमों के मत का अपने पक्ष में ध्रुवीकरण करना और चुनाव जीतकर सत्तासुख भोगना ही इनके लिए राष्टवाद है।फिर देश और देश का भविष्य ? ऐसी परिस्थिति में हर भारतीय जागृत मतदाता समझता है कि यदि किसी राज्य की व्यवस्था ढुलमुल हो जाय , वंशवादी सत्ता में जड़ें जमा लें, बहुमत के लिए जाति और धर्म की चाल चलें, धर्म निरपेक्षता के नाम पर बहुसंख्यकों का निरादर हो और देश की सीमाएँ असुरक्षित रहें तो राज्य के अस्तित्व पर संकट मँडराते हैं।समय की माँग है कि विरोधी अपने आचरण और मुद्दों में सकारात्मक बदलाव लाएँ  और राष्ट्रवाद को अपने मन ,कर्म और वाणी में वैसे ही बैठा लें जैसे कि श्री मोदी ,एक सीमा प्रहरी सैनिक या एक आम राष्ट्रवादी  नागरिक। राष्ट्रवाद राष्ट्रवाद है और इसका अर्थ भी राष्ट्रवाद है ,इसके दाएं बाएँ कुछ नहीं।यह राष्ट्रवाद प्रखर तो हो सकता है परन्तु ढुलमुल कदापि नहीं।
***************वस्तुतः जिस राष्ट्रवाद ,प्रखर राष्ट्रवाद या सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की आज चतुर्दिक चर्चा है इसका उद्भव भाजपा के पैतृक सांस्कृतिक संगठन राष्ट्रीय स्वयँसेवक संघ के विचार धारा रूपी प्रांगण से हुआ। फिर  संघ ने उद्देश्यों की समग्र उपलब्धि के लिए अनेक और सगठन खड़ा किया जिसमें राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए पूर्व की जनसंघ आज की भाजपा बनी।वर्षों राष्ट्रवाद का ध्वज लिए अनवरत चलते हुए यही  भारतीय जनता पार्टी न केवल भारत या विश्व की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बनी है अपितु  सवा सौ करोड़ भारतीयों के गौरव को बढ़ाते हुए उनके आकांछा को परिणाम के धरातल पर उतारने वाली इकलौती राष्ट्रीय पार्टी है तथा श्री नरेंद्र मोदी इस दल के यूएसपी हैं। इनके कथनी करनी और विश्वसनीयता पर आम लोगों का जाँचा परखा भरोसा है।इस दल में न वंशवाद है न तुष्टिकरण है।यहाँ न छद्म धर्म निर्पेक्षता है और न भ्रष्टाचार। विगत पाँच वर्षों में भाजपा सरकार ने आवश्यक आवश्यकता जैसे बिजली ,सड़क ,आवास ,शौचालय  रसोई गैस,स्वच्छता पर ध्यान दिया जिससे भारत में विकास की एक अच्छी यात्रा हुई। अनुकूल समर्थन से अन्तरिक्ष विज्ञानिकों ने कई मील के पत्थर गाड़े। आतंक और नक्सलवाद पर अंकुश लगा। सैनिकों का सम्मान बढ़ा और सीमाएँ जबरदस्त ढंग से जल ,थल ,नभ में सुरक्षित हुई हैं। बढ़ती सामरिक और आर्थिक शक्ति के साथ साथ सफल विदेश नीति से आज पूरी दुनियाँ में भारत के नागरिकों के साथ सम्मान का व्यवहार हो रहा है। देश विदेश जहाँ कहीं भी हमारे प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी जाते हैं;  मोदी- मोदी के नारों से उनका स्वागत होता है।आचरण की शुद्धता के साथ श्री मोदी में नेतृत्व ,सूझबूझ और निर्णय की अतुल्य क्षमता है जो उन्हें अन्य नेताओं से बहुत ऊपर प्रतिष्ठित करती है। यही कारण है कि प्रधान मंत्री की दावेदारी में वे निरंतर पहली पसंद बने हुए हैं।नव भारत में राष्ट्रवाद की पर्याय बन चुकी भाजपा यदि सोना है तो श्री मोदी सोने में सुहागा। अस्तु यदि भाजपा पुनः सत्ता में लौटती है तो अगला पाँच वर्षीय कालखण्ड देशवासियों की आकांछा पूर्ति वाला स्वर्णयुग हो सकता है।                मंगलवीणा
वाराणसी ;दिनाँक 22 अप्रैल 2019 ----------------------------------mangal-veena.blogspot.com
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आज के उद्धरण
1 . राष्ट्रवाद राष्ट्रवाद है और इसका अर्थ भी राष्ट्रवाद है ,इसके दाएं बाएँ कुछ नहीं।यह राष्ट्रवाद प्रखर तो हो सकता है परन्तु ढुलमुल कदापि नहीं।
नव भारत में राष्ट्रवाद की पर्याय बन चुकी भाजपा यदि सोना है तो श्री मोदी सोने में सुहागा। अस्तु यदि भाजपा पुनः सत्ता में लौटती है तो अगला पाँच वर्षीय कालखण्ड देशवासियों की आकांछा पूर्ति वाला स्वर्णयुग हो सकता है।------------------------------------------------- मंगलवीणा 
वाराणसी ;दिनाँक 22 अप्रैल 2019
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शुक्रवार, 5 अप्रैल 2019

Mangal-Veena: चुनावी आचार संहिता

Mangal-Veena: चुनावी आचार संहिता: ***************भारत वर्ष में सत्रहवीं लोकसभा गठन हेतु आम चुनाव का  डंका बज चुका है। अब इससे उत्पन्न तुमुल ध्वनियाँ कानों में धमकने लगी हैं ...

चुनावी आचार संहिता

***************भारत वर्ष में सत्रहवीं लोकसभा गठन हेतु आम चुनाव का  डंका बज चुका है। अब इससे उत्पन्न तुमुल ध्वनियाँ कानों में धमकने लगी हैं ,पल पल रंग बदलती दृश्यावली आँखों में घूमने लगी हैं और सुरसा सी बढ़ती चुनावी गर्मी  दिनचर्या को झेलाने लगी हैं।चुनाव की घोषणा के साथ चुनाव आयोग द्वारा आदर्श चुनाव संहिता भी लागू कर दी गई है।करें भी क्यों न ;यही एक चाबुक है जिससे आयोग सम्पूर्ण चुनावी गतिविधियाँ नियंत्रित करता है।वरन सांसदी के अधिकाँश भ्रष्ट प्रत्याशी हर संभव कदाचार के अपकीर्तिमान को  स्थापित करने से न चूकें। आश्चर्य होता है कि एक आदर्श शिष्टाचारी परम्परा वाले देश में हम इतने आचार विहीन हो चुके हैं कि चुनाव के खातिर हम पर आचार रूपी अंकुश लगता है और बताया जाता है कि हम क्या करें और क्या न करें ।जहाँ तक नेताओं , प्रत्याशियों और समर्थकों की बात है ,वे चुनाव संपन्न होने तक आचार संहिता के साथ तूँ डार -डार मैं पात -पात का जम कर खेल खेलें गे परन्तु स्वभाव से आचारशील नागरिक इस संहिता से बुरी तरह प्रताड़ित होते हैं।निश्चय ही लोकतंत्र में चुनाव एक पर्व है जिसे हर नागरिक को बढ़चढ़ कर मनाना चाहिए और हर मतदाता को अपना मत अवश्य डालना चाहिए परन्तु यह भी अपेक्षित है कि चुनाव के नाम पर नागरिकों का प्रताड़न न हो। अन्यथा प्रश्न तो उठे गा कि प्रताडन और पर्व साथ साथ कैसे।
***************यथार्थ की जमीन पर उतरें तो सबको मालूम है कि ध्वनि प्रदूषण स्वाथ्य के लिए बहुत ही हानिकारक है फिर भी चुनाव में ध्वनि विस्तारक यंत्रों की दहाड़ से हम सभी को त्रस्त होना पड़ता है। घर,गली ,सड़क ,चौराहा ,पार्क ,मैदान कहीं भी जाइये ;इन भोंपुओं पर अपने प्रत्याशियों के लिए चीखने चिल्लाने वाले समर्थकों से बच नहीं सकते।टीवी पर समाचार चैनलों को खोलिए तो वही कर्कश और कुतर्की परिचर्चा ;एंकर का प्रश्न कुछ तो प्रवक्ताओं का जवाब कुछ और। सब बेसुरी ढफली बजाते मिलते हैं। ऐसा वातावरण शायद यह मान कर बनता है कि अब लोग ऊँचा सुनने लगे हैं।रात्रि में यह प्रदूषण नियंत्रित कर लिया जाता है ;यह भी कहना कठिन है।घर से किसी गंतव्य के लिए निकलिए तो यह संभव ही नहीं कि संहिता की छाया में चेकिंग के नाम पर पुलिस अवरोध और रौब से यहाँ- वहाँ दो चार न होना पड़े। किसी कार्यालय से कोई काम करना तो कोई सोच भी नहीं सकता क्योंकि  सबसे एक ही जवाब मिलता है कि चुनाव बाद मिलिए। सबसे अधिक साँसत तो उन भद्र लोगों की होती है जिनके पास सुरक्षा के लिए लइसेंसी असलहे होते हैं।पुलिस वाले इसे थाने या शस्त्र दुकानों पर जमा करने का मौखिक दबाव बनाने लगते हैं। समझ से परे है कि चुनाव के समय शस्त्र पास न रहने पर लाइसेंसधारिओं की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित हो जाती है। ऐसा प्रतीत होने लगता है कि पुलिस को अवैध असलहे धारी असामाजिक तत्वों पर तो सिकंजा कसना ही है परन्तु भद्र लोगों को भी चुनाव के समय चैन से नहीं रहने देना है।
*************** जब संहिता पालन की बात राजनीतिक दलों ,चुनाव लड़ रहे प्रत्याशियों एवँ नेताओं पर हो तो आयोग उनसे जूझता दिखता है। चुनाव में प्रत्याशियों के लिए खर्च निर्धारित करना और निगरानी कराना एक बात है परन्तु उसे सुनिश्चित कराना और बात है।सामान्यतया माना जाता है कि पैसे जैसे  संसाधन से प्रत्याशी अपनी विचारधारा और जनसेवा के संकल्प को अपने मतदाता तक पहुँचाते हैं ;अतः इस खर्च का हिसाब वे आसानी से आयोग को दे सकते हैं। वस्तुस्थिति इससे विल्कुल इतर है। आज के चुनाव इस अच्छे आचरण वाले परदे के पीछे लड़े जाते हैं जहाँ काले धन का ताण्डव होता है ;मतदाताओं तक पैसे ,प्रलोभन और दावतें पहुँचा कर मत खरीदने का खड्यंत्र होता है। यही नहीं बड़े बड़े असामाजिक  तत्व  विभिन्न दलों  के शीर्ष नेताओं को करोड़ों रूपए का काला  धन टिकट केलिए भेंट करते हैं। अब तो मिडिया वाले स्टिंग ऑपरेशन कर ऐसे काले धन्धों का खेल सबको प्रत्यक्ष दिखाने भी लगे हैं।आम आदमी बहुत चिंतित है कि ऐसी बेशर्म ,भ्रष्ट और आचरणहीन राजनीति देश को कहाँ पहुँचाने को उद्यत है।वर्तमान की बहती बयार में भारतीय लोकतंत्र के सामने सबसे ज्वलंत प्रश्न है कि आयोग एक हाथ आचार संहिता लिए और दूजे हाथ प्रशासनिक शक्तियाँ लिए क्या क्या करता है या क्या कर सकता है।
***************चाहे कितनी भी विस्तारित परिचर्चा की जाय सत्य यही है कि आदर्श आचार किसी संहिता से नहीं संस्कारों से उपजता और पलता है। साथ ही यदि चोर सिपाही से शक्तिशाली होगा तो कानून की बेवसी बढ़ती है। आचार संहिता और आयोग की शक्तिओं के साथ कुछ ऐसा ही हो रहा है।आगे इससे भी बड़ा सत्य यह है कि हमारा भारत बदल रहा है। शिक्षा के साथ  इलेट्रॉनिक , प्रिंट और सोशल  मीडिया ने हमारे समाज में जागरूकता की एक अभूतपूर्व क्रान्ति ला दी है और इसी जन जागरण से चुनावी भ्रष्टाचार का संहार होने भी लगा है।विशेष रूप से नई पीढ़ी के रंगमंच पर उदित होने से राजनितिक भ्रष्टाचार के दिन और तेजी से लदने लगे हैं।सब मिलाकर बदलती हवाएँ शुभ संकेत दे रही हैं कि भविष्य में आचारशील चुनाव आयोग ,आचारशील नेता, आचारशील मतदाता और आचारशील नागरिक अपने भारत को इसके स्वर्णिम युग की ओर अग्रसर करें गे।
***************परन्तु वर्तमान चुनावी परिदृश्य में हर परेशानी से ऊपर उठ कर  भारत के प्रत्येक मतदाता का प्रथम दायित्व है कि वह मतदान अवश्य करे और स्वविवेक से सबसे बेहतर प्रत्याशी को मत दे। नदी की धारा को मोड़ने का यही बेहतर तरीका है और इसी प्रकार मतदान द्वारा देश को सुरक्षित हाथों में सौंपा जा सकता है।नए भारत की इसी जनाकांछा की परिणीति का ज्वलन्त उदाहरण आज की भाजपानीत केंद्र सरकार है। वर्तमान चुनाव में भी जनाकांछा उसी भाजपा के मोदी जी पर टिकी हुई है।और यह संभव हुआ था- पिछले चुनाव में मतदान की आँधी से। इस चुनाव में भी ऐसे ही प्रबलतर आँधी की परिस्थितियाँ बन रही हैं। अस्तु हमारी प्रतिबद्धता और शुभकामना हो कि भारत का चुनाव आयोग तथा उसकी घोषित आचार संहिता 2019 चल रहे लोक सभा चुनाव को अच्छे से संपन्न करने में सफल हों और नागरिकों को कोई असुविधा भी न हो।------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- मंगलवीणा
वाराणसी ,चैत्र कृष्ण अमावस्या सँ. 2076                                                         
दिनाँक 05 अप्रैल 2019
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अंततः
आइए एक नेता जी से मिलें जो पूर्व में माननीय मंत्री जी रह चुके हैं। हर सीधी उलटी कोशिश के बावजूद किसी जिताऊ  पार्टी से सांसदी का टिकट नहीं मिल पा रहा है  सो जल बिन मछली की भाँति छटपटा रहे हैं और अपनी व्यथा कुछ यूँ व्यक्त कर रहे हैं।
भाई ! मोहि कुर्सी विसरत नाहिं।
 मन डोलत ही इच्छा पूरी ,जादू कुर्सी माहिं।
ढके कुकर्म सभी खादी में ,महामहिम कहलाहिं। भाई ------
दिन जनता दरबार बैठना ,निशा मौज़ क्लब माहिं।
न्याय नियम को फेंक किनारे ,लूटम लूट मचाहिं। भाई ------
बन गाँधी के छद्मी वारिस ,मॉल मलाई खाहिं।
राजा रजवाड़ों से न्यारे , नेता  भारत  माहिं। भाई --------
गर एक टिकट पुनः मत भारी ,शक्र देइ  बरसाहिं।
वहि इन्द्रासन फिर मिल जाए,सुफल जनम होइ जाहिं। भाई ------
-----------------अब उनकी ब्यथा सुन आम आदमी की क्या दशा होगी ;यह विचारणीय है। इति।
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  --------------- पुनः सभी सुधी पाठकों एवँ शुभेच्छुओं को चैत्र की नवरात्रि एवँ पावन राम नवमी की शुभ कामनायें। नया विक्रम सँवत वर्ष आप के लिए स्वास्थ्यप्रद ,यशप्रद एवं सुखप्रद हो ;यह हमारी  कामना है।------------------------------------------------- --मंगलवीणा
वाराणसी ;चैत्र कृष्ण अमावस्या  सँ. 2076 ------------------------ mangal-veena ,blogspot .com
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रविवार, 5 अगस्त 2018

सोशल मिडिया पर प्रवचन -प्रलय

***************बात चौंकने की नहीं ,रंच समय देने व विचार करने की है। वर्षा ऋतु अपनी चढान पर है।पूरे भारत में जल या पानी -प्रलय से हाहाकार मचा हुआ है।समूचे पहाड़ी ,समुद्र तटीय और मैदानी राज्यों में सामान्य जन जीवन अस्त -व्यस्त है। सैकड़ों जनधन,हजारों पशुधन और अरबों की संपत्ति बीते बर्षों की भाँति इस पानी प्रलय को भेंट चढ़ रही हैं।इस प्रलय प्रहार से भारत ही नहीं चीन ,जापान इत्यादि देश भयावह रूप से प्रकोपित हैं।परन्तु यदि थोड़े दिन पहले ही बीते ग्रीष्म की बात करें तो सर्वत्र जल संकट ,गिरते भू जलस्तर और जल संचयन की चर्चा थी।दोनों स्थितियों का मिलान करें तो यही परिणाम मिलता है कि जलवायु और ऋतुएँ हमारे अनुकूल नहीं संचलित हो रही हैं या कि मानव जलवायु या ऋतुओं के विपरीत आचरण कर रहा है जिससे हम प्राकृतिक आपदाओं से आए दिन दो चार हो रहे हैं।आजकल लोग जल प्रलय जैसा ही एक और  प्रलय, जिसे प्रवचन प्रलय कह सकते हैं , व्हाट्सप्प ,फेसबुक ,मेसेंजर ,ट्वीटर, टीवी इत्यादि पर, झेल रहे हैं। प्रत्यक्ष तथा परोक्ष मित्रों की मुफ्त वाली शुभेच्छाओं एवँ अन्यार्थी संदेशों ने नाकों दम कर रक्खा है।जो इस प्रवचन प्रलय से मानसिक तौर पर सकुशल बचा रहे ,सच मानिए उसपर ईश्वर की असीम अनुकम्पा है।
***************साधारणतया लोग अपने मित्रों एवँ सम्बन्धियों को आत्मीयता या शुभेच्छा जताने अथवा  तत्काल सूचना पहुँच हेतु कविता, प्रवचन ,उद्धरण ,नीति वाक्य ,बधाई,श्रव्य और दृश्य सन्देश  इन नए द्रुतगामी माध्यमों से भेजते और प्राप्त करते हैं और आशा भी की जाती है कि विज्ञान प्रदत्त इन माध्यमों से समाज ,संस्कृति ,सभ्यता  और जन जीवन की आर्थिक एवँ चारित्रिक जीवन स्तर की बेहतरी होगी। परन्तु व्यवहार में ऐसा नहीं हो रहा है। मनुष्य दोहरा चरित्र जीने की ओर अग्रसर है ;एक तरफ वह सभ्य दिखने के सारे उपक्रम कर रहा है तो दूसरी तरफ उस सभ्यता के तले उसकी असभ्यता हिलोरें मार रही हैं जिससे हमारी स्वच्छ परम्पराओं के टीले एक एक कर ढहते जा रहे हैं। उदहारण के लिए व्हाट्सप्प जैसे सन्देश वाहक मंच पर गौर किया जा सकता है।इस मंच पर रात दिन प्रेषित हो रहे अधिकांश सन्देश मिथ्याचरण की पराकाष्ठा हैं।भ्रामक ,घृणास्पद ,द्वेषकारी ,स्वार्थप्रेरित या अंधविश्वास को बढ़ाने वाले सन्देश; शुभेच्छा के आवरण में इतर उद्देश्यों के साथ; व्हाट्सप्प पर इधर से उधर भेजे जा रहे हैं जो तत्काल वायरल हो कर समाज में दिग्भ्रम की स्थिति उत्पन्न कर रहे हैं। अब तो बात साईबर क्राइम की चल रही है क्योंकि ए माध्यम अपराध के कारण भी बन रहे हैं। तात्पर्यतः मित्रों ,सम्बन्धियों और किसी न किसी के माध्यम से परचित लोगों द्वारा आपसी संपर्क हेतु बनाए गए व्हाट्सएप्प - संजाल में आज अधिकांशतःपर उपदेश कुशल बहुतेरे वाले प्रवचन,धर्मभीरू बनाने वाले उपदेश,अधकचरी शुभेक्षाएँ, अनावश्यक सलाह और  भ्रमात्मक सूचनाएँ नदियों की बाढ़ की भाँति आपसी संवाद ,सूचना तथा कुशल क्षेम को रौंद रही हैं।
***************अब आमतौर पर लोगों द्वारा बनाए गए ग्रुप या समूह में कोई भी व्यक्ति श्रृंखलात्मक पहुँच द्वारा समूह के बाहर से ,कहीं से, किसी भी प्रकार का प्रवचन समूह अंदर तक अग्रसारित कर देता है और ए सन्देश बहुत ही ब्यापक स्तर पर जन -जन तक पहुँच जाते हैं। यहाँ तक कि एक ही सन्देश एक व्यक्ति को कई कई बार कई लोगों द्वारा अग्रसारित हो कर मिलता है और हर क्लिक पर वही बात देख या पढ़ कर अजीब सी खीझ होती है। हद तो तब हो जाती  है जब धार्मिक प्रताड़न भरे संदेशों की बाढ़ आती है यथा यदि यह संदेश अपने इतने मित्रों को अग्रसारित करें गे तो इनकी क़ृपा होगी अन्यथा यह अनिष्ट हो जाय गा।इसी प्रकार घोर संसारी एवँ गृहस्थ लोग भी प्रवचन भेजने में बड़े बड़े योगी ,ऋषियों ,मुनियों ,दार्शनिकों व सरस्वती साधकों को मात दे रहे हैं। जिन्हे स्वयँ सुधरने की आवश्यकता है वे सोशल मीडिया पर प्रवचन की झड़ी लगा दूसरे को सुधार रहे हैं। नेताओं व अन्य गुरु घण्टालों के लोग उन्हें चमकाने व आगे बढ़ाने के लिए रात दिन अपने प्रवचन धकेल रहे हैं। रही सही कमी व्यवसाय व विज्ञापन वाले पूरा कर दे रहे हैं। अब स्मार्ट फोन ,टीवी और इन्टरनेट पर सकून तलाशने वाला ब्यक्ति इस प्रवचन वाले महा प्रलय से बचे तो बचे कैसे ?
*****************जब लोग इस प्रवचन प्रलय को झेलने को विवश ही हैं तो प्रवचनों के मन्तव्य,पूर्ण सत्य ,अर्ध सत्य और मिथ्य को तर्क की कसौटी पर भी कसना अपरिहार्य हो जाता है क्योंकि दुःख के प्रति समझ का बढ़ना ही दुःख का निवारण है।जहाँ तक मन्तब्य की बात है तो अधिकांश का जुड़ाव स्वार्थ या बाह्याडम्बर ,कुछ का परार्थ एवं नगण्य का परमार्थ(सत्य ) हेतु होता है।अतः अपने सीमित स्वार्थ या आवश्यकता से अधिक हमें सोशल मीडिया पर सक्रिय रहना ही नहीं चाहिए।पुनः आशा तो नहीं है कि प्रवचन प्रेषित करने वाले समझेंगे परन्तु क्षीर नीर भेद तो प्रवाचक बनने से पहले जान लेना चाहिए ही।वह यह है कि हम आप जो भी प्रवचनों की हेरा फेरी करते हैं वे अर्ध सत्य और मिथ्या के बीच के हमारे विचार हैं जो प्रथम दृष्ट्या प्रेषकों को प्रबुद्ध होने एवँ प्राप्तकर्ता को अनुगृहीत होने वाले छल हैं परन्तु तर्क पर वे वहम से ज्यादा कुछ नहीं होते हैं।अतः सोशल मीडिया पर सक्रिय लोगों से अपेक्षा है कि वे न ऐसे  भ्रम पालें ,न ऐसे भ्रम भेजें और न ऐसे भ्रम पाएँ।इसी प्रकार सोशल मीडिया पर चहक चहक कर बलात्कार व बलात्कारियों की चर्चा न हो ( यह अच्छा नहीं लगता है।) बल्कि यह बताया जाय कि कितने बलात्कारियों को फाँसी हुई ,कितने को आजीवन कारावास और कितनी जल्दी और कैसे। पुलिस और न्यायपालिका की सफलता की कहानी बताई जाय  । बलात्कार पर अपने आप लगाम लग जाएगी।जैसे ही इन माध्यमों का सार्थक उपयोग बढे गा ,प्रवचन प्रलय तिरोहित हो जाय गा और सोशल मीडिया हमारे लिए अमूल्य वरदान सिद्ध होने लगेगी। किसी के उस पल की प्रसन्नता की कल्पना करें जब फेस बुक या व्हाट्सएप्प उसे उसके किसी पुराने बिछड़े मित्र या संबंधी से संपर्क करा देता है। ----------------------------------------------------------------------------------मंगलवीणा
वाराणसी ,दिनाँक :5 अगस्त 2018
mangal-veena.blogspot.com
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अन्ततः
***************बात उन्नीस फरवरी वर्ष २०११ के सांध्य बेला की है जब मैं जीप द्वारा गोरखपुर से वाराणसी आ रहा था। सड़क थोड़ी खाली थी ,सो स्वभाववश चालक ने रफ़्तार भी बढ़ा दिया था। एक व एक हेड लाईट की रोशनी आगे चल रही ट्रक के पश्च भाग पर पड़ी। उस पर लिखे एक उद्धरण ने हमें चौका दिया। काफी देर तक ट्रक के पीछे चलते हुए मैं उस उद्धरण को बार बार पढ़ता रहा। उस दिन की वह घटना मेरे स्मृतिपटल पर अंकित हो गई ।तब ऐसा झटका लगा था कि मेरी दिन भर की थकान ही मिट गई थी। आज भी कभी कभी सोचता हूँ कि यह सत्य है या असत्य या कि अर्ध सत्य।आप भी सोचिये कि क्या ,"विश्वास केवल वहम है और सच्चाई मात्र झूठ। "? क्या कभी ऐसा नहीं लगता की जिस बात की स्थापना विजेता करे वह सत्य और जिसकी स्थापना पराजित करे वह झूठ वरन यह सच कैसे हो सकता है कि नेकी कर जूता खा।अधिक क्या,इन ट्रक वालों की महिमा भी अनन्त है।-------------------------------------------------------------------------------------------------------------- मंगलवीणा
वाराणसी ;श्रावण कृष्ण अष्टमी संवत २०७५
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शनिवार, 23 जून 2018

भ्रष्टाचारियों से पिटती नासमझ भाजपा

***************जो भारतीय जनता पार्टी चार वर्ष पूर्व जनाकांछा बन पूरे देश पर छा गई और अगले तीन वर्ष या उत्तर प्रदेश के विगत विधान सभा चुनाव तक अपने उत्कर्ष पर रही ,वह अब  बुरी तरह जनाक्रोश का शिकार होने लगी है। जनाक्रोश भी ऐसा की जनता उसे महा भ्रष्टाचारी नेताओं और उनके दलों से पिटवा रही है।किसी संस्कारी ,ईमानदार और राष्ट्रवादी पार्टी से यदि भाजपा पिटती तो ठीक ही होता परन्तु दुर्भाग्य कि यह पार्टी अब बेईमान , भ्रष्टाचारी और राष्ट्रद्रोही दलों से पिट रही है। यदि मारीच को मरना है तो रावण के हाथ मरना तो बद से बदतर होगा।अच्छा होता कि इस काम के लिए भारतीय राजनैतिक क्षितिज पर किसी बेहतर दल का अभ्युदय होता। परन्तु ऐसा हुआ नहीं और जनता प्रबल संकेत देने लगी है कि बस बहुत देख लिया ;अहितकर ईमानदारों से हितकर बेईमान भले।
***************आजकल पत्रकारिता ,सोशल मीडिया ,टीवी एवँ सामान्य जन में यत्र तत्र ,सर्वत्र बीजेपी के विरुद्ध जनमत एवँ विपक्षियों के ध्रुवीकरण की चर्चा है।उपचुनाओं में  जहाँ भी ऐसे प्रयोग प्रस्तुत हो रहे हैं ,अधिकांश स्थानों पर भाजपा पिट रही है।शनैः शनैः परिस्थितियाँ कुछ ऐसी बनने लगी हैं कि जनता के लिए किसी गैर भाजपाई को चुनने में गुण दोष नामक पैमाना भी अनावश्यक होता दिख रहा है।बिलकुल साधारण गणित काम कर रही है कि यदि सारे विपक्षी ध्रुवीकृत होकर जनता के सामने आएंगे तो जनता भी भाजपा के विरुद्ध उन्हें विजय श्री का हार पहनाए गी क्योंकि भाजपा से कोई उम्मीद नहीं बची है।सच ही कहा है कि कलियुगे शक्ति संघे। विपक्षियों के लिए यह सूत्र वाक्य निश्चित सफलता की कुँजी सिद्ध हो सकती है। संघ चाहे कुसंघ हो या सुसंघ ;इससे जातियों और उपजातियों में बँटी जनता में कोई अन्तर नहीं पड़ता।भुक्तभोगी जनता ने अनुभव किया है कि कुसंघियों (विपक्षी दलों ) के सत्ता में रहते जो कठिनाइयाँ थीं वे सुसंघियों (भाजपा)के शासन में भी यथावत या उससे बदतर बनी हुई हैं।
***************जब सरकार की लोकप्रियता इतनी तीब्रता से गिर रही हो तब लोकसभा चुनाव पूर्व भाजपा द्वारा जनता से किये गए वादों और उनके पूरा न होने के कारणों पर परिचर्चा  सामयिक हो जाती है और इसके लिए कुछ ज्वलंत उदहारण पर्याप्त हो सकते हैं जैसे यदि भ्रष्टाचार की बात करें तो भाजपा ने देश को भ्रष्टाचार मुक्त सरकार देने की बात की थी।लगता है कि उनके लिए इसका तात्पर्य मात्र भ्रष्टाचार मुक्त मंत्री व प्रधान मंत्री देना था। भुक्तभोगी जनता ने तो व्यवहार में यही पाया कि सरकारी तंत्र और बाबू तो जम कर उन्हें अब भी लूट रहे हैं और बिना भय के लूट रहे हैं। फिर मंत्री जी भ्रष्टाचरी नहीं हैं ;से जनता  को क्या राहत ?कोई चौराहा ,तिराहा , नुक्कड़ या कार्यालय नहीं जहाँ सरकार के निम्नतम पादन  के कर्मचारी ,सिपाही या होमगार्ड जनता को खुलेआम न लूट रहे हों।उनसे ऊपर मध्यम और उच्च पादन पर बैठे बाबुओं की रौबदार लूट का तो कहना ही क्या। ठेकेदारी व्यवस्था से मूलभूत संरचना का त्वरित विस्तार भी बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रहा है। इस लूट के प्रतिफल में कानून के राज की धज्जियाँ उड़ रही हैं।
***************विगत लोकसभा चुनाव पूर्व भाजपा ने यह भी खूब उछाला था कि सत्ता में आने पर वर्षों से जनता व देश को लूट रहे नेता और बाबू सलाखों के पीछे होंगे ;परन्तु ऐसा हुआ नहीं। अब वे ही भाजपा वाले कहते हैं कि यह भ्रष्टाचार निरोधी एजेंसियों एवँ न्यायपालिका का काम है। काले धन पर चर्चा में अब वे विभिन्न देशों के साथ संयुक्त प्रयास की बात करते हैं जो बालू से तेल निकालने जैसा है।जब भी राम मन्दिर या कश्मीर की धारा तीन सौ सत्तर की बात होती है ये कछुए सी रणनीति अपनाते हैं ;कभी गर्दन बाहर तो कभी गर्दन भीतर।  यहाँ तक कि मध्यम वर्ग, जिसने इन्हें सत्ता पर बैठाया, उसके लिए कुछ करना तो दूर उलटे उन्हें प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों से वर्ष दर वर्ष निराश करते गए।अरुण जेटली जैसे गैरजमिनी ,अप्रायोगिक और प्रत्याकर्षक नेताओं ने आम जन का  ध्यान रखे बिना  साल के बाद साल ऐसे ऐसे बजट प्रस्तुत किए कि जनता सोचती कि सोचती रह गई।
 ***************मँहगाई के मोर्चे पर पर भी पेट्रोल एवँ डीज़ल की बढ़ती कीमतों ने कोढ़ में खाज का काम किया है और घरेलू बाजार में महँगाई का पलीता लगने लगा है।पेट्रोलियम पदार्थों की महँगाई पर सरकार ऐसे मौन है मानो उनका इस गम्भीर समस्या से कोई सरोकार नहीं। शायद भाजपा अपनी यूएसपी ही भूल बैठी है।वर्तमान परिदृश्य जनता को ऐसे कुठाँव मारती जा रही है कि मोह भंग का रंग और पक्का बनता जा रहा है।यह वास्तविकता जन जन तक पहुँच गई है कि भाजपा के प्रधान मंत्री,मुख्य मंत्री तथा उनके मंत्रिमंडल के मंत्री ईमानदार होते हुए भी एक ईमानदार और सक्षम सरकार नहीं दे सकते हैं।पिछले सारे प्रयोग यही इंगित करते हैं कि इन्हें शासन करना आता ही नहीं।
 ***************ठीक है कि मोदी जी के नेतृत्व में अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में भारत की साख और भूमिका बढ़ी है ;साथ ही एक उभरती अर्थव्यवस्था के रूप में अंतर्राष्ट्रीय साझेदारी भी। विदेशों में बसे भारतीयों को भारतीय होने या कहने में अब गर्व का अनुभव होता है और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में उन्हें बड़े सम्मान से देखा जाने लगा है।बेहतर विदेशी निवेश के लिए वर्तमान सरकार सराहनीय कार्य कर रही है। परन्तु इनसे पूर्ववर्ती सरकारों की भाँति  पाकिस्तान रूपी महाव्याधि की कोई प्रभावी दवा इनके पास भी नहीं दिख रही है। दुर्भाग्य है कि पश्चिमी सीमा पर हमारे जवान जान गँवा रहे हैं परन्तु राजनैतिक अनिर्णय के कारण हम बांग्ला देश जैसा इतिहास नहीं रच पा रहे हैं।सरकार पड़ोसी पाकिस्तान से सठ के साथ सठ जैसा तत्कालिक व्यवहार कर रही है परन्तु स्थाई समाधान का  कोई अता पता नहीं।कश्मीर मुद्दे पर जनता को भाजपा से बहुत उम्मीद थी जिसपर यह सरकार पाकिस्तान परस्त श्रीमती महबूबा की पीडीपी के साथ मिल वहाँ राज्य सरकार बना कर पानी फेरती दीख रही थी।एक सर्जिकल स्ट्राइक को छोड़ ऐसा कोई चमत्कारी कार्य नहीं हुआ जिसके लिए भाजपा जानी जाती है और वह इतिहास की स्वर्णिम घटनाओं में सम्मिलित हो सके।(देर सही परन्तु दुरुस्त कि भाजपा ने पीडीपी से अपने को अलग कर लिया और कश्मीर में राज्यपाल शासन लागू हो गया। भाजपा के पास अब भी इस क्षति नियंत्रण के लिए पर्याप्त समय है।)
***************इन विपरीत परिस्थितिओं के होते हुए भी पूरी संभावना है कि आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा पुनः विपक्षिओं पर भारी पड़े गी और विपक्षियों को बुरी तरह पीटेगी। इसका सबसे बड़ा कारण प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी का राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उभरा सक्रिय,समर्पित, निष्कलंक एवँ जादुई व्यक्तित्व है जिसकी तुलना में विपक्ष का कोई नेता कहीं ठहरता ही नहीं।उतना ही या सबसे अहं कारण राष्ट्रवाद है जिस पर जनता  अन्य दलों की अपेक्षा भाजपा पर सर्वाधिक भरोसा करती है। अन्य कारणों में राममंदिर, धारा तीन सौ सत्तर,समान नागरिक संहिता भी ऐसे मुद्दे हैं जिनपर भाजपा के अतिरिक्त किसी भी  विपक्षी दल से देश को कोई उम्मीद नहीं है।आज भारत वर्ष में वास्तविक धर्मनिरपेक्षता की ध्वजावाहक भी मात्र भाजपा ही है जब कि शेष विपक्षी दल धर्मनिरपेक्षता के नाम पर कुछ धर्म और जातियों की तुष्टिकरण पर्याय हैं। जनता विपक्षियों द्वारा सत्ता के बन्दरबाँट से भी सचेत है जिसके चलते भाजपा एक स्वाभाविक चयन है।जाति ,धर्म ,भाषा,परिवारवाद ,भ्रष्टाचार और क्षेत्रियता पर खड़ी पार्टियां सत्ता के लिए एक गठबंधन बना कर चुनाव लड़ पाएं गी ;यह तो गधे को सींग जैसी घटना लगती है।
***************अतएव भाजपा आगामी चुनाव में भी विपक्षी गठबंधन से पिटे गी; यह उन द्वारा देखा जाने वाला दिवा स्वप्न है।इस बीच यदि एक भी ऊपर उल्लिखित मुद्दा भाजपा के पक्ष में क्लिक (खड़क )कर गया तो जनता फिर भाजपा को भारी बहुमत से सर आँखों पर बैठाए गी और परिवारवादी विपक्षी भ्रष्टाचारी पार्टियाँ हमेशा के लिए धराशाई हो जायँगी।ऐसा होने पर संभावना है कि चुनाव बाद भाजपा के सामने एक नए शिष्ट एवँ ईमानदार राष्ट्रीय दल का उदय हो।अन्यथा दूसरी स्थिति में भाजपा कठिनाई से केंद्र में  सरकार बना पाए गी।तीसरी स्थिति में भाजपा की  लगातार लोक प्रियता घटने पर सत्ता का विपक्षियों में बन्दर बाँट होगा जिससे केंद्र सरकार कमजोर होगी और विभिन्न प्रांतों में क्षेत्रीय क्षत्रप निरंकुशता के साथ केंद्र का हाथ मरोड़े गे। यह स्थिति देश की उभरती अर्थ व्यवस्था एवं अखण्डता के लिए अहितकर होगी। आदर्श और सर्वाधिक संभाव्य स्थिति यही है और होगी कि भाजपा को आगामी  लोक सभा चुनाव में जनता बहुमत दे ताकि वह अपने अच्छे वादों को पूरा कर पाए।तब तक कई राज्यों में होने वाले विधान सभा चुनाव इसे शीर्ष चर्चा का विषय बनाये रखें गे।----- मंगलवीणा
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 दिनाँक :२४ जून २०१८ ,वाराणसी------------------------- mangal-veena.blogspot.com
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