गुरुवार, 5 जून 2014

सत्ता परिवर्तन

**********अधिकांश भारतीयों को अच्छा लग रहा है कि हमारा लोकतंत्र सही रास्ते पर चल पड़ा है । रास्ते की अवरोधक राजनीतिक वंश -वल्लरियाँ सूखने लगी हैं । देश में अन्ना आन्दोलन से उपजी आम आदमी पार्टी के अभ्युदय एवँ मुख्य राष्ट्रीय विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष पद पर श्री राजनाथ सिंह के मनोनयन के बाद बदलाव ने अपना रास्ता बहुत ही द्रुत गति से बनाना शुरू किया और कुछ ही महीनों में सोलहवीं लोकसभा के चुनाव समापन तक श्री नरेंद्र मोदी को प्रधान मंत्री पद पर आसीन कर एक बेहतर एवँ कल्याणकारी युग में प्रवेश कर गया ।आरम्भिक चरण में जब श्री सिंह ने भाजपा की  कमान सँभाला ,आम जन की अभिरुचि उनमें कम और इस बात में ज्यादा थी कि श्री मोदी भाजपा की ओर से प्रधान मंत्री पद के प्रत्याशी घोषित किए जाँय । इस दबाव के पीछे कारण यही था कि जनता काँग्रेस नीत सरकार को समूल उखाड़ फेंकने का मूड बना रही थी और पूरे देश में उसे नरेंद्र मोदी ही ऐसे नेता रूप में दिख रहे थे जो राष्ट्रीय पटल पर नायक की भूमिका निभा सकते थे । मात्र नमो में ही वह दम -ख़म था जो कुशासन ,महँगाई और भ्रष्टाचार की पर्याय बन चुकी काँग्रेस को टक्कर एवँ उसे तहस -नहस करने वाला मात दे सकता था ।
**********सब कुछ अनुकूल होता गया । नमो भाजपा की ओर से प्रधान मंत्री पद के प्रत्याशी घोषित किए गए । मिल बाँट कर सत्ता सुख भोगने वाले सारे विरोधी दल मोदी -निंदा में जुट गए ।  पिछले दस -बारह वर्षों से प्रिंट एवं इलेक्ट्रॉनिक समाचार माध्यमों ने जिस मोदी को विवादों में घेरे रखा वही मोदी उन पर नशा सा छाने लगे और समाचारों के शीर्ष विषय बन गए ।जहाँ कहीं मोदी की रैली होती लाखों श्रोताओं का समुद्र उमड़ पड़ता । अनदेखी और अनजान बनी काँग्रेस कहती रही कि उन्हें तो मोदी की कहीं लहर दिखती नहीं । आप कहती कि भ्रष्टाचार से हम लड़ रहे हैं और जनता हमें ही सत्ता सौंपे गी । प्रदेश स्तर की पार्टियाँ कहतीं  कि उनका तीसरा मोर्चा ही सरकार बनाए गा । बिरोधी दल मोदी नहीं बाकी सब कुछ पर आमादा होते गए । परन्तु भाजपा एवँ मोदी अपने सुशासन एवँ विकास के मुद्दे पर अडिग रहे । चुनाव मोदी वनाम मोदी- नहीं होता गया ।मोदी के पक्ष में समूचे देश की नई पीढ़ी ने सोशल मीडिया सँभाला ,बुद्धजीवियों ने बढ़ते जन समर्थन रूपी ऊर्जा की व्यूह रचना की और कार्यकर्ताओं ने मतदान प्रतिशत बढ़ाने का सँकल्प लिया ।जन -जन ने ठान लिया कि अबकी बार मोदी सरकार ।परिणाम घोषित हुए । मोदी के नेतृत्व में भाजपा को पूर्ण बहुमत एवँ भाजपा नीत राजग को प्रचंड बहुमत मिला । मोदी -नहीं खेमें वाले देश विदेश के लोग भौंचक एवँ अवाक् रह गए ।जनाकांछा पूरी हुई और अपार उल्लास बीच मोदी जी भारत के प्रधान मंत्री पद पर सुशोभित हुए ।लगता है कि अच्छे दिन आने वाले हैं।
**********यह चुनावी दौर जब कल भारतीय इतिहास का हिस्सा होगा ,तीन -चार प्रमुख घटनाएँ निश्चित रूप से उसमें उल्लिखित होंगी । आम आदमी पार्टी का पुच्छल तारे की भाँति भारतीय राजनीति के पटल पर उदित होना इनमें पहली घटना थी । निःसंदेह अन्ना आन्दोलन से कुछ अच्छे लोग जुड़े थे जबकि कुछ अन्य चालाक और अच्छे लोग थे । वे धैर्य और दृष्टि केसाथ देश की राजनीति में कुछ अभिनव प्रयोग कर सकते थे परन्तु सत्ता एवँ ख्याति के वशीभूत हो स्वयं महत्वकांछी बन गए और वैसे ही लोगों से चौतरफा घिर गए । काँग्रेस के विरोध पर खड़ी यह पार्टी कांग्रेस से सहयोग लेकर दिल्ली में सत्ता का खेल खेली ; फिर और  बड़ी महत्वकाँछा पूर्ति केलिए लोकसभा चुनाव में कूद पड़ी। जनता सतर्क हो गई कि  आप नमो के रास्ते का रोड़ा बन रही है और इसका आचरण भी अन्य विरोधी दलों जैसा ही है । फिर क्या था ।  पूरे देश में इस पार्टी की भी काँग्रेस व अन्य दलों की भाँति बुरी दुर्गति हुई और यह पुच्छल तारा चुनाव परिणाम के साथ तिरोहित हो गया ।
**********इस चुनाव में एक और उल्लेखनीय बदलाव यह आया कि भारत में धर्म निरपेक्षता /सेक्यूलरिस्म अपने मूल स्थान पर लौट आया । हमारे संविधान में यही एक ऐसा शब्द है जिसका सर्वाधिक दुरुपयोग हुआ ।  अधिकांश दल अनेक धर्मों वाले इस देश में सेक्युलरिस्म के नाम पर भ्रम एवं भय फैलाकर राष्ट्रवादी दलों को अछूत बनाये रक्खे और अपने पक्ष में बार -बार सत्ता पाते रहे। नई पीढ़ी ने इस छलावा को बड़ी बारीकी से पकड़ा और  इसे चुनावी मुद्दा से अलग कर जनता की ज्वलंत समस्याओं को आगे बढ़ाया। यह स्थापित हो गया कि विकास और सुशासन की बात करने वाले राष्ट्रवादी  केवल सेक्युलर -सेक्युलर रटने वालों से ज्यादा सेक्युलर हैं । यह अर्थ मिटा दिया गया कि किसी वर्ग विशेष की बात करना सेक्युलरिस्म है तो सभी वर्गों की बात करना नानसेक्युलरिस्म ।जनमत ने तय कर दिया कि सबकें लिए सुशासन एवं सबका विकास ही भारत केलिए आदर्श धर्मनिरपेक्षता की व्याख्या है। अतः आशा की जा सकती है कि आने वाले चुनावों में यह शब्द अपने मौलिक तात्पर्य को नहीं खोयेगा ।
**********परिवर्तन के दौर में तीसरा सबसे अहं ,सकारात्मक एवँ सराहनीय बदलाव लोकतंत्र के नाम पर वर्षों से स्थापित वंशवादी शासन व्यवस्था का उखड़ना  था ।काँग्रेस के नाम पर नेहरू -गाँधी परिवार ,डीएमके के नाम पर करूणानिधि परिवार ,सपा के नाम पर मुलायम सिंह यादव परिवार ,राजद के नाम पर लालू परिवार इत्यादि -इत्यादि ने अपना स्पष्ट पराभव देखा । जनता नहीं चाहती कि कोई सरकार किसी परिवार की कठपुतली बनकर चले ।जनता ने स्पष्ट कर दिया कि वंशतंत्र में लोकतंत्र नहीं हो सकता और जहाँ लोकतंत्र  है वहाँ वंशवाद पनप नहीं सकता । अतः राजनीतिक दलों को यथाशीघ्र वंशवादी बेड़ियाँ तोड़ कर अपनी प्रासंगिकता बहाल करना होगा । काँग्रेस मुक्त भारत का नारा अपने में बहुत सारे निहितार्थ समेटे हुए है ।इन मील के पत्थरों के अतिरिक्त राजनेताओं के भाषणों एवं उद्गारों में भाषा की अशिष्टता इस चुनाव में अपने चरम पर रही । चुनाव आयोग को कक्षा मॉनिटर की तरह नेताओं को डाँटते फटकारते और संतुष्ट होते पाया  गया ।आयोग करता भी क्या। हमारे देश में फिल्म सेंसर बोर्ड भी तो "चोली के पीछे क्या है "जैसे फ़िल्मी गानों को समझाने पर शिष्टाचार के हिसाब से ठीक -ठाक मान लेता है ।
**********अब बदलाव की बयार को जनता तक पहुँचाने का समय है । अपेक्षा प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी से है । यह गौण है कि उनके कैबिनेट मैं कौन लोग हैं या उनके सहयोगी कौन हैं।पहले राहत फिर सुशासन और विकास को भारत भूमि पर अवतरित होते देश का हर नागरिक देखना चाहता है । अच्छे दिन रूपी स्वप्न सुन्दरी की प्रतीक्षा है और भगीरथ प्रयास कसौटी पर ।
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अंततः
************जब सफलता मिलनी होती है ,परिस्थितियाँ स्वयँ अनुकूल होती जाती हैं । यथा जब पवनपुत्र हनुमान लंका दहन को उद्यत हुए तो उन्चासों पवन चलने लगे थे ।
++++++++++हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास ।
++++++++++अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास । गोस्वामी तुलसी दास
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दिनाँक 5 जून 2014                              Mangal-Veena.Blogspot.com@Gmail.com
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गुरुवार, 17 अप्रैल 2014

गुजराती गौरव -एक चुनावी चर्चा

तीन -चार दिन पहले कच्छ गुजरात निवासी मेरे एक चिर परचित मित्र  का देर रात फोन आया । चूँकि रात में आने वाले फोन थोड़ा चौंकते हैं ,अतः झट उठकर मोबाइल सँभाला और हेलो बोल पड़ा ।
उधर से आवाज आई -साब जी नमस्ते । मैं नरायन भाई कच्छ से बोल रहा हूँ ।  देर रात में फोन करने से आप बिचलित तो नहीं हुए ।
बिल्कुल नहीं भाई ,नमस्ते । तुम कैसे हो ?घर -परिवार एवँ कच्छ का कुशल -छेम बताओ ।
सब भलो ।आप लोग कैसे हैं ?बनारस में नरेंद्र भाई मोदी का चुनाव अभियान कैसा चल रहा है ?
बहुत बढ़िया । फिरहाल मोदी जी की स्थिति सर्वोत्तम चल रही है । वे बनारस से चुनाव जीत सकते हैं । ऐसी प्रबल सम्भावना है । परन्तु तुम तो काँग्रेसी नेता एवँ ओहदेदार हो। फिर तुम्हें मोदी जी से सहानुभूति क्यों ?
दूसरी ओर से आवाज आती है "सा --ब जी !हमारे लिए भारतीय होना सर्वाधिक गौरव एवँ गुजराती होना प्रथम गौरव की बात है। मेरा काँग्रेसी होना तो बाद की बात है । आज नरेंद्र भाई हम गुजरातिओं के लिए गुजरात का गौरव हैं। हम सबकी शुभेक्षा है कि नरेन्द्र भाई देश के प्रधान मंत्री बनें ।
परन्तु तुम सरीखे काँग्रेसी मोदी जी को प्रधान मंत्री बनाने में क्या योगदान कर सकते हैं ?
अरे सा -ब जी !समझने का प्रयास करिए । राज की नीति को राजनीति कहते हैं । हम लोग भी अपने ढंग से काम कर रहे हैं ।अभी -अभी होटल वापस लौटे हैं । मस्तिष्क में कौंध हुई "होटल "
तुरन्त सवाल दागा -भाई तुम इस समय कहाँ से बात कर रहे हो ?
मैं इस समय दिल्ली हूँ और अभी एकाध सप्ताह यहीं रहूँ गा । हो सकता है कि बनारस आने का भी कार्यक्रम बनाऊँ । रात बहुत हो चुकी है । फिर किसी दिन चर्चा करें गे । जय भारत ।
नमस्ते भाई । ऐसा लगा कि लाइन कट चुकी है । मेरी नींद गायब थी । एक क्षण राज ---नीति का ध्यान आता तो दूसरे क्षण "जिसको न निज गौरव तथा निज देश पर अभिमान हो "का ध्यान आता । मुझे लगा कि कच्छ के लिए काशी का हाथ बढ़ाने का समय आ गया है ।
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अंततः -एक लघु कहानी
-----------------------------------------------रजाई वाला रमैया  -----------------------------------
**********रमैया अपने परिवार के साथ समाज के अन्य जंगल पर आश्रित परिवारों की भाँति जीवन यापन कर रहा था । कभी जाड़े में लकड़ी की बेच से उसे थोड़ी अच्छी कमाई हो गई ।  उसने मन ही मन सोचा कि बड़े लोग जाड़े में रजाई ओढ़ते हैं । उन्हें बड़ा मजा आता होगा । हमारी भी कोई जिन्दगी है ?पूरी सर्दी पुआल एवं कथरी में लिपटे बीत जाती है । उसने अपने को धिक्कारा कि पिछले साल भी उसने अपने बच्चों द्वारा इकठ्ठा किये गए सेमर की रुई को नून- तेल के चक्कर में महाजन को भेंट कर दिया था। न जाने कहाँ से हौसला बढ़ा ,झटपट बाजार की ओर बढ़ गया और एक नई रजाई खरीद कर ख़ुशी -ख़ुशी घर आया ।
**********पूरे परिवार में खुशियों की बाढ़ आ गई । पत्नी ने त्योहारी खाना बनाने का उपक्रम किया । तभी रमैया के साले साहब बहन का हाल समाचार लेने आ धमके । फिर क्या था । भोजन के बाद नई रजाई का  पहला आनन्द साले साहब उठाये । जब तक साले जी बहनोई के घर से विदा हुए ,पूरे समाज एवं रिश्तेदारों में यह बात जंगल की आग की तरह फ़ैल गई कि रमैया ने नई रजाई खरीदी है  ।जहाँ समाज में किसी के पास एक साबुत ओढ़ना नहीं वहाँ रमैया के पास नई रजाई ।आश्चर्य । फिर शुरू हुआ रमैया के यहाँ एक रिश्तेदार का आना तो दूसरे का जाना । वीटो वाले रिश्तेदार तो पांच- छः दिन से पहले हिलने का नाम न लिए । इस प्रकार जाड़ा बीतने को आया परन्तु रमैया और उसको बच्चों  को अपनी नयी रजाई ओढने का सौभाग्य न मिला । उलटे रिश्तेदारों के आव- भगत में पूरा घर बेहाल हो गया और गाँव के महाजन का क़र्ज़ भी उसपर बढ़ता चला गया ।
**********जिस रजाई को रमैया  बड़ी नियामत समझ कर घर लाया था उस  रजाई ने उसका सुकून छीन लिया । अब वह रात दिन उस रजाई से छुटकारा पाने की तरकीब  सोचने लगा  । एक अल -सुबह जब फूफा महोदय रजाई छोड़ कर बहार सैर पर निकले ,रमैया ने झट कौड़ा जलाया और रजाई को अग्नि के हवाले कर दिया।सारी बात समझते ही फूफा भी खिसक लिए ।रमैया के जाड़े एवं कष्ट का एक साथ अंत हो गया ।
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दिनाँक 17.04.2014                                    Mangal-Veena.blogspot.com@Gmail.com
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बुधवार, 26 मार्च 2014

A homage to the compassion

My eldest brother Shri Shambhoo Narain Singh,who had been an exemplary poet of Hindi literature,passed away on 6.3.2014 at the age of eighty three years.Better known with nickname Akinchan Ji in the literary word ;he carried forward the great tradition of Shri Jaishankar Prasad in spirit as well as letters.Through out his life he was a teacher,a scholar,a philosopher and a Satsangi full of compassion.
During college days in 1960s Akinchan Ji published his first two books of poems namely 1.PREMMANDIR 2.JIVAN MALA having philosophical approach of life in stenza.He had such a passion for literature in those days that he convinced mother and aunt to sell their ornaments to meet the expenses of printing these books.Afterwards he also saw bundles of these books being sold to Noonwalah for buying common salt in exchange.But the best creation of this poet came in 1987 when an epic HANS KALADHAR reached in hands of Hindi scholars and comments sprang in news papers.This Mahakavya is based on story of Nala and Damyanti narrated in Mahabharata.This work has perfected all the parameters of a Mahakavya and thus a treasure of Hindi literature which may be compared well with Kamayani  for its literary richness.The epic has a very smooth journey with the umbrellas of nine Rasas and pretty clothings of Alankars on the platform of poetic standards.This epic is still waiting for its evaluation.His post 90s and unpublished writings viz poems ,proses,stories are left with his family awaiting publication.
Here are some stenza to recall the gret poet-
हे  नाथ ! दीनता  के  पीछे , जैसी  तव  करुणा  रहती  है ।
इस दास अकिंचन की आशा ,निशि दिवस उसी पर रहती है।
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स्वामी की चाह जान मन में
श्री जा पहुँची ज्यों निषध देश
सुख -शान्ति -साधनों में प्रवेश
पाकर बैठी ज्यों विविध वेश । 1 परिचय सर्ग
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नीरव अम्बर के  किस पथ से-
वह आई थी मेरे   समीप
फिर किस पथ से वह गई कहाँ
यह मुझे बता दे ,गगन -दीप । 35 स्वप्न -सर्ग
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अम्बर  परिधान पहन श्यामल
फहरा मादक छवि क्षितिज छोर
ज्यों सन्ध्या -श्री अञ्चल पसार
उनको पुकारती विभा -ओर । 2 6 निसर्ग -दर्शन सर्ग
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निज अहँकार के पोषण में
जीवन करता कल्मष रचना
चाहे जैसी भी सिद्धि मिले
उसमें न कहीं कुछ भी अपना । 59 हँस -प्रदीप (द्वितीय -कला )सर्ग
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With passage of time and research of his literary contributions the genius of this great poet will get its proper place.I have never seen a poet of such a high standard and of such a low popularity.This may be the plight of today,s marketing management.
 Passing away of Akinchan Ji is an irreparable loss to our family and to the literary world.With all our sentiments and sincerity we pay homage to his compassion .
O GOD !May his soul rest in peace .
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Date-26.3.2014                                   Mangal-Veena.Blogspot.Com
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सोमवार, 10 फ़रवरी 2014

समाजवादी टोपी एवं लाल बत्ती

--------------------इस वर्ष होने जा रहे आम लोकसभा चुनाव में अपनी -अपनी विजय केलिए भाजपा या काँग्रेस ही नहीं अपितु देश के सभी छोटे- बड़े राजनीतिक दल अपने आधुनिक रणकौशल केसाथ जनता के बीच उतर चुके हैं । सायकिल सवार समाजवादी भी लाल टोपी लगाये झुण्ड के झुण्ड उत्तर प्रदेश की सडकों पर निकल पड़े हैं । जनता को मोहक सपने दिखा कर उन्हें अपना सपना पूरा करना है । सपना एक ही है कि यदि किसी भाँति जनता एक बार फिर बहक जाती और लोकसभा चुनाव में उन्हें ज्यादा से ज्यादा सीटों पर विजयी बना देती तो जोड़ -तोड़ की कोई जुगत भिड़ा कर उनके नेता जी अर्थात मुलायम सिंह यादव भी चौथेपन में देश के प्रधान मंत्री वाली कुर्सी का नैसर्गिक आनन्द उठा लेते ।कितने दिन केलिए बैठ लेते -यह बात समाजवादिओं के सपना में गौण है । बैठने के बाद वे मनमोहन सिंह ,देवगौड़ा, स्व नरसिंह राव या स्व चौधरी साहब सिद्ध होंगे -यह भी इन लोगों का नहीं बल्कि इतिहासकारों का विषय होगा ।    
--------------------अभी नेता जी ने कहा है कि चुनाव से पहले कोई तीसरा मोर्चा नहीं होगा । बात भी ठीक है चुनाव परिणाम आने तक सारे विकल्प खुले रखना उनके हित में है । यदि अच्छी सँख्या में उत्तर प्रदेश से सीटें मिल गईं और सम्भावना का सिद्दांत काम कर गया तो मन माँगी मुराद पूरी नहीं तो सोनिया जी की शरण में तो वे पहले से हैं ही । सारे आकलन गलत होने की दशा में नेता जी तो कहते ही हैं कि अडवाणी जी देश के बड़े नेता हैं । चूँकि प्रदेश के बाहर समाजवादी दल अस्तित्व विहीन है अतः इन्हीं तीन विकल्पों में उन्हें अपनी जगह तलाशनी है । समाजवादी भूलें -न भूलें परन्तु उनके मुखिया कैसे भूल सकते हैं कि राष्ट्रपति चुनाव के समय वे ममता बहन का कितना साथ निभाए या नाभकीय मुद्दे पर वे बामपंथियों के साथ कितना चले ।
--------------------उत्तर प्रदेश में राजशाही ज़माने से दबंगई की एक सामन्ती धारा बहती है ।समाजवादियों में भी दबंगई की अपनी संस्कृति है। किसी को उठक -बैठक करा देना ,किसी जी हुजूरी न करने वाले अधिकारी को अपमानित कर देना ,जाति विशेष के अधिकारियों का योग्यता न होते हुए भी रुतबा बढ़ा देना ,कानून ब्यवस्था की धज्जियाँ उड़ते देखना या सैफई जैसे नाच -गाने का आयोजन सदा इनके शासन और शान में होता आया है । इनकी दबंगई कार्यालयों एवं सडकों पर दिखती है और एक वर्ग के नव युवकों को खूब भाती है।ऊपर से इस दल के बड़े नेताओँ का अपने छोटे कार्यकर्ताओं एवं परंपरागत मतदाताओं से गहरा जुड़ाव है । सोने में सुहागा कि उत्तर प्रदेश का जातीय समीकरण निर्विवादरूप से समाजवादियों की सबसे बड़ी मतपूँजी है ।
 --------------------दबंगई बढ़ाने एवं कार्यकर्ताओं में नया रक्त -संचार भरने केलिए उत्तर प्रदेश सरकार चाहती है कि हर जिले में उनके दस -पाँच नेता लाल बत्ती से सुशोभित हों और जनता में इनके साथ रहने के ग्लैमर का चकाचौंधी संदेश जाय । किसी को मंत्री ,किसी को राज्यमंत्री तो किसी को उनका दर्जा देकर लालबत्ती एवं सुरक्षा कर्मियों का कवच देना भी तो सरकार का दायित्व है ताकि समाजवादिओं में समाजवाद चहुँ ओर दिखे । यह तो माननीय उच्च न्यायालय है कि लाल बत्तियों की बाढ़ को रोक रही है । फिर भी समाजवादी सरकार उच्चतम न्यायालय जाने का मन बना चुकी है और यह बात माननीय न्यायालय के संज्ञान में लाये गी कि लाल बत्ती की सँख्या बढ़ाने से भला जनता का क्या लेना -देना है । अलबत्ता इससे तो हनक बढे गी कि पुलिस वाले खोई हुई  समाजवादी भैसें हर हाल में ढूंढ़ निकालें गे ।
-------------------- लाल टोपी और लाल बत्ती की युगलबंदी जनता को भली लग रही है या नहीं -यह तो चुनाव परिणाम ही बताएँ गे ।परन्तु समाजवादियों को इतना तो समझ लेना चाहिए कि अन्ना आन्दोलन से देश की जन चेतना जागृत हुई है और वह अब नेताओं को मात्र सेवक के रूप में देखना चाहती है । अभी समाजवादी सरकार जनता की कितनी और क्या -क्या सेवा कर रही है ;इसका सड़क और चौराहों पर आकलन हो रहा है । अब निर्णय ,धर्मनिरपेक्षता के छलावे पर नहीं, सामने दिखते विकास पर होगा । यह आगामी चुनाव का बड़ा ही दिलचस्प पहलू होगा कि उत्तर प्रदेश किस करवट बैठता है।  बेहतर होगा कि समाजवादी खास बनने का चक्कर छोड़ आम बनने का प्रयास करें और अपनी सारी ऊर्जा एवं संसाधन उत्तर प्रदेश के विकास और जनता की खुशहाली केलिए लगा दें ।
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अंततः
--------------------विकास वह चकाचौंध है जो दिखती है । इसे रैली,सड़क यात्रा या विज्ञापन द्वारा दिखाने की अवश्यकता नहीं पड़ती है ।
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दिनाँक 11 . 2 . 2014 -------------------------------------mangal-veena.blogspot.com
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बुधवार, 29 जनवरी 2014

भारतीय गणतंत्र की पैंसठवीं वर्षगाँठ

---------------बीते छब्बीस जनवरी को पूरे देश में यहाँ -वहाँ भारतीय गणतंत्र की पैंसठवीं वर्षगाँठ मनाई गई । जो लोग भारतीय तंत्र से सीधे या परोक्ष जुड़ें हैं वे इसे मनाने का चाक -चौबंद एवँ सफल उपक्रम किये । जो लोग इस तंत्र से सीधे या परोक्ष लाभार्थी हैं वे उत्सव का आनंद उठाए और अपना छबिप्रदर्शन भी किए । वर्षों से देखा गया है कि राष्ट्रीय पर्वों पर कर्मचारी बहुत आनंदित होते हैं जिन्हें पर्व के नाम पर एक दिन की छुट्टी मिल जाती है या वे लोग प्रसन्न होते हैं जिन्हें मिठाई खाने ,खेलने -कूदने या मौज-मस्ती का अवसर मिल जाता है । वे भी बहुत खुश होते हैं जिन्हें काफी प्रतीक्षा के बाद उस दिन केलिये व्यवस्था दायित्व निर्वहन के बदले छतिपूर्ति का भरपूर लाभ मिल जाता है । परन्तु गणतन्त्र चलाने वाले नेता और नौकरशाह रूपी तांत्रिकों के ख़ुशी एवं उमँग का क्या कहना जो ऐसे अवसरों पर सञ्चार माध्यमों से जनता को यह अनुभव कराते हैँ कि वे ही इस देश की सवा सौ करोड़ जनता के विधाता हैं । इन विशेष वर्गों से इतर शेष जन मानस से हमारे राष्ट्रीय पर्व भावनात्मक एवं ब्यवहारिक तौर पर जुड़ ( कनेक्ट ) नहीं पाये हैं । ढेर सारे कारणों में साफ़ दीखता कारण यह है कि गणतन्त्र चलाने वालों में जनता के प्रति कोई ईमानदार प्रतिबद्धता नहीं है और जनता में गणतंत्र चलाने वालोंके प्रति उनके नित नए कारनामों से उपजा घोर विकर्षण है।
---------------गणतांत्रिक देश बनने के बाद चौसठ वर्षों में अर्जित हमारी उपलब्धियों ने पूरी दुनियाँ का ध्यान खींचा है । परंतु चीन से विकास में अभी पीछे होने और विश्व शक्ति न बन पाने केलिए गणतंत्र चलाने वालों पर सदैव उँगली उठती रही है । गणतंत्र के उम्र का एक भारतीय नागरिक जब देश में ऊबड़ -खाबड़ ,गड्ढायुक्त ,धूल -गुबार भरी घटिया सडकों का संजाल देखता है , सड़क चौराहों पर पुलिस को अवैध वसूली करते पाता है ,कार्यालयों में किसी भी काम केलिए कर्मचारियों को सुविधा शुल्क माँगते पाता है या सरकारी अस्पतालों में स्वयँ अस्पताल को बीमार पड़ा देखता है तो वह निराश होकर गणतंत्र से डिस्कनेक्ट हो जाता है ।इसी वय का गंगा किनारे वसने वाला कोई दूसरा ब्यक्ति; जो लड़कपन में नित्य गंगा की धवल धारामेंतैराकी,स्नान,मज्जन एवं पान  का आनंद उठाया करता था ;आज जब उसी धाराविहीन और दुर्गंधयुक्त गंगा को मल- जल के साथ बहते देखता है तो उसे घोर निराशा होती है । ऋषियों -मुनियों की ब्यथा का तो कहना क्या । ऐसे ही एक कृषक अपनी उपेक्षा एवँ एक ब्यवसायी उसपर थोपी जानेवाली असुविधाओं के कारण डिस्कनेक्ट हो जाता है । डिसकनेक्सन  की ये सारी लड़ियां मिलकर जन को जनतंत्र से अलग कर दी हैं । फिर जन में जनतंत्र के लिए उत्साह कहाँ से आए ?
---------------इस निराशा के बीच पिछले एक -दो वर्षों से इन राष्ट्रीय पर्वों पर भागीदारी में कुछ अद्भुत बदलाव दिखने लगा है  जो मरुस्थल में किसी मरूद्यान सा प्यारा लगता है ।गली ,मुहल्ले में घूम -घूम कर सब्जी बेचने वाले अपनी रेहड़ी पर ,गाड़ी चालक अपने वाहन पर ,कुछ घरेलू लोग अपने घरों पर ,चाय -पानी वाले अपनी दुकानों पर ,यहाँ तक कि घुमन्तू लोग अपनी साइकिल पर छोटे -छोटे तिरंगे लहराते इन पर्वों पर प्रसन्न मन से कार्यशील दीखते हैं।सोने में सुहागा कि कुछ वर्ष पहले से हमारा तिरंगा भी सरकारी दायरे से आगे बढ़ कर जन -जन के हाथ पहुँचने का राह पा चुका है। यह परिदृश्य स्पष्ट संकेत देता है कि परिवर्तन की वयार चल पड़ी है और गणतंत्र का नया युग प्रारंभ हो रहा   है । नई पीढ़ी के युवा ही इस बदलाव के सूत्रधार एवं नायक हैं । इन युवकों में पुरानी पीढ़ी की अपेक्षा अधिकार और कर्तब्य की बेहतर समझ है । ये युवक भारत एवं इसके गणतंत्र को नई उँचाई देना शुरू कर दिए हैं । इन्हीं की उर्जाभरी सहभागिता से गणतंत्र चलाने वालों की सोच बदल रही है और जनता गणतंत्र से कनेक्ट हो रही है । जनता की आपसी विमर्श में तुरंत संपर्क माध्यम भी बड़ी भूमिका निभा रहे हैं । इन माध्यमों की सक्रियता ने भारत क्या पूरे विश्व में परंपरागत शासन प्रणाली को झकझोर दिया है ।आज का बदलाव कल के सुनहरे  भारत का शुभ संकेत है ।
---------------कितना अच्छा होता कि देश की निःस्वार्थ सेवा करने वाले अन्ना हजारे जी इस पर्व पर राजपथ पर विशिष्ट अतिथि के रूप दिखे होते या काले धन के विरुद्ध संघर्ष करने वाले बाबा रामदेव को इस अवसर पर पदमभूषण जैसा पुरस्कार दिया गया होता अथवा गणतंत्र को गंगा -यमुना बचाओ या जंगल और पर्यावरण बचाओ अभियान पर केंद्रित (फोकस )किया गया होता । निःसंदेह भारत एक दिन अनुकरणीय राष्ट्र बने गा जब हमारे सांस्कृतिक एवं धार्मिक पर्व राष्ट्रीय पर्व बन जाएँ गे और राष्ट्रीय पर्व सांस्कृतिक एवं धार्मिक बन जॉय गे । रिट्रीट का समय निकट है अतः बस । जय भारत ,जय गणतंत्र ।
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अंततः
अजीब लगता है जब "जो शहीद हुए हैं ,उनकी जरा याद करो कुर्बानी "जैसे कालजयी गाने की याद आते ही लता जी की ओर ध्यान चला जाता है परन्तु जिसकी अन्तःपीड़ा इस कविता के रूप में अवतरित हुई उस महान कवि प्रदीप को लोगों में याद कराना पड़ता है । उन्हें भारतरत्न देने वाले किस श्रेणी में रखते हैं ?
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दिनाँक 29 जनवरी 2014                                              mangal-veena.blogspot.com
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सोमवार, 30 दिसंबर 2013

नववर्ष मंगलमय रहे


आकलन की बात हो तो कुछ सुखद दीखता नहीं ।
फिर भी प्रभु से प्रार्थना , नववर्ष मंगलमय रहे । (1)
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जानता हूँ ‘विश' का , कोई मायने होता नहीं ।
पर शुभेच्छा चाहती , नववर्ष मंगलमय रहे । (2)
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तरणि तरना चाहती , झंझावतों पर वश नहीं ।
नाविक नदी से चाहता , कि पार सब होते रहें । (3)
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रश्मिओं को क्या पता , बादल घनेरे छा रहे ।
लहरें तो दिल से चाहतीं, अठखेलियाँ होती रहें ।  (4)
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उम्र ढलती जा रही , इस पर हमारा वश नहीं । 
पर सदा यह कामना,हम चिर युवा दिखते रहें । (5)
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समय सब कुछ देखता,है बढ़ रहा निज राह पर।
आज इतना खुश रहें, कि कल हमारी बात हो।  (6)
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पुष्प की क्या उम्र हो ,माली इतर है सोचता।
पवन जब पाए सुरभि , सारी धरा मस्ती में हो। (7)
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कर्म करते हैं सभी , "कर्तव्य क्या"  सोचा नहीं ।
रात दिन उलझे रहे ,"जो चाह थी" पाया नहीं (8)
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बहुत हल्ला कर लिया,वर्तन हुआ कुछ भी नहीं ।
भ्रष्ट  रिश्वतख़ोर  हँसते , और हम घुटते रहे ।  (9)
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उठो मिलकर थाम लें, उल्टी हवा के वेग को ।
स्वर्ग हो अपनी धरा,हर जन यहाँ खुशहाल हो।  (10)
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यदि कैलेंडर जादुई,मिल जाय इस नव वर्ष में ?
टाँग दूँ घर घर पहुँच , सारा जहाँ खुशहाल हो।  (11)
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करणीय या करने योग्य कर्म को कर्तब्य या धर्म कहते हैं।
----------------------------------------------------------------- मंगलवीणा
वाराणसी  Mangal-veena.Blogspot.com
दिनाँक 30.12.2013
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बुधवार, 20 नवंबर 2013

भारतरत्नगर्भा वसुन्धरा

 ************  इस धरती पर कभी खनिज विशेष के रूप में तो कभी व्यक्ति विशेष के रूप में रत्न अवतरित होते रहते हैं । खनिज या पत्थर वाले रत्न परीक्षण के तो शतप्रतिशत परिभाषित मानक  हैं परन्तु ब्यक्ति के परीक्षण हेतु ,कम से कम भारत में ,कोई स्पष्ट मानक नहीं हैं । फिर भी जो मानक उपलब्ध हैं ;उनके परिपेक्ष्य में जब कोई व्यक्ति कुछ एक भारत रत्नों के लिटमस जाँच का प्रयास करता है ,उसकी शंका घटने के वजाय बढ़ती जाती है । हाल में सचिन तेंदुलकर एवं प्रो सीएनआर राव को भारतरत्न दिए जाने के बाद पूरे देश में इसके मानकों पर एक बार फिर ऐसी ही चर्चा होने लगी है और भारतरत्न के मानक ही लड़खड़ाते दिख रहे हैं । हम भारतीयों की विशेषता है कि हम किसी भी निर्णय के लिये बहुत ही लचीला एवं धुँधला मानक बनाते हैं ताकि निर्णय को गलत या सही ठहराने में इन  दो शब्दों का लाभ उठाया जा सके ।थक हार क़र एक मानक को सर्वोपरि मानना पड़ता है कि सरकार जिसे भारतरत्न की उपाधि देदे वह भारतरत्न पाने की योग्यता रखता है । अन्यथा नहीं ।
************अभी हाल में जिन दो महानुभावों को भारतरत्न दिया गया ;निःसंदेह उनमें से एक विज्ञानं जगत का सितारा है तो दूसरा क्रिकेट का । इन्हें यह सम्मान मिलने से इनके प्रसंशकों में ख़ुशी की लहर है और बधाइयों का ताँता । यह और भी अच्छी बात रही कि बीते सप्ताह ये दोनों भारतरत्न विशेषकर तेंदुलकर महँगाई ,भ्रष्टाचार एवं जनता के तमाम घावों पर भारी पड़े ।यदि ऐसा ही कुछ हमारी सरकारें सप्ताह दर सप्ताह करती रहें तो भूखी जनता ख़ुशी मनाते मरेगी और उनके कराह की आहट भी नहीं लगेगी ।मीडिया को भी ब्यस्त होने का मसाला मिल जायगा । इस घोषणा हेतु चुने गए समय केलिए भी भारतरत्न चयन समिति के सदस्य और भारत सरकार सभी बधाई के योग्य हैं । सोने में सुहागा यह कि सप्ताह जाते -जाते इस अलंकरण ने एक नया एवं बड़ा बहस का विषय खड़ा कर दिया कि सचिन को भारतरत्न तो अटल विहारी बाजपेयी को क्यों नहीं । यह विषय भी दर्द निवारक की तरह थोड़े दिन जनता को राहत देते दिख सकता है ।
************रही बात भारत के पूर्व प्रधान मंत्री बाजपेयी की । उन्हें भारतरत्न न देने में मानक अड़चन हैं ही नहीं ।मूल में अड़चन तो राजनीति है वरन मानकों की निष्पक्ष कसौटी पर वे सबसे पहले और सबसे ऊपर खरे उतरते हैं । उन्हें यह सम्मान देने से सम्मान भी सम्मानित होता । यदि श्रेष्ठता की चर्चा हो तो यह सच्चाई है कि समान कार्यक्षेत्र में योगदान देने वालों में ही तुलना हो सकती है। अतः सचिन की तुलना किसी खिलाड़ी से , प्रो राव की किसी वैज्ञानिक से एवं अटल विहारी बाजपेयी की किसी राजनेता या राष्ट्रनायक से ही सटीक हो सकती है ।चूँकि प्रो राव पर कोई विवाद नहीं है , अतः मानकों के विश्लेषण हेतु  हम सचिन को भरपूर सम्मान देते हुए , उपलब्धियों के रूप में उनके योगदान को स्मरण कर सकते हैं ।
 ************ उनका कार्यक्षेत्र क्रिकेट का खेल रहा है जो दुनियाँ के मात्र आठ -दस देशों में खेला जाता है ।  यह खेल न तो विश्व स्तर का है न ही ओलम्पिक में सम्मिलित है ।भारत में इस खेल का दायित्व एक गैर सरकारी संस्था ,जिसका नाम भारतीय क्रिकेट कन्ट्रोल बोर्ड है ,निभाती है । यही संस्था खिलाड़ियों का चयन कर उन्हें अनुबन्धित करती है और इन्हीं आठ -दस देशों में मैच आयोजित कर करा करा कर अपने और खिलाड़ियों के लिए पैसे कमाती है । चूँकि भारत में यह खेल बहुत ज्यादा लोकप्रिय एवं धन संपन्न है इस लिए क्रिकेट खेल एवं इसके खिलाड़ियों  की आभा भी  चकाचौंध करने वाली बन चुकी है । आंकड़ों की ढेर सारी रोमांचक विविधताओं से भरी इसी क्रिकेट में सचिन ने सैकड़ों का सैकड़ा बनाया ,सर्वाधिक रन बनाया ,सर्वाधिक मैच खेला ,सर्वाधिक समय तक क्रिकेट खेला ,सभी प्रारूप में भारत को विजय दिलाया ,इत्यादि इत्यादि ।बदले  में तेंदुलकर ने बोर्ड एवं विज्ञापन से अरबों रूपया कमाया और शोहरत के शिखर पर पहुँच गए ।क्रिकेट में वर्षों तक खेलते हुए सचिन ने आंकड़ों के अनेक कीर्तिमान बनाने के अलावा खेल को ऐसा कोई योगदान नहीं दिया जिससे वह पूरे विश्व में खेला जाने लगा हो या खेल भावना की कोई सांस्कृतिक लहर चल पड़ी हो । पैसा एवं सोहरत से इतर उनकी दृष्टि ,सोच ,कृतित्व एवं प्रतिबद्धता में कोई करिश्मा भी अबतक नहीं दिखा है जो समाज के लिए एक चालन -शक्ति (driving -force )का काम करे । अब कोई अन्य खिलाडी किसी अन्य खेल या क्रिकेट में ऐसी ही परिस्थितियों में इस तरह के आँकड़े बनाए तो क्या सचिन के लिए बनाये गए मानक उसे भारत रत्न दिलाएं गे ?शायद नहीं । खेल को योगदान के मापदण्ड पर मेजर ध्यानचन्द ,कपिल देव या पी टी उषा उनसे किसी भी प्रकार पीछे नहीं रहे । फिर यही यक्ष प्रश्न कि इन सितारों को भी भारतरत्न क्यों नहीं ।
************निर्विवाद सचिन ने करोड़ों भारतीयों का वर्षों तक बेजोड़ मनोरंजन किया । इसके लिए उन्हें साधुवाद । भारतीय समाज एवं राजनीतिज्ञों को उन्होंने ऐसा बल्ला और गेंद भी पकड़ा दिया कि वे भविष्य   में वाद-विवाद रूपी  विषम बैट -बाल का खेल खेलते रहेंगे ।इस योगदान के लिए भी उन्हें याद किया जायगा ।        भारतरत्न चयन समिति को चाहिए कि अपनी भूल ठीक करते हुए ,आज की स्थिति में पहुँच चुके मानकों के सन्दर्भ में ,श्री अटल विहारी बाजपेयी ,स्व ध्यान चन्द व अन्य ऐसे विशिष्ट ब्यक्तियों को फटाफट भारत रत्न देदे ताकि वर्तमान विवाद को विराम लगे । भारतीयों को आवश्यक और अनावश्यक बोझ ढोने की आदत है । वे सभी भारतरत्नों को याद करेंगे और अपना सामान्य ज्ञान बढ़ाएंगे । जब मानकों की बात उठेगी ,भारत के भाग्य विधाता लोग इतिहास -भूगोल बदलने की बात उठा देंगे । परन्तु किसी को नहीं भूलना चाहिए कि मानकों का क्षरण समाज के लिए घातक है । यदि माप -तौल के मानकों को क्षरण से बचाने के लिए वैज्ञानिक एक से बढ़ कर एक त्रुटिहीन ब्यवस्था कर रहे हैं तो हम भारतीय अपने सर्वोच्च सम्मान के क्षरण पर गंभीर क्यों नहीं ?सम्मान वही जो मानकों पर खरा उतरे और सर्व स्वीकृति पाये ।
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अंततः
           जिस पुरुष या नारी को सम्मान देने से सम्मान स्वयं सम्मानित हो
          ,वही पुरुष या नारी उस सम्मान के लिए सुपात्र है ।
दिनाँक 21 नवम्बर 2013   वाराणसी                                Mangal-Veena.Blogspot.com
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मंगलवार, 22 अक्टूबर 2013

पारदर्शिता में पिछड़ती भाजपा

                               जैसे -जैसे काँग्रेस से जनता की उम्मीदें चकनाचूर हो रही हैं वैसे -वैसे जनता भाजपा के हर कदम पर सावधान निगाहें रख रही है। दूध का जला छाछ भी फूँक कर पीता है। भारतीय  जनता पार्टी पर उम्मीदें भी टिकी हैं और शंकाएँ भी क्योंकि अलग चाल ,चरित्र और चेहरा वाली पार्टी इन्ही सन्दर्भों में कहीं -कहीं बिलकुल काँग्रेस सी दिखती है। अभी हाल में जब दागी सांसदों एवं विधायकों से संवंधित उच्चतम न्यायलय के फैसले को पलटने का प्रकरण चल रहा था ,भाजपा द्वारा भी इस मुद्दे पर परोसी जा रही थाली जनता को पसन्द नहीं आ रही थी। जब राजनीतिक पार्टियों के आमदनी श्रोत उजागर करने की बात आई तो वह काँग्रेस जैसी दिखी और अपने को जनता से छिपाती नजर आई। वैसे ही जब मंत्रियों एवं जनप्रतिनिधियों के संपत्ति विवरण की बात आती है तो भाजपा की आक्रामकता भोथरी नजर आती है। जब नेताओं की महत्वाकान्छा की बात होती है तो अनुशासन की बात करने वाली पार्टी के लोग मर्यादा को धता बताते नजर आते हैं और राष्ट्रवाद की बात करने वाले नेता अपनी महत्वाकान्छा के लिए लड़ पड़ते हैं। पारदर्शिता पर बल न देने के कारण ही जनता के मन में  भाजपा के विरोध और विचारधारा पर शंका के बादल उठते रहते हैं।
                               काँग्रेस पार्टी कहती है कि उसने जनता को सूचना का अधिकार दिया जिससे शासन और ब्यवस्था में पारदर्शिता आई परन्तु सबको पता है कि शासन करने वाली राजनीतिक पार्टियाँ एवं केंद्र और राज्य की सरकारें सूचना के अधिकार के प्रति कितनी ईमानदार और संवेदनशील हैं।यह भी पता है कि अन्ना हजारे जैसे सामाजिक कार्यकर्ताओं को सूचना अधिकार केलिए क्यों और कितना संघर्ष करना पड़ा था। शर्म की बात है कि इस लोकतान्त्रिक देश में बहुत कुछ जनता से छिपाया जाता है या कि नहीं बताया जाता है जिसे जानने के लिए उसे सूचना के अधिकार रूपी हथियार से लड़ना पड़ता है। जहाँ इस हथियार को और प्रभावी बनाने की आवश्यकता थी वहीँ इसे दिनोंदिन निष्प्रभावी बनाने के लिए अनेकानेक अपवाद बनाये जा रहे हैं और इसके दायरे सीमित किए जा रहे हैं। बहुत अजीब लगा जब काँग्रेस एवं अन्य पार्टियों के साथ भाजपा भी खड़ी हो गई कि राजनीतिक पार्टियों के श्रोत एवं ब्यय विवरण नहीं दिए जा सकते क्योंकि पार्टियाँ कोई सरकारी या लोक इकाई नहीं हैं। यही है अंधी पारदर्शिता कि भाजपा भी जनता से चन्दा लेगी लेकिन जनता को इसका हिसाब नहीं देगी। फिर जनता सोच में है कि राष्ट्रवादी भाजपा पर अन्य मुद्दों के सन्दर्भ में किस दिशा में और कितना भरोसा किया जा सकता है।यह जानना सबकी बेहतरी में है कि बीसीसीआई के तर्ज पर विभिन्न दलों द्वारा दिखाया जा रहा बल्ले और गेंद का मनोरंजन महँगाई और भ्रष्टाचार की मारी जनता को शूल की तरह साल रहा है।
                             अभी उन्नीस अक्टूबर को भाजपा के प्रधान मंत्री पद के दावेदार नरेन्द्र मोदी की कानपुर में एक भीड़ भरी जन सभा हुई जिसमें मोदीजी बहुत ही मार्मिक एवं तार्किक ढंग से अपनी बात जनसमूह के समक्ष प्रस्तुत किए। यहाँ तक कि वे सेक्युलरिस्म की एक अच्छी परिभाषा भी दे डाले कि हिन्दू अच्छा हिंदू बने ,मुसलमान अच्छा मुसलमान बने ,सिक्ख अच्छा सिक्ख बने और इसाई अच्छा इसाई बने -फिर हमसब मिलकर बेहतर राष्ट्र बनायें गे। यहाँ वे यह भी उल्लेख कर सकते थे कि भाजपा अच्छी सरकार बनाये गी और फिर सब मिल कर देश को बेहतर बनायें गे। फिर अच्छी सरकार के विजन पत्र की बात होती कि उनकी सरकार कराहती जनता को महँगाई और भ्रष्टाचार से बाहर निकाल कर उन्हें कैसे खुशहाल बनाने की सोच रखती है।यह अच्छा होना ही वह  ब्रह्मास्त्र  है जो भाजपा केलिए  काँग्रेस की बुराइयों पर विजय दिला सकता है। संभव है कि काँग्रेस को नकारने के लिए लोग भाजपा को चुनें परन्तु जब लोग अच्छाइयों के लिए भाजपा को बहुमत केसाथ सत्ता पर बैठाएं तभी उसे  सर्वोत्तम राष्ट्रवादी पार्टी होने का गौरव प्राप्त होगा।
                             राजनेताओं द्वारा बार -बार ठगी गई जनता के लिए आज किसी पार्टी के अच्छा होने का सबसे बड़ा मापदंड उसकी पारदर्शिता है। पारदर्शिता इस बात की गारन्टी देती है कि पार्टी मन ,वाणी और कर्म से एक है और उसपर भरोसा किया जा सकता है। पारदर्शिता की कसौटी पर, जनता के लिए संघर्ष करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा  कुछ माह पहले गठित "आम आदमी पार्टी " ,सबसे आगे दीख रही है। इसी पारदर्शिता के बल पर आज "आप "ने दिल्ली प्रदेश के चुनाव को त्रिकोणीय बना दिया है। काँग्रेस और भाजपा के माथे पर दिल्ली के चुनाव को लेकर चिंता की लकीरें स्पष्ट हैं। जिस साफगोई से विभिन्न मुद्दों जैसे महँगाई , भ्रष्टाचार ,कालाधन ,जन लोकपाल ,नोटा ,पार्टी का आय -ब्यय विवरण ,बहुमत की स्थिति में सरकार के स्वरुप इत्यादि पर "आप "के लोग बोल रहे है ;वह आज की तारीख में जन भावना के बहुत नजदीक है। पारदर्शिता में धुंधलापन के कारण राष्ट्रीय स्तर भाजपा उस श्रेणी की आत्मीयता जनता के साथ नहीं बना पा रही है। इस दिशा में नरेन्द्र मोदी को विशेष ध्यान देना देना होगा। जनता को लगना चाहिए कि उनसे कुछ हाईड ( छिपाया )नहीं किया जा रहा है। तभी भाजपा काँग्रेस से बिल्कुल अलग दिखेगी  और जनता को अच्छा विकल्प दे सके गी।
Mangal-Veena.Blogspot.com                Date 22 October 2013
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अन्ततः
                             जब -जब हस्तिनापुर में गान्धारी की हित साधना में गान्धार के शकुनि जैसे लोग सक्रिय होंगे ,तब -तब महाभारत की पुनरावृत्ति होगी और परिणाम में गान्धारी एवं धृतराष्ट्र को केवल संताप हाथ लगेगा।                                                                   --मंगल -वीना
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गुरुवार, 10 अक्टूबर 2013

दशहरा का पूर्वानुमान

दशहरा अच्छा होगा
जा सकते हैं जेल,सांसदी छिन सकती है |
दुराचारियों बिना,भी संसद चल सकती है । 
नेता दिखते पस्त ,देश कुछ बेहतर होगा |
न्याय की होगइ जीत,दशहराअच्छा होगा |
——————–भ्रष्ट तंत्र से  नहीं ;न्याय से देश बचे  गा |
——————–मीडिया बन हनुमान,जानकी खोज करेगा |
——————–कुम्भकरण 
 के बा ,मेघ को मरना होगा |
——————–रावण होगा भस्म , दशहरा अच्छा होगा |
खूब हुई बरसात ,कि धरती तृप्त हो गई |
पेंग मारती फ़सल,उपज की आस बढ़ 
गई|
हँसता दिखा किसान,देशभर उत्सव होगा |
कुदरत की है कृपा ,दशहरा अच्छा होगा |
———————डीए बोनस मिला ,खरीदी जमकर होगी |
———————पकवानों की महक,घरों में महमह होगी |
———————पैसे से बाजार ,जरा मुस्काता होगा |
———————आमदनी में वढत, दशहरा अच्छा होगा |

रेवड़ी ,चूड़ा , धनुष ,वाण घर-घर में होगा |
मेला मेल-मिलाप ,मौज-मस्ती भी होगा |
महिषासुर का नाश,शस्त्र का पूजन होगा |
माँ दुर्गा की धूम ,दशहरा अच्छा होगा |
——————–जो हैं बेवश दीन ,सहारा देना होगा |
——————–अन्नाजैसे जन को,नायक बनना होगा|
——————–नोटा के अधिकार, से आगे जाना होगा|
——————–लोकतंत्र अवतरण ,दशहरा अच्छा होगा |
राम-लक्ष्मन काज ,हनू को लड़ना होगा|
आश्विनकी नवरात्रि,शक्ति का संचय होगा|
दसवें दिन रणभूमि,विजय का पर्व मनेगा |
ऐसा है अनुमान , दशहरा अच्छा होगा |

Mangal-veena.blogspot.com      Date 10.10.2013
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पूर्वानुमान केसाथ सभी सुधी पाठकों को विजय-दशमी की ढेर सारी शुभ कामनायें |
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शुक्रवार, 13 सितंबर 2013

अरे ! मुजफ्फरनगर में यह क्या हो रहा है ?

                                 मुजफ्फरनगर के दंगों ने अंतर्मन को झकझोर दिया है और एक बार पुनः सोचने को मजबूर किया है कि सोसल मीडिया ,मोबाइल और इंटरनेट जैसे युगांतकारी सम्पर्क माध्यमों के आगमन के बाद भी क्या हमारी सोच में कोई ब्यापक परिवर्तन हुआ है । युवाओं से बड़ी उम्मीद है कि वे इन संसाधनों द्वारा समाज की कुरीतिओं को समूल नष्ट कर एक तर्कसंगत ,वैज्ञानिक ,विकसित एवं समभाव समाज बनाने में सफल होंगे परन्तु ऐसा कोई मधुर परिणाम अभी तक सामने नहीं आया है। जब सम्पर्क और संचार के त्वरित साधन नहीं थे तो  दंगे हो जाया करते थे और अब जबकि त्वरित साधन हैं तो भी दंगे हो रहे हैं । स्पष्ट है कि संचार क्रान्ति का समाज को सकारात्मक लाभ मिलना शेष है । उल्टे इस सन्दर्भ में उंगलियाँ सोसल मिडिया के नकारात्मक भूमिका की ओर उठ रही हैं । अतः आज की सभ्यता माँग करती है कि सोसल मीडिया  जैसे ,फेसबुक,आरकुट और ट्वीटर के उपयोगकर्ता एवं अन्य संचार माध्यम समाज के प्रति अपनी -अपनी जिम्मेदारियों की समीक्षा करें ।
                               दंगा के आयाम बढाने वाले छोटे -बड़े कई कारक हो सकते हैं परन्तु दंगा होने के स्पष्ट कारण तो सतर्कता ,कानून एवं ब्यवस्था की असफलता ही हैं । यह उत्तर प्रदेश सरकार को बिना किसी हीला -हवाली के विनम्र भाव से स्वीकार कर लेना चाहिए । रही बात कानून ब्यवस्था की तो अंग्रेजों के समय से अब तक हमारे देश में हजारों कानून बने हैं और क़ानूनी कारखानों में हर समय नये -नये कानून बन रहे हैं जो न आम आदमी के संज्ञान में हैं न संज्ञान में लाने की सरकार के पास् कोई इच्छा है ।इसके बिपरीत हजारों वर्षों के संस्कार से हमें जो तार्किक या अतार्किक समाजी नियम /कानून मिले हैं वे अटूट आस्था के साथ जैसे के तैसे चल रहे हैं और दृढ़ता से उनका पालन भी हो रहा है ।इन्ही विरोधाभाष ने उथल -पुथल मचा रखा है और समाज उसका कुपरिणाम भुगत रहा है । दंगे तो हो गए । क्या कोई बता सकता है कि जो लोग दंगे में मारे गए उन्होंने किस कानून का उलंघन किया था और जिन्होंने मारा वे किस कानून का पालन कर रहे थे ।जिन लोगों ने दंगा भड़काया वे समाज की कौन सी भलाई किये और जो इन दंगों को रोंक न सकी वह सरकार किस  लिए है ।
                           संपत्ति एवं सम्मान की रक्षा के लिए झगड़े एवं लडाइयां होती रही हैं ,हो रही हैं और होती रहेंगी । यह किसी भी प्रभावित ब्यक्ति के लिए न्यायोचित माना गया है और ऐसी लडाइयां लोगों के समझ में भी आती हैं । परन्तु बिभिन्न धर्म या मजहब के लोग आपस में धर्म -द्वेष के कारण लड़ें- यह अधार्मिक एवं अमानवीय है। साथ ही धर्म के नासमझी की पराकाष्ठा है ।सभी धर्मग्रन्थ कहते हैं कि धर्म मनुष्य की जीवन -शैली है ; धर्म जीवन है; धर्म मनुष्यता है और धर्म सद्भाव है ।फिर किसी एक धर्म या संप्रदाय के लोग दूसरे धर्म या सम्प्रदाय वाले भाई से ईर्ष्या भी क्यों करें ?जिस धर्म से जीवन अनुप्राणित हो ,उसी धर्म की मंशा के बिपरीत  कोई ब्यक्ति आचरण कैसे कर सकता है ?
                          हमारे देश में ऐसी घटनाएँ, दुर्भाग्यवश, यत्र -तत्र सर उठाने लगी हैं । समाज में असहिष्णुता बढ़ रही है । अतः सोसल नेटवर्किंग से जुड़े करोड़ों युवक एवं युवतियों से यह अनुरोध करना अति प्रासंगिक है कि वे  केवल किसी घटना के लिए सपाट दर्पण न बनें । वे एक स्वर से भाई चारे एवँ मुहब्बत का सन्देश भी  दें । उन्हें आज के भारत को बेहतर और कल के भारत को  वैभवशाली बनाना है । निश्चय ही युवाओं ने इस राह पर कई मील के पत्थर गाड़ा है परन्तु उन्हें अभी लम्बी यात्रा तय करनी है ।
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दिनाँक 12 सितम्बर 2013
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अंततः
सद्भावना विहीन व्यक्ति समाज को तोड़ता है और सद्भावी जोड़ता है ।इसी सद्भाव को फेविकोल कहते हैं ।
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मंगलवार, 27 अगस्त 2013

आम आदमी सदमे में

                     जन्माष्टमी के पावन पर्व पर श्री कृष्ण महाराज के चरणों में समर्पित एक कविता


महँगाई क़े  नए दौर में ,रूपया  लुढ़का  गड्ढे  में ।
विक्रेता  क्रेता से  बोले ,कीमत  लेंगे   डालर  में  ।
डालर यदि हो पास नहीं तो,प्याज चलेगा बदले में।
रूपया तेरे  दीन  दशा पर ,आम आदमी  सदमे में ।

---------------गाड़ी ,मोटर ,यात्रा  महँगी ,रुपये  की  बदहाली  में ।
---------------दाल उड़नछू,सब्जी गायब,कुछ न बचा अब थाली में।
---------------बत्तीस वाले धनी शहर के,भीख  माँगते मन्दिर  में ।
---------------या  ढाबे में बरतन  धोते , आम  आदमी  सदमे  में ।

पश्चिम पाकिस्तानी घूरें,ड्रैगन गरजे  उत्तर में ।
धैर्य रखें ,हम  बात  करेंगे,नेता बोलें  संसद  में ।
लुंज- पुंज  नेतृत्व  हमारा,साख  बचे कैसे  जग में ?
देश की चिंता कोइ न करता,आम आदमी सदमे में।

---------------भ्रष्टाचार से लड़ -थक अन्ना ,गए घूमने यू.एस में।
---------------शीर्ष कोर्ट  को धता  बताते,एकजुट नेता संसद में ।        
---------------देश को  सत्ताधारी  लूटें,रक्षक लग गए  भक्षण में ।
---------------कैसे हो कल्याण देश का ,आम  आदमी  सदमे  में ।

बालाओं का चीर हरण तो ,आम हो गया कलियुग में ।
अब तो उनका शील हरण भी ,नित्य हो रहा भारत में ।
कृष्ण जन्मदिन तुम्हें मुबारक,प्लीज पधारो मथुरा में।
सारे नाग  नथइया  कर  दो , आम  आदमी  सदमे में ।

--------------कृष्ण जन्मदिन तुम्हें मुबारक,प्लीज पधारो मथुरा में।
--------------सारे नाग  नथइया  कर  दो , आम  आदमी  सदमे में ।

दिनांक 28 .8 . 2013 कृष्ण जन्माष्टमी ।              Mangal-Veena.Blogspot.com
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1 डालर =66 रुपये =1 किलोग्राम प्याज
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अंततः
रूपया सही जगह पर आ जायगा । ---संसद में चिदाम्बरम जी का बयान ।
लगता है कि अभी कुछ बाकी है ?????????????????????????????
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सोमवार, 12 अगस्त 2013

मानसूनी मेनिफेस्टो

                             मानसूनी हवाएँ भारत में पानी बरसाती हैं और चुनाव में विजयी राजनीतिक  दल का मेनिफेस्टो या वादापत्र ,जनता के पैसे से जनता पर, विकास की घटिया सौगात बरसाता है। लगता है भारतीय लोकतंत्र में विभिन्न दलों द्वारा चुनाव से पहले जारी मेनिफेस्टो ,वादा या घोषणा पत्र बहुत कुछ पावस ऋतु के मानसून ,बादल एवं बरसात तुल्य चरित्र के होते हैं।वर्षा पूर्व मानसून कभी अरब सागर तो कभी बंगाल की खाड़ी में सक्रिय होते हैं ,फिर घटते -बढ़ते हवा के दबाव व दिशा के अनुसार कहीं फटने वाले बादल बन कर सैलाब लाते हैं ,कहीं जीवनदायी बरसात बन जाते हैं तो कहीं बिल्कुल कमजोर एवं निष्क्रिय होते हुए किसी क्षेत्र को सूखे से तवाह कर देते हैं । चुनाव से पहले सभी दलों द्वारा घोषित वादापत्र लगभग ऐसे ही होते हैं । जिस भी दल को जंग -ए -चुनाव की उठा -पटक में सफलता मिल जाती है, उसे वादारूपी बरसात करने की स्वच्छंदता मिल जाती है । वह विरोधियों को फटने वाला बादल बन डराता है,समर्थन देने वाले मतदाताओं पर कृपा की बरसात करता है और वोट न देने वाले क्षेत्र की जनता को सरकारी सुबिधाओं से वन्चित कर देता है । आम लोग इन दलों के नेताओं के ऐसे ब्यवहार के आदी हो चुके हैं परन्तु आश्चर्य तब होता है जब ये नेता जनता को समस्या एवं समाधान में उलझा समझ कर अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिए ऐसे कारनामें कर जाते हैं कि इतिहास भी उन्हें माफ़ नहीं करे।
                         इस संदर्भ में यदि भारत में वादापत्रों के बरसाती ब्यवहार की बात करें तो सभी प्रदेश कड़ी प्रतिद्वंदिता में हैं । उत्तर प्रदेश को ही लेलीजिये -यहाँ अम्बेडकर ,कांशीराम ,लोहिया इत्यादि ख्यातिप्राप्त नामधारी सौगातों की बरसात मनचाहे भौगोलिक क्षेत्रों  एवं मतदाताओं पर उनकी या इनकी बारी से होती रहती है,वैसे ही जैसे मध्यान भोजन  की बरसात, बच्चों को उनके गरीबी एवं लाचारी का अहसास कराते हुए, स्कूलों द्वारा विभिन्न रूपों में देश के स्कूली बच्चों पर हो रही है ।और देखिये -कहीं टीवी बरस रही है तो कहीं लैपटाप । कहीं साईकिल या रिक्शा तो कहीं एक रूपया किलो अनाज । कहीं शादी कराने की ब्यवस्था तो कहीं शादी तुड़वाने में पूरा खर्च । आगे मोबाइल भी बरसने की बात हो रही है जो ब्यापक मानसून की तरह एक पार्टी पूरे देश में बरसा सकती है । अब तो ए वादापत्र रोजगार न देकर  बेरोजगारी भत्ता देना अपने हित में  बेहतर समझ रहे हैं ।  
                     इन मेनिफेस्टो को ध्यान से पढ़ने पर हमारे देश के नेताओं में छिपी महत्वाकान्छायें भी साफ झलकती हैं । इनकी महत्वाकांछा ने देश का बंटवारा किया ,फिर प्रदेशों को बांटना शुरू किया । यह दौर कहाँ रुकेगा - किसी को पता नहीं । कभी कोई दल एक प्रदेश को बांटने का वादा करता है तो दूसरा किसी और का । अवसर मिलते ही बिना सीधे जनमत के नेतालोग आन्दोलन एवं दंगों के बलपर विकास की दुहाई देकर प्रदेशों को बाँट रहे हैं । संविधान भी मूल भावना से नहीं बुद्धिविलक्षणता से विश्लेषित होने लगा है । फिर क्या ;राजा (जनता )को पता  नहीं मुसहर वन बाँट रहे हैं । ताजा उदहारण है आंध्र प्रदेश जो ऐसे ही एक वादा बरसात का झंझावत झेल रहा है । यह ठीक नहीं है । क्या बँटवारा को आगे बढ़ानेवाले बता सकते हैं कि इस प्रदेश के कितने प्रतिशत लोग ऐसा चाहते हैं ?
                   लोकतन्त्र में यदि जनता द्वारा चुनी हुई सरकारें जनता की सेवा  के निमित्त बनती हैं तो सेवा केलिए चुनाव में उतरने वाले दलों एवं उम्मीदवारों के वादापत्र सर्वजन हिताय के धरातल पर होने चाहिये और चुनाव के समय इस पर सर्वाधिक खुली बहस होनी चाहिए । इन्हें वर्ग ,वर्ण या मतदाता विशेष से भी परे होना चाहिए ।गाँधी के देश में यह सभी दलों को पता है कि जनता को क्या चाहिए । इसलिए वादापत्र बनाने वालों को उस समय की जनता बन कर इन्हें तैयार करना चाहिये ।परन्तु वस्तुस्थिति बेमेल है और नेतानीत दल जनता को वह देने का वादा करते हैं जिससे लगे कि वे राजा और जनता उनकी प्रजा है ;वे दाता हैं और जनता भिखारी है;; वे सर्व सुख भोग के अधिकारी हैं और कष्ट झेलती जनता बेवश कराहने की पात्र।ये दानवीर आधुनिक कर्ण कम्बल क्रय करने की क्षमता नहीं देंगे बल्कि जाड़े में सीधे घटिया कम्बल ही बाँट देंगे ।अतः  आज के भारत का लोकतंत्र  ब्यवहार में राजशाही का भ्रष्टतम रूप है जिसमें नेता केलिए सब जायज है और जनता क्या चाहती है के कोई मायने नहीं हैं।
                  स्वतंत्रता मिलने के छाछठ वर्षों बाद भी भारत के नागरिक उपलब्ध करायी गयी सुविधाओं से बेहद आहत है क्योंकि ये सुविधाएँ यथा अच्छी सड़कें ,चुस्त नागरिक सुरक्षा ,भरोसे योग्य एवं सुलभ स्वास्थ्य सुविधाएँ ,सस्ती शिक्षा ,भरपूर बिजली ,स्वच्छ पेय जल ,द्रुत न्याय ब्यवस्था तथा भ्रष्टाचार मुक्त शासन आज भी ये सरकारें सुनिश्चित नहीं कर पाई हैं । जनता केलिए जो सुविधाएँ बनाई या दी जा रही हैं वे ज्यादातर असुविधाजनक एवं कोसने को विवश करने वाली हैं । यदि शुद्ध जन सेवा की भावना होती तो ये राजनैतिक दल अपने वादापत्र में घोषणा करते कि यदि जनता ने उन्हें चुना तो पाँच वर्षों में बिजली का इतना उत्पादन बढ़ा देंगे कि जनता एवं उद्योगों को चौबीस घंटे भरपूर बिजली सुलभ रहे गी या कि जो भी सड़कें बनायें गे वे अंतर्राष्ट्रीय स्तर की होंगी या कि नागरिकों को वे राम राज्य जैसी सुरक्षा सुनिश्चित करेंगे इत्यादि ।इनसे भी ऊपर उन्हें अपने पर विश्वास बहाली एवं राजस्व खर्च पारदर्शी ढंग से सर्व समाज हित में करने का वादा करना चाहिए । साथ ही वादा को पूरा करने का भी सच्चा वादा होना चाहिए।
                   पिछले दो -तीन वर्षों में अन्ना हजारे साहब एवं बाबा रामदेव के जन आंदोलनों से जहाँ एक ओर जनता जागृत हुई है वहीँ दूसरी ओर उच्चतम न्यायलय के कुछ प्रशंसनीय फैसलों से आशा की नई किरणें फूटी हैं । आगामी लोकसभा चुनाव में इन आंदोलनों एवं निर्णयों का प्रभाव स्पष्ट रूप में दिख सकता है । इसका श्रीगणेश राष्ट्रीय दलों जैसे भाजपा 'कांग्रेस ,वामदल के वादापत्रों से अपेक्षित है । ब्रह्म सूत्र मान कर चलें कि देश में अब भ्रष्टाचार ,विदेश में काला धन संचय तथा दागी प्रतिनिधित्व स्वीकार्य नहीं होगा ।
                  यदि इन संकेतकों को ध्यान में रख कर सर्व समाज केलिए ढाँचागत विकास आधारित वादापत्र बनें गे और जनता से स्वीकृत अर्थात विजयी होने पर दृढ़ता से क्रियान्वित होंगे तो देशवाशी स्वयं सहकारी प्रतिद्वंदिता द्वारा देश को दिन दूना रात चौगुना गति से आगे ले जांय गे । तभी भारत का विश्व शक्ति बनने का सपना साकार हो सके गा । भारतीयों को बेहतर मंच या लाँचिंग पैड चाहिए ,अवसर वे स्वयं तलाशने को उत्सुक हैं ।खासतौर पर भारत का युवावर्ग जैसा मानसून चाहता है वैसी स्थितियाँ लाई जांय अन्यथा लायी जांयगी ।
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अंततः
मां ,पिता और अभिभावकों को बच्चों में इतना भी संस्कार नहीं भर भर देना चाहिए कि समाज से मिलने वाले नए संस्कारों को ग्रहण न कर सकें;वरन सभ्यता के ठहर जाने का खतरा है ।
12  अगस्त 2013                                            Mangal-Veena.Blogspot.com
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सोमवार, 24 जून 2013

दशा बदलती है

                              श्री लाल कृष्ण आडवानी ने बीजेपी के इतिहास पुरुषों के साथ मिलकर विचारधारा का जो बाग लगाया ,सींचा ,पल्लवित एवं पुष्पित किया ;वह कुछ वर्षों से क्रमशः मुरझाया है ।परन्तु प्रसन्न करने वाली बात यह है कि इस दल में एक ऐसा ऊर्जावान माली आगे आया है जिससे बाग के लहलहाने एवं फलित होने की संभावना ही  नहीं बढ़ी है अपितु पूरे देश की खुशहाली एवं विकास की उम्मीद जगी है । अतः आडवानी जी को अब अपना पूरा अनुभव एवं सामर्थ्य इस परिणाम के लिए झोंक देना चाहिए । आडवानी सत्तापक्ष में नहीं हैं अतः वे भीष्म पितामह नहीं हो सकते । हाँ वे कर्मयोगी हैं और उन्हें वैसा ही बना रहना चाहिए । उनके योगदान को न बीजेपी भुला सकती है न देश; परन्तु सबका अपना समय होता है ।
                             पूर्वांचल में एक प्रचलित कहावत है -दस बरस में दशा बदलती ,पाँच कोस पर बोली । भले ही पुरनियों ने दशा को अपने परिवार ,उसकी आर्थिक स्थिति एवं समाज के संदर्भ में लिया होगा परन्तु आज भी यदि देश में हो रही राजनीति को इस दस वर्ष की कसौटी पर परखा जाय तो कहावत की सटीक पुष्टि होती है । बीजेपी नीत राजग को केंद्र की सत्ता से बाहर हुए और काँग्रेस नीत संप्रग को सत्ता पर बैठे हुए दस वर्ष पूरे होने वाले हैं । इस बीच काँग्रेस ने देश को भ्रष्टतम एवं अक्षम शासन ब्यवस्था देने का अपने ऊपर अमिट कलंक लगा लिया ,वहीँ बीजेपी केन्द्र की सत्ता बेदखली से अबतक हिमाँचल प्रदेश ,राजस्थान ,झारखंड ,उत्तराखंड और कर्नाटक से अपना पत्ता साफ कराते हुए बिहार से भी निर्वासित हो चुकी है ।परिवारवादी काँग्रेस में जहाँ राहुल को सर्वाधिक शक्तिशाली उत्तराधिकारी बनाया जा चुका है वहीँ आम लोग ,बीजेपी के जमीनी कार्यकर्ता एवं देश के युवा बीजेपी के नरेन्द्र मोदी  को अगला प्रधान मंत्री बनते देखना चाहते हैं ।इस दशा परिवर्तन ने बीजेपी के लिए एक अभूतपूर्व उत्साहजनक स्थिति उपलब्ध करा दी है । फलतः जनाकांछा के चलते मोदी नायक रूपमें बीजेपी के रंगमंच पर उभर रहे हैं और आडवानी नेपथ्य के पीछे जाने का संकेत पा रहे हैं । आडवानी आज भी एक आदरणीय नेता हैं किन्तु देश को चीन से प्रतिस्पर्धा करने वाला  गुजरात माडल विकास चाहिए जिसकी संभावना केवल मोदी में है ।
                            आगामी चुनाव में मतदाताओं को दो खुले विकल्प मिलने वाले हैं । पहला कि युवराज की ताजपोशी कर दी जाय  दूसरा कि विकास की राह पर बढ़ चलें । सारे भ्रष्टाचार एवं बुराइयों के बावजूद ताजपोशी रोकना एक कठिन कार्य है क्योंकि प्रदेशीय एवं अन्य परिवारवादी दल आपना हित साधने केलिए धर्मनिर्पेक्षता की माला जपते फिर वहीं शरणागत हो जांयगे । अतः ऐसे दलों पर जनता एवं बीजेपी के रणनीतिकारों को पैनी नजर रखनी होगी ।उलट दशा में यदि मतदाताओं में दूसरे विकल्प की लहर उठी तो विभिन्न प्रदेशों के छत्रप धर्मनिर्पेक्षता की परिभाषा बदलते इधर -उधर भागते मिलेंगे और उसी समय आडवानी एवँ बीजेपी के अन्य नेताओं के मार्गदर्शन एवं कूटनीतिक भूमिका की सर्वाधिक अपेक्षा होगी । अबतक हुए सारे सर्वेक्षण मोदी के पक्ष में ऐसी लहर बनने का संकेत दे रहे हैं । यहाँ तक कि चौराहों और गलियों की चाय -चर्चा में भी मोदी सर्वोपरि चल रहे हैं कारण कि वे पूरे भारत में गुजरात की तरह विकास और खुशहाली चाहते हैं ।इन्टरनेट ,फेसबुक ,ट्वीटर पर  तो वे सर्वाधिक लोकप्रिय हैं ही ।
                          इस मंथन में धर्मनिर्पेक्षता एक बड़ा प्रसंग है । सभी अनुभव करते हैं कि भारत में यह शब्द विभिन्न वर्ग के मतदाताओं को भ्रमित करने वाला शोर -मचाऊ हथियार बन चुका है जबकि सारे राजनैतिक दलों की शासन संस्कृति एक है । किसी भी पार्टी के शासन को परखा जाय तो दिखता यही है कि कुछ पेंच जो पूर्ववर्ती ने कसे थे ,उसे ढीला कर दिया गया और अन्य पेंच जो ढीले किये गए थे ,उन्हें कस दिया गया । जनता का धन या तो एक विश्वासपात्र मतदाता वर्ग पर खर्च कर दिया जाता है या अब्यवस्थित लूट खसोट हो जाती है -बस । इसमें भला धर्मनिरपेक्षता की क्या भूमिका हो सकती है ?परन्तु दुर्भाग्य से ऐसा है नहीं । सत्ता हथियाने या गँवाने में इसकी अहं भूमिका होती है । इसी छद्म हथियार ने आडवानी को पार्टी में हाशिया पर लाया और मोदी को केंद्र में । जैसे -जैसे वे पार्टी के बाहर ज्यादा धर्मनिर्पेक्ष और उदारवादी बनने का उपक्रम करते गए ,पार्टी की विचारधारा से अलग पड़ते गए और नरेन्द्र मोदी विचारधारा पर अटल रहकर चहेते बनते गए । मोदी उदय एवं आडवानी ढलान का यह भी एक बड़ा कारण रहा है ।
                         रही बात भारतीय जनता पार्टी की तो जदयू से गठबंधन टूटने के बाद उसे कुछ और खोना शेष नहीं है । आगे जदयू केलिए सबकुछ खोने की बारी होगी और बीजेपी केलिए पाने की । कुछ राज्यों में होने वाले चुनाव इसका संकेत देंगे और लोकसभा चुनाव के परिणाम इसपर मुहर लगा सकते हैं । चुनाव  से पूर्व बीजेपी को यह सोचना ही नहीं चाहिए कि उनके साथ गठबंधन में और कौन से दल जुड़ें गे । क्या पूर्व में अटल जी के नेतृत्व में बीजेपी गठबंधन बना कर चुनाव लड़ी थी ?पार्टी को जनाकांछा एवं युवाओं की सोच के अनुसार मोदी में अटल विश्वास रख चुनाव की दुन्दुभी बजानी होगी । एकता ,अच्छे प्रत्याशियों का चयन ,युद्ध स्तर का जनसंपर्क और काँग्रेस की सत्य कथाएँ आगामी लोकसभा चुनाव में वांछित बदलाव की नींव भरें गी बशर्ते पूरी पार्टी भीतर -बाहर ,अर्श से फर्श तक मन .कर्म और वाणी से एक रहे और वैसा ही दिखे । यह कौतुहल भरी प्रतीक्षा होगी कि तेज़ी से बदलती परिस्थितियाँ एवं देश के युवाओं की चाहत क्या मोदी को आगामी चुनाव के माध्यम से भारत का अगला प्रधान मंत्री बना पाती हैं । देश निर्णायक मोड़ पर है कि कौन सी सोच भारत को आगे बढ़ाती है ।
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अंततः
Think over it :--
Love and hatred are the two opposite poles of an axis of relation.
One can"t ride both ends at the same time.
24.06.2013                                      Mangal-Veena.Blogspot.com
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बुधवार, 29 मई 2013

भ्रष्ट्राचार की स्वीकृति

                           उम्मीदवारों में यदि समान गुण एवं योग्यता हों तो उन्हें चुनावी मुद्दा नहीं बनाया जा सकता है ।चुनाव होते ही इसलिए हैं कि तुलना के आधार पर बेहतर नीतियों ,योग्यता ,शुचिता एवं सेवा की संभावनाओं से भरे ब्यक्ति को किसी चुनाव आधारित पद पर बैठाया जा सके । दुर्भाग्यवश हमारे देश में ये सारे मापदंड अर्थहीन होते जा रहे हैं । जुगाड़ या अर्थबल द्वारा जिस राजनैतिक दल से टिकट मिल जाय उस समय उस दल की नीति ही उम्मीदवार की नीतिक आस्था है ; उम्मीदवारी के लिए शैक्षणिक योग्यता या दक्षता नाम की कोई चीज इस देश में है नहीं ; शुचिता गंगा -यमुना की भाँति मैली हो चुकी है और सेवाभाव अब स्वसेवा बन चुकी है ।फिर जनता बेहतर उम्मीदवार का निर्णय कैसे करे जबकि भ्रष्टाचार तो न अछूत रहा न निंदनीय । इसे तो समाज से लगभग स्वीकृति ही मिल गयी है ।
                            मुद्दे समय सापेक्ष होते हैं । यह आवश्यक नहीं है कि जो मुद्दे कलतक समाज केलिए अहम् रहे हों आज भी प्रासंगिक हों । उदाहरण केलिए उपनिवेशवाद के दौर में श्वेत और अश्वेत का मुद्दा इतना प्रबल हुआ करता था कि चुनाव की स्थिति में अन्य मुद्दे गौण हो जाया करते थे । परन्तु आज ऐसा कुछ नहीं है । बराक ओबामा  अमेरिका जैसे देश में वहाँ का राष्ट्रपति पद चुनाव बिना इस मुद्दा के उछले जीते हैं ।भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष से स्वतंत्र होने के कुछ वर्षों बाद तक नेताओं में आचरण की सभ्यता सबसे बड़ी कसौटी थी ।अंग्रेजों के भ्रष्टाचार के विरूद्ध हमारे नेताओं के पास शिष्टाचार ही था कि पूरे भारतवासी उनके पीछे खड़े थे ।   
                             स्वतंत्रता केसाथ हमें नौकरशाही में प्रचलित भ्रष्टाचार एवं अंग्रेजी शिक्षा पद्धति विरासत में मिले । शास्त्री युग केबाद भ्रष्टाचार के आकार -प्रकार एवं विविधता में नए -नए आयाम तेजी से जुड़ने लगे । फिर अंतर्राष्ट्रीय उपभोक्तावादी संस्कृति ने आग में घी का काम किया। फ़लतः समाज के हर क्षेत्र -शिक्षा ,स्वास्थ्य ,न्याय ,अभियंत्रण ,कानून ब्यवस्था ,सरकारी सेवा ,यहाँ तक कि समाज सेवा पर भ्रष्टाचार का चटक रंग चढ़ता चला गया । इस होड़ में भ्रष्टाचार जनित त्वरित एवं आशातीत उपलब्धियों ने नेताओं को सर्वाधिक प्रभावित किया क्योंकि जो नेतागिरी से इतर कुछ करने योग्य न थे वे लाभ की संभावना से ओत -प्रोत दिखने लगे ।आज स्थिति यह है कि नेताओं की सम्पत्ति उद्योगपतिओं से भी तीब्र गति से बढ़ रही है । इनमें से कुछ तो धरती ,आकाश और पाताल तक डकार जाने केबाद भी शालीन ,शिष्ट एवं माननीय हैं ।भ्रष्टाचार से पैसा ,पैसे से साधन सम्पन्नता ,साधन से पद और पद से प्रतिष्ठा सबकुछ राजनीति में सुलभ है । यह पूछना ही निरर्थक है कि पैसे शिष्टाचार से कमाया कि भ्रष्टाचार से । रही बात मतदाताओं की तो उन्हें सब पता है क्योंकि उन्हें और उनके परिवार को भी आये दिन भ्रष्टाचार मद में खर्च या आमदनी का जुगाड़ करना पड़ता है ।हमाम में सब नंगे । तात्पर्य कि सर्व ब्यापकता के कारण अब यह कोई मुद्दा नहीं है ।
                            हाल ही में बीजेपी कर्नाटक एवं हिमांचल में चुनाव हार गयी । जीतने वाली पार्टी ने शोर मचाया कि उसने भ्रष्टाचारी सत्ता दल को उखाड़ फेंका । परन्तु वहाँ की जनता की सोच रही कि जब वहाँ की पूरी सत्ता भ्रष्ट थी तो मुख्य मंत्री मात्र को बलि चढ़ा देने से पूरी की पूरी ब्यवस्था ईमानदार कैसे हो गई । जनता बेईमानी भुगतती रही , लूट देखती रही और सत्ताधारियों की ईमानदार होने की धौंस भी सुनती रही -समय आने पर निर्णय सुना दिया । कुछ ऐसे ही निर्णय की बड़े चुनाव में भी संभावना है । उसमें भी भ्रष्टाचार नहीं बल्कि उससे आगे की बातें मुद्दा बनेंगी ।
                            परन्तु देश हित में है कि भ्रष्टाचार मुद्दा बना रहे । नीतियाँ भी चुनाव की शर्त बनी रहें क्योंकि शिष्टाचार केसाथ नीतियाँ सदैव अर्थ रूप में जुड़ी होती हैं । यदि भारत को बचाना है तो अन्ना हजारे समय की माँग हैं और उन्हें तथा उनकी माँगों को नकारना आत्मछलावा है ।सचमुच यदि भ्रष्टाचार को चुवावी मुद्दा बनाना है तो मतपत्र में "कोई भी पसन्द नहीं "का एक विकल्प दिया जाय । बदलाव की बयार बहने लगेगी ।
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अंततःएक पैराडाक्स --
भ्रष्ट सरकार के एक भ्रष्ट मंत्री ने बयान दिया कि भ्रष्टाचारियों को बक्शा नहीं जाय गा
 और उन्हें कठोर से कठोर सजा दी जायगी ।
29 May2013                                                   Mangal-Veena.Blogspot.com
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बुधवार, 15 मई 2013

A reminiscence-on 1st PunyaTithi+ of Late Dr Kesar

Kesar was nearly three and a half years younger to me.We almost all barefoot students with little clothings were getting our early education in a nearby Basic Primary School at Siristi Varanasi.This door and window free kachcha/pucca school was having four rooms to accomodate students of five classes but was gifted with good open space ,ambience and a pucca well for the reason that ,earlier,it was an Indigo processing cum collection centre during British period.An event of those schooling days is still fresh in my memory.In 1960-61,I was in 5th and Kesar in 2nd standard.Kesar was doing exceptionally well in studies.
Like other years Autumn came with message of seriousness towards our studies.Our extra curriculum activities were to ensure beautiful flower plantaton on boundaries and dividers with regular watering and attractive up-keep of the premises for which groups were formed in rotation.One day evening when students were taking Hindi dictation,our Head Master Late Sri Markandey Maurya noticed that Kesar was absent from the class.When searched he was found watering the plants alone.Teacher called him to attend the class but at that moment Kesar was not having a Deshi pen ready to write.So he rushed to my classroom and asked for a knife and started to sharpen his stick(Sarpat grass)in order to give its edge a nib shape .The knife slipped and made a deep cut on his right thigh with rush of blood.I became badly afraid with the happening and helpless about what to do .Before others could rush to help ,Kesar took my gamchha(thin towel),banded wounds and asked me to drop at home .The class activities were halted and the Head Master arranged a bicycle to take Kesar home.I remember well ,all the students of my village followed that bicycle running all the way.A Hakim from neighbour bazar was called to provide medical aid.In days when Kesar was recovering the H.M.visited my village with me to see Kesar.While chatting with my father and Kesar he asked,"Kesar!when all students were supposed to be in class,why were you busy in watering the plants and flowers?---Munshijee!actually the asignee team  was not honest on that day in watering the plants and I doubted their survival for want of water so I dared ----was his reply.
The wounds healed. Every thing resumed but the cut mark existed on his thighs for ever.So was the nature loving early life of a simple scientist.What to say of memory?
Date.16.5.2013                                                         Mangala Singh and family
Ashok Vihar Varanasi
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N B:+=Death Anniversary
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सोमवार, 13 मई 2013

शहीद की अवधारणा

                          बहुत हो -हल्ला और मीडियाबाजी के बावजूद एक भारतीय नागरिक स्व श्री सरबजीत को न तो सरकार पाकिस्तान की जेल से आजाद करा पाई न जेल में ही घायल किये जाने पर उसे इलाज केलिए जीवित अपने देश ला सकी । अंत में उसका पार्थिव शरीर देश लौटा और देश की माटी में विलीन हुआ । जो कुछ हुआ ,उससे हर भारतीय को बड़ी ही पीड़ा हुई ।जीते जी जो कुछ दिनों केलिए ही सही अपने गाँव व देश न लाया जा सका ;मरने पर अतिसक्रिय केंद्र और राज्य सरकारें श्रद्धासुमन से शुरुआत कर उनके परिवार पर लक्ष्मी की बरसात करते हुए उनके बच्चों को नौकरी देने में दत्तचित्त हो गयीं । यह सब तो ठीक था ।  असामान्य एवं चौकाने वाली बात तो तब हुई जब सरबजीत को बहादुर लाल और शहीद तक घोषित कर दिया गया ।
                          शहीद की बात आई तो शहीदी क्षेत्र के सपूतों की याद आई कि क्या स्व सरबजीत शहीद भगत सिंह ,चन्द्र शेखर आजाद की श्रेणी का आत्मबलिदानी था । कदाचित नहीं । लगता है हमारे देश मेंशहीदनामकसम्मानपरिभाषित है ही नहीं ।सच यह है कि शहीद एक  अवधारणा है जिसका दायरा पूर्णरूपेण अस्पष्ट है या बनाया जा रहा है । शब्दकोष की मानें तो देश और समाज केलिए आत्मबलिदान करने वालों को शहीद कहते हैं ।फिर इसी परिपेक्ष्य में या तो इशारे को समझा जाय या मान लिया जाय कि सरकार केपास शहीद घोषित करने केलिए न मानक योग्यता शर्तें हैं न इस सम्मान केलिए कार्य क्षेत्र परिभाषित हैं । तभी तो जिसे मन में आया शहीद कह दिया।ऐसे सम्मानसूचक विशेषण और भी हैं जो मात्र अवधारणा रूप में रह गए हैं जैसे महात्मा ,बापू ,नेताजी ,महामना,लौहपुरुष ,लोकनायक इत्यादि जिन्हें आजकल चाटुकारिता केलिए प्रयोग में लाया जाता है। देश में खिलाड़ियों ,साहित्यकारों ,संगीतकारों ,फिल्मकारों इत्यादि केलिए उनके क्षेत्र से जुड़े परिभाषित सम्मान हैं जो मानकों के आधार पर उनके विशेष योगदान केलिए उन्हें दिए जाते हैं परन्तु जिन नायकों के त्याग और बलिदान से हम हैं ,हमारा राष्ट्र है और हमारे राष्ट्र का गौरव है ;उनके साथ लगे सम्मानसूचक शब्द मात्र अवधारणा हैं या यूँ कहें कि अब्यक्त ,अपरिभाषित एवम अनारक्षित हैं ।
                         किसी देश की कोई भी सरकार एक ब्यक्त ब्यवस्था होती है फिर वह अवधारणा पर कैसे काम कर सकती है । सरकार का प्रथम कर्तब्य है कि वह विशेष सम्मानसूचक शब्दों को जाने ,उनका दुरुपयोग रोके और आवश्यकता पड़ने पर उनकी पेटेंटिंग कराए । सरकार से अब यह तत्काल अपेक्षा है कि वह शहीद शब्द  की भी लिखित ब्याख्या दे और स्पष्ट करे कि शहीद किसको कहा जायगा । फिर उसके प्रति क्या सम्मान एवं जिम्मेदारियाँ होंगी । हमारे अतीत के राष्ट्र नायकों एवं शहीदों की श्रेणी में किसी की घोषणा से पूर्व सरकार को चाहिए कि सारे मानकों पर हर केस का गहन परीक्षण करे अन्यथा सच्चे सपूतों के साथ हमलोग कृतघ्नता के दोषी होंगे ।
                         मानकों पर खरा उतरने की बात ही क्या हो जब हम भारतीयों का एक बड़ा वर्ग अभी भी नहीं जान पाया है कि यह सरबजीत वस्तुतः कौन था ,वह क्या करता था और कैसे पाकिस्तान पहुँच गया !या तो वह स्वयं सीमा लाँघ कर पाकिस्तान पहुँचा होगा या सीमा लंघा कर उसे पाकिस्तान पहुँचाया या खींच लिया गया होगा । इन तीनों स्थितियों में किसी न किसी का कोई मन्तब्य रहा होगा ।पाकिस्तान कहता रहा है कि वह दहशतगर्द था जो पाकिस्तान में  दहशत फ़ैलाने आया था । हमलोग सुनते हैं कि वह भूलवश सीमा लाँघ गया था । सब मिलाकर ऐसा लगता है कि सीमा लाँघने और लंघाने का काम बार्डर पर होता रहता है । फिर तो पाकिस्तान की जेलों में ऐसे बहुत सारे सरबजीत होंगे । मन नहीं मानता ,कहीं आंधी -तूफान और चक्रवाती हवाएँ इन सीमावर्ती वासिन्दों को सीमापार फेंक तो नहीं देती हैं ;फिर दोनों ही सरकारें सारे काम -काज छोड़ ऐसे बदनसीबों के पीछे पिल पड़ती हैं ताकि अन्य बातों से जनता का ध्यान हटाया जा सके । अब सरबजीत मामले में सबकुछ ख़त्म होने के बाद सरकार को उनकी एक रीयल स्टोरी जारी कर देनी चाहिए ताकि शंका निर्मूल होसके और शहीद की अवधारणा प्रश्न चिन्हित न हो ।
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अंततः
अर्जुन ने अपना विचार व्यक्त किया
                          चंचलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बल्वददृढं ।
                          तस्याहं  निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करं ।६ /३ ४
श्री भगवान ने समाधान बताया --
                          असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलं ।
                          अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते । ६ /३ ५
(मनकी चंचलता निरंतर अभ्यास एवं वैराग्य से ही मिटाई जा सकती है)
13 May 2013                                                         Mangal-Veena.Blogspot.com
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मंगलवार, 16 अप्रैल 2013

बीजेपी !सावधान

        लोकसभा चुनाव की रणभेरी अभी बजी भी नहीं कि धर्मनिरपेक्षता के नामपर भाजपा का एक सहयोगी दल उसके चरित्र और चेहरे पर ग्रहण लगाने पर तुल गया । आम आदमी जदयू के इस शतरंजी चाल से नहीं बल्कि भाजपा के इस मौकेपर अनिर्णय की स्थिति पर अचंभित है । बीजेपी की वैशाखी सहारे खड़ा बिहार का मुख्यमंत्री जब  बीजेपी के सर्वाधिक लोकप्रिय नेता एवं गुजरात के मुख्यमंत्री को नान - सेक्यूलर कहतेहुये उसके विकास माडल को ख़ारिज किया ,तत्काल बीजेपी को इस मारेसि मोहिं कुठाँव का मुंहतोड़ प्रतिकार गठबन्धन तोड़कर करना चाहिए था,परन्तु ऐसा नहीं हुआ । फिर देश के दूसरे सबसे बड़े राजनीतिक दल को ऐसे लांछन सहने का कोई बडा लाभकारी कारण होना चाहिए जिसे आम आदमी नहीं समझ पा रहा है । जहाँ नरेन्द्र मोदी की लोक प्रियता के आधार पर आगामी चुनाव में बीजेपी केलिए दोसौ का आंकड़ा पार होने की संभावना है,वहां बीस के आसपास खेलने वाला टंगड़ी मार रहा है ।
        भारतीययुवा मतदाता की सोच है कि अब चुनाव विकास ,बेहतरी एवं भ्रष्टाचार मुक्ति जैसे मुद्दों पर लड़े और जीते जांय जबकि अधिकांश दल और नेता जाति एवं धर्म के नाम पर समाज को तोड़कर चुनाव लड़ने में दक्ष हैं । ऐसे लोग अपने कुटिल चाल में सफल भी होते रहे हैं ।चाल फिर चल दिया गया है ।इसलिए सावधान बीजेपी । मुद्दे से  भटकना  आत्मघाती हो सकता है । पूरा देश कांग्रेस के अधिनायकवाद, भ्रष्टाचार, कुशासन एवं संवेदनशून्यता से त्रस्त है। सभी चाहते हैं कि बीजेपी जैसा राष्ट्रीय दल देश को चलाने एवं कांग्रेस को राजनीतिक टक्कर देने की स्थिति में बना रहे । यह हमारे लोकतंत्रऔर विकास केलिए आवश्यक  है ।इस अपेक्षा पर भी बीजेपी को खरा उतरना है ।
        गुजरात में  सामने दिखता विकास एवं इसके प्रतीक नरेद्र मोदी आज ऐसे दो कारण हैं जिनसे प्रेरित होभाजपा का खोया जनाधार वापस भाजपा की ओर मुड़ने की सोच रहा है ।देश के हर नुक्कड़-चौराहे पर, विविध मंचों पर, समाचारपत्रों एवं सोशल मिडिया में मोदी का देश का सर्वाधिक लोकप्रिय नेता
होना स्वीकृत एवंचर्चित विषय है । विभिन्न विचारधाराएँ भी चाहती हैं कि आगामी लोकसभा चुनाव भाजपा से नरेन्द्र मोदी एवं कांग्रेस से राहुल गाँधी के भावी प्रधान मंत्री पद की दावेदारी मुद्दे पर हो । अतः सामने कांग्रेस को देखते हुए तत्कालभाजपा को अपनी पार्टी की ओर से नरेन्द्र मोदी को भावी प्रधान मंत्री पद का दावेदार घोषित करना चाहिए और पूरी पार्टी को एक जुट होकर आडवानी जी के दिशा निदेशन में चुनाव में कूद पड़ना चाहिए । यदि दोसौ का आंकड़ा बीजेपी छू लेती है तो सरकार बीजेपी नेतृत्व वाली गठबंधन ही बनाये गी और जदयू इधर -उधर झांकती दिखेगी । इसके बिपरीत लक्ष्य से पिछड़ने पर कोई गठजोड़ काम नहीं बना सके गा । फिर रणभूमि में उतरने से पहले अर्जुन की भांति मोह क्यों ?
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अंततः
जबतक हमारे देश में प्रधान मंत्री और मुख्य मंत्रियों का चुनाव सीधे मतदाताओं के मतदान से होने की संवैधानिक ब्यवस्था नहीं होगी ,भ्रष्टाचार मिटाने का कोई निर्णायक प्रयास नहीं होगा ,सीबीई जैसी संस्थाएं स्वायत्त नहीं होंगी और बिना आमदनी बढ़े महंगाई बढती रहे गी ;आम आदमी असहाय मतदाता बना रहेगा ।
16 April 2013                                            Mangal-Veena.Blogspot.com
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रविवार, 7 अप्रैल 2013

युवाओं के प्यार से जुड़ा यौन अपराध

            यदि प्यार शब्द LOVE का समानार्थी है तो जी हाँ, युवाओं का प्यार यौन अपराधों को बढ़ावा देता है। पहले भी यह शब्द भारतीय समाज में था, परन्तु इतना ब्यापक नहीं था जितना पश्चिमी सभ्यता के भौतिकवाद में। राधा-कृष्ण, नल-दमयन्ती, दुष्यंत-शकुंतला जैसे शालीन एवं अनुकरणीय उदाहरण हमारे अपने भारत के हैं जिनकी तुलना आज के युवाओं के प्यार से करना न ही उचित है न संभव। आज हम जिस प्यार की बात करते हैं, वह शब्द और संस्कृति पश्चिमवालों ने बड़े प्रयास से विदेशी शिक्षा एवं भारतीय सिनेमा के माध्यम से भारत में स्थापित किया और अब वेलेन्टाइन डे की स्वीकृति के साथ उस प्यार का पूर्ण प्रदार्पण हो चुका है।
            आज भारत में बनने वाले अधिकांश फार्मूला चलचित्रों के विषयवस्तु प्यार एवं अपराध के प्रेरक ही तो हैं। जो सिनेमा में होता है, वह कालेज और विश्वविद्यालयों में अनुकरण होकर, समाज में जहर की तरह फैलता है। आज के युवक एवं युवतियां जब प्यार की उम्र में पहुचते हैं तो तो इनके दो छोर बनते है, पहला सुन्दर काया  और सम्पन्नता वाला छोर, दूसरा इससे आंशिक या पूर्ण वंचित छोर। कोई रिझने में मुग्ध तो कोई रिझाने में और कोई असफल होने पर यौन अपराधों में लीन। अपराध का सम्बन्ध सदैव भूख से रहा है और यदि प्यार के कारण यौन अपराध हो रहा है तो निश्चय ही यह प्यार एवं इसमे ब्यवधान भी किसी अन्य शारीरिक भूख के कारण हैं और कुछ नहीं। फिर अपराध तो अपराध है और इसमें कमी लाने के लिए इस प्यार की संस्कृति में बदलाव लाना भी सभ्यता की पुकार है।
            हाल ही में एक अंग्रेजी समाचार पत्र के सम्पादकीय पृष्ठ पर एक दृष्टिकोण छपा था कि फ़िल्में हमें वह देती हैं जो हम चाहते है। बड़ी अजीब बात है कि मनोरंजन से जुडी इंडस्ट्री का उद्देश्य मनोरंजन से अलग क्यों होना चाहिए। यह इंडस्ट्री आज अधिकांशतः लव,सेक्स,हिंसा,यौन अपराध, रेप को उकसाती(induce) है, नकि कुछ देती है। यह उद्योग लोगों से मनोरंजन के नाम पर पैसा लेकर उन्हें गलतियों की ओर प्रेरित कर रहा है। इन्हें अपराध एवं प्यार के नायाब तरीके बताने एवं उकसाने का दायित्व किसने सौपा है?सिर्फ पैसा ने या सामाजिक दायित्व ने- एक दिन इसका सभी को उत्तर देना होगा। युवाओं का प्यार जिस रास्ते पर जा रहा है वह रास्ता विषम एवं विनष्टकारी है। समाज जितना जल्दी चेत जाय, हमारी सभ्यता के लिए उतना के लिए उतना ही अच्छा होगा क्योंकि प्यार करना सबका हक़ है और उससे वंचित होने पर अपराध बढ़ने की सदैव संभावना रहेगी।
            अच्छी बात है कि युवाओं एवं उनमें प्यार को धनात्मक दिशा देने के भी अभिनव प्रयास हो रहे हैं ।अभिभावक वर्ग भी चौकन्ना हो गया है । सेक्स एजुकेशन के लिए गंभीर प्रयास हो रहे हैं । बहुत सारी फ़िल्में स्वस्थ मनोरंजन या प्यार को केंद्र में रख कर सही दिशा में बन रही हैं ।  अतः भविष्य में यौन अपराधों में कमी की आशा भी की जा सकती है ।
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अंततः
Films give us what we want.-----------------------------------------------------NO.                                                      
Films give us what pays them crores even at the cost of let society go to hell .
7 April 2013                                                               Mangal-Veena.Blogspot.com
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